कश्मीर का हाल, कश्मीर के भीतर से आंखों देखी

  • 6 अगस्त 2019
जम्मू कश्मीर में कर्फ्यू लगा है इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption जम्मू कश्मीर में कर्फ्यू लगा है

भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाकर विशेष दर्जा समाप्त करने के बाद से ही भारत प्रशासित कश्मीर का बाहरी दुनिया से सूचना संपर्क कटा हुआ है.

सभी फ़ोन लाइनें और इंटरनेट सेवाएं बंद हैं. लगातार दूसरे दिन भारत प्रशासित कश्मीर में लॉकडाउन जारी है.

स्कूल और व्यापारिक प्रतिष्ठान भी बंद हैं और सड़कों पर हज़ारों सैनिक पहरा दे रहे हैं. स्थानीय नेताओं को हिरासत में लिया गया है.

इसी बीच बीबीसी ने कश्मीर के एक इलाक़े में 1980 के दशक से ढाबा चला रहे और मूलरूप से बिहार के रहने वाले एक व्यक्ति से बात की है.

पढ़िए उन्होंने क्या बताया...

Image caption बीबीसी ने श्रीनगर के पास ढाबा चला रहे एक व्यक्ति से फ़ोन पर बात की है

मैं मूलरूप से बिहार से हूं और 1980 के दशक से कश्मीर के इस इलाक़े में अपना ढाबा चला रहा हूं.

मेरे ढाबे पर खाने सैनिक भी आते हैं और आम लोग भी आते हैं.

मैंने 1990 के दौर की मिलिटेंसी भी देखी है. लेकिन कभी ऐसा माहौल नहीं देखा है.

मैं श्रीनगर के पास के जिस इलाक़े में हूं यहां हालात शहर से थोड़े बेहतर हैं. बड़ी तादाद में सेना तैनात हैं.

लेकिन शहर के निचले इलाक़ों में तनाव है और हालात ख़राब हैं. सब बंद पड़ा है.

कुछ पता नहीं चल पा रहा है कि वहां क्या हो रहा है.

यहां बिजली आ रही है इसके अलावा संपर्क कटा हुआ है. मैं न्यूज़ नहीं देख पा रहा हूं.

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Image caption जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले मज़दूर वापस लौट रहे हैं

पहले कश्मीर का माहौल बहुत बेहतर था. लेकिन अब सब बंद बड़ा है. काम बंद है.

जो बाहर से आए मज़दूर थे वो वापस लौट रहे हैं. मैंने सुना है कि उनसे हवाई किराया नहीं लिया जा रहा है.

मेरे ढाबे पर अभी ज़्यादातर लोग सेना की ही आ रहे हैं. आम लोग नहीं आ रहे हैं.

1990 के दशक में जब हालात बहुत ख़राब थे तब भी मुझे यहां कोई परेशानी नहीं हुई.

यहां के कश्मीरी लोगों का व्यावहार मेरे साथ बहुत अच्छा रहा है. सब अच्छे से बात करते हैं.

लेकिन अब डर और भय का माहौल है. शहर के इलाक़ों में बहुत तनाव है.

370 समाप्त होने के बाद से अब कुछ कश्मीरी दोस्त मज़ाक में कह रहे हैं कि अब तो आप यहां ज़मीन अपने ही नाम से ख़रीद सकते हो.

मैं चालीस साल से यहीं रह रहा हूं और आगे भी जो भी हालात हों मुझे तो यहीं ही रहना है.

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बीबीसी संवाददाता आमिर पीरज़ादा ने सोमवार को क्या देखा?

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कश्मीर में मौजूद बीबीसी संवाददाता आमिर पीरज़ादा ने बताया कि शायद यह पहली बार है जब कश्मीर में लैंडलाइन सेवाओं को भी बंद कर दिया गया है.

पुलिस और प्रशासन अधिकारियों को सैटेलाइट फ़ोन जारी किए गए हैं क्योंकि उनके फ़ोन भी बंद हैं. सरकार के भीतर भी सैटेलाइट फ़ोन के ज़रिये ही बातचीत हो रहा है.

आमिर ने बीबीसी दिल्ली दफ़्तर में टेलीफ़ोन करके बताया, "मैं अभी जहां से आपसे बात कर रहा हूं, एक ढाबा है, वहां का टेलीफ़ोन है. यह शायद पूरे कश्मीर का इकलौता लैंडलाइन फ़ोन है जो काम कर रहा है."

उन्होंने बताया, "हम एसआरटीसी के एक टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर पर पहुंचे तो वहां यूपी-बिहार और दूसरे इलाक़ों से आए कई मज़दूर थे. हमने उनसे पूछा कि आप लोगों को यहां से जाने के लिए कहा गया था, आप गए क्यों नहीं? उनका कहना था कि उनके पैसे यहां फंसे हुए थे इसलिए उन्हें देर हो गई और आज सुबह उन्हें कोई बस नहीं मिली. वे पांच-छह घंटे से वहां इंतज़ार कर रहे थे."

"अभी लोग काफ़ी डरे हुए हैं और घरों से बाहर नहीं आ रहे हैं. बल्कि कई परिवारों ने महीनों का राशन जमा किया हुआ है. हमें भी नहीं पता कि क्या कहीं पर हिंसा हुई है या नहीं. ऐसा लगता है कि यह गतिरोध लंबा चलेगा और हिंसा की आशंकाओं को ख़ारिज नहीं किया जा सकता."

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