आम्रपाली पर फ़ैसला संकटग्रस्त हाउसिंग सेक्टर में जान डालेगा?

  • 13 अगस्त 2019
राजेंद्र सिंह बोरा
Image caption राजेंद्र सिंह बोरा

आम्रपाली डेवलपर्स के हाउसिंग प्रोजेक्ट में सालों पहले अपना फ़्लैट करवाने वाले ग्राहको के लिए सुप्रीम कोर्ट से राहत की ख़बर आई है. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस संबंध में नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से फ़्लैट खरीदारों को आवंटन के लिए पंजीकरण शुरू करने के लिए कहा है.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों को चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने फ़्लैट का पज़ेशन देने में देरी की तो उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद अब अलग अलग प्रोजेक्टों में फंसे लोगों को उम्मीद जगी है कि उन्हें अपने सपनों का आशियाना मिल सकेगा.

छठे फ़्लोर पर अपनी बालकनी में सुबह की चाय पीते हुए राजेंद्र सिंह बोरा अधूरी पड़ी इमारत को निहारते हैं.

साल 2012 में आम्रपाली डेवलपर्स के हाउसिंग प्रोजेक्ट में अपना फ्लैट बुक कराने वाले 52 साल के राजेंद्र सिंह बोरा का ये रुटीन सा बन चुका है.

वो कहते हैं, "मैं अपने बच्चों को जो एजुकेशन देना चाहता था वो नहीं दे पाया. मध्यवर्ग की आमदनी आप समझ सकते हैं, अपनी सारी बचत उस फ़्लैट में लगाने के बाद घर चलाना बहुत मुश्किल है और सालों से वो फ्लैट अधर में लटका हुआ है. अपने खर्चे पूरा करने के लिए मुझे हर महीने दोस्तों से उधार लेना पड़ता है."

अपने फै़सले से तबाह हो चुके बोरा परिवार के पास प्रोजेक्ट के अधूरे हिस्से में एक अपार्टमेंट किराए पर लेने और अपनी क़िस्मत को कोसने के सिवाय और कोई चारा नहीं बचा था.

दुर्भाग्य से आम्रपाली प्रोजेक्ट में निवेश करने के कारण सालों से मुश्किल झेलने वाले वो अकेले नहीं हैं.

इससे कुछ मील दूर ही अपने किराए के घर में रहने वाले भारतीय सेना के एक सेवानिवृत्त अफ़सर उस दिन को कोसते हैं जब उन्होंने एक ऐसे ही प्रोजेक्ट में अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई लगा देने का फै़सला किया था.

अब 68 साल के हो चुके कर्नल (सेवानिवृत्त) खन्ना आरोप लगाते हैं, "हमने एक व्यवस्थित रिटायर्ड ज़िंदगी जीने की योजना बनाई थी और 2012 में आम्रपाली के प्रोजेक्ट में निवेश किया था. दुखद ये है कि ये फ़्लैट अभी मिलना बाकी है. हमने कैंडल मार्च से लेकर डेवलपर के कार्यालय के सामने धरना प्रदर्शन तक किया और अपनी तरफ़ से कोई कसर नहीं छोड़ी है."

Image caption कर्नल (रिटायर्ड) खन्ना जैसे हज़ारों लोगों को अपने फ्लैट का इंतज़ार है.

आम्रपाली में वित्तीय अनियमितता

ऐसे हज़ारों परिवार हैं जो सालों से बहुत अधिक मानसिक तनाव, अवसाद और धोखा खाने के अहसास लिए जी रहे हैं.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उन हज़ारों फ्लैट ख़रीदारों को राहत दी है जिनके फ्लैट धोखाधड़ी और पैसे की हेराफेरी के कारण इस डेवलपर ने सालों से नहीं दिए हैं.

आम्रपाली के कार्यकारी निदेशकों पर आरोप है कि उन्होंने होम बायर्स के 500 मिलियन डॉलर (क़रीब 3,500 करोड़ रुपये) का फंड दूसरी कंपनियों में डाल दिया और बैंक लोन को निजी हित में इस्तेमाल किया.

सुप्रीम कोर्ट ने कई बैंकों को भी इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया कि उन्होंने कंपनी को लोन देने के बाद उसकी निगरानी नहीं की.

इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी विकास प्राधिकरणों को भी आड़े हाथों लिया.

कोर्ट ने कहा, "प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) और विदेशी विनिमय प्रबंधन एक्ट (फे़मा) के नियमों का उल्लंघन कर घर ख़रीदारों के पैसे की हेराफेरी की गई."

अदालत ने सरकारी निर्माण कंपनी नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन लिमिटेड (एनबीसीसी) को आम्रपाली प्रोजेक्ट को पूरा करने की ज़िम्मेदारी सौंपी.

इसके बाद ये भी चर्चा चल पड़ी है कि एक और डेलवपर यूनिटेक का काम भी एनबीबीसी के पास आए.

आम्रपाली के हज़ारों घर खरीदारों को राहत देने के अलावा इस फै़सले का भारत के हाउसिंग सेक्टर पर व्यापक असर पड़ने वाला है.

Image caption सुप्रीम कोर्ट के वकील कुमार मिहिर.

पूरे देश में 50 लाख अधूरे फ्लैट

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कुमार मिहिर कहते हैं, "ये दो तरह से अहम है. पहली बार भारत की शीर्ष अदालत निवेशकों की मेहनत की कमाई को बचाने के लिए आगे आई है. ऐसा सरकार को करना चाहिए था. दूसरा, फै़सले में बिल्कुल साफ़ लिखा है कि ये पूरे देश में अधूरे पड़े सभी हाउसिंग प्रोजेक्ट पर लागू होगा."

एक अनुमान के मुताबिक भारत में क़रीब 50 लाख फ्लैट का निर्माण अधूरा है.

यही नहीं, पिछले पांच सालों में क़रीब डेढ़ लाख रिहाइशी फ्लैट अधर में लटक गए हैं और ख़रीदार खुद को फंसा हुआ पा रहे हैं.

इन 50 लाख अधूरे घरों में ढाई लाख एमएमआर यानी मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन में हैं, जिसमें पुणे भी शामिल है.

जबकि दिल्ली और एनसीआर में ऐसे 1 लाख 75 हज़ार अधूरे पड़े घर हैं, दक्षिण भारत में बेंगलुरु 25,000 अधूरे घरों के साथ शीर्ष पर है और इसके बाद चेन्नई और हैदराबाद का नंबर आता है.

भारतीय रीयल इस्टेट बाज़ार में एक दशक तक ज़बरदस्त उछाल रहा और माना जाता है कि ये सिलसिला 2014 तक चला.

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सालों की क़ानूनी जंग के बाद अब आम्रपाली के प्रोजेक्ट में फंसे घर ख़रीदारों को मिली उम्मीद.

संकट में रीयल इस्टेट सेक्टर

इस सेक्टर में मंदी का दौर तब दिखा जब कई अग्रणी डेवलपर और प्रॉपर्टी बाज़ार के बादशाह भी इसकी जद में आए.

जब सरकार इस सेक्टर में काले धन को रोकने के लिए गंभीर हुई, नतीजे के तौर पर इसका असर रीयल इस्टेट के कई बड़े धुरंधरों पर पड़ा. हालांकि अचानक बहुत तेज़ी से आई इस गिरावट के कई कारण थे.

शुरुआती उछाल के पीछे आसान लोन और गिरती ब्याज़ दरें प्रमुख कारणों में से एक थीं. लेकिन यही उन हज़ारों लोगों के लिए घातक भी साबित हुआ, जो रुके हुए और विवादित प्रोजेक्ट में फंस गए थे.

इसके अलावा, कृषि भूमि को बेचकर जल्दी से राजस्व बढ़ाने की राज्य सरकारों की हड़बड़ी भी मांग और आपूर्ति के बीच आए असंतुलन के प्रमुख कारणों में से एक रही है.

जैसे ही हाउसिंग सेक्टर में क़ीमतों में भारी गिरावट आई, रुके हुए प्रोजेक्टों की संख्या भी बढ़ती गई.

तो क्या सालों की निराशा के बाद, सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप फिर से चीजों को पटरी पर ला पाएगा?

