दिल्ली में गुरु रविदास मंदिर तोड़े जाने की पूरी कहानी - ग्राउंड रिपोर्ट

  • 14 अगस्त 2019
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Image caption पंजाब के जलंधर शहर में मंदिर हटाये जाने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

दिल्ली के तुग़लकाबाद में शनिवार सुबह दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गुरु रविदास मंदिर को ढहा दिया था जिस पर अब दिल्ली से लेकर पंजाब तक राजनीति गरमा गई है.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी और पंजाब की कांग्रेस सरकार समेत भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणी अकाली दल ने भी मंदिर ढहाए जाने की आलोचना की है और डीडीए को इसका दोषी ठहराया है जो केंद्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के अधीन आता है.

उधर पंजाब के फगवाडा, जलंधर, होशियारपुर और कपूरथला में दलित संगठनों ने मंगलवार को मंदिर गिराए जाने से नाराज़ होकर बंद का आह्वान किया.

पंजाब के लुधियाना, बरनाला, फ़िरोज़पुर, मोगा और अमृतसर समेत हरियाणा के कुछ कस्बों में भी संत रविदास के अनुयायियों ने छुटपुट प्रदर्शन किये.

इन तमाम ख़बरों के बीच बीबीसी ने तुग़लकाबाद स्थित उस जगह का दौरा किया जहाँ वर्ष 1443 में जन्मे संत रविदास को समर्पित, यह मंदिर हुआ करता था.

Image caption दक्षिणी दिल्ली का नक़्शा

कहाँ था गुरु रविदास मंदिर?

गुरु रविदास मंदिर दिल्ली के 'जहाँपनाह सिटी फ़ॉरेस्ट' के दक्षिण-पूर्वी छोर पर स्थित था.

मंदिर स्थल से क़रीब सवा सौ मीटर पूर्व में जो सड़क है, उसका नाम 'गुरु रविदास मार्ग' है और दाईं ओर बने बस स्टैंड का नाम भी मंदिर के ही नाम पर है.

इन दोनों की तरफ़ इशारा करते हुए तुग़लकाबाद के कुछ युवक यह बताने की कोशिश करते हैं कि ये मंदिर कितना पुराना था.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में मंदिर की जिस ज़मीन को डीडीए का माना है, उसके तीन तरफ़ ऊंची दीवार है और एक हिस्सा घने जंगल से जुड़ा है.

गुरु रविदास मार्ग से इस मंदिर तक पहुँचने के लिए पहले दीवार में एक बड़ा दरवाज़ा हुआ करता था जिसे मंदिर गिराये जाने के बाद डीडीए ने बंद कर दिया है.

इस दरवाज़े की जगह अब एक कच्ची दीवार खड़ी कर दी गई है. इसे दिल्ली पुलिस के सिपाहियों ने घेर रखा है और जहाँ ढांचे को गिराया गया, वहाँ किसी को जाने की इजाज़त नहीं दी जा रही.

लेकिन इस ख़बर पर जिस तरह की हलचल पंजाब-हरियाणा में देखी जा रही है, वैसी हलचल दिल्ली के तुग़लकाबाद में महसूस नहीं होती.

गुरु रविदास में आस्था रखने वाले कुछ लोग हमें इस ज़मीन से पचास गज की दूरी पर खड़े मिले जिन्होंने कहा कि वो केंद्र सरकार की मनमानी से बहुत नाराज़ हैं. कुछ देर बाद इन लोगों ने मोदी सरकार के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी की.

यहाँ हमारी मुलाक़ात संत रविदास को मानने वाली कुछ महिलाओं से भी हुई जो मंदिर के रास्ते पर बनी दीवार के सामने खड़ी पूजा कर रही थीं.

कैसे हटाया गया मंदिर?

इन महिलाओं में से एक रानी चोपड़ा ने बीबीसी से यह दावा किया कि जिस समय मंदिर गिराया गया, वो क़रीब 25 सेवकों के साथ मंदिर परिसर में ही मौजूद थीं.

