कश्मीर: ‘विरोध का प्रतीक’ बनी इस वायरल तस्वीर की पूरी कहानी

  • 9 अगस्त 2019
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सोशल मीडिया पर कश्मीर के एक स्कूली बच्चे की यह तस्वीर वायरल हो गई है.

इस तस्वीर को केंद्र सरकार के जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा छीनने वाले निर्णय के ख़िलाफ़ भारत प्रशासित कश्मीर के 'विरोध का प्रतीक' बताया जा रहा है.

सोमवार को अनुच्छेद-370 'ख़त्म' किये जाने की घोषणा के बाद से ही इस तस्वीर को भारत और पाकिस्तान में शेयर किया जा रहा है.

#KashmirBleedsUNSleeps, #SaveKashmirSOS और #ModiKillingKashmiris जैसे हैशटैग्स के साथ इस तस्वीर को ट्विटर और फ़ेसबुक पर सैकड़ों बार पोस्ट किया गया है.

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कुछ लोगों ने यह भी दावा किया है कि 'ये तस्वीर कश्मीर में चल रहे मौजूदा तनाव के बीच की है'. लेकिन यह सच नहीं है.

यह फ़ोटो एक साल पुरानी है और इसे उत्तर कश्मीर में फ़ोटो जर्नलिस्ट पीरज़ादा वसीम ने क्लिक किया था.

इस फ़ोटो के पीछे की कहानी जानने के लिए हमने श्रीनगर में रहने वाले 24 वर्षीय वसीम से बात की.

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Image caption पीरज़ादा वसीम श्रीनगर से चलने वाली एक न्यूज़ वेबसाइट के लिए काम करते हैं

कब और कहाँ की है ये तस्वीर?

पीरज़ादा वसीम ने बताया की ये तस्वीर उन्होंने 27 अगस्त 2018 को श्रीनगर से उत्तर-पश्चिम में स्थित सोपोर क़स्बे में खींची थी.

वसीम के मुताबिक़ 26 अगस्त 2018 को श्रीनगर और अनंतनाग समेत दक्षिण-कश्मीर के कुछ इलाक़ों से यह अफ़वाह फैलनी शुरु हुई थी कि सुप्रीम कोर्ट 35-ए पर सुनवाई करने जा रहा है.

वसीम बताते हैं कि इस अफ़वाह के आधार पर कई अलगाववादी संगठनों ने भारत प्रशासित कश्मीर के कई इलाक़ों में बंद का आह्वान कर दिया था और मार्च करने की चेतावनी दी थी.

वसीम ने पिछले साल फैली इस अफ़वाह के बारे में जो बातें बीबीसी को बताईं, जम्मू-कश्मीर के एडीजी पुलिस (सिक्योरिटी) मुनीर अहमद ख़ान का एक ट्वीट उनकी पुष्टि करता है.

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मुनीर अहमद ने 27 अगस्त 2018 को अपने ट्वीट में लिखा था, "ऐसी अफ़वाह फैल रही है कि सुप्रीम कोर्ट आज आर्टिकल 35-ए पर सुनवाई करने वाला है. ये फ़ैक्ट नहीं है. हम ऐसी अफ़वाह फैलाने वालों की जाँच कर रहे हैं और उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जायेगी."

लेकिन इस अफ़वाह के कारण श्रीनगर, अनंतनाग और सोपेर के कुछ हिस्सों में तीन दिन तक बंद रहा था और कई जगह से सेना की प्रदर्शनकारियों के साथ हिंसक झड़पें होने की ख़बरें आई थीं.

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Image caption सोपोर मेन चौक का इलाक़ा

फ़ोटो के पीछे की कहानी

बीते चार वर्षों से घाटी में फ़ोटो जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर रहे पीरज़ादा वसीम ने बीबीसी को बताया कि 35-ए से जुड़ी अफ़वाह के कारण पूरी घाटी में ही तनाव था, लेकिन सोपोर क़स्बे में हालात कुछ ज़्यादा तनावपूर्ण हो गये थे.

वसीम कहते हैं, "सीआरपीएफ़ के लिए सोपोर में मॉब को कंट्रोल करना मुश्किल हो रहा था. जब मैं वहाँ पहुँचा तो कई लोगों को यह पता था कि सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर से आर्टिकल 35-ए हटा दिया है. अफ़वाह बुरी तरह फैल चुकी थी."

"पुलिस ने स्कूल और कॉलेज पहले ही बंद करवा दिये थे. पर जब मैं सोपोर मेन चौक के इलाक़े में पहुँचा तो दुकानें खुली थीं. कुछ दूर पर नारेबाज़ी हो रही थी. सीआरपीएफ़ इलाक़े की नाक़ेबंदी में जुटी थी."

वसीम कहते हैं कि देखते ही देखते सोपोर मेन चौक में एक तरफ़ से पत्थरबाज़ी शुरु हो गई जिसका जवाब सैनिकों ने पैलेट गन से दिया.

वो बताते हैं, "जैसे ही फ़ायरिंग हुई, दुकानदार अपनी दुकानों के शटर गिराकर गलियों में दौड़े. तभी मैंने देखा कि स्कूल की ड्रेस में छह-सात लड़कों का एक समूह गली से निकला. उनके हाथ में वो कुर्सियाँ थीं जिन्हें दुकानदार जल्दबाज़ी में दुकानों के बाहर छोड़ गये थे."

"इन लड़कों में से एक ने दुकान के आगे कुर्सी डाली, वो उसपर बैठा और चिल्लाने लगा कि 'अब चलाओ गोली, देखते हैं कितना दम है'."

पीरज़ादा वसीम दावा करते हैं कि वायरल तस्वीर में जो लड़का दिखाई देता है, वो उस समय ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ रहा था.

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लड़के का क्या हुआ?

पर क्या सैनिकों ने इस लड़के पर पैलेट गन से हमला किया था? इसके जवाब में वसीम कहते हैं कि सैनिकों ने गोली चलाई तो थी, लेकिन छर्रे इस लड़के को नहीं लगे थे.

वो बताते हैं कि "सोपोर में हुई इस झड़प में कुछ अन्य स्कूली छात्र ज़रूर पैलेट गन से घायल हो गये थे. इनमें से कुछ स्टूडेंट्स से मेरी मुलाक़ात अस्पताल में हुई थी. ये सारा हंगामा कम से कम तीन दिन चला था."

27 अगस्त से लेकर 31 अगस्त 2018 के बीच स्थानीय मीडिया में छपी ख़बरें सैनिकों और स्थानीय लोगों के बीच हुई झड़पों की पुष्टि करती हैं. हालांकि इस दौरान किसी प्रदर्शनकारी की मौत की ख़बर हमें नहीं मिली.

पीरज़ादा वसीम बताते हैं कि साल 2018 में भी उनकी यह तस्वीर काफ़ी शेयर की गई थी.

अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारुक़ ने इस तस्वीर को शेयर करते हुए लिखा था, "यह सुनकर दुख होता है कि हमारे युवाओं को पैलेट गन से अंधा किया जा रहा है. वो भी उस देश के द्वारा जो अपने आप को अंहिसा का परिचायक बताता है. वो उनके साथ इतना अमानवीय व्यवहार करता है जो सिर्फ़ अपने बुनियादी अधिकारों की माँग कर रहे हैं."

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