अनुच्छेद 370: कैसे बँटी हुई कांग्रेस और बिखर गई

  • 9 अगस्त 2019
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जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता पर संविधान से अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने पर बहस के दौरान कांग्रेस पार्टी कैसे अलग-अलग सुर में बोली, ये सभी ने देखा.

ये एक और इशारा था कि आज पार्टी की दशा क्या है.

एक तरफ़ कांग्रेस नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद कह रहे थे कि अनुच्छेद 370 ने राज्य के तीनों इलाक़ों जम्मू, कश्मीर और लद्दाख़ को धार्मिक, सांस्कृतिक तौर पर बांध रखा था, पांच अगस्त को "हिंदुस्तान की तारीख़ में काले शब्दों में लिखा जाएगा" और सरकार ने जम्मू-कश्मीर को ही ख़त्म कर दिया है, "टुकड़े-टुकड़े करके और आर्टिकल 370 को ख़त्म करके."

पूर्व वित्त मंत्री पी चिंदबरम ने इसे भारत के संवैधानिक इतिहास का सबसे बुरा दिन बताया. उधर, कांग्रेस के कुछ नेताओं की सोच अलग थी.

वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी बोले, "एक भूल जो आज़ादी के समय हुई थी, उस भूल को देर से ही सही सुधारा गया और ये स्वागत योग्य है."

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्विटर पर लिखा, "जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ को लेकर उठाए गए क़दम और भारत देश में उनके पूर्ण रूप से एकीकरण का मैं समर्थन करता हूँ. संवैधानिक प्रक्रिया का पूर्ण रूप से पालन किया जाता तो बेहतर होता, साथ ही कई प्रश्न खड़े नहीं होते. लेकिन ये फ़ैसला राष्ट्रहित में लिया गया है और मैं इसका समर्थन करता हूँ."

अनुच्छेद 370 पर स्टैंड

दीपेंदर सिंह हुड्डा ने लिखा, "मेरा पहले से ये विचार रहा है कि 21वीं सदी में अनुच्छेद 370 का औचित्य नहीं है और इसको हटना चाहिए."

कर्ण सिंह ने कहा है कि जो कुछ हुआ है वो निजी तौर पर उसकी पूरी तरह निंदा नहीं करते हैं लेकिन कुछ सकारात्मक बातें भी हैं.

कांग्रेस की सुष्मिता देव ने बीबीसी से बातचीत में कांग्रेस वर्किंग कमेटी द्वारा पारित प्रस्ताव का हवाला दिया जिसमें भाजपा सरकार के क़दम को एकतरफ़ा, अलोकतांत्रिक और बेशर्मी से भरा क़दम बताया गया जिसे "सर्वसम्मति" से पारित किया गया.

उन्होंने कहा, "हम गाय भैंस नहीं हैं. हमारे विचार हैं."

जहां ये बातें चल रही थीं तो राज्यसभा में कांग्रेस व्हिप भुवनेश्वर कलिता ने अनुच्छेद 370 पर पार्टी के स्टैंड पर इस्तीफ़ा दे दिया क्योंकि "एक देश में दो संविधान नहीं होने चाहिए."

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रणनीति पर सवाल

ये सब ऐसे वक़्त हो रहा है जब पार्टी में पिछले दो महीने से नेतृत्व को लेकर सवाल बरक़रार है. राहुल गांधी का इस्तीफ़ा अभी भी स्वीकार किया गया है या नहीं इसकी पार्टी की तरफ़ से कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है. अगला नेता कौन होगा, ये पता नहीं.

जब देश की सबसे पुरानी और इस वक़्त सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी की ये हालत हो तो पूरे विपक्ष की क्या हालत होगी, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं.

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी के मुताबिक़ इतने बड़े मुद्दे पर कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी में अलग-अलग राय होना आश्चर्य की बात नहीं लेकिन उनके आश्चर्य के दो कारण हैं.

एक, अनुच्छेद 370 को हटाने की बात भाजपा के घोषणापत्र में सालों से है, और ऐसे वक़्त में जब भाजपा इतनी बड़ी संख्या से सत्ता में वापस आई तो इस मुद्दे पर अभी तक कांग्रेस ने अपना स्टैंड क्यों तैयार नहीं किया?

दूसरा, कांग्रेस इतने लंबे वक़्त से सत्ता में रही है और ये कैसे संभव है कि उसे इस बात की भनक ही नहीं लगी कि सरकार संसदीय सत्र के अंतिम दिनों में क्या बिल या आदेश पेश करना चाहती थी?

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पारिवारिक विचारधारा

इसके बारे में विभिन्न एजेंसियों के कुछ लोगों को तो पता होगा, ऐसे में ये कैसे संभव है कि कांग्रेस को सरकार की सोच के बारे में हवा नहीं लगी.