उन्होंने कहा, "शुक्रवार (9 अगस्त) शाम को जिस वक़्त सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर आया, तब हम मंदिर में सत्संग कर रहे थे. रात को क़रीब 9 बजे हमने देखा कि मंदिर के आसपास हज़ार से ज़्यादा पुलिसवाले तैनात कर दिए गए हैं. कुछ ही देर बाद उन्होंने विवादित ज़मीन से बाहर जाने के सब रास्ते बंद कर दिए और सभी सेवकों को हिरासत में ले लिया."

9 अगस्त 2019 के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने लिखा है, "दिल्ली विकास प्राधिकरण दिल्ली पुलिस की मदद से कल तक यह ज़मीन खाली कराये और वहाँ मौजूद ढांचे को हटा दे."

इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को यह आदेश दिया कि वो मौक़े पर पर्याप्त पुलिस बल मुहैया कराएं.

40 वर्षीय रानी चोपड़ा बताती हैं, "पुलिस ने 10 अगस्त की सुबह 6 बजे मंदिर को तोड़ना शुरू किया था और जेसीबी मशीन की मदद से 8 बजे तक पूरे ढांचे को गिरा दिया गया. हमने उनसे गुज़ारिश की थी कि जिस क़मरे में हमारे ग्रंथ रखे हैं, बस उस एक क़मरे को छोड़ दिया जाए लेकिन उन्होंने नहीं सुनी."

रानी की यह बात सुनकर वहाँ मौजूद अन्य महिलाएं ग़ुस्से से भर जाती हैं. इन महिलाओं का आरोप है कि मंदिर की प्रतिमाओं और ग्रंथों के साथ डीडीए के कर्मचारियों ने और दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों ने बेअदबी की.

लेकिन इन दोनों ही विभागों के वरिष्ठ अधिकारी इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं.

वो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जब ढांचे को हटाया गया तो 'गुरु रविदास जयंती समारोह समिति' के सदस्य वहाँ मौजूद थे और उन्होंने कोई विरोध नहीं किया. ना ही पुलिस को बल का प्रयोग करना पड़ा.

Image caption तुग़लकाबाद में मंदिर हटाये जाने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते कुछ अनुयायी

संत रविदास के अनुयायियों की मान्यता

दिल्ली के छतरपुर में रहने वाले जोगिंदर सिंह कहते हैं कि वो बीते 30 वर्षों से 'गुरु रविदास जयंती समारोह समिति' से जुड़े हुए हैं.

वो पुलिस के सुरक्षा घेरे की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं कि "जिस ज़मीन को डीडीए का बताया जा रहा है, हम उसकी वर्षों से सुरक्षा कर रहे थे. हमसे पहले भी संत रविदास के अनुयायी सैकड़ों वर्षों से इस जगह पर आते रहे हैं."

जोगिंदर सिंह अपनी मान्यताओं के आधार पर ये दावा करते हैं कि "वर्ष 1509 में जब संत रविदास बनारस से पंजाब की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने इस स्थान पर आराम किया था. एक जाति विशेष के नाम पर यहाँ एक बावड़ी (कुआँ) भी बनवाई गई थी जो आज भी मौजूद है. यही वजह है कि रविदास के अनुयायियों में इस जगह की ख़ास मान्यता है."

इस बारे में हमने संत रविदास से जुड़ी जगहों की खोज का काम कर रहे सतविंदर सिंह हीरा से बात की. सतविंदर 'आदि धर्म मिशन' नाम की एक संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और मंगलवार को पंजाब में हुए प्रदर्शनों में वो शामिल थे.

उन्होंने दावा किया कि "ये मंदिर संत रविदास की याद में साल 1954 में बनवाया गया था. दिल्ली में लोदी वंश के सुल्तान रहे सिकंदर लोदी ने संत रविदास से नामदान लेने के बाद उन्हें तुग़लकाबाद में 12 बीघा ज़मीन दान की थी जिस पर यह मंदिर बना था."

