जब दिल्ली में बताया गया कश्मीर का आंखों देखा हाल

  • 14 अगस्त 2019
श्रीनगर में एक दुकान का बंद शटर इमेज कॉपीरइट Kavita Krishnan
Image caption 'गो इंडिया गो बैक' के नारे के आगे कुछ अक्षर जोड़ उनका मतलब बदल दिया गया है.

दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया का कमरा दर्जनों कैमरा, पत्रकारों और नागरिक अधिकार ऐक्टिविस्ट्स से खचाखच भरा था. सब जमा हुए थे कश्मीर घाटी में पांच दिन बिताकर लौटे अर्थशास्त्री ज़्यां द्रेज़ , नेश्नल अलायंस ऑफ़ पीपुल्स मूवमेंट्स के विमल भाई, सीपीआईएमएल पार्टी से कविता कृष्णनन और ऐप्वा से मैमूना मोल्लाह को सुनने के लिए.

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाने और दो केंद्रशासित प्रदेशों में उसे विभाजित करने के फ़ैसले के बाद, श्रीनगर, सोपोर, बांदीपोरा, पंपोर, शोपियां और अनंतनाग में नौ अगस्त से तेरह अगस्त तक व़क्त बिताकर लौटे इन लोगों ने वहां के हाल की तस्वीरें और वीडियो दिखाने का वादा किया था.

लेकिन प्रेस वार्ता शुरू होने से पहले ही उन्होंने अचानक बताया कि वो ये सब नहीं दिखा पाएंगे. कविता कृष्णनन ने कहा, "प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने हमें कहा है कि हम ये सब दिखाने के लिए प्रोजेक्टर का इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि उनपर बहुत दबाव है."

हालांकि जब मैंने प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया की एक प्रवक्ता से बात की तो उन्होंने इस आरोप से इनकार किया और कहा कि उनकी तरफ़ से वीडियो या तस्वीरें दिखाने पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई.

लेकिन मैमूना मोल्लाह ने दावा किया कि, "प्रेस क्लब ने साफ़ तौर पर कोई वजह नहीं बताई पर कहा कि उन पर भी कुछ पाबंदियां हैं इसलिए यहां कुछ नहीं दिखाया जाएगा."

प्रेस वार्ता के बाद वही फ़ोटो और वीडियो पत्रकारों के साथ ईमेल के ज़रिए साझा किए गए.

मीडिया सेंसरशिप के संदर्भ में ज्यां द्रेज़ ने कहा कि कश्मीर से क्या ख़बरें दिखाई जाएं, इसपर इस व़क्त सरकार का दबाव है और मीडिया से एक तरह की छवि दिखाने की उपेक्षा है.

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Image caption कश्मीर से छपनेवाले अख़बार में कई पन्नों पर शादियों के रद्द होने की सूचना है.

उन्होंने कहा, "स्थानीय कश्मीरी मीडिया काम नहीं कर पा रहा है, उनपर दबाव तो है ही, जानकारी जुटाने के रास्ते भी नहीं है, ज़्यादातर राष्ट्रीय स्तर का मीडिया निष्पक्ष तरीके से अपना काम नहीं कर रहा, सिर्फ़ न्यूयॉर्क टाइम्स, रॉएटर्स और बीबीसी जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों में काम करे भारतीय नागरिक कश्मीर में घूम-घूम कर रिपोर्ट इकट्ठा कर पा रहे हैं और उसे छाप रहे हैं."

द्रेज़ के मुताबिक इस वजह से अख़बारों में छापने के लिए पुष्ट ख़बरें नहीं हैं.

कविता कृष्णनन की खींची तस्वीरों में दिख रहा है कि अख़बार में कुछ पन्ने सिर्फ़ शादियों के रद्द किए जाने के विज्ञापनों से भरे हैं.

मैमोना ने ये भी बताया कि अख़बारों के पास छापने के लिए ज़रूरी कागज़, 'न्यूज़प्रिंट', ख़त्म हो रहा है और दिल्ली से उसे मंगवाने के साधन नहीं हैं.

