कश्मीर डायरी: बिना फ़ोन, बिना इंटरनेट और कर्फ़्यू के बीच रिपोर्टिंग

  • 19 अगस्त 2019
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वो चार अगस्त 2019 का दिन था. इस दिन पूरे कश्मीर में अफ़रातफ़री का माहौल था. लोग खाने-पीने की ज़रूरी चीज़ों को बाज़ार से इकट्ठा कर रहे थे.

पेट्रोल पंपों पर लोगों की लम्बी कतारें थीं. किसी को कुछ भी पता नहीं था कि कल कश्मीर में क्या होने वाला है.

लेकिन बीते दस दिनों से जो कुछ भी कश्मीर में हो रहा था, उसे लेकर लोग इस बात पर सहमत थे कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है. अमरनाथ यात्रियों को सिक्योरिटी का हवाला देकर लौटने के लिए कहा जा रहा था. कश्मीर की फ़िज़ा में बेचैनी तो बरसों से महसूस होती है पर इस बार कुछ अलग था- क्या इसकी नब्ज़ पर हाथ रखना मुश्किल था.

मैं भी अपनी रिपोर्टिंग कर रहा था. तब मोबाइल फ़ोन, इंटरनेट, लैंडलाइन फ़ोन बंद नहीं हुए थे. मैं अगले दिन यानी पांच अगस्त 2019 की सुबह के रेडियो प्रसारण के लिए रिपोर्ट तैयार कर रहा था.

रात के ग्यारह बज चुके थे और मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिए गए.

अब एक आख़िरी उम्मीद ब्रॉडबैंड और लैंडलाइन थी. देखते ही देखते रात के साढ़े बारह बज गए.

मैंने अपनी रिपोर्ट तैयार की और अब मेल करना बाक़ी था. ये उम्मीद थी कि मैं ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन से अपने दफ्तर रिपोर्ट मेल कर पाउंगा.

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फ़ोन की वो घंटी नहीं बजी..

लेकिन पलक झपकते ही ब्रॉडबैंड इंटरनेट भी बंद हो गया. मैंने लैंडलाइन से दफ्तर फ़ोन करके सूचित किया कि इंटरनेट के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, इसलिए हम रिपोर्ट नहीं भेज सकते हैं. ऐसा लगा जैसे आप एक ऐसी दुनिया में हैं जहाँ बाहर की हवा तक दस्तक नहीं दे सकती.

अब ये फ़ैसला हुआ कि सुबह के प्रसारण में मुझसे लाइव लिया जाएगा. लेकिन सुबह तक लैंडलाइन भी बंद कर दिया गया था और सुबह की वो फ़ोन कॉल की घंटी आज तक नहीं बजी.

गौरतलब है कि अनुछेद 370 को हटाने से पहले क़रीब दस दिनों से सरकारी ऑर्डर्स आ रहे थे.

पहले ऑर्डर में कश्मीर में सुरक्षाबलों को संख्या बढ़ाने की बात कही गई. उसके बाद एक दूसरे ऑर्डर में तीन महीने राशन स्टॉक करने की बातें कही गईं.

तीसरे ऑर्डर में अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों को कश्मीर छोड़ने के लिए कहा गया.

इन सब बातों ने कश्मीर में ख़ौफ़ का माहौल पैदा कर दिया.

अगले दिन यानी पांच अगस्त की सुबह छह बजे जब हम श्रीनागर के राजबाग, जहां हमारे दूसरे साथी एक होटल में रुके थे, जाने लगे तो घर से दो किलोमीटर की दूरी पर सेना कंटीले तार बिछा रही थी और लोगों को आगे बढ़ने से रोका जा रहा था.

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पांच अगस्त की वो सुबह

मैं और मेरा ड्राइवर किसी तरह से श्रीनगर के राजबाग इलाके में सुरक्षाबलों और पुलिस के हर नाके को पार करते हुए पहुंच गए, जहां होटल में दिल्ली से आए हुए बीबीसी के कई साथी मेरा इंतज़ार कर रहे थे.

घर से होटल तक के 12 किलोमीटर के रास्ते में जगह-जगह सु रक्षा के सख़्त इंतज़ाम थे. जगह-जगह पर हमसे पूछताछ की गई.

होटल पहुंचने के बाद हम सभी साथी इस बात पर चर्चा करने बैठ गए कि हमें कैसे काम करना है. इस बात पर हम सब सहमत थे कि हमें चुनौतियों से निपटते हुए काम करना है.

पूरे दिन हमने श्रीनगर में हालत पर नज़र बनाए रखी और कुछ लोगों से हमारे दूसरे साथी बात करने में क़ामयाब भी रहे.

जब टीवी स्क्रीन्स पर ये ख़बर फ़्लैश हुई कि भारत की संसद में अनुच्छेद 370 को हटाने का प्रस्ताव पेश किया गया तो पूरा कश्मीर सकते में आया.