Image caption ग़ुलाम ज़िया

फैसले के बाद भी संशय

रीयल इस्टेट विशेषज्ञ ग़ुलाम ज़िया को लगता है कि चीजें पहले से बेहतर हुई हैं लेकिन इस सेक्टर में समस्याएं बनी हुई हैं.

वो कहते हैं, "जिन डेवलपर को सबसे बड़ा माना जाता था, उनमें से भी कई धराशायी हो रहे हैं और आर्थिक रूप से नाकाम हो रहे हैं. ये बाज़ार की सच्चाई है जो सामने है और इसमें सबसे अधिक जिनपर असर पड़ा है वो हैं बेचारे घर ख़रीदार."

उनके मुताबिक, "सुप्रीम कोर्ट का फै़सला एक न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और उस पूरे गड़बड़झाले का जवाब नहीं हो सकता, जो हम पैदा कर रहे हैं. कहीं न कहीं कुछ नियामक फ्रेमवर्क भी होना चाहिए."

लेकिन अदालत से अपने पक्ष में फै़सला आने के बावजूद आम्रपाली और अन्य प्रोजेक्ट में फंसे घर खरीदारों में समय सीमा को लेकर संशय हैं.

अदालत ने एनबीसीसी को प्रोजेक्ट पूरा करने का आदेश दिया है लेकिन अगला सवाल है कि फंड कहां से आएगा.

चूंकि एनबीसीसी के पास अपना कोई कोष नहीं है, इसलिए वो आम्रपाली की ज़मीनों की नीलामी, बिना बिके घरों को बेचने और घर ख़रीदारों से बकाया पैसे लेने पर निर्भर है.

Image caption बलवंत सिंह

अभी रुकावटें बहुत हैं

ग्रेटर नोएडा के निवासी बलवंत सिंह पूछते हैं, "हमारे भुतहे टॉवरों में लिफ़्ट का शॉफ्ट खुला हुआ है, महिलाओं और बच्चों की कोई सुरक्षा नहीं है और ये किसी दुर्घटना का सबब हो सकता है. अब इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए हमें एनबीसीसी को बकाया 10 प्रतिशत पैसा भी चुकाना है. लेकिन मेरे पास अब पैसे नहीं हैं. और इसकी क्या गारंटी है कि ये मेरे अपार्टमेंट को पूरा करने के लिए ही इस्तेमाल किया जाएगा?"

होम लोन की किश्तें देने के साथ साथ किराया भी दे रहे बलवंत सिंह के पास अपने आधे अधूरे फ्लैट में आकर रहने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था.

ग़ुलाम ज़िया जैसे रीयल इस्टेट विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ये सब हल होने से पहले बहुत सारी बाधाएं हैं.

वो कहते हैं, "इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए ज़रूरी फंड इकट्ठा करने में बाधा हो सकती है अगर घर ख़रीदार बकाया राशि एक समय सीमा में जमा न करा पाए. ये भी ध्यान देने वाली बात है कि इनमें से अधिकांश घर ख़रीदार पहले ही अपनी पूरी बचत लगा चुके होंगे."

एनबीसीसी कितना कर पाएगी?

ये भी साफ़ है कि हो सकता है कि एनबीसीसी का विकल्प आम्रपाली के मामले में कारगर हो लेकिन इसके जिम्मे कुछ और प्रोजेक्ट आएगा तो उसके लिए भी मुश्किल बढ़ेगी.

ग़ुलाम ज़िया के मुताबिक, "इस तरह के अन्य प्रोजेक्ट को हाथ में लेने की एनबीसीसी की क्षमता को भी देखना होगा और सभी रुके हुए प्रोजेक्ट के लिए ये एक मानक हल के रूप में नहीं लिया जा सकता है."

अधिकांश भारतीय किराए पर रहने की बजाय घर खरीदने में विश्वास रखते हैं.

इसीलिए ताज्जुब है कि इतनी मंदी के बाद भी रीयल इस्टेट अभी भी आकर्षक बना हुआ है और 2030 तक इसके एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है.

लेकिन अपने अधूरे सपने के साथ रह रहे बोरा और कर्नल खन्ना जैसे हज़ारों लोग फिर से घर में निवेश नहीं करना चाहेंगे.

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