जानकार कह रहे हैं कि ऐसे दौर में जब भाजपा द्वारा परिभाषित राष्ट्रवाद का उभार है और कांग्रेस नेतृत्व की हालत पस्त है, युवाओं के नज़दीक रहने वाले युवा कांग्रेस नेता अपनी ज़मीन मज़बूत कर रहे हैं.

पत्रकार राधिका रामाशेषन के मुताबिक़, "ज्योतिरादित्य और दीपेंदर हुड्डा जैसे नेताओ का "उठना बैठना आज की पीढ़ी के साथ है. ये न भूलें कि ज्योतिरादित्य जनसंघ परिवार से ही आते हैं, उनकी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ और बाद में भाजपा की बड़ी नेता थीं... इसलिए मेरे ख्याल में पारिवारिक विचारधारा उन्हें प्रभावित तो करती ही होगी."

जनार्दन द्विवेदी के बारे में वो कहती हैं कि उन्होंने उनसे "जितनी बात की है, मुझे हमेशा लगा कि वो थोड़े सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर झुके हुए हैं."

राधिका रामाशेषन कहती हैं, "आज के युवा की जो सोच है - और मैं ये नहीं कह रही हूं कि ये सोच अच्छी है या नहीं - उसने आज के भारत को अपनी जकड़ में ले लिया है. युवा उन बातों से प्रभावित हैं और नेताओं को ये लगा कि वो जो बात बोलते हैं, संसद या उसके बाहर, उस सोच की परछाई उनकी बातों में नज़र आनी चाहिए."

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राहुल, सोनिया की चुप्पी

एक और बात जिसने कई लोगों को आश्चर्य में डाला वो था सरकार के इतने बड़े फ़ैसले पर राहुल गांधी और सोनिया गांधी का खुलकर संसद में मज़बूती से अपनी बात न रखना.

राहुल गांधी ने हालांकि इस मामले में एक ट्वीट किया था लेकिन इतने बड़े और गंभीर मुद्दे पर पूरी पार्टी और कांग्रेस समर्थकों के अलावा भारत के देशवासी भी उनकी तरफ़ देख रहे थे कि आख़िर पार्टी इस मामले में क्या सोच रही है.

नीरजा चौधरी कहती हैं, "आज कांग्रेस इतनी दिशाहीन, नेतृत्वहीन हो गई है कि इतने बड़े दिन भी लीडरशिप ने कुछ नहीं कहा. आप कोई तो स्टैंड लेते. कुछ तो कहते. ये फ़ैसले ऐसे हैं कि लोग 50 साल के बाद रेफ़र करेंगे. लेकिन (कांग्रेस की) लीडरशिप इस पर 10 मिनट के लिए भी बोलने के लिए भी तैयार नहीं थी."

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अधीर रंजन ने बढ़ाई मुश्किल

लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी के प्रदर्शन से भी विश्लेषकों में निराशा है.

लोकसभा में बहस के दौरान एक बार वो सरकार से इस बात पर सफ़ाई मांगते नज़र आए कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है या द्विपक्षीय. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र का भी ज़िक्र किया.

नीरजा चौधरी कहती हैं, "अधीर रंजन चौधरी बहुत कन्फ्यूज़्ड दिखे. उन्होंने (कश्मीर के बारे में) संयुक्त राष्ट्र, द्विपक्षीय मुद्दे का ज़िक्र किया. कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग साफ़ तौर पर न कहना, ये कांग्रेस के लिए चुनौती है."

"उन्हें लोकसभा में कांग्रेस का नेता चुना जाना ही अपने आप में आश्चर्य में डालने वाला फ़ैसला था. अगर कांग्रेस को भाजपा को टक्कर देनी है तो उसे ममता बनर्जी की ओर देखना होगा. और ममता बनर्जी की अधीर रंजन चौधरी से बिल्कुल पटरी नहीं खाती. पता नहीं कांग्रेस की सोच क्या है."

राधिका रामाशेषन कहती हैं, "मेरी जानकारी है कि जिस दिन लोकसभा में बहस हुई, उस दिन सुबह कांग्रेस की बैठक में चर्चा के नाम पर कुछ नहीं हुआ. मनीष तिवारी और शशि थरूर ने कहा कि वो क्या बोलने वाले हैं. अधीर चौधरी चुप रहे, किसी को कुछ नहीं पता था कि अधीर चौधरी क्या बोलने वाले हैं. और जो भी बोला उन्होंने उससे कांग्रेस बहुत मुश्किल में पड़ गई."

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कांग्रेस से क्यों अलग हुए कलिता?

क़रीब चार दशकों से कांग्रेस से जुड़े रहे और असम में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भुवनेश्वर कलिता ने पार्टी से इस्तीफ़ा देकर सभी को आश्चर्य में डाल दिया.

उन्होंने कांग्रेस के स्टुडेंट विंग के अलावा यूथ विंग और एआईसीसी में भी काम किया.

