MBBS: क्या भारत में ‘बेची’ जा रही हैं सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटें?

  • 17 अगस्त 2019
बीबीसी

राजस्थान के मेडिकल स्टूडेंट्स इस बात से बेहद नाराज़ हैं कि ओबीसी और एससी/एसटी कोटे की कट-ऑफ़ से भी कम नंबर पाने वाले कुछ छात्रों को इस वर्ष राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाख़िला दिया गया है.

इन छात्रों का आरोप है कि "ये दाख़िले NEET के स्कोर को देखकर नहीं, बल्कि फ़ीस भरने की क्षमता के आधार पर हुए हैं. तो क्या सरकार सीटें बेचने लगी है?"

ये छात्र सबूत के तौर पर राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग से जारी MBBS स्टूडेंट्स की एक लिस्ट दिखाते हैं जिसमें ऐसे कई छात्रों के नाम हैं जिनका NEET स्कोर 50-55 परसेंटाइल से भी कम है.

ये वो स्टूडेंट हैं जिन्हें इस साल राज्य सरकार द्वारा लागू एनआरआई कोटे के तहत एडमिशन मिला है.

राजस्थान में एनआरआई कोटे की दो सौ से ज़्यादा सरकारी सीटें निर्धारित की गई हैं जिनके ख़िलाफ़ राज्यस्तर की 'मेडिकल स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमेटी' बीते तीन महीने से विरोध प्रदर्शन कर रही है.

राजस्थान के अजमेर, कोटा, उदयपुर, जयपुर और बीकानेर मेडिकल कॉलेज समेत प्रदेश के सभी 14 मेडिकल कॉलेज कैंपस पिछले दिनों सरकार विरोधी नारों से गूँजते दिखे और कुछ छात्र भूख हड़ताल पर भी रहे.

लेकिन राज्य सरकार ने एनआरआई कोटे से जुड़ी मेडिकल छात्रों की माँगों पर कोई विचार नहीं किया, इसलिए ये छात्र अब इस कोटे को 'सरकार के पैसा कमाने की स्कीम' कह रहे हैं.

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NRI कोटा है क्या?

सरकारी आदेशों के अनुसार राजस्थान सरकार ने जून 2019 में शैक्षणिक सत्र 2014-15 के बाद बढ़ाई गई मेडिकल सीटों में से 15 प्रतिशत सीटें एनआरआई कोटे से भरने का फ़ैसला किया है.

राजस्थान सरकार के इस नये बंदोबस्त के अनुसार राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कुल 212 सीटें एनआरआई कोटे के लिए रिज़र्व की गई हैं.

राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग के एडिश्नल डायरेक्टर सुरेश चंद ने बीबीसी को बताया कि "राजस्थान में 14 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं. इनमें से 6 कॉलेज सीधे तौर पर सरकार के अंतर्गत आते हैं. बाक़ी 8 कॉलेज सरकारी समितियों द्वारा संचालित हैं. राज्य की 212 एनआरआई सीटों को इन सभी 14 सरकारी कॉलेजों के बीच बाँटा गया है. इससे पहले एनआरआई कोटा सिर्फ़ राज्य के प्राइवेट कॉलेजों में ही ऑफ़र किया जाता था."

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मेडिकल एजुकेशन विभाग के मुताबिक़ ये कोटा एमबीबीएस और डेंटल कोर्स के अलावा आगे की पढ़ाई, यानी पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स के दाख़िलों पर भी लागू होगा.

सुरेश चंद ने कहा कि राज्य सरकार इस कोटे की मदद से विदेशी छात्रों को अपने यहाँ पढ़ने के लिए आमंत्रित करना चाहती है. साथ ही एक लक्ष्य यह भी है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों के लिए कुछ अधिक पैसा जुटाया जा सके. यही वजह है कि एनआरआई कोटे के तहत आवेदन करने वाले छात्रों से सामान्य छात्रों की तुलना में ज़्यादा फ़ीस ली जा रही है.

लेकिन मेडिकल स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमेटी में शामिल सभी सरकारी कॉलेजों के प्रतिनिधि सरकार के इस तर्क से असहमत हैं.

