उन्नाव रेप मामला: कुलदीप सिंह सेंगर को क्यों नहीं हटा पा रही बीजेपी?

  • 30 जुलाई 2019
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ठीक 15 महीने बाद एक बार फिर उत्तर प्रदेश के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की वजह से सनसनी मची हुई है.

रायबरेली में 28 जुलाई को कुलदीप सिंह सेंगर पर रेप का आरोप लगाने वाली पीड़िता की कार को एक ट्रक ने इस तरह टक्कर मारी कि पीड़िता की चाची और मौसी की मौत हो चुकी है जबकि पीड़िता और उनके वकील फ़िलहाल लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम पर हैं. इस मामले पर विपक्षी पार्टियां सड़क से लेकर संसद तक में सवाल उठा रही हैं.

सबसे बड़ा सवाल तो हादसे के बाद यही उठ रहा है कि इस मामले में पीड़िता के साथ मौजूद सुरक्षाकर्मी उस दिन कहां ग़ायब थे, इस सवाल का कोई ठोस जवाब ना देने के बाद हादसे के बाद जब यूपी पुलिस के मुखिया ओम प्रकाश सिंह जब मीडिया के सामने आते हैं तो कहते हैं, प्रथम दृष्टया ये मामला ओवरस्पीडिंग का लगता है.

ओपी सिंह अपने बयान में जिस मासूमियत से ये कहते नजर आते हैं उससे उनका वो चेहरा तत्काल याद आता है जब ठीक 15 महीने पहले उनका विभाग कुलदीप सिंह सेंगर को गिरफ्तार नहीं करने की वजहें बता रहा था. वे खुद कह रहे थे कि माननीय विधायक जी पर तो अभी आरोप ही लगे हैं.

इन दोनों हालात में एक अंतर ये जरूर आया है कि अब कुलदीप सिंह सेंगर जेल में हैं लेकिन जेल में रहने से उनके रसूख में कहीं से कोई कमी आई हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता.

हादसे से जुड़े तमाम सवाल जिनके जवाब अभी तक नहीं मिले हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि कुलदीप सिंह सेंगर अब तक पार्टी में क्यों बने हुए हैं?

पार्टी में क्यों बने हुए हैं कुलदीप सिंह सेंगर?

इसके बारे में मीडिया ने जब संसद के बाहर यूपी से बीजेपी की सांसद चुनी गईं रीता बहुगुणा जोशी से जब पूछा गया तो उन्होंने टालने जैसा जवाब देते हुए कहा कि बीजेपी वैसी पार्टी है जो अपराधियों को संरक्षण नहीं देती है.

हाल ही में यूपी बीजेपी के अध्यक्ष बनाए गए स्वतंत्र देव सिंह ने इस बारे में बात आगे बढ़ाते हुए कहा है, "कुलदीप सिंह सेंगर पार्टी से निलंबित किए गए थे और अभी भी निलंबित हैं."

लेकिन कुलदीप सिंह सेंगर कब तक पार्टी में बने रहेंगे और क्यों अब तक पार्टी में बने हुए हैं, इस पर कोई सामने आकर कुछ नहीं कहना चाहता. राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल यूपी के एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा कि ये बात सही है कि सार्वजनिक रूप से पार्टी की छवि को ज़रूर नुकसान पहुंचा है लेकिन पार्टी इस पर विचार करके जो भी फैसला लेगी वो सामने आ जाएगा.

दरअसल इस पूरे मामले को अगर सिलसिलेवार देखें तो ये समझना मुश्किल नहीं है कि कुलदीप सिंह सेंगर के रसूख के सामने पहले योगी आदित्यनाथ की सरकार और अब बीजेपी भी बेबस नजर आ रही है.

पहले बात इस पूरे मामले के शुरुआत की. दरअसल कुलदीप सिंह सेंगर बीजेपी के टिकट पर उन्नाव ज़िले की बांगरमाउ सीट से विधायक हैं. उन पर उनके गांव माखी की रहने वाली नाबालिग़ लड़की ने चार जून, 2017 को रेप करने का आरोप लगाया. लेकिन विधायक पर कोई मामला लड़की दर्ज नहीं करा पाई थी.

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मामला दर्ज हो पाता उससे पहले आठ अप्रैल, 2018 को पीड़िता के पिता को उन्नाव पुलिस ने आठ अप्रैल, 2018 को आर्म्स एक्ट में गिरफ़्तार कर लिया. इसके बाद पीड़िता ने प्रदेश के मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह करने की कोशिश की, जिसमें उन्हें बचा लिया गया था.

