अनुच्छेद 370: कश्मीर की बेहतरी के सरकारी दावों में कितना दम: नज़रिया

  • 15 अगस्त 2019
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अनुच्छेद 370 के अचानक ख़त्म किए जाने के दो दिन बाद दिल्ली के एक टैक्सी ड्राइवर से मेरी शर्त लगी. उनका कहना था कि एक साल बाद कश्मीर के हालात बिल्कुल सामान्य हो जाएंगे और सुरक्षाबलों की तैनाती की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. अगर कश्मीर में फिर भी सुरक्षा बल तैनात रहते हैं तो वो मुझे महिलापालपुर में पार्टी देंगे.

भारत के आम लोगों को ये मिथक बताया जाता रहा है कि कश्मीर में जो कुछ भी किया जा रहा है वो कश्मीरी जनता के लिए है.

आठ अगस्त को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुच्छेद 370 पर राष्ट्र को संबोधित किया तो उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत ये कहते हुए की कि कश्मीरियों को उनके अधिकार देने के लिए एक ऐतिहासिक क़दम उठाया गया है.

उन्होंने कहा, "अब भारत के हर नागरिक के लिए समान अधिकार और समान ज़िम्मेदारियां होंगी." लोकसभा में अमित शाह ने राज्य के विकास के आंकड़े रखे.

हालांकि शाह और मोदी ने अनुच्छेद 370 के ख़त्म होने और इससे संबंधित बदलावों से जम्मू और कश्मीर की जनता को फ़ायदा मिलने वाले जो भी दावे किए, वो कसौटी पर खरे नहीं उतरते.

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कश्मीर की अलग से फ़िक्र क्यों?

पहले हमें बताया गया कि कश्मीरियों को भी आरटीआई जैसे क़ानूनों का फ़ायदा मिलेगा. ये दिलचस्प है ख़ासकर तब जब इसके प्रावधानों में बदलाव लाकर शेष भारत में इसे कमज़ोर किया जा रहा है.

घुमंतू क़बीलों और अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण और वन अधिकार क़ानून में गुज्जरों तक को शामिल करना एक अच्छी बात तभी होगी जब बीजेपी आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़े (ईडब्ल्यूएस) का प्रवाधान लाकर शेष भारत में एससी-एसटी के लिए आरक्षण को कमज़ोर नहीं करती.

जम्मू कश्मीर के एससी/एसटी के लिए बीजेपी की चिंता तब वाजिब मालूम होती जब बीजेपी के नेता कठुआ में एक मासूम गुज्जर बच्ची के बलात्कारियों का बचाव नहीं किए होते.

दूसरे, अनुच्छेद 370 को ख़त्म करते हुए ये दावा किया गया कि कि इससे कश्मीर के विकास में मदद मिलेगी क्योंकि यहां अब उद्योगों में निवेश होगा.

जब पूरे देश में निवेश लगातार गिर रहा है, तो कोई कैसे भरोसा करे कि निजी कंपनियां अब कश्मीर में निवेश करना शुरू करेंगी. ये भी ताज्जुब की बात है कि कश्मीर में जब इतनी आसानी से सारे संचार बंद किए जा सकते हैं तो कौन सी बीपीओ कंपनी वहां निवेश करेगी.

अगर अनुच्छेद 370 ही कश्मीर में रोज़गार और विकास की कमी के लिए ज़िम्मेदार है तो उन तथ्यों का क्या जवाब है, जिसे अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने उठाया है कि मानव विकास सूचकांक में कश्मीर गुजरात से कहीं आगे है?

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कश्मीर मुद्दे पर क्या कहते हैं इतिहासकार?

समस्या आर्थिक नहीं राजनीतिक है

जम्मू-कश्मीर में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से भले कम है लेकिन ये मध्यप्रदेश से ऊपर है जहां 15 सालों तक बीजेपी का शासन रहा. अनुच्छेद 370 के बावजूद बिहार और यूपी से दसियों हज़ार मज़दूर बेहतर मज़दूरी के लिए कश्मीर में काम कर रहे हैं.

चलिए इस आसान तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दें कि ऐसा राज्य के विशेष दर्जे के कारण था जिसकी वजह से शेख़ अब्दुल्लाह कश्मीर में भूमि सुधार करने में कामयाब हुए थे और जिसकी वजह से औसतन कश्मीरी के आर्थिक स्तर में सुधार आया.

लेकिन ये सही बात है कि कश्मीरियों को भी नौकरी की ज़रूरत है पर उनकी नाराज़गी का मुख्य कारण आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक है.

तीसरी बात, हमें बताया जाता है कि हमें बीजेपी के साहसिक क़दम का शुक्रिया अदा करना चाहिए, क्योंकि तीन ख़ानदान जो कश्मीर को नियंत्रित करते थे और सारा लाभ लेते थे वो लाभ अब जनता तक पहुंचेगा. लेकिन ख़ुद बीजेपी में वंशवादी राजनीति लगातार फलफूल रही है.

चौथा, सरकार दावा करती है कि अनुच्छेद 35ए को ख़त्म करके और बाहर के लोगों को राज्य में ज़मीन मुहैया कराने का अवसर देकर वो केवल स्थानीय लोगों को अच्छे दाम मिलने का मौक़ा ही नहीं दे रहे हैं बल्कि कश्मीरी महिलाओं के पक्ष में एक बड़ा स्त्रीवादी क़दम भी उठा रहे हैं.

अनुच्छेद 35ए में जो लैंगिक आधार पर ग़ैरबराबरी थी, उसे सुप्रीम कोर्ट में जाकर आसानी से ख़त्म किया जा सकता था.

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Image caption हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का कश्मीर की लड़कियों से जोड़कर दिया गया बयान विवाद की वजह बन गया था.

कश्मीरी महिलाएं जश्न मनाएंगी?

जब बीजेपी के विधायक ख़ुशी के साथ गोरी कश्मीरी महिलाओं से शादी करने की बात करते हों, जोकि यौन हिंसा के ज़रिए जीत लेने की एक छिपी धमकी है, ऐसे में ये समझना कठिन है कि कश्मीरी महिलाएं तथाकथित समान अधिकार मिलने के लिए जश्न मना पाएंगी.

लोगों को ये भी उम्मीद होगी कि बीजेपी पूरे देश में हिंदू महिलाओं को उनके हिंदू भाइयों और पतियों के ख़िलाफ़ ज़मीन के अधिकार देने का नियम लागू करने की वही प्रतिबद्धता दिखाएगी.

मुंबई में केवल महाराष्ट्रियों को नौकरी देने की मांग को लेकर शिव सेना पहले से प्रदर्शन कर रही है, हिमाचल और उत्तराखंड में भी बाहरी लोगों को खेती की ज़मीन बेचने के ख़िलाफ़ क़ानून है और नागालैंड जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में अभी भी विशेष संवैधानिक धाराएं लागू हैं.

ताज्जुब होता है कि केंद्र जितना कश्मीर की फ़िक्र करता है उतनी इन सारे राज्यों के विकास के बारे में क्यों लापरवाह बना हुआ है?

पांचवां, हमें बताया जाता है कि आतंकवाद कम हो जाएगा. ये बात हमने पहले भी सुनी है, जब हमें बताया गया था कि नोटबंदी ने आतंकवादियों और बाग़ियों की कमर तोड़ दी थी. लेकिन पुलवामा समेत अन्य हमले लगातार जारी रहे, वो भी राष्ट्रपति शासन में.

जिन कारणों से कश्मीरी ख़ुद को अलग थलग पाते थे, वे सब बने रहेंगे. मानवाधिकार उल्लंघन, हत्याएं, पैलेट गन से अंधे होते नागरिक, हिरासत और टॉर्चर, जिनके बारे में संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त ने भी हाल ही में ध्यान दिलाया, ये सब नए बने केंद्र शासित क्षेत्र के नागरिकों की याददाश्त से मिटेंगे नहीं.

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हालात सुधरेंगे?

जो लोग मानते हैं कि उन्हें हथियार से जवाब देना चाहिए, वे हथियारों और ट्रेनिंग के लिए सीमापार पाकिस्तान जाएंगे. अनुच्छेद 370 के हटाए जाने का मतलब ये नहीं कि भौतिक सीमा भी ख़त्म हो जाएगी.

अत्यधिक सुरक्षाबलों की तैनाती से हो सकता है कि सरकार चरमपंथ पर अंकुश लगाए रखे लेकिन इससे लोगों के दिल और दिमाग़ को जीतना मुश्किल ही है.

जितनी आसानी से बड़े मीडिया संस्थान और सभी पार्टियों के नेताओं ने जम्मू-कश्मीर के विखंडन को स्वीकार किया है और कश्मीरी लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित करने वाले फ़ैसले को लेकर इनके लोगों में जो गहरी ख़ामोशी पसरी है, ये दिखाता है कि उन्होंने कश्मीरियों को भारत के नागरिकों के बराबर कभी समझा ही नहीं.

यह ये भी दिखाता है कि उन्हें वाक़ई कभी संविधान में भरोसा नहीं था. जब आप किसी इलाक़े को अपने नियंत्रण में लेते हैं बिना वहां के लोगों से सलाह मशविरा किए और ताक़त के साथ, तो इसे और अधिकार और लोकतंत्र के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता.

(नंदिनी सुंदर दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाती हैं. ये लेखिका के अपने विचार हैं.)

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