आगराः इन क़ैदियों को रिहा करने की मुहिम क्यों चला रहे हैं ये जेल अधीक्षक

  • 19 अगस्त 2019
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आगरा की ज़िला जेल में अपराध की सज़ा काटने के बावजूद कई क़ैदी इसलिए रिहा नहीं हो पा रहे थे क्योंकि उनके पास कोर्ट की ओर से आरोपित जुर्माना अदा करने का पैसा नहीं था. इन पैसों को कोई भर सके इसके लिए जेल के अधीक्षक शशिकांत मिश्र ने एक पहल शुरू की.

उन्होंने सामाजिक संस्थाओं, आम नागरिकों और कुछ ख़ास लोगों से अपील की कि वह इन पैसों को भरें ताकि जेल में बंद लोग खुली हवा में सांस ले सकें.

शहर के एक व्यवसायी ने दरियादिली दिखाई, 21 क़ैदियों के जुर्माने की राशि ख़ुद अदा की और फिर क़ैदियों ने जेल के बाहर सांस ली और सुकून महसूस किया.

आगरा की ज़िला जेल के अधीक्षक शशिकांत मिश्र ने बीबीसी को बताया, "शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी राजेश सहगल ने स्वतंत्रता दिवस पर इन क़ैदियों की एक लाख 73 हज़ार रुपये की ज़मानत राशि ख़ुद अदा की जिसके बाद इन लोगों को जेल से छोड़ दिया गया."

जेल अधीक्षक शशिकांत मिश्र के मुताबिक़, इनमें से ज़्यादातर क़ैदी रेलवे, सड़कों, चौराहों पर चोरी जैसी छिटपुट घटनाओं में जेल में बंद थे. किसी को कुछ महीनों से लेकर दो साल तक की सज़ा हुई थी या फिर कुछ ऐसे भी थे जिन पर सिर्फ़ अर्थ दंड ही लगाया गया था. ज़्यादातर क़ैदी सज़ा पूरी करने के बावजूद काफ़ी समय से बंद थे.

शशिकांत मिश्र ने बताया कि ज़्यादातर क़ैदी पहली बार किसी अपराध में जेल में बंद हुए थे और रिहाई के बाद कोई आपराधिक कृत्य न करने का वादा भी किया है. ये सभी क़ैदी 18 से 35 साल की उम्र के हैं और अलग-अलग तरह के अपराधों में इन्हें सज़ा मिली थी.

शशिकांत मिश्र के मुताबिक़, "क़ैदियों पर जुर्माने की राशि कुछ सौ रुपयों से लेकर 23 हज़ार रुपये तक थी."

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ऐसे हज़ारों क़ैदी

आगरा के व्यवसायी राजेश सहगल का कहना है कि उन्हें जब इस बारे में पता चला कि सज़ा पूरी करने के बावजूद कुछ लोग जेल में बंद हैं और बाहर का कोई व्यक्ति इनके जुर्माने की राशि अदा कर सकता है तो उन्होंने इसके लिए जेल अधिकारियों से संपर्क किया.

व्यवसाय के सिलसिले में राजेश सहगल इस समय जर्मनी में हैं. वो कहते हैं, "हमने सोचा कि जो ग़लती इन्होंने की थी उसकी सज़ा तो मिल ही गई है. अब ये ग़रीब लोग हैं. थोड़े बहुत जुर्माने की राशि अदा नहीं कर पा रहे हैं तो क्यों न इनकी मदद की जाए."

जानकारों के मुताबिक, राज्य की जेलों में इस तरह के हज़ारों क़ैदी पड़े हैं जो सिर्फ़ इसीलिए जेल से बाहर नहीं निकल पाते क्योंकि उनके पास जुर्माना भरने का पैसा नहीं होता.