लेकिन पीड़िता के पिता की कस्टडी में हुई पिटाई की वजह से नौ अप्रैल, 2018 को मौत हो गई थी. सोशल मीडिया में जिस तरह की तस्वीरें और वीडियो पीड़िता के पिता के नज़र आए थे, उससे यही ज़ाहिर हुआ कि जब सत्ता आपके हाथ में हो तो सिस्टम का आप कैसे मखौल उड़ा सकते हैं और आम आदमी सत्ता में मदांध तंत्र के सामने कितना निरीह हो सकता है.

ये झलक योगी आदित्यनाथ के उस बयान में भी दिखी थी कि किसी को भी बख़्शा नहीं जाएगा, बावजूद राज्य के गृह विभाग के सचिव और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक कुलदीप सिंह सेंगर को विधायक जी और माननीय विधायक जी कहते नज़र आए.

जब पत्रकारों ने पुलिस महानिदेशक के माननीय कहने पर आपत्ति जताई तो राज्य के पुलिस प्रमुख ये बताने लगे कि अभी तो उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता, अभी तो आरोप लगे हैं. इस पर जब मीडिया में हंगामा मचा तो 12 अप्रैल, 2018 को मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया.

इसके बाद 7 जुलाई, 2018 को सीबीआई ने पीड़िता के पिता की मौत के मामले में आरोपपत्र दाखिल किया. इसके बाद 11 जुलाई, 2018 को विधायक पर बलात्कार का मामला दर्ज किया. पीड़िता नाबालिग़ थी इसलिए पॉक्सो एक्ट (प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ़्रॉम सेक्शुअल ऑफ़ेंसेस एक्ट, 2012) के तहत भी ये मामला दर्ज किया गया.

13 जुलाई, 2018 को कुलदीप सिंह सेंगर से सीबीआई ने लगातार 16 घंटे पूछताछ करने के बाद उन्हें गिरफ़्तार किया. इसके बाद 13 जुलाई को ही सीबीआई ने कुलदीप सिंह सेंगर पर पीड़िता के पिता के ख़िलाफ़ झूठा आरोप लगाने का मामला दर्ज किया.

लेकिन इन मामलों में अब तक किसी में भी सुनवाई शुरु नहीं हो पाई है.

दबदबे की वजह

पीड़िता के परिवार को लगातार डराने और धमकाने की बात भी सामने आ रही है. पीड़िता के चाचा को एक पुराने मामले में जेल में डाल दिया गया है और मामले के एक गवाह की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है.

अब रायबरेली में हुए हादसे के बाद उनपर एक बार फिर से हत्या और हत्या के प्रयास सहित कई मुक़दमे दर्ज कराए गए हैं, लेकिन पार्टी में उनकी मौजूदगी को लेकर कहीं से सवाल नहीं उठ रहा है.

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कुलदीप सिंह सेंगर का ये दबदबा तब देखने को मिला जब वे परंपरागत तौर पर भारतीय जनता पार्टी के तौर पर प्रशिक्षित नेता नहीं हैं. वे ना तो संघ की शाखाओं में निखरे हैं और ना ही भारतीय जनता पार्टी के मूल्यों में उनकी कोई आस्था रही है. वे पूरी तरह से अवसरवादी राजनीति का चेहरा हैं.

वे पहले 2002 में बहुजन समाज पार्टी से विधायक बने थे, फिर 2007 और 2012 में समाजवादी पार्टी के विधायक रहे और 2017 में ठीक चुनाव से पहले बीजेपी में जमा हुए नेताओं की कतार में आ गए.

बीते 17 साल से विधायकी और 50 साल से परिवार की पंचायती और प्रधानी ने कुलदीप सिंह सेंगर को वो दबंगई तो दी ही है जिसकी वजह से बलात्कार के आरोपों के बीच कभी वो मुख्यमंत्री सचिवालय में खिलखिलाते नज़र आए और कभी लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के आवास के बाहर कहते नज़र आए कि आरोप ही लगा है, भगोड़ा तो नहीं हूं.

इसकी क्या वजह हो सकती है? इसकी दो ठोस वजहें दिखाई देती हैं- एक तो कुलदीप सिंह सेंगर, योगी आदित्यनाथ की बिरादरी से आते हैं. संयोग ऐसा है कि जिस थाने ने पीड़िता का मामला दर्ज नहीं किया था, वहां के थानेदार से लेकर ज़िला पुलिस प्रमुख और राज्य पुलिस के मुखिया तक, सब के सब ठाकुर रहे हैं.

राज्य की राजनीति पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता बताते हैं, "यूपी के मुख्यमंत्री के साथ पुलिस महानिदेशक भी ठाकुर हैं और कुलदीप सिंह सेंगर भी. ऐसे में समझना मुश्किल नहीं है कि उन्हें इसका फ़ायदा तो मिला होगा क्योंकि यूपी की राजनीति में यह हमेशा नजर आता है कि जातीयता एक बड़ा रोल निभाती रही है."

