कश्मीर का लाल चौक 370 के निष्प्रभावी होने के बाद अब एक मामूली चौराहा: नज़रिया

  • 17 अगस्त 2019
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Image caption जम्मू-कश्मीर का लाल चौक

जवाहरलाल नेहरू और शेख़ अब्दुल्ला के बीच कश्मीर मसले पर समझौता हुआ था. जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीरियों के सामने संकल्प लिया था कि कश्मीरी ही कश्मीर का भविष्य निर्धारित करेंगे.

रेफ़रेंडम के उस ज़िक्र को कई राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टियां भारत की एक कूटनीतिक भूल भी मानते हैं. शेख़ अब्दुल्ला ने ख़ुशी के इस मौक़े पर फ़ारसी में एक नज़्म पढ़ी थी जिसका अर्थ, "मैं आप बन गया और आप मैं बन गए. मैं आपका शरीर बन गया और आप मेरी आत्मा बन गए. अब कोई कह नहीं सकता कि हम अलग-अलग हैं."

1947 के बाद से कश्मीर के हालात लगातार बिगड़ते गए. चरमपंथ और वामपंथ का अड्डा बनते कश्मीर के लाल चौक को रूस के रेड स्क्वेयर की तरह देखा जाने लगा. लाल चौक धीरे-धीरे भारत के ख़िलाफ़ होने वाली हर गतिविधि के केंद्र बन गया. लाल चौक पर ख़ून से सनी कई इबारतें लिखी गईं.

भारत से विद्रोह और पाकिस्तान की हिमायत, इन दोनों की क़वायद करने वाले नेताओं ने लाल चौक पर ख़ूब झंडे फहराए. आज हमें यह सोचना है कि कश्मीर का लाल चौक क्या वास्तव में किसी प्रतीकात्मक विजयघोष का केंद्र है?

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लाल चौक बना आम चौक?

अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने पर लाल चौक का वामपंथी मिथक भरभरा कर गिर चुका है. एक सुदूर, अप्राप्य और बौद्धिक रोमांच के दिवास्वप्न का प्रतीक लाल चौक क्या आज के भारत और कश्मीर का प्रतिनिधित्व करता है?

1990 में कश्मीरियत को मिले सांप्रदायिक धोखे और पंडितों के जबरन पलायन का मूकदर्शक लाल चौक नेहरू और शेख़ अब्दुल्ला के मौखिक संकल्प पर कभी न खुलने वाले सांप्रदायिक साँकल की तरह है.

कश्मीरियत के नाम पर की जाने वाली दोयम दर्जे की राजनीति का केंद्र बन चुका लाल चौक आज के संदर्भ में नकारात्मकता का केंद्र है.

चाहे वह 2008, 2009 या 2010 का भारत विरोधी प्रचार हो, या वह कर्फ़्यू लगे कश्मीर में पैसे लेकर पत्थर फेंकने वाले युवाओं का जत्था हो, लाल चौक कश्मीर की बर्बादी का प्रतीक है.

पिछले कई दशकों की भारत विरोधी और कश्मीरी विरोधी राजनीतिक स्ट्रैटेजी और उसके प्रयोगों की परखनली है लाल चौक.

लेकिन अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी के साथ कश्मीर के साथ भारत के संवैधानिक एकीकरण के बाद लाल चौक इस देश के किसी अन्य चौक की तरह बन गया है.

हालाँकि कालांतर में कश्मीर में हुए सांप्रदायिक इस्लामिक चरमपंथ ने नेहरु के संकल्प की अवमानना करते हुए लाल चौक की स्मृतियों को दूषित किया तो था लेकिन अनुच्छेद 370 का निष्प्रभावी होना, लाल चौक की प्रतीकात्मक राजनीति को पूरी तरह से ध्वस्त करता है.

जैसे त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को गिराकर त्रिपुरावासियों ने जर्जर हो चुकी एक विचार परम्परा का बहिष्कार किया, ठीक उसी तरह, कश्मीर में लाल चौक को किसी भी ऐतिहासिकता से वंचित कर देना एक वैचारिक क़दम होगा.