आगरा की ज़िला जेल से स्वतंत्रता दिवस पर रिहा हुए गौतम के ख़िलाफ़ बाह थाने में मुक़दमा दर्ज था, दो साल की सज़ा भी पूरी कर चुके थे लेकिन 23 सौ रुपये जुर्माने की राशि चुकाने का उनके पास न तो पैसा था और न ही कोई मदद करने वाला. इस बारे में पूछे जाने पर गौतम सिर्फ़ राजेश सहगल और जेल अधीक्षक का आभार जताते हैं, कहते कुछ नहीं.

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पुलिस की अपील

जेल अधीक्षक शशिकांत मिश्र बताते हैं कि इस तरह की अपील वो सामाजिक संस्थाओं, आम नागरिकों और अन्य लोगों से भी करते हैं जिसकी वजह से समय-समय पर ऐसे क़ैदियों की रिहाई संभव हो पाती है.

शशिकांत मिश्र के मुताबिक़, इस पहल के चलते पिछले दो साल में आगरा की ज़िला जेल में इस तरह के अब तक करीब ढाई सौ क़ैदी रिहा किए जा चुके हैं.

15 अगस्त, 26 जनवरी, गांधी जयंती जैसी प्रमुख तिथियों पर राज्य सरकारें अक़्सर ऐसे क़ैदियों को रिहा करने का फ़ैसला करती हैं जिनका जेल के भीतर आचरण अच्छा रहता है. लेकिन ज़िला जेल की ये पहल अनोखी है क्योंकि ऐसे क़ैदियों के बारे में यदि किसी को बताया न जाता तो शायद मदद करने वाले भी आगे न आ पाते. जेल अधिकारियों के मुताबिक़, आगरा में पिछले दो साल में तमाम संस्थाओं और दूसरे लोगों ने बढ़-चढ़कर इसमें हाथ बढ़ाया है.

दरअसल, ऐसे क़ैदियों की रिहाई के बारे में न तो कोई स्पष्ट व्यवस्था है और न ही कोई निर्देश है, जो जुर्माने की राशि न अदा कर पाने के कारण जेल में ही पड़े रहते हैं. इनमें से ज़्यादातर वही होते हैं जिनके परिवार वाले या फिर सगे-संबंधी भी या तो इस स्थिति में नहीं होते कि वो जुर्माने की राशि भर सकें या फिर कई बार भरना नहीं चाहते.

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कहां से मिली प्रेरणा

आगरा की ज़िला जेल के अधीक्षक शशिकांत मिश्र कहते हैं कि उन्हें इसकी प्रेरणा लखनऊ में तब मिली जब वहां के तत्कालीन ज़िलाधिकारी राजशेखर ने इस मामले में निजी तौर पर कुछ मदद करने की बात कही.

राजशेखर इस वक़्त उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक हैं. बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "ज़िलाधिकारी होने के नाते ज़िला जेल का भी प्रमुख था. ऐसे क़ैदियों के बारे में जब सुना तो लगा कि ख़ुद ही प्रयास करना चाहिए."

"दरअसल, इनके जुर्माने की राशि राज्य सरकार तो भर नहीं सकती है क्योंकि इनके ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कराने और फिर सज़ा दिलाने का काम भी राज्य सरकार ही करती है. ऐसे में दंड का जुर्माना नहीं भर सकती. उस वक़्त जेल अधीक्षक से हमने कहा कि ज़्यादा राशि तो होती नहीं, हम लोग ख़ुद भी अपनी तरफ़ से दे सकते हैं. उसके बाद शशिकांत मिश्र ने आम लोगों को जोड़ने की कोशिश की और ये कोशिश काफ़ी सफल रही है."

शशिकांत मिश्र बताते हैं कि लखनऊ में भी उन्होंने दो साल से भी कम समय में क़रीब दस लाख रुपये का जुर्माना इसी तरह से अदा कराकर डेढ़ सौ से ज़्यादा लोगों को जेल से रिहा कराया था. वो कहते हैं कि धीरे-धीरे इसे दूसरी जगहों पर भी आज़माया जा रहा है और शायद आने वाले दिनों में इस बारे में कोई स्पष्ट नीति भी बन सके.

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