जौहर यूनिवर्सिटीः हर ओर से क्यों घिरे हैं आज़म ख़ान?

  • 31 जुलाई 2019
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Image caption अब्दुल्लाह आजम़ स्वार-टांडा सीट से विधायक हैं

उत्तर प्रदेश के रामपुर में मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी में जांच करने पहुंची पुलिस के साथ बदसलूकी के आरोप में समाजवादी पार्टी के सांसद आज़म ख़ान के बेटे और स्वार से विधायक अब्दुल्लाह आज़म को हिरासत में लिया गया है.

अब्दुल्लाह आज़म जौहर यूनिवर्सिटी के सीईओ यानी मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी हैं. उनके पिता आज़म ख़ान यूनिवर्सिटी के संस्थापक और चांसलर हैं.

रामपुर के एसपी अजय पाल शर्मा ने बीबीसी को बताया, "अब्दुल्लाह आज़म ने यूनिवर्सिटी में पुलिस दल के साथ बदसलूकी की और जांच को रोकने की कोशिश की. उन्हें हिरासत में ले लिया गया है."

अजय पाल शर्मा के मुताबिक अब्दुल्लाह आज़म को गिरफ़्तार नहीं किया गया है.

पुलिस ने यूनिवर्सिटी परिसर से क़रीब दो हज़ार पुरानी किताबें भी बरामद की हैं. आरोप हैं कि ये किताबें रामपुर के ऐतिहासिक आलिया मदरसे से चोरी की गईं थीं.

पुलिस अधीक्षक के मुताबिक किताबों की चोरी के सिलसिले में चार लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है. ये सभी यूनिवर्सिटी के ही कर्मचारी हैं.

वहीं आज़म ख़ान ने पुलिस के इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया है कि पुलिस ही बंडलों में किताबें अपने साथ लाई थी और ले गई है और अब उन्हें चोरी का माल बता रही है.

आज़म ख़ान ने आरोप लगाया है कि जिन हज़ारों किताबों को उन्होंने संरक्षित किया है उसे रामपुर पुलिस लूट कर ले गई थी.

उन्होंने कहा, "आज हम पर किताबों की चोरी का आरोप है. कल हम पर सिक्षा को चुरा लेने का आरोप लगेगा."

रामपुर पुलिस इस समय आज़म ख़ान, उनके बेटे अब्दुल्लाह आज़म और यूनिवर्सिटी से जुड़े कर्मचारियों के ख़िलाफ़ कई आरोपों की जांच कर रही है.

इनमें ज़मीन क़ब्ज़ाने, फ़र्ज़ी दस्तावेज़ बनाने से लेकर चोरी तक के आरोप हैं.

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Image caption पुलिस ने यूनिवर्सिटी परिसर से शेर की दो मूर्तियां भी बरामद की हैं. पुलिस का कहना है कि ये मूर्तियां रामपुर क्लब से चोरी की गईं थीं

आलिया मदरसे से किताबें चोरी होने का आरोप लगाने वाले मौलाना मोहब्बे अली नईमी ने बीबीसी को बताया, "आज़म ख़ान ने समाजवादी पार्टी के शासनकाल के दौरान अपनी रसूख़ और सत्ता की ताक़त का इस्तेमाल करते हुए 1774 में बने ऐतिहासिक आलिया मदरसे को एक रुपए सालाना की दर से लीज़ पर ले लिया था."

उन्होंने आरोप लगाया, "आलिया मदरसे की बेशक़ीमती किताबें और फ़र्नीचर भी क़ब्ज़ा कर लिया गया था."

मोहब्बे अली के मुताबिक उन्होंने आरटीआई के ज़रिए किताबों के बारे में जानकारी हासिल की थी और फिर इनके चोरी होने की शिकायत पुलिस को दी थी.

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक मदरसे में 9 हज़ार से अधिक किताबें थीं.

रामपुर पुलिस के मुताबिक आलिया मदरसे से जुड़ी किताबों के अलावा मदरसे का प्राचीन फ़र्नीचर भी ज़ौहर यूनिवर्सिटी से बरामद किया गया है.

आलिया मदरसे का इतिहास

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Image caption मदरसा आलिया की स्थापना 1774 में रामपुर के तत्कालीन नवाब ने की थी

इस मदरसे की स्थापना रामपुर रियासत के तत्कालीन नवाब फ़ैसुल्लाह ख़ान ने 1774 में की थी. 15 मई 1949 को जब रामपुर रियासत भारतीय गणतंत्र में शामिल हुई तो तत्कालीन नवाब ने सरकार से गुज़ारिश की थी कि इस मदरसे को सरकारी पैसे से चलाया जाता रहे. इस मदरसे को ओरिएंटल कॉलेज भी कहा जाता रहा है.