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लाल चौक को उसके विवादित ऐतिहासिक स्वरूप से आज़ाद करने की आवश्यकता है. 370 के निष्प्रभावी होने पर और तमाम विपक्ष की इस मुद्दे विशेष पर कोई सिलसिलेवार या ठोस बहस के अभाव में, कश्मीर को देश के अन्य किसी भी राज्य या प्रांत के समकक्ष देखना लाल चौक के ऐतिहासिक महत्व पर एक टिप्पणी है. टिप्पणी यह है कि बौद्धिक उन्माद और छायावादी रोमांच के परे लाल चौक का कोई महत्व आज के भारत और उस भारत के एक हिस्से कश्मीर में नहीं बचा है.

आज कश्मीरियत अपने नाम पर की जाने वाली दोयम दर्जे की राजनीति से आज़ादी चाहता है. भारत में एकीकृत होने के बाद, अन्य प्रदेशों की तरह कश्मीर की अवाम वस्तुतः उस मुद्दे पर उसी संविधान से न्याय की गुहार कर सकती है जिस संविधान की शरण में देश के सभी प्रदेशों की सभी सरकारें अपनी नीतियों से वैश्विक स्तर पर एक मिसाल क़ायम करती हैं.

प्रश्न यह है कि क्या हम- कश्मीर और देश की नई पीढ़ी- इस नवीन आरम्भ को सदियों से सड़ रही भयावह और बासी हो चुकी राजनीतिक आवाज़ों से ऊपर एक नई धुन दे सकते हैं?

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किसने बढ़ाया चरमपंथ?

आँकड़े हमारे समक्ष हैं. किन लोगों ने कश्मीर की सियासत को कुछेक घरों तक नज़रबंद करके रखा, किन लोगों ने कश्मीर की कम-से-कम तीन पीढ़ियों के बच्चों की तुलना में अपने बच्चों के साथ भेदभाव किया, किन लोगों ने कश्मीर को धार्मिक उग्रवाद की तरफ़ प्रेरित किया, किन लोगों के जन्नत को दोज़ख़ बना डाला और किन लोगों ने कश्मीर पर लुटाए जाने वाले भारतवासियों के टैक्स और प्रेम को भी चंद व्यावसायिक सौदों तक समेट कर रख दिया.

इन सबका ब्योरा आज कश्मीर की जनता और भारत की आवाम के सामने स्पष्ट है. कश्मीर का भारत के साथ इस रूप में एकीकृत होना अपने-आप में एक युगांतकारी घटना है.

ये केवल एक राजनीतिक शिकस्त या जीत का बिंदु नहीं है, एक वैचारिक विजय भी है, इसलिए 'लाल चौक' जैसे वामपंथी और भारतीय संदर्भ में अतार्किक शब्दावली को उसके भौतिक स्वरूप के साथ साथ नकारना आवश्यक है.

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नए कश्मीर में नई सोच के साथ एक नयी इबारत गढ़ी जाए. नए कश्मीर में इतिहास के राजनीतिक रस्साकशी के परे सौहार्द्र के इतिहास को जीवंत करने की क़वायद हो.

नए कश्मीर में कल्हन की राजतरंगिनी के साथ साथ लल दद की कविताओं का पाठ भी हो. नए कश्मीर में पीरों की मज़ारों के दर्शन के अलावा शिव-पार्वती के विवाह का वार्षिक उल्लास भी सब मिलकर मनाएँ.

नए कश्मीर में जो भगाए गए उनको गले लगाने के लिए एक पहल भी शुरू की जाए. और नए कश्मीर में ये सब केवल राजनीति से या राजनेताओं के माध्यम से न हो बल्कि कश्मीरी समाज से स्वयंभू चेतना के रूप में ख़ुद-ब-ख़ुद सामने आए.

नया कश्मीर नए भारत के लिए प्रेरणा भी हो और नए भारत के तेजस्वी मस्तक के रूप में जगमगाए- ऐसी ही शुभकामना.

(शुभ्रास्था 'द लास्ट बैटल ऑफ़ सरायघाट: द स्टोरी ऑफ़ द बीजेपीज़ राइज़ इन द नॉर्थ-ईस्ट' किताब की सह लेखिका हैं और साथ ही भारतीय जनता पार्टी के चुनावी अभियानों से भी जुड़ी रही हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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