पांच अगस्त, 2019 की सुबह तक किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि भारत सरकार इतना बड़ा क़दम उठाने जा रही है.

कश्मीर में जहां-जहां नज़र जा सकती थी, वहां सिर्फ और सिर्फ पुलिस और सेना नज़र आ रही थी.

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चप्पे-चप्पे पर पुलिस और सेना

हर क़दम पर सुरक्षाबलों को तैनात किया गया था. पूरी कश्मीर घाटी में सोमवार यानी पांच अगस्त को कर्फ्यू लगाया गया था.

अगले दिन हम उत्तरी कश्मीर के बारामूला के लिए सुबह साढ़े छह बजे निकले.

श्रीनगर से बारामूला की यात्रा एक घंटे की है. इस यात्रा के दौरान हमें सुरक्षाबलों और पुलिस ने हर एक किलोमीटर पर रोका.

आगे जाने की वजह पूछी. हर बार हमने कहा कि हम पत्रकार हैं और इसके बाद हमें आगे जाने दिया गया.

बारामूला पहुंचकर हम पुराने शहर गए. वहां भारी संख्या में सुरक्षाबल तैनात थे. एक दो अधिकारयों ने हमारा पहचानपत्र माँगा और जिसके बाद हमें कैमरा खोलने की इजाज़त मिली. उन अधिकारियों ने हमसे चाय के लिए भी पूछा.

शूट ख़त्म करने के बाद हम एक दूसरे मोहल्ले में गए और आम जनता से बात करने की कोशिश की. पहले तो कोई आम इंसान हमसे बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ.

काफ़ी मशकत के बाद दो आम लोगों ने हमसे बात की.

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'कैमरे पर बात करने का मतलब गिरफ़्तारी'

मीडिया के साथ बात न करने की वजह डर था. कई लोगों ने हमसे कहा कि कैमरे पर बात करने का मतलब है कि शाम को हमें गिरफ्तार कर लिया जाएगा. हमने लोगों में काफ़ी डर पाया.

श्रीनगर वापस लौटने पर हमें उसी तरह से रोका गया, जिस तरह आते समय जगह-जगह रोका गया था.

अगले दिन सवेरे सात बजे हम दक्षिणी कश्मीर के लिए रवाना हुए. अनंतनाग कस्बे तक पहुंचने के दौरान कई जगहों पर हमें रोका गया.

जब हम अनंतनाग कस्बे पहुंचे तो हर तरफ सुरक्षाबल और पुलिस मुस्तैदी के साथ खड़े थे.

हम सीधा अनंतनाग के ज़िसा अस्पताल पहुंचे. यहां पहुंचकर हमने अस्पताल के कर्मचारियों से जानकारी हासिल की.

हमें बताया गया कि बीते दो दिनों में यहां कोई ऐसा ज़ख़्मी नहीं लाया गया है, जो बंदूक़ की गोली या पैलेट गन का निशाना बना हो.

अस्पताल से लौटने के बाद जब हम आगे बढ़े तो जम्मू और कश्मीर पुलिस के विशेष दस्ते के लोगों ने हमारी गाड़ी रोकी और आगे जाने नहीं दिया.

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पुलिस ने गाड़ी आगे नहीं जाने दी

उन्होंने हमसे कर्फ्यू पास मांगे. हमने उनसे कहा कि सरकार तो कह रही है कि कर्फ्यू तो है ही नहीं. लेकिन वो अपनी ज़िद पर अड़े रहे.

हमने किसी तरह वहां से अपनी गाड़ी पीछे मोड़ी और एक पतली गली से निकलकर हाइवे पर पहुंच गए. डर के मारे हमने किसी जगह अपना कैमरा नहीं खोला.

दोपहर तक हम श्रीनगर वापस पहुंच गए. वापसी पर भी वैसे ही रोका गया जैसे आते समय.

वापसी पर अवंतीपोरा के पास सीआरपीएफ़ के दो जवानों ने हमारी गाड़ी को रुकने के लिए कहा.

हमारे साथी आमिर पीरज़ादा आगे की सीट पर बैठे सिगरेट पी रहे थे. जब ड्राइवर ने गाड़ी रोकी तो सीआरपीएफ़ के एक अधिकारी ने आमिर से गुस्से में कहा, "सिगरेट पीते हो, बाहर आओ."

आमिर ने फ़ौरन सिगरेट फेंक दी और मैंने बीच में दखल देकर मामले को सुलझा दिया.

नौ अगस्त को जब सौरा में प्रदर्शन हुए तो अगले दिन आमिर पीरज़ादा और मैं सौरा के लिए निकले.

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'कैमरा खोला तो कैमरा तोड़ दिया जाएगा'

सौरा के नज़दीक पहुंचकर दर्जनों नौजवानों ने रास्ता बंद किया था. किसी गाड़ी को आगे बढ़ने की इजाज़त नहीं थी. जब हम जब भीड़ के पास पहुंचे तो कुछ नौजवान हमारी गाड़ी के पास आए और वापस जाने के लिए कहा.