मौलाना नईमी के मुताबिक, "साल 2001 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने इसकी अहमियत को देखते हुए इसे अरबी फ़ारसी विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा की. सरकार की ओर से करोड़ों रुपए का फंड भी मदरसे को मिला. लेकिन राज्य में समाजवादी पार्टी की सत्ता आने के बाद आज़म ख़ान की नज़रें इस मदरसे पर पड़ गईं और उन्होंने अपने प्रभाव से इसे लीज़ पर ले लिया."

मोहब्बे अली बताते हैं, "एक ज़माने में ये मदरसा इस्लामी शिक्षा का केंद्र था. मौलाना मोहम्मद अली ज़ौहर ने भी यहां से शिक्षा प्राप्त की थी. सिर्फ़ भारत के ही नहीं बल्कि दुनियाभर के छात्र यहां पढ़ने के लिए आते थे. लेकिन फिर अनदेखी की वजह से इस मदरसे की विरासत खोती चली गई."

उनके मुताबिक इस समय मदरसे की जगह में रामपुर पब्लिक स्कूल चलता है. ये स्कूल भी आज़म ख़ान के ट्रस्ट का ही है.

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रामपुर के ज़िलाधिकारी आंजनेय कुमार सिंह ने बीबीसी को बताया, "ये मदरसा फिलहाल आज़म ख़ान के ट्रस्ट के पास लीज़ पर है. सरकार चाहे तो कैबिनेट में प्रस्ताव पास करके इसे रद्द कर सकती है."

अंजनेय कुमार सिंह बताते हैं, "इस मदरसे को अरबी-फ़ारसी यूनिवर्सिटी बनाने का प्रस्ताव था. यदि यह मदरसा यूनिवर्सिटी बनता तो ये यूपी में अरबी भाषा की अपनी तरह की पहली यूनिवर्सिटी होती. इस मदरसे का संबंध मिस्र की अल-अज़हर यूनिवर्सिटी से भी रहा है."

वो कहते हैं, "हमने मदरसे की पूरी जांच करके रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. आगे की कार्रवाई का निर्णय सरकार को लेना है."

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ज़मीन क़ब्ज़ाने के आरोप

आरोप है कि यूनिवर्सिटी के लिए किसानों की ज़मीन ज़बरदस्ती ली गई. ऐसे कई किसानों ने अब ज़िला प्रशासन को आज़म ख़ान और यूनिवर्सिटी प्रशासन के ख़िलाफ़ शिकायत दी है.

किसानों की ओर से शिकायत करने वाले मुस्तफ़ा हुसैन बताते हैं, "जिन किसानों की ज़मीन यूनिवर्सिटी परिसर के आसपास थी उनकी ज़मीन ज़बरदस्ती ली गई. कई किसान ऐसे भी हैं जिनकी ज़मीन की घेराबंदी कर ली गई और उनके रास्ते बंद कर दिए गए. ऐसे ही किसानों ने यूपी में सरकार बदलने के बाद शिकायत दर्ज करवाने की हिम्मत की है. इन्हीं किसानों की शिकायतों पर कार्रवाई हो रही है."

वो बताते हैं, "सिर्फ़ किसानों की ज़मीन ही नहीं बल्कि सरकारी भूमि का इस्तेमाल भी यूनिवर्सिटी के लिए किया गया है. प्रशासन ने हाल ही में ऐसी ज़मीनों को वापस लेने की कार्रवाई शुरू की है."

आलिया मदरसे को आज़म ख़ान के ट्रस्ट को दिए जाने की जांच यूपी सरकार ने एसआईटी को सौंप दी है.

इस मदरसे के बारे में एक वीडियो में दिए बयान में आज़म ख़ान ने कहा है, "अरबी कॉलेज जो चालीस पैंतालीस साल पहले बंद हो गया, जिसका इतिहास ख़त्म हो गया, जिसकी इमारत खंडहर हो गई है. जिसमें आज बच्चों का स्कूल चल रहा है."

विवादों में रही है आज़म ख़ान की यूनिवर्सिटी

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आज़म ख़ान ने साल 2005 से यूनिवर्सिटी बनाने के प्रयास शुरू किए थे. इस यूनिवर्सिटी का शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 18 सितंबर 2006 को किया था. इस दौरान यूपी सरकार के सभी मंत्री रामपुर में मौजूद थे.

बाद में जब बहुजन समाज पार्टी की सरकार आई तो सरकारी ज़मीन पर बनाई गई दीवारों को तोड़ दिया गया और यूनिवर्सिटी का काम रुक गया. इसके बाद प्रदेश में जब फिर से सपा सरकार आई तो आज़म ख़ान ने अपनी पूरी ताक़त इस यूनिवर्सिटी को बनाने में लगा दी.

ज़िलाधिकारी के मुताबिक, "ये यूनिवर्सिटी क़रीब 78 हेक्टेयर भूमि में बनी है जिसमें से 38 हेक्टेयर के क़रीब ज़मीन या तो सरकारी है या शत्रु संपत्ति है या दलितों से अनियमित रूप से ली गई है."

