सोनिया गांधी की शरण में फिर से क्यों गई कांग्रेस

  • 13 अगस्त 2019
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कांग्रेस पार्टी ने कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक तो अध्यक्ष चुनने के लिए आयोजित की थी लेकिन ये हो ना सका और अब ये आलम है कि पार्टी यू-टर्न लेते हुए एक बार फिर सोनिया गांधी पर आकर अटक गई है.

शनिवार 10 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में दिन भर चर्चा हुई लेकिन अध्यक्ष का फ़ैसला नहीं हो सका. हालांकि ये कहना भी पूरी तरह से सही नहीं होगा. राहुल गांधी का नाम तो अध्यक्ष के तौर पर पहली पसंद के तौर पर सामने आया लेकिन राहुल गांधी अपनी पुरानी बात से टस से मस नहीं हुए.

इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सोनिया गांधी को पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया गया और राहुल गांधी का लंबित चल रहा इस्तीफ़ा भी स्वीकार कर लिया गया.

इसके बाद कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बताया कि बैठक में तीन प्रस्ताव पारित हुए हैं.

- राहुल गांधी का इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया गया है

- सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष चुना गया है. जब तक पूर्णकालिक अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो जाता वो पद पर बनी रहेंगी.

- सरकार से आग्रह किया जाएगा कि विपक्षी पार्टियों को जम्मू-कश्मीर के हालात का जायज़ा लेने के लिए भेजा जाए.

इस मीटिंग से पहले तक अटकलें लगाई जा रही थीं कि किसी अनुभवी और ग़ैर-गांधी परिवार के शख़्स को अध्यक्ष चुना जाएगा. दिन भर जिस तरह से परत दर परत बैठक हुई उम्मीद बढ़ी भी कि नाम तय हो जाएगा लेकिन बैठक ख़त्म हुई और कोई नया नाम सामने नहीं आया.

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लेकिन इसे दोनों तरीक़ों से देखा जाना चाहिए. क्या गांधी परिवार ही नहीं चाहता कि कोई और पार्टी प्रमुख बने? या फिर नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस पार्टी का काम ही नहीं चलता?

जानी-मानी विश्लेषक कल्याणी शंकर कहती हैं कि कमोबेश ये दोनों ही बातें सही हैं.

कल्याणी शंकर कहती हैं "गांधी परिवार इसे अपना अधिकार मानता है और वो अपना ये अधिकार किसी को नहीं देगा, यह बात बहुत पहले से ही स्पष्ट है."

हालांकि कल्याणी शंकर सोनिया गांधी के चुने जाने पर आश्चर्य जताती हैं. वो कहती हैं "ज़्यादातर लोगों को उम्मीद थी कि राहुल गांधी अपना इस्तीफ़ा वापस ले लेंगे या फिर कांग्रेस पार्टी अपने किसी पुराने क़रीबी और गांधी परिवार के क़रीबी को चुनेगी लेकिन सारे क़यास ग़लत साबित हुए."

कल्यााणी शंकर कहती हैं कि सोनिया गांधी के चुने जाने से कोई और ख़ुश हुआ हो या ना हुआ हो लेकिन कांग्रेस पार्टी के वो पुराने नेता ज़रूर ख़ुश हुए होंगे जो राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने से कुछ असहज हो गए थे.

हालांकि वो एक बात ज़ोर देकर कहती हैं कि हो सकता है कि आने वाले समय में राहुल गांधी दोबारा अध्यक्ष बन जाएं क्योंकि हालात थोड़े स्थिर हो जाएंगे और बाद में पावर ट्रांसफ़र (शक्ति का हस्तांतरण) भी आसानी से हो जाएगा.

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कल्याणी शंकर कहती हैं "पार्टी में ये एक सोच घर कर गई है कि कांग्रेस पार्टी के बिना वो कुछ हैं ही नहीं. उन्हें लगता है कि गांधी परिवार ही सबसे ऊपर है."

पर वो ये भी कहती है कि गांधी परिवार किसी भी क़ीमत पर 'पावर' को हाथ से नहीं जाने देना चाहता.

वरिष्ठ पत्रकार जतिन गांधी भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं.

वो कहते हैं "कांग्रेस पार्टी को गांधी परिवार के बाहर सोच ही नहीं पाती है और ये भी संभव है कि अगर पार्टी गांधी परिवार के बाहर से किसी को अध्यक्ष बनाए तो ख़ुद ही बिखर जाए. ख़ासतौर पर तब जब पुराने लीडर्स (ओल्ड गार्ड) और युवा नेता दो धड़े जैसे हैं. ऐसे में संभव है कि पार्टी बिखर जाए."

जतिन गांधी कहते हैं अगर कांग्रेस के नज़रिये से देखा जाए तो ग़ौर करना होगा कि साल 2014 के बाद से ही पार्टी हमेशा किसी न किसी मुश्किल दौर में ही दिखाई दी है. ऐसे में हो सकता है कि पार्टी के सदस्यों ने सोचा हो कि सोनिया गांधी जांची-परखी अध्यक्ष हैं और उन्हें लेकर सभी में स्वीकार्यता भी है. साथ ही लोगों को यह भी उम्मीद है कि आने वाले वक़्त में राहुल मान जाएं.