Image caption संत रविदास की प्रतिमा

इस मंदिर से सिखों की आस्था भी जुड़ी हुई थी क्योंकि सिखों का मानना है कि संत रविदास की वाणी (600 से ज़्यादा शबद) गुरु ग्रंथ साहिब में मौजूद हैं. संत रविदास का पंथ आज भी भारत के दलितों में बहुत लोकप्रिय है.

लेकिन तुग़लकाबाद में रहने वाले कुछ वरिष्ठ लोगों ने बीबीसी को स्थानीय स्तर पर सुनाई जाने वाली एक कहानी बताई.

उन्होंने कहा, "हमने तो सुना है कि ये ज़मीन तुग़लकाबाद के शामलत गाँव में रहने वाले किसी रूप नंद की थी. इस ज़मीन में डेढ़ सौ साल पहले उन्होंने ही कुआँ खोदा था. कुएँ के पास ही उनकी एक झोपड़ी थी. वो वहीं रहते थे और जो समाधियाँ मंदिर के पास थीं, उनमें से एक रूप नंद की थी."

स्थानीय लोग यह भी कहते हैं कि साल 1959 में केंद्रीय मंत्री जगजीवन राम इस मंदिर का उद्घाटन करने तुग़लकाबाद पहुँचे थे.

जगजीवन राम की बेटी और पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने इस बात की पुष्टि की है. उन्होंने एक ट्वीट में लिखा है, "तुग़लकाबाद स्थित प्राचीन मंदिर स्थल पर गुरु रविदास 1509 में स्वयं आए थे और मेरे पिता बाबू जगजीवन राम ने इसका जीर्णोद्धार कर 1 मार्च 1959 को इसका उद्घाटन किया था."

कोर्ट में रविदास समिति को फटकार

दिल्ली विकास प्राधिकरण के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जब शनिवार को यह ढांचा तुग़लकाबाद की ज़मीन से हटाया गया तो वहाँ तीन छोटे क़मरे मौजूद थे. संत रविदास के भक्तों के अनुसार इनमें से एक गुरु रविदास की समाधि थी.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 'गुरु रविदास जयंती समारोह समिति' के इस दावे को नहीं माना.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस नवीन सिन्हा ने 8 अप्रैल 2019 को इस ज़मीन के संबंध में एक आदेश दिया था जिसमें लिखा था, "हम दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को सही मानते हुए याचिकाकर्ता की अपील को ख़ारिज करते हैं. साथ ही यह आदेश देते हैं कि अगले दो महीने में इस ज़मीन को ख़ाली करा लिया जाए. प्राधिकरण यह सुनिश्चित करे. अगर ऐसा नहीं किया जाता तो इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना क़रार दिया जाए."

सुप्रीम कोर्ट में चली इस केस की सुनवाई पर नज़र डालें तो दो अगस्त 2019 को 'गुरु रविदास जयंती समारोह समिति' ने कोर्ट को यह सूचना दी थी कि मंदिर परिसर को खाली कर दिया गया है.

लेकिन जब इस पर डीडीए से रिपोर्ट मांगी गई तो पाया गया कि 'गुरु रविदास जयंती समारोह समिति' ने कोर्ट में ग़लत सूचना दी.

9 अगस्त 2019 के अपने फ़ैसले में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एम आर शाह ने 'गुरु रविदास जयंती समारोह समिति' को फटकार लगाते हुए यह पूछा है कि क्यों ना समिति के पदाधिकारियों के ख़िलाफ़ कोर्ट की अवमानना पर सुनवाई की जाये.

'गुरु रविदास जयंती समारोह समिति' के कुछ सदस्यों ने इसके जवाब में बीबीसी से कहा कि उन्हें अंत तक यह उम्मीद थी कि इंसानियत के नाते डीडीए मंदिर की एक समाधि छोड़ देगा.