हिंसा का दावा

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Image caption प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक पेलेट गन से घायल इस व्यक्ति के परिवार ने कहा कि ये शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहा था.

मीडिया के साथ साझा की गई तस्वीरों में पेलेट गन से बुरी तरह घायल हुए एक शख़्स की तस्वीर भी है.

ज्यां द्रेज़ ने कहा, "हम श्रीनगर के अस्पताल में ऐसे दो लोगों से मिले लेकिन हम जानते हैं कि सौरा में शुक्रवार 10 अगस्त को बड़ा प्रदर्शन हुआ जिसमें लोग घायल हुए पर हमें वहां जाने नहीं दिया गया."

उनके मुताबिक बड़े राजनेताओं के अलावा, राजनीतिक वर्कर, नागरिक अधिकार ऐक्टिविस्ट, व़कील, व्यापारी और ऐसे सभी लोग जो सरकार के ख़िलाफ़ बोल सकते हैं या लोगों को प्रभावित कर सकते हैं, उन्हें हिरासत में ले लिया गया है.

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Image caption सोपोर में गैस सिलेंडर की बंद दुकान के सामने लाइन में खड़े लोग.

इन हिरासतों की तादाद, किस क़ानून के तहत उन्हें उठाया गया है या कहां रखा गया है, इसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी.

इनका दावा था कि श्रीनगर और उसके बाहर के शहरों और गांवों में लोगों में बहुत दहशत है और उनसे सिर्फ़ पहचान छिपाने की शर्त पर ही लोगों ने बात की.

जम्मू कश्मीर पुलिस ने आज श्रीनगर में पत्रकारों से बातचीत में ये माना कि पिछले दिनों में कुछ लोगों को पेलेट गन से चोटें आईं और उन्हें उपचार के बाद घर जाने दिया गया.

ईद और कर्फ़्यू

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Image caption कश्मीर के बिजबिहारा में ईद के दिन सज़कों पर सन्नाटा

श्रीनगर समेत कई इलाकों में धारा 144 लागू है जो किसी भी जगह चार से ज़्यादा लोगों के जमा होने पर पाबंदी लगाता है.

मैमूना मोल्लाह के मुताबिक कि औपचारिक तौर पर कर्फ़्यू ना होने के बावजूद इन इलाकों में कर्फ़्यू जैसा ही माहौल है.

उन्होंने कहा, "हम लोगों के लिए जगह-जगह जाना बहुत मुश्किल था क्योंकि हर जगह हमसे कर्फ़्यू पास मांगा जाता था पर कर्फ़्यू लोगू नहीं था इसलिए ऐसे कोई पास जारी नहीं किए गए, नतीजा ये कि कंटीली तारें और बैरिकेड के ज़रिए बंद रास्तों को पार नहीं किया जा सकता था."

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Image caption श्रीनगर के डाउनटाउन में एक चेक पोस्ट

अपनी रिपोर्ट में इन्होंने बताया कि ईद के दिन भी कोई ख़ास ढील नहीं दी गई थी और लोगों ने शिकायत की कि उन्हें ईद की नमाज़ घर मौहल्ले में पढ़नी पड़ी जबकि ये जामा मस्जिद में पढ़ी जाती है.

ये टीम लद्दाख़ और जम्मू इलाकों में नहीं गई. पर कश्मीर घाटी में धारा 370 हटाए जाने पर लोगों में खुशी होने के सरकार के दावे को उन्होंने ग़लत बताया.

कविता कृष्णनन ने कहा कि वो सैंकड़ों लोगों से मिले लेकिन सिर्फ़ एक व्यक्ति ने इस फ़ैसले पर ख़ुशी ज़ाहिर की जो भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता हैं.

उनका दावा था कि लोगों से बातचीत में कुछ ऐसे अल्फ़ाज़ ही बार-बार सुनाई दिए, "बर्बादी, बंदूक की ज़्याद्ती, धोख़ा, कब्रिस्तान और ज़ुल्म".

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