अमित शाह ने बिसात पर यूं चली कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने की चाल

  • 6 अगस्त 2019
इमेज कॉपीरइट EPA

राजनीतिज्ञ और प्रशासक के तौर पर उनके काम करने के तरीके की भी खूब चर्चा होती रही है लेकिन यह उतना ही मुश्किल है जितना लिफाफे को देखकर खत को समझना.

चाहे वो गुजरात के गृह मंत्री के तौर पर काम करना रहा हो या फिर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर काम करना रहा हो या फिर अभ भारत के गृह मंत्री के तौर पर काम करना रहा हो, अमित शाह ने अपने व्यवहार से कभी ये जाहिर नहीं होने दिया है कि वे क्या करने वाले हैं.

लेकिन उनके राजनीतिक करियर के संभवत सबसे अहम दिन में उनके व्यवहार में थोड़ा बदलाव जरूर दिखा.

सोमवार को सुबह 11 बजे, वे राज्य सभा और देश को संबोधित करने पहुंचे थे वो भी कश्मीर के तनावपूर्ण स्थिति पर.

जब वे संसद पहुंचे तो उनके पास के टॉप सीक्रेट दस्तावेज़ था- लेकिन सामान्य मान्यता और प्रोटोकोल के मुताबिक वह ना तो फोल्डर में था और ना ही फाइल में. अमित शाह कैमरे की तरफ मुड़े और मुस्कुराते हुए दोनों हाथ जोड़ते हुए संसद की तरफ बढ़ चले.

उन्हें संभवत इस पल का इंतजार एक सप्ताह से था, हालांकि कुछ बीजेपी नेता कहते हैं कि इस पल का इंतजार तब से था जब उनके नेतृत्व में इसी साल बीजेपी ने 300 से ज्यादा सीटें जीती थीं.

भारत प्रशासित कश्मीर बीते एक सप्ताह से तनाव के दौर से गुजर रहा है. तत्काल प्रभाव से कश्मीर में हजारों सैनिकों की तैनाती से कईयों के मन में आशंका उत्पन्न हुई थीं, कश्मीर की स्थानीय आबादी ने भी आने वाले दिनों के लिए अनाज और राशन की व्यवस्था करने लगी थी.

इमेज कॉपीरइट EPA

अमरनाथ यात्रा के लिए कश्मीर में मौजूद हज़ारों तीर्थयात्रियों को भी आतंकी ख़तरे का हवाला देते हुए सुरक्षित अपने घर लौटने के लिए कहा गया.

राज्य के नेताओं ने अपनी चिंता जरूर जाहिर की और कहा कि घाटी में कुछ ऐसा घट सकता है जो सुखद नहीं है, ऐसे लोगों को रविवार की रात से उनके घरों में नजरबंद कर दिया गया था.

सोमवार की सुबह जम्मू में कर्फ्यू लगा दिया गया और उस वक्त दिल्ली में जम्मू के मामले पर कैबिनेट कमेटी की बैठक शुरू हो गई थी.

इससे पहले अमित शाह ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नाश्ते पर करीब एक घंटे तक की बैठक की थी.

सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में ज्यादातर समय गृह मंत्री अमित शाह बोलते रहे और प्रधानमंत्री सुनते रहे. अमित शाह ने उन्हें अनुच्छेद 370 को लेकर अपनी योजना और उनके क्रियान्वन की जानकारी दी.

प्रधानमंत्री को ये बखूबी मालूम था कि उनके 'अनाधिकृत डिप्टी' बीते कई दिनों से किस अभियान में जुटे थे.

पिछले ही दिनों में हाल में चुने गए बीजेपी सांसदों की ट्रेनिंग वर्कशाप में भी वे संक्षिप्त उद्घाटन भाषण देने के बाद नहीं दिखे, जबकि इस वर्कशाप में प्रधानमंत्री मोदी ने घंटों बिताए.

इमेज कॉपीरइट EPA

लेकिन ऐसा लगा रहा है कि जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने की दिशा में मोदी और शाह अपना काम करते रहे थे.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने गोपनीयता की शर्त के साथ कहा, आप जाकर 2019 के आम चुनाव के लिए हमारा घोषणा पत्र देखिए. इसमें हमने अनुच्छेद 370 को खत्म करने के जनसंघ के समय से चले आ रहे वादे को दोहराया था. अमित जी ने 2014 में जब से पार्टी की कमान संभाली है तब से वे इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा जोर देते आए हैं.