वो सवाल उठाते हैं कि किसी अन्य स्टूडेंट से ज़्यादा पैसे लेकर, राज्य के एक ज़्यादा मैरिट वाले छात्र की सीट उससे छीन लेना कहाँ तक न्यायोचित है?

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Image caption डॉक्टरों ने मुँह पर ताले लगाकर भी प्रदर्शन किया. उनका कहना है कि सरकार में उनकी सुनने वाला कोई नहीं.

फ़ीस और विवाद

एनआरआई कोटे वाली सीट पर सालाना फ़ीस कितनी है? यह पढ़ने से पहले आप ये जान लें कि फ़ीस को लेकर भी राजस्थान के मेडिकल स्टूडेंट पिछले एक साल से सरकार की आलोचना कर रहे हैं.

उनका कहना है कि साल 2017 में हॉस्टल, ट्यूशन, अकादमिक और स्पोर्ट्स फ़ीस को मिलाकर एक छात्र को प्रति वर्ष 6,000 रुपये जमा करने होते थे. साल 2018 में इसे बढ़ाकर क़रीब 50,000 रुपये प्रति वर्ष कर दिया गया.

साथ ही सरकार ने यह नियम भी बना दिया कि मेडिकल स्टूडेंट्स की फ़ीस हर साल दस फ़ीसदी बढ़ाई जाएगी.

अब बात एनआरआई कोटे वाली सीटों की. एडिश्नल डायरेक्टर सुरेश चंद के मुताबिक़ इन सीटों पर दाख़िला लेने वाले छात्रों को हर वर्ष तक़रीबन 14 से 15 लाख रुपये फ़ीस जमा करनी होगी.

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Image caption राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग का 26 जून 2019 का आदेश

लेकिन फ़ीस की यह रकम सूबे के प्राइवेट कॉलेजों की एनआरआई सीटों की फ़ीस की तुलना में काफ़ी कम है.

मेडिकल स्टूडेंट इस बात पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि ये वाक़ई एक बढ़िया सौदा है क्योंकि प्राइवेट कॉलेज की तुलना में किसी एनआरआई कोटे वाले छात्र को अब कम पैसे ख़र्च करके सरकारी कॉलेज की डिग्री मिल सकेगी.

पर डॉक्टर नितेश भास्कर इस स्थिति पर अलग तरह से सवाल करते हैं. वो कहते हैं, "अधिक फ़ीस के नाम पर प्रतिभाशाली छात्रों की 15 प्रतिशत सीटें सरकार कैसे छीन सकती है?"

डॉक्टर नितेश 'मेडिकल स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमेटी' में अजमेर मेडिकल कॉलेज के प्रतिनिधि हैं.

उनके अनुसार, "सरकार ने पहले सभी छात्रों की फ़ीस बढ़ाई. फिर फ़ीस के नाम पर तैयार किए गए एनआरआई कोटे के तहत 15 प्रतिशत सीटें हड़प लीं. ये वो सरकारी सीटें हैं जो एनईईटी की परीक्षा में बेस्ट रैंक हासिल करने वाले छात्रों के बीच बाँटी जाती थीं."

"कौन नहीं जानता कि देश में मेडिकल कोर्स की सरकारी सीटें सिर्फ़ 30 हज़ार हैं और देश में मेडिकल की सबसे बड़ी परीक्षा, NEET-2019 में पास हुए सभी 8 लाख छात्र इन सीटों को पाने का सपना रखते हैं. लेकिन सरकारी सीटों पर सिर्फ़ वे जा पाते थे जिनका स्कोर बढ़िया हो. चाहें उनके माता-पिता के पास पैसे हों या नहीं. लेकिन सरकार ने इस पैमाने को बदल दिया है."

डॉक्टर नितेश ने कहा, "हमारे राज्य में किसी भी साधारण कोचिंग सेंटर में मेडिकल की तैयारी करने का रेट डेढ़ लाख रुपये है. ग़रीब परिवार भी ये सोचकर बच्चे की कोचिंग पर पैसा ख़र्च कर देते थे कि एक बार सरकारी कॉलेज में दाख़िला हो जायेगा तो डॉक्टरी कर लेगा. लेकिन 15 प्रतिशत सीटें एनआरआई के लिए ब्लॉक होने से प्रतिस्पर्धा तेज़ी से बढ़ेगी या ग़रीब परिवार ये ख़्वाब देखना ही छोड़ देंगे."