ज़िलाधिकारी अनंजेय कुमार सिंह बताते हैं, "जो बाकी की चालीस हेक्टेयर ज़मीन है वो भी अधिकतर अनियमितता करके ही ली गई है. इस क्षेत्र में तीन बार सर्किल रेट कम किया गया है. इसकी भी जांच की जा रही है. इसके अलावा किसानों से ली गई 5-6 हेक्टेयर भूमि भी विवादित है."

ज़िलाधिकारी के मुताबिक यूनिवर्सिटी के निर्माण में लगभग 88 करोड़ रुपए सरकारी धन से लगे हैं.

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इस यूनिवर्सिटी का संचालन मौलाना मोहम्मद अली ज़ौहर कल्याण ट्रस्ट करती है जिसके अध्यक्ष आज़म ख़ान स्वयं हैं. इसके अलावा उनकी पत्नी और दोनों बच्चे भी ट्रस्ट से जुड़े हैं. ट्रस्ट से जुड़े अन्य लोग भी या तो आज़म ख़ान के रिश्तेदार हैं या बेहद क़रीबी हैं.

रामपुर प्रशासन अब यूनिवर्सिटी से जुड़े विवादों और अवैध तरह से ज़मीन हासिल करने के आरोपों की जांच कर रहा है.

ज़िलाधिकारी कहते हैं, "हमने किसी भी मामले का स्वतः संज्ञान नहीं लिया है. हम शिकायतों पर कार्रवाई कर रहे हैं. बहुत सी शिकायतें उन लोगों ने दी हैं जिनकी ज़मीनों पर क़ब्ज़ा किया गया है."

उन्होंने बताया, "यूनिवर्सिटी में कई ज़मीनें ऐसी हैं जिनके मालिकाना हक़ के कोई दस्तावेज़ नहीं मिले हैं. इसके अलावा कई किसानों की ज़मीनें भी हैं जिनका कोई बयनामा नहीं कराया गया है. हमें उम्मीद है कि हम किसानों को उनकी ज़मीन वापस दिला सकेंगे."

वहीं किसानों की ओर से एसआईटी में शिकायत करने वाले मुस्तफ़ा हुसैन कहते हैं, "सरकार बदलने के बाद लोगों में अपनी बात कहने की हिम्मत आई है, समाजवादी पार्टी के शासनकाल के दौरान किसी में हिम्मत नहीं थी कि आज़म ख़ान के ख़िलाफ़ शिकायत कर सकें."

यूनिवर्सिटी का क्या होगा?

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जब ज़िलाधिकारी से ये सवाल किया गया तो उनका कहना था, "यूनिवर्सिटी का अधिकतर हिस्सा सरकारी पैसे से बना है. इसकी ज़मीन को लेकर कई तरह के विवाद हैं. हम हर एंगल से जांच कर रहे हैं. हमने अपनी जांच रिपोर्टें शासन को भेजी हैं. यूनिवर्सिटी का क्या होगा इसका फ़ैसला शासन को ही करना है."

वो कहते हैं, "हमने इस बात का पूरा ख़्याल रखा है कि हमारी कार्रवाई के दौरान यूनिवर्सिटी का शिक्षण कार्य किसी भी तरह से प्रभावित न हों. अपनी पूरी जांच के दौरान हम सिर्फ़ तीन बार यूनिवर्सिटी में गए हैं."

ज़िलाधिकारी कहते हैं, "अभी तक जो शिकायतें हमें मिली हैं हम उस पर कार्रवाई कर रहे हैं. लेकिन अगर अनियमितताओं को देखा जाए तो ये कार्रवाई बहुत कम है."

आरोपों को नकारते रहे हैं आज़म ख़ान

आज़म ख़ान सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि अगर उन पर एक भी पैसे के ग़बन का आरोप साबित होता है तो वो राजनीति से सन्यास ले लेंगे. हालांकि बीबीसी ने जब उनसे संपर्क करने की कोशिश की तो कोई जवाब नहीं मिला.

आज़म ख़ान ने मंगलवार को पुलिस की कार्रवाई पर एक वीडियो जारी कर अपना पक्ष रखा था. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस आलिया मदरसे की मुहर लगी किताबें अपने साथ बंडलों में लाई थी.

उन्होंने वीडियो में कहा, "पुलिस ने जो कार्रवाई की है वो इतिहास का ऐसा अध्याय है जिसे आने वाली नस्लें पढ़ेंगी और रोएंगी."

आज़म ख़ान ने कहा, "जौहर विश्वविद्यालय एक स्वतंत्रता संग्राम सिपहेसालार के नाम से बनाया गया है और इसको बनाने में लाखों इंसानों का ख़ून पसीना, उनकी मेहनत की कमाई शामिल है. इसे बर्बाद करने के लिए सरकारों ने क़सम खा रखी है."

वहीं समाजवादी पार्टी ने अब्दुल्लाह आज़म को हिरासत में लिए जाने के बाद कई ज़िलों में प्रदर्शन करने का ऐलान किया है.

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