पार्टी स्रोतों के मुताबिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े एक नेता ने संघ के शीर्ष नेताओं को पिछले कुछ समय से इस बारे में लूप रखा हुआ था.

इसकी अपनी पृष्ठभूमि भी है. मोदी सरकार 2019 में जब कहीं ज्यादा बहुमत से सरकार में आयी तो इसको लेकर भी खूब अटकलें लगीं कि अमित शाह पार्टी में रहेंगे कि सरकार में शामिल होंगे.

फिर इस बात पर भी कयास लगाए गए कि वे वित्त मंत्री बनेंगे या गृह मंत्री. प्रधानमंत्री ने उनके लिए गृह मंत्रालय का चुनाव किया क्योंकि गुजरात के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के तौर पर दोनों गुजरात सरकार चला चुके थे.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
संसद में आर्टिकल 370 के प्रस्ताव से पहले जम्मू में कर्फ्यू

लेकिन कश्मीर और अनुच्छेद 370 को लेकर बीजेपी की योजना भी एक बड़ी वजह रही होगी जिसके चलते शाह को गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई. उनसे पहले गृह मंत्री रहे राजनाथ सिंह को जम्मू कश्मीर के मसले पर मेल मिलाप करने वाला नेता माना जाता रहा.

2014 में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के अपने उद्घाटन भाषण में राजनाथ सिंह ने कहा था, "जम्मू कश्मीर हमारे लिए एक गंभीर और संवेदनशील इलाका है. अगर राज्य का विकास अनुच्छेद 370 से हो रहा है तो हमें इसे बनाए रखने में कोई आपत्ति नहीं है."

हालांकि पिछले कुछ सालों में वे अनुच्छेद 370 को हटाने की बात करने लगे थे क्योंकि उनके मुताबिक इससे राज्य के लोगों को कोई मदद नहीं मिली.

यह बात भी उभरकर सामने आ रही है कि इस योजना को बनाने और लागू करने में वे अकेले नहीं थे और उन्हें कईयों का समर्थन हासिल था. लेकिन उनके आलोचक उनके तानाशाह और अलोकतांत्रिक रवैए की आलोचना कर रहे हैं.

उनके सबसे भरोसेमंद लेफ्टिनेंट भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल रहे.

इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption सरकार के अनुच्छेद 370 से जुड़े फ़ैसले की ख़बर पढ़ते लोग

बीते एक महीने में डोभाल ने कई बार कश्मीर का दौरा किया और वहां के हालात का जायजा लिया. एक बड़ा फ़ैसला लेने से पहले उन्होंने वहां की सुरक्षा की स्थिति को भांपा-परखा है.

उन्होंने हाल ही में बीवीआर सुब्रमण्यम को राज्य का मुख्य सचिव बनवाया ताकि श्रीनगर से नियमित तौर पर फीडबैक मिलता रहे.

सुब्रमण्यम प्रधानमंत्री कार्यालय में वरिष्ठ पद पर तैनात थे और मौजूदा समय में प्रधानमंत्री मोदी के सबसे भरोसेमंद अधिकारी के तौर पर जाने जाते हैं.

इसके अलावा गृह सचिव राजीव गाबा अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अमित शाह के साथ उन परिस्थितियों के लिए प्रशासनिक स्तर का काम कर रहे थे जो इस घोषणा के बाद उत्पन्न होने वाली थी, वहीं क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद सरकार के फैसले का क़ानूनी पक्ष का जिम्मा संभाले हुए थे.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
आर्टिकल 370: पाकिस्तान में विरोध-प्रदर्शन

अनुच्छेद 370 के जरिए कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किए जाने से फ़ायदा होगा या नहीं, इस पर चर्चाओं का दौर जारी है, वहीं सरकार इसकी क़ानूनी समीक्षा के लिए भी तैयार है.

बहरहाल, अमित शाह एक बार फिर बीजेपी और सरकार दोनों जगह मोदी के बाद दूसरे नंबर के आदमी साबित हुए हैं.

अमूमन ऐसा होता नहीं है कि भारत के प्रधानमंत्री अपने कैबिनेट मंत्री के भाषण को ट्वीटर पर शेयर करते हुए उसे विस्तृत और गहरी जानकारी देने वाला बताएं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार