जम्मू-कश्मीर पर चीन की प्रतिक्रिया को भारत नज़रअंदाज नहीं करेः नज़रिया

  • 8 अगस्त 2019
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जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के भारत सरकार के क़दम को लेकर कई हलकों से बहुत गंभीर प्रतिक्रियाएं आई हैं.

सबसे अहम प्रतिक्रिया भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन से आई, जो जम्मू-कश्मीर प्रांत के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण रखते हैं. भारत इन हिस्सों पर अपना दावा करता है.

इसे याद रखना महत्वपूर्ण है कि ये दोनों ही पड़ोसी मुल्क परमाणु शक्ति संपन्न हैं और इनके बीच आपसी ताल्लुकात भी विशेष हैं. ये दोनों भारत के साथ युद्ध भी लड़ चुके हैं.

सीमा विवाद और अन्य तनावों के कारण इन दोनों देशों के साथ भारत के संबंध लंबे वक़्त से प्रतिकूल रहे हैं.

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यह पृष्ठभूमि ही इतना बताने के लिए काफ़ी है कि आख़िर क्यों पाकिस्तानी नेतृत्व ने पहले तो अपने कमांडरों और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के साथ गहन विचार-विमर्श किया और फिर अपनी संसद का संयुक्त सत्र बुलाया.

संसद में यह प्रस्ताव रखा गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से भारत की ओर से उठाए गए क़दम पर आपातकालीन सत्र बुलाने का आग्रह किया जाए.

पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा ने कश्मीरियों की मदद के लिए सेना के 'किसी भी हद तक जाने' के लिए तैयार होने की बात कही है.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारत के इस फ़ैसले पर दो तरह की संभावनाओं की ओर इशारा किया. उन्होंने दोबारा 'पुलवामा' जैसे आत्मघाती हमले और भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध की बात की.

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की दूसरी बैठक के बाद पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर कुछ नीतिगत फै़सलों का ऐलान किया- उच्चायुक्तों को वापस बुलाना, द्विपक्षीय व्यापार रोकना और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर निए सिरे से विचार करना.

हालांकि, इनके बयानों को दुनिया के अधिकांश देश उनकी अपनी जनता के बीच की गई बयानबाज़ी के रूप में देख रहे हैं. उनका मानना है कि पाकिस्तान किसी भी तरह की भारत विरोधी गंभीर कार्रवाई शुरू करने की स्थिति में ही नहीं है.

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कितनी महत्वपूर्ण हैं ये प्रतिक्रियाएं?

अगर चीन के साथ उसके अहम रिश्ते को केंद्र में रखकर देखें तो पाकिस्तान की ये प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं. विशेषज्ञ पाकिस्तान को चीन के संरक्षण में रहते हुए उसी की भाषा बोलने वाला बताते हैं.

जैसा कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान होता आया है, इस बार भी चीन की प्रतिक्रिया ने ही पाकिस्तान का रुख़ तय किया.

भारत के मामले में चीन छद्म रूप से पाकिस्तान का इस्तेमाल करता आया है जबकि ख़ुद हमेशा नपे-तुले क़दम चलता है. ऐसे में चीन की प्रतिक्रिया, जिसके गहरे मायने हैं, उसका गंभीर विश्लेषण और व्याख्या करने की ज़रूरत है.

सबसे पहले तो वैश्विक स्तर पर चीन आज एक बड़ा कद्दावर देश है जहां उसका एक छोटा से छोटा क़दम भी काफी वज़नदार लगता है. ख़ासकर बात जब एशियाई मामलों की आती है तो निश्चित तौर पर यहां वह हर मामले में सबसे बड़े देश के रूप में अपनी पहचान रखता है.

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चीन की चिंताओं के कारण

हाल के दिनों में दुनिया ने चीन की विस्तारवादी नीतियों को देखा है जो अपने पड़ोसी मुल्कों में भारत को उभरते समकक्ष प्रतियोगी के रूप में पाता है.

अमरीका और उसके जो मित्र देश चीन की इन विस्तारवादी नीतियों का विरोध करते हैं, उनकी भारत से बढ़ती क़रीबी चीन के लिए चिंता का विषय रहा है. भारत द्वारा अपने जम्मू-कश्मीर प्रांत का पुनर्गठन किए जाने को लेकर चीन की 'चिंता' का कारण यह भी है.

जम्मू-कश्मीर प्रांत के अक्साई चिन के 38,000 वर्ग किलोमीटर और शक्सगाम घाटी के 5,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाक़े पर चीन का नियंत्रण है.

जम्मू-कश्मीर के इस पुनर्गठन के बाद आई चीन की प्रतिक्रिया ने दोनों देशों के बीच पहले से चले आ रहे सीमा विवाद को एक बार फिर उभार दिया है, जिसका प्रभाव चीन और भारत के आपसी संबंधों से परे भी है.

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विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, "चीन अपनी पश्चिमी सीमा के इलाक़े को भारत के प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल किए जाने का हमेशा ही विरोध करता रहा है."

यह समझना आसान है कि चीन ने यह बात क्यों दोहराई. मगर चीन की चिंताएं उसके इस कथन से प्रकट होती हैं- "हाल ही में भारत ने अपने एकतरफ़ा क़ानून बदलकर चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को कम आंकना जारी रखा है. यह अस्वीकार्य है और यह प्रभाव में नहीं आएगा."

ज़ाहिर है, यह अचानक इस तरह का बयान आया तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इसे 'भारत का आंतरिक मामला' बताते हुए कहा कि 'भारत अन्य देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता और उम्मीद करता है कि दूसरे देश भी ऐसा ही करेंगे.'

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मध्यस्थता पर चीन की राय

दूसरा, चीन हमेशा की तरह भारत-पाकिस्तान तनाव पर ध्यान केंद्रित करते एक बार फिर ख़ुद को थर्ड अंपायर की तरह पेश करने का मौक़ा तलाश रहा है.

अपने लिखित जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, "संबंधित पक्षों को संयम और एहतियात बरतते हुए विवेकपूर्ण तरीक़े से कार्य करने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे कार्य करने से बचना चाहिए जो एकतरफ़ा रूप से यथास्थिति को बदलकर तनाव बढ़ा सकते हैं. हम दोनों पक्षों से संबंधित विवाद पर संवाद और परामर्श के ज़रिए शांतिपूर्वक हल करने और क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बनाए रखने का आग्रह करते हैं."

चीन की ये प्रतिक्रिया निश्चित ही शिमला समझौते की भावनाओं और लगातार दी गई भारत की उस सफ़ाई के ख़िलाफ़ जाती है कि भारत-पाकिस्तान तनाव में चीन मध्यस्थ या किसी और तरह की कोई भूमिका नहीं चाहता.

यही नहीं, यह चीन के मसले पर समय-समय पर चीनी नेताओं की ओर से दिए गए नीति आधारित बयानों के भी ख़िलाफ़ है. चीन के प्रसिद्ध विदेश मंत्री छिएँन छीचेन के 1989 में नेपाल में दिए बयान से लेकर राष्ट्रपति चियांग चेमिन के 1996 में पाकिस्तानी सेनट में दिए भाषण का ही नतीजा था कि उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के कश्मीर के मुद्दे को सुरक्षा परिषद में उठाने से दो टूक मना कर दिया था.

कारगिल युद्ध तो वह दौर था जब भारत-पाकिस्तान तनाव को लेकर चीन की तटस्थता का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण देखने को मिला था.

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अंतरराष्ट्रीय दख़ल

तीसरा, जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन को भारत-पाकिस्तान के बीच का मुद्दा बताने के पीछे चीन की मंशा यह है कि वह बताना चाहता है कि यह भारत का आंतरिक मामला नहीं है. वह यह दिखाना चाहता है कि तटस्थ खिलाड़ी के तौर पर वह भारत-पाकिस्तान तनाव में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से समाधान का कोई परोक्ष मक़सद नहीं रखता है.

हाल ही में जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की भूमिका निभाने को कहा है, तब चीन ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि कश्मीर विवाद के निपटारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक रचनात्मक किरदार निभा सकता है.

यह पाकिस्तान के साथ उसके विशेष रिश्ते और जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से पर उसके कब्ज़े को देखते हुए मज़ाक की तरह लग रहा है.

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चीन का पाकिस्तान के साथ समझौता?

चौथा, चीन ने इस पर अपनी गंभीर चिंता जताई है कि भारत ने यथास्थिति में एकतरफ़ा बदलाव किया है जो इस क्षेत्र में तनाव को इतना बढ़ा सकता है कि चीन भारत के आंतरिक मामलों में दख़ल देने लगे.

साथ ही, अगर चीन मानता कि यह विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच का ही है तो उसका पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ जाने का बयान देना पूरी तरह अनुचित है.

मार्च 1963 को चीन-पाकिस्तान के बीच हुए सीमा समझौते में पाकिस्तान ने अपने कब्ज़े वाली शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी थी.

उसी समझौते के अनुच्छेद-6 में यह लिखा गया है कि "पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर विवाद के निपटारे के बाद, सीमा को लेकर संप्रभुता की वार्ता पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार के साथ फिर शुरू होगी."

क्या इसका यह मतलब नहीं निकलता कि चीन को तब तक शांत रहना चाहिए जब तक कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर पर द्विपक्षीय समाधान नहीं कर लेते?

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तो क्या बढ़ेगी भारत की सीमाई सुरक्षा?

बौद्ध बहुल लद्दाख को नया केंद्र शासित प्रदेश बनाने के भारत के फ़ैसले से भी चीन हैरान दिख रहा है, जिसकी सीमा तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र से लगी हुई है.

अब यह इलाक़ा सीधे भारत की केंद्र सरकार के अधीन हो रहा है जहां दलाई लामा समेत सैकड़ों की संख्या में तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं.

शायद इसी कारण नई दिल्ली में चीन के राजदूत याओ जिंग ने भारतीय मीडिया से कहा कि कश्मीर "अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र है" और सुरक्षा परिषद का स्थानीय सदस्य होने के नाते उसकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करे.

विवादित जम्मू-कश्मीर से अलग होने पर लद्दाख में मनाई जा रही खुशी भारत के इस हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र में चीन के प्रभाव का मुक़ाबला करने में मदद कर सकती है जहां बौद्धों की पर्याप्त उपस्थिति है.

वास्तव में, चीन और पाकिस्तान से सटे जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन से नई दिल्ली अपनी सीमाओं के बेहतर नियंत्रण और प्रबंधन की उम्मीद कर रहा है.

पुनर्गठन की प्रक्रिया के गुणों और इसकी आंतरिक जटिलताओं को एक तरफ़ रखा जाए तो जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन से भारत की सरहदी सुरक्षा बेहतर होगी और इसी वजह से चीन और पाकिस्तान दोनों बेचैन हैं.

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