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कितनी सीटें भरीं?

मेडिकल स्टूडेंट्स की इसी स्टेट कमेटी में डॉक्टर धर्मेंद्र कुमार भांभू बीकानेर मेडिकल कॉलेज के प्रतिनिधि हैं. धर्मेंद्र बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज की स्टूडेंट यूनियन के निर्वाचित अध्यक्ष भी हैं.

उनका कहना है कि एनआरआई कोटे की वजह से बहुत सारे छात्रों के लिए NEET की रैंक का कोई मतलब नहीं रह गया है.

धर्मेंद्र ने कहा, "हम दो महीने से इसके ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट कर रहे हैं. कॉलेज प्रशासन कहता है कि ये सरकार के स्तर का मुद्दा है, उनके हाथ में कुछ नहीं है. मंत्री इस बारे में बात नहीं करते. जिन पेरेंट्स के पास 70-80 लाख रुपये नहीं हैं, उनके बच्चों की सीट महज़ कुछ नंबरों से छूट रही है. भले ही NEET में उनके 95 परसेंटाइल नंबर आए हैं."

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वो कहते हैं, "सब सुविधाओं में जीने वाले उन लोगों के लिए जिनके पास बहुत सारा पैसा है, कोटा निर्धारित करने का क्या मतलब है? फिर कई बच्चों की NEET रैंक बहुत ख़राब है. लेकिन ज़्यादा फ़ीस लेकर उन्हें सरकारी सीट पर दाख़िला दिया जा रहा है क्योंकि एनआरआई कोटे की व्यवस्था है. क्या इसका मतलब ये हुआ कि अगर आप एनआरआई कोटे का सर्टिफ़िकेट बनवाने में सफल हो जाते हैं, तो NEET में न्यूनतम नंबर होने पर भी आप सरकारी सीट के बारे में सोच सकते हैं?"

राजस्थान के मेडिकल एजुकेशन विभाग ने बीबीसी से इस बात की पुष्टि की है कि सूबे की 212 एनआरआई सीटों में से अधिकांश सीटें (200 से ज़्यादा) आवंटित की जा चुकी हैं.

विभाग के अनुसार इनमें वो छात्र भी हैं जिनका NEET स्कोर 50 परसेंटाइल से कम है. यानी ओबीसी और एससी-एसटी श्रेणी के कट-ऑफ़ स्कोर से कम.

मेडिकल एजुकेशन विभाग के एडिश्नल डायरेक्टर सुरेश चंद ने बताया कि सरकार ने जो मौजूदा व्यवस्था बनाई है, उसके अनुसार एनआरआई कोटे की सभी 212 सीटें अगर नहीं भर पाती हैं, तो उन्हें कॉलेज की मैनेजमेंट सीटों में बदल दिया जाएगा. ऐसी स्थिति में सोसायटी से संचालित सरकारी मेडिकल कॉलेज यह तय कर सकेंगे कि वो छात्रों से कितनी फ़ीस लेंगे.

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ख़राब पॉलिसी?

कमेटी में शामिल उदयपुर, जयपुर, बीकानेर, झालावाड़ और जोधपुर के जिन मेडिकल स्टूडेंट्स से हमारी बात हुई, उनका मानना है कि एनआरआई कोटे की शर्तें इतनी ढीली हैं कि उनकी वजह से सिस्टम में धांधली बढ़ सकती है.