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डीडीए की भूमिका क्या रही?

सोशल मीडिया पर जो लोग गुरु रविदास मंदिर हटाये जाने की कार्रवाई से नाराज़ हैं, वो केंद्र सरकार और डीडीए को इसका दोषी ठहरा रहे हैं.

पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने लिखा है, "सरकार मंदिर के मामले में सावधानी से काम लेती है. फिर गुरु रविदास जी के तुग़लकाबाद प्राचीन मंदिर को क्यों तोड़ा गया? क्या इस पवित्र मंदिर को इसलिए तोड़ा गया क्योंकि गुरु जी के भक्त दलित हैं. परन्तु गुरु जी तो सभी के हैं."

दिल्ली में सरकार चला रही आम आदमी पार्टी जो कि लंबे समय से केंद्र सरकार से डीडीए को दिल्ली सरकार के अंतर्गत लाने की वकालत करती रही है, उनके नेता भी डीडीए को इसका दोषी मान रहे हैं.

दिल्ली के समाज कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने बीबीसी से कहा, "केंद्र सरकार और डीडीए चाहती तो इस मंदिर को बचा सकती थी. लेकिन उन्होंने संत रविदास को मानने वाले 30-35 करोड़ लोगों की आस्था का ज़रा भी ध्यान नहीं रखा. अब ये मुद्दा बहुत तेज़ी से फ़ैल रहा है. इसलिए मैंने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर उनसे अनुरोध किया है कि मंदिर की प्रतिमाओं को दोबारा स्थापित किया जाए."

उन्होंने कहा, "दिल्ली हाई कोर्ट ने मंदिर के संबंध में नवंबर 2018 में जो आदेश दिया था उसमें कहा गया था कि डीडीए रविदास समिति को वैकल्पिक ज़मीन देगी जहाँ मंदिर का ढांचा शिफ़्ट किया जा सके. मगर ऐसा नहीं हुआ."

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Image caption दिल्ली के समाज कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम

डीडीए के वाइस चेयरमेन तरुण कपूर इस मामले में प्राधिकरण की आलोचना को जायज़ नहीं मानते.

तरुण इस बात पर ज़ोर देते हैं कि रविदास समिति के सदस्यों ने कभी डीडीए से वैकल्पिक ज़मीन की मांग नहीं की, बल्कि वो इस बात पर अड़े रहे कि ऐतिहासिक जगह को शिफ़्ट नहीं किया जा सकता.

तरुण ने बताया कि रविदास समिति के लोग ही इस मामले को कोर्ट में लेकर गए थे. डीडीए ने इसकी शुरुआत नहीं की थी.

उन्होंने बताया, "साल 2015 में समिति द्वारा केस फ़ाइल किया गया. समिति ने दलील दी कि हम लंबे अरसे से इस ज़मीन पर क़ाबिज़ हैं, इसलिए यह ज़मीन हमें दे दी जाये. लेकिन यह ग्रीन बेल्ट का इलाक़ा है और जहाँपनाह फ़ॉरेस्ट की रिजर्व ज़मीन है. तो कोर्ट ने इनकी दलील नहीं सुनी और 31 जुलाई 2018 को निचली अदालत ने इनके ख़िलाफ़ फैसला दिया."

"इसके बाद निचली अदालत के फ़ैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी गई और नवंबर 2018 में जब दिल्ली हाई कोर्ट का फ़ैसला आया तो निचली अदालत के फ़ैसले को सुरक्षित रखा गया. यही अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने किया और आदेश दिया कि ज़मीन खाली करा ली जाये."

तरुण कपूर कहते हैं कि इस पूरे मामले में डीडीए की भूमिका सिर्फ़ कोर्ट के फ़ैसले का पालन करते हुए सरकारी ज़मीन को अपने कब्ज़े में लेने तक सीमित है.

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