राज्यसभा में उनका काम था बाकियों को डिसिप्लिन करना, कहना कि इस तरह वोट करना होगा, या ये बोलना पड़ेगा, उलटा व्हिप ही कांग्रेस के पक्ष में वोट के पहले इस्तीफ़ा देकर चले गए हैं.

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बीबीसी से बातचीत में भुवनेश्वर कलिता ने कहा कि पार्टी में अनुच्छेद 370 को लेकर मतभेद थे और उन्होंने पार्टी लीडरशिप से बात करने की कोशिश की थी लेकिन बात नहीं हुई.

कांग्रेस की ओर से इस दावे की पुष्टि नहीं हो पाई. वो कहते हैं, "पार्टी अभी लीडरलेस है, कोई लीडर नहीं है, तो इसलिए हर कोई अपना-अपना मत दे रहा है."

वो क्यों सरकार के क़दम का समर्थन करते हैं, इस पर वो कहते हैं, "एक देश में दो संविधान नहीं होने चाहिए. पंडित नेहरू ने ख़ुद कहा था कि कुछ सालों बाद धीरे-धीरे इसे ख़त्म कर दिया जाएगा. दूसरे प्रांत के लोगों को मिल रहे फ़ायदे वहां नहीं पहुंच रहे हैं."

"राइट टू एजुकेशन का फ़ायदा वहां के बच्चों को नहीं मिल रहा है. अनुच्छेद 370 के जाने के बाद सभी क़ानूनों के फ़ायदे वहां के लोगों को मिलेंगे."

कलिता के मुताबिक़ हाल के वक़्त में अनुच्छेद 370 पर पार्टी में कभी भी चर्चा नहीं हुई. तो क्या वो भाजपा में शामिल हो रहे हैं, वो कहते हैं, "हाल ही में मैंने इस्तीफ़ा दिया है. मैं फ़ैसला लूंगा क्योंकि मैं सक्रिय राजनीति में हूं. और मैं सक्रिय रहना चाहूंगा."

कांग्रेस की दुविधा

राधिका रामाशेषन के मुताबिक़ कांग्रेस की मुख्य सोच, उसकी विचारधारा के मुख्य प्रतीक हैं नेहरू. उधर अनुच्छेद 370 ख़त्म करने की बात जनसंघ और उसके बाद भाजपा की विचारधारा से गहरे तौर पर जुड़ी हुई है.

वो कहती हैं, "अगर कांग्रेस सरकार का समर्थन करती तो संदेश जाता कि वो अपनी मूल विचारधारा छोड़ रही है. भाजपा ने राष्ट्रवाद की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है. भाजपा के प्रयास जनसंघ के ज़माने से शुरू हो गए थे. ये क्लाइमेक्स पर अब पहुंचा है. इस परिभाषा में कांग्रेस की विचारधारा फ़िट नहीं बैठती."

"इसलिए मुझे लगता है कि कांग्रेस गहरी दुविधा में पड़ गई है. जब कांग्रेस ख़ुद वैचारिक दुविधा में पड़ी है तो आप साफ़गोई की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? कभी पार्टी सॉफ़्ट हिंदुत्व की बात करती है, कभी सेक्युलरिज़्म की. पार्टी में विचारधारा नहीं है, लीडरशिप नहीं है. नीति पर लाइन लेने को कोई तैयार नहीं है."

क्या सोच रहे हैं कांग्रेस के युवा नेता?

राधिका कहती हैं, "जब लीडरशिप नहीं है तो बाक़ी सब चाहे आज़ाद साहब हों, आनंद शर्मा हों, सब झिझकते हैं कोई लाइन लेने में. कांग्रेस एक पार्टी है जो परिवार के साथ बंधी हुई है और आज की तारीख़ में भी जब परिवार कुछ नहीं कहता तो पार्टी को समझ नहीं आता कि क्या कहें, क्या करें. तो सबके मन में जो आ रहा है वो बोले जा रहे हैं."

उधर, नीरजा चौधरी के मुताबिक़, "पार्टी के युवा नेताओं को एहसास है कि उनके आगे लंबी राजनीति पड़ी है. देश की सोच अलग जा रही है. बड़े बूढ़े नेताओं की राजनीति 4-5 साल की ही होगी. वो तो चाहेंगे, जैसा चल रहा है वैसे चलने दो."

"डूबती नाव को सभी छोड़ देते हैं. 2014 में पार्टी का हौसला नहीं टूटा था. लेकिन आज पार्टी इतनी ठस्स हो गई है कि उन्हें कॉन्फ़िडेस नहीं है. मनोबल नीचे है. विपक्ष का मनोबल कांग्रेस के मनोबल से जुड़ा है. पार्टी परिवार पर अभी भी निर्भर है. (आज भी) पर्दे के पीछे परिवार ही फ़ैसला कर रहा है."

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