मेडिकल स्टूडेंट्स के इस दावे को समझने के लिए हमने राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग की वेबसाइट पर मौजूद सरकारी आदेश को पढ़ा जिसमें लिखा है कि एनआरआई कोटे के तहत किसे एनआरआई माना जायेगा:

  • ऐसे छात्र जिनके माता या पिता में से कोई एक या दोनों एनआरआई हों और विदेश में रहते हों.
  • ऐसे छात्र जिनके भाई या बहन विदेश में रहते हों और उन्हें स्पॉन्सर करने को तैयार हों.
  • अगर चाचा-चाची, मामा-मामी, दादा-दादी, नाना-नानी या फिर आवेदक के माता-पिता का कोई भी फ़र्स्ट डिग्री रिश्तेदार छात्र को स्पॉन्सर करने के लिए तैयार हो जाता है, तो उसे भी एनआरआई कोटे के तहत दाख़िला मिलेगा.
  • पर्सन्स ऑफ़ इंडियन ऑरिजन (PIOs) और ओवरसीज़ सिटिज़न ऑफ़ इंडिया (OCIs) भी एनआरआई कोटे के तहत एडमिशन लेने के योग्य हैं.

एनआरआई कोटे के तहत सरकारी मेडिकल सीट हासिल करने की पात्रता का दायरा क्या वाक़ई बहुत बड़ा नहीं है? यह सवाल जब हमने राजस्थान के मेडिकल एजुकेशन मंत्री रघु शर्मा को भेजा तो उन्होंने दस दिन तक लगातार हमें समय दिया और फिर इस विषय पर बात नहीं की.

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अन्य राज्यों की स्थिति कैसी?

अपनी पड़ताल में हमने पाया कि राजस्थान अकेला ऐसा राज्य नहीं है जहाँ सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे का प्रबंध किया गया है.

राज्यों के मेडिकल एजुकेशन विभाग के अनुसार गुजरात के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 181, हिमाचल प्रदेश में 22, हरियाणा में 20 और पंजाब में 45 सीटें एनआरआई कोटे के लिए निर्धारित की गई हैं.

इन राज्यों में भी एनआरआई कोटे से एमबीबीएस करने की सालाना फ़ीस 13 लाख से 19 लाख रुपये के बीच है.

गुजरात के मेडिकल एजुकेशन विभाग ने ये दावा किया कि उनके यहाँ एनआरआई कोटे के तहत सिर्फ़ उन स्टूडेंट्स को दाख़िला दिया जाता है जिनके माता-पिता या फिर वो ख़ुद एनआरआई हों.

इन पाँच राज्यों के अलावा बीबीसी ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के मेडिकल एजुकेशन विभाग से भी बात की जिन्होंने दावा किया कि उनके राज्य में फ़िलहाल सिर्फ़ प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ही एनआरआई कोटे की व्यवस्था है.

पर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे के तहत छात्रों के एडमिशन से क्या प्रभाव हो सकते हैं? इसपर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर केके अग्रवाल ने बीबीसी से बातचीत में एक अन्य नज़रिया पेश किया.

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Image caption डॉक्टर केके अग्रवाल

डॉक्टर अग्रवाल ने कहा, "अगर यह मान भी लिया जाए कि इस कोटे के तहत एनआरआई छात्र मेडिकल की पढ़ाई करने भारत आएंगे तो इसकी क्या गारंटी होगी कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वो भारत में ही अपनी सेवाएं देंगे. ये बात सही है कि वो बहुत अधिक फ़ीस दे रहे हैं. लेकिन एमबीबीएस की डिग्री के लिए जो क़ीमत विदेशी होने के नाते वो देने वाले हैं, वो उनकी मुद्रा में बहुत कम होगी. यानी सस्ते में एक सरकारी डिग्री."

"और अगर वो पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस लौट गये, तो भारत में डॉक्टरों की जो कमी है, वो वैसी की वैसी बनी रहेगी. ऐसी स्थिति में बढ़ी हुई सरकारी मेडिकल सीटों पर एनआरआई कोटा लागू करने का क्या फ़ायदा?"

डॉक्टर केके अग्रवाल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार अगर पैसा कमाने के लिए यह सब कर रही है तो वो ग़लत है.

उन्होंने कहा, "बेहतर स्थिति यह होती कि सरकार बढ़ी हुई सीटों को भारत के ही छात्रों के लिए रखती. मौजूदा स्थिति में मैं राजस्थान के प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के साथ हूँ."

(इस कहानी से संबंधित डेटा रीसर्च बीबीसी के सहयोगी प्रशांत शर्मा ने की)

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