इसके अलावा मौजूदा समय में राजपूत या ठाकुरों का तबका भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा समर्थक वर्ग भी है, संभवतः इसलिए भी पार्टी एक दबंग ठाकुर विधायक के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर अपने समर्थक वर्ग को थोड़ा भी नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती है.

हालांकि, एक बात ये भी कही जा रही है कि जिन लोगों के सहारे कुलदीप सिंह सेंगर बीजेपी में आए थे, वो योगी आदित्यनाथ के विपक्षी समझने जाने वाले खेमे के लोग हैं. माना जाता है कि राज्य में बीजेपी के संगठन मंत्री सुनील बंसल और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या, कुलदीप सेंगर को बीजेपी के पाले में लेकर आए थे.

बीजेपी में उन्हें लाने की बड़ी वजह सेंगर का अपने इलाक़े में अच्छा-ख़ासा प्रभाव रहा था.

सेंगर की ख़ासियत

कुलदीप सिंह सेंगर 2002 में पहली बार उन्नाव सदर से बीएसपी के टिकट पर विधायक चुने गए थे. यह पहला मौका था जब इस सीट पर किसी बीएसपी उम्मीदवार को जीत हासिल हुई थी. इसके बाद बांगरमाउ से 2007 में वे समाजवादी पार्टी की टिकट पर विधायक चुने गए.

2012 में वे भगवंतनगर विधानसभा सीट से बीजेपी के विधायक बने. यानी बीते 17 सालों में वे उन्नाव की तीन विधानसभा सीटों की तीन अलग अलग पार्टियों से नुमाइंदगी कर चुके हैं. उनका पूरे जिले में अच्छा प्रभाव रहा है.

यही वजह है कि उन्नाव से सांसद चुने जाने के बाद साक्षी महाराज जेल में उनसे मिलकर धन्यवाद देना नहीं भूलते.

शरद गुप्ता बताते हैं, उन्नाव की संसदीय सीट पर कुलदीप सिंह सेंगर इतने प्रभावी तो हैं ही कि वे किसी को चुनाव हरवा सकते हैं, जिसे चाहें जितवा सकते हैं.

ये भी दिलचस्प है कि सेंगर के परिवार की राज्य के कुछ ठाकुर राजनीतिक परिवारों से रिश्तेदारियाँ भी हैं जिसके चलते उनके रिश्तेदार दूसरी पार्टियों मं भी मौजूद हैं.

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राज्य की राजनीति पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता बताते हैं, दरअसल कुलदीप सिंह सेंगर अपने क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय नेता हैं. लिहाजा पार्टी हाईकमान की वो बहुत परवाह नहीं करते हैं.

इसकी एक झलक अखिलेश यादव की सरकार के दौरान भी देखने को मिली थी, जब वे सपा के विधायक हुआ करते थे. पार्टी हाईकमान की इच्छा के परे जाकर कुलदीप सिंह सेंगर ने अपनी पत्नी संगीता सेंगर को जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए खड़ा करवाया.

शरद गुप्ता कहते हैं, "सपा सरकार की मशीनरी ने संगीता सेंगर को हरवाने के लिए पूरा जोर लगा दिया था लेकिन कुलदीप सिंह सेंगर अपनी पत्नी को अध्यक्ष बनवाने में कामयाब रहे. आज भी अगर वे इस्तीफ़ा देकर चुनाव लड़ेंगे तो जीत जाएंगे, इतना गुडविल तो है ही."

कहते हैं कि राजनीति के साथ साथ ठेकेदारी में हाथ आजमाने वाले कुलदीप सिंह सेंगर ने जो पैसा कमाया है, उसे अपने क्षेत्र के लोगों के बीच ख़ूब बांटा भी है. अपने इलाके के हर घर परिवार में होने वाले आयोजन में पहुंचकर वहां कुछ ना कुछ मदद करने का भाव उनमें रहा है.

ऐसे में हो सकता है कि कुलदीप सिंह सेंगर ज़्यादा अंतर से चुनाव जीत जाएं. ये भी हो सकता है कि उन्हें भारतीय जनता पार्टी की भी जरूरत नहीं हो.

राजनीतिक तौर पर उनके ख़िलाफ़ साज़िश होने की बात भी होती रही है, लेकिन आशंका के पक्ष में कोई ठोस वजह नज़र नहीं आती.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए वे क्यों ज़रूरी बने हुए हैं? इसके जवाब में बीजेपी के एक नेता कहते हैं कि वे जेल में हैं ही, सीबीआई जांच कर ही रही है और क्या किया जाए. आरोप सिद्ध तो नहीं हुआ है कि पार्टी निकाल बाहर करे.

लेकिन जानकार यही बताते हैं कि बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ की नीति को आगे बढ़ाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी की छवि को कुलदीप सिंह सेंगर की वजह से पूरे देश में नुकसान पहुंच रहा है.

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