वो कहते हैं "राजीव गांधी की हत्या के बाद 1998 में जाकर सोनिया गांधी राजनीति में आईं. इस वक़्त में यह साफ़ हो गया था कि पार्टी गांधी परिवार के बिना नहीं चल पाएगी."

जतिन कहते हैं कि पार्टी में चाटुकारिता का इतिहास रहा है और आज के वक़्त में भी पार्टी उससे उभर नहीं पा रही है.

लेकिन राहुल गांधी मान क्यों नहीं रहे हैं

लोकसभा चुनावों के नतीजों की ज़िम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने जुलाई 2019 में अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

हालांकि उनका इस्तीफ़ा स्वीकार अब जाकर हुआ है लेकिन ऐसा क्या हठ है जो पार्टी के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं के अनुनय-विनय के बाद भी राहुल पद संभालने के लिए तैयार नहीं हैं.

इस सवाल के जवाब में जतिन गांधी कहते हैं "राहुल गांधी जब राजनीति में आए थे तो उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा था कि मैं वंशवाद की राजनीति को कहीं से भी बढ़ावा नहीं दूंगा. लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी यह समझ आ गया कि गांधी परिवार का पार्टी की लीडरशिप से अलग हो पाना बहुत मुश्किल है. उनके व्यक्तित्व में एक कंफ़्यूज़न सा नज़र आता है. कई बार उनके काम से भी यह नज़र आ जाता है. वो कभी वीटो करने लगते हैं और जताने की कोशिश करते हैं कि उनकी बात मानी जानी चाहिए."

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जतिन गांधी का मानना है कि राहुल गांधी समझ ही नहीं पाए कि उन्हें लोकतांत्रिक रहना है या परिवार से जुड़कर और यही वजह है.

इससे अलग कल्याणी शंकर कहती हैं कि राहुल गांधी ने कोशिश की थी. वो कहती हैं "कांग्रेस दो हिस्सों में नज़र आती है. हालांकि राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद जितनी तरज़ीह युवाओं को दी, पुराने पार्टी नेताओं को भी दी. उन्हें पूरी तरह अनदेखा नहीं किया. लेकिन उन्हें पुराने नेताओं से वो सहयोग नहीं मिला."

वो कहती हैं कि जो बाते अभी तक सामने आई हैं वो ये कि राहुल गांधी बेहद हताश हैं. क्योंकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से उन्हें वो सहयोग नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी.

क्या गांधी परिवार के अलावा कोई नाम नहीं है पार्टी के पास?

इस सवाल के जवाब में कल्याणी शंकर कहती हैं कि ऐसा तो कहना बिल्कुल ग़लत होगा कि पार्टी के पास नेता नहीं है जो अध्यक्ष बन सकें.

"तमाम नाम हैं. युवा नाम हैं. पुराने नाम हैं. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने कभी किसी दूसरे नाम के लिए सोचा ही नहीं. सोचा होता तो उसे उस तरह पेश किया जाता. लेकिन कभी भी गांधी परिवार से आगे वो बढ़े ही नहीं. नतीजा ये है कि जनता भी कांग्रेस पार्टी के किसी दूसरे चेहरे को उस तरह से नहीं पहचानती है जैसे गांधी परिवार को. आप ख़ुद बताएं सोनिया गांधी जाएंगी तो लोग आएंगे या फिर किसी नए चेहरे के लिए..."

क्या प्रियंका गांधी का नाम भी इसमें नहीं गिना गया?

इस सवाल के जवाब में कल्याणी शंकर कहती हैं "प्रियंका गांधी के नाम को इतना महत्व क्यों दिया जाता है? उन्होंने अपने भाई के लिए प्रचार किया पर वो उनके गढ़ में हार गए...उन्होंने अभी तक ख़ुद को साबित नहीं किया है ऐसे में उन्हें कैसे?"

कल्याणी शंकर कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं के हवाले से कहती हैं कि वे ख़ुद कहते हैं कि प्रियंका के संदर्भ में ये फ़ैसला जल्दबाज़ी होगी.

वो कहती हैं कि पार्टी के कुछ सीनियर नेता भी प्रियंका से चिढ़े हुए हैं और वो उन्हें नहीं चाहते.

प्रियंका गांधी के नाम पर जतिन गांधी कहते हैं "लोग भले ये कहें कि उनकी शक़्ल उनकी दादी से मिलती है, बात करने का लहज़ा दादी जैसा है...पर ये काफी तो नहीं है. लेकिन उनके पास कोई अनुभव नहीं है. उन्होंने कुछ भी साबित नहीं किया है. उन्हें वक़्त लगेगा राजनीति के लिए."

क्या सोनिया से करिश्मे की उम्मीद कर रही है कांग्रेस?

कल्याणी शंकर कहती है कि सोनिया जब राजनीति में आई थीं तो वो वक़्त भी कुछ और था और उनकी उम्र भी इतनी नहीं थी.

वो कहती हैं "सोनिया के आने से पहले लोग पार्टी छोड़-छोड़कर जा रहे थे. वो आईं तो नेताओं का जाना थोड़ा रुका लेकिन पार्टी को सत्ता में लाने के लिए उन्हें छह साल का संघर्ष करना पड़ा. लेकिन तब वो इतनी उम्र की नहीं थी."

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