कश्मीरः मोदी सरकार ने विशेष दर्जा क्यों समाप्त किया है?

  • 6 अगस्त 2019
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Image caption जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होने पर मुंबई में जश्न मनाते लोग

जम्मू और कश्मीर से धारा 370 हटाना हमेशा से ही बीजेपी की नीति का हिस्सा रहा है. लेकिन जिस तरह से 'परिस्थितियां बनाईं गईं' और गृहमंत्री अमित शाह ने सोमवार को राज्यसभा में इसका प्रस्ताव पेश किया उसे कश्मीर पर नज़र रखने वाले और कश्मीर में वार्ताकार रहे लोग अभूतपूर्व बता रहे हैं.

प्रोफ़ेसर राधा कुमार मानती हैं कि अभी तक जो परिस्थितियां बन रही हैं उनसे चिंता और बढ़ रही है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "यदि इसका समाधान नहीं किया गया तो ये चिंता अन्य तरह की निराशाओं में बदल जाएगी."

जहां तक बीजेपी की बात है, वह पिछले कई चुनावों से अपने संकल्प पत्रों में सत्ता मिलने की स्थिति में अनुच्छेद 370 हटाकर कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने की बात करती रही है.

जम्मू-कश्मीर में हुए पिछले विधानसभा चुनावों के बाद बीजेपी ने महबूबा मुफ़्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन सरकार भी बनाई थी. पीडीपी और बीजेपी के गठबंधन को बेमेल गठबंधन भी कहा गया था.

शुरुआत में चीज़ें ठीक भी रहीं. लेकिन फिर गठबंधन में दरारें नज़र आने लगीं और अंततः राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.

इसके बाद से ही बीजेपी गवर्नर के मार्फ़त राज्य को चला रही है. राज्य में नए चुनाव कराए जाने की संभावना भी जताई गई लेकिन फिर ये बात भी पीछे छूट गई.

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Image caption जश्न मनाते भाजपा कार्यकर्ता

वरिष्ठ पत्रकार राहुल पंडिता वो देख रहे हैं जो स्पष्ट नहीं है. सुबह श्रीनगर के लिए उड़ान पकड़ने से पहले उन्होंने कहा कि बीजेपी जनसंघ के समय से ही राज्य की राजनीति में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रही है. अमित शाह ने पार्टी का अध्यक्ष होने के बावजूद राज्य में ग्राम पंचायतों तक का दौरा किया.

वो कहते हैं, "बीजेपी राज्य की राजनीतिक गतिविधियों में सीधा दख़ल चाहती है. यही वजह है कि वो निचले स्तर पर भी पार्टी के काडर को मज़बूत करने में लगे हैं. जब वो लोगों को ये बताते हैं कि वो मज़बूत हो रहे हैं तो इससे लोगों को पार्टी से जोड़ना आसान हो जाता है."

वो कहते हैं कि इसमें कोई शक़ नहीं है कि बीजेपी घाटी में अपने काडर को बहुत ही व्यवस्थित तरीके से और तेज़ी से बढ़ा रही है.

सैन्यबलों की भारी मौजूदगी, कर्फ़्यू लगाए जाने, नेताओं को नज़रबंद करने और इंटरनेट सेवाएं बाधित करने की जहां तक बात है , सरकार की ओर से वार्ताकार रहीं प्रोफ़ेसर राधा कुमार मानती हैं कि 'ये पूरी तरह से गैर ज़रूरी क़दम थे.'

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वो कहती हैं, "वो किनसे डरे हुए हैं. क्या मुफ़्ती और अब्दुल्लाह विद्रोह कर देंगे? सरकार जो चाहे प्रस्ताव ला सकती थी क्योंकि वो बहुमत में हैं. लेकिन इस तरीके से क्यों?"

संसद में प्रस्ताव रखे जाने से पहले ही पवित्र अमरनाथ यात्रा को रोक दिया गया और पर्यटकों से घाटी छोड़ने के लिए कह दिया गया.

स्कूल और शिक्षण संस्थानों में छुट्टियां घोषित कर दी गई हैं और सभी परीक्षाओं को रद्द कर दिया गया है.

लेकिन कश्मीर पर नज़र रखने वाले पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे शांति आने के बजाए असंतोष और अधिक बढ़ सकता है, ख़ाकर राज्य को बांटने के प्रावधान से.

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