हमारी गाड़ी पर बीबीसी का स्टीकर भी लगा था लेकिन वो नहीं माने.

एक नौजवान ने तो गरजती आवाज़ में हमसे कहा कि अगर आपने कैमरा खोला तो आपका कैमरा तोड़ दिया जाएगा.

कुछ सेकेंड तक जब ड्राइवर ने गाड़ी नहीं मोड़ी तो एक नौजवान हमारी गाड़ी के बोनट पर ज़ोर से मुक्का मारा और ड्राइवर से कहा कि फ़ौरन गाड़ी को मोड़ दो.

इतने में मैं और आमिर गाड़ी से नीचे आए और भीड़ से ऑफ़ द कैमरा बात करने लगे.

एक शख़्स ने हमसे कहा कि हम तो ईद का इंतज़ार कर रहे हैं. उनका कहना था कि ईद के बाद देखिए क्या होता है.

वहां से निकलकर हम एक दूसरे रास्ते से जाने की कोशिश करने लगे. जब हम उस रास्ते पर पहुंचे तो सुरक्षाबलों ने आगे जाने से रोका. और उस दिन हम सौरा जाने में नाकाम हो गए.

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कैमरा देखकर ही भड़क जाते थे लोग

मीडिया को लेकर लोगों का गुस्सा इसलिए भी ज़ाहिर हो रहा था क्योंकि उन्हें ये लगता है कि मीडिया कश्मीर की असली तस्वीर नहीं दिखा रहा है.

श्रीनगर के तीन बड़े अस्पतालों से घायलों के आंकड़े हासिल करने के लिए हमें तीन दिन लग गए.

इन अस्पतालों में हम कैमरा लेकर नहीं गए. कैमरा देखते ही लोग भड़क जाते थे.

हमने किसी तरह इन तीन अस्पतालों से विरोध प्रदर्शनों में जख़्मी हुए लोगों के आंकड़े हासिल किए.

इन अस्पतालों में डॉक्टरों के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि न उनके पास फ़ोन हैं और न ही कर्फ्यू पास. अपने घरवालों से बातचीत करने के लिए वे लोग परेशान थे.

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फ़ारूक़ अब्दुल्ला से मिलने नहीं दिया गया

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मख्यमंत्री डॉक्टर फ़ारूक़ अब्दुल्ला से इंटरव्यू लेने के लिए आमिर पीरज़ादा और मैं क़रीब एक किलोमीटर पैदल चलकर जब उनके घर के गेट के बाहर पहुंचे तो उनके सिक्योरिटी गार्ड्स ने कहा कि आप हमसे बात न करें, क्योंकि यहां सब देख रहे हैं.

इतने में सीआरपीएफ़ के अधिकारी आए और हमें वहां से जाने के लिए कहा गया. एक तरफ सरकार कह रही थी कि वो घर में नज़रबंद नहीं हैं तो दूसरी तरफ उनसे मिलने नहीं दिया जा रहा था.

ईद के दिन कश्मीर में बंदिशों को और भी सख्त किया गया था. सरकार को इस बात का अंदाज़ा था कि आम जनता ईद की नमाज़ के बाद विरोध प्रदर्शन कर सकती है. ईद के दिन हम दो टीमें बनाकर एक साथ श्रीनगर का दौरा करने निकले थे.

हैदरपोरा इलाके में लोगों को पुलिस सड़क के दूसरे तरफ मस्जिद में जाने से रोक रही थी. हम उन लोगों से मिले और उनका इंटरव्यू रिकॉर्ड किया किया. हमारे इंटरव्यू के बाद कुछ लोगों को मस्जिद में जाने दिया गया.

हैदरपोरा से निकलकर हम डाउनटाउन इलाके में पहुंचे, यहां सख्त कर्फ्यू था. किसी को चलने फिरने की इजाज़त नहीं थी. हमें दर्जनों जगहों पर रोका गया.

एक जगह कर्फ्यू पास माँगा गया. हमने फिर वही जवाब दिया कि सरकार तो कहती है कि कर्फ्यू तो है नहीं. यहां हम दो परिवारों से मिले. उन्होंने कहा कि हम तो क़ैद किए गए हैं, हमें बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा है.

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सड़कों पर सुरक्षाबलों के अलावा कोई नहीं

ईद के दिन डाउनटाउन की सड़कों पर सिर्फ सुरक्षाबल हमें नज़र आए. कहीं कोई आम नागरिक दिख भी जाता तो सुरक्षाबल उनसे पूछताछ करते.

अपनी कहानियों के लिए जानकारी इकट्ठा करने की मुश्किलों का सामना एक तरफ़ और फिर उस जानकारी को अपने दफ्तर तक पहुंचाने की जंग.

तीन दिनों तक हम श्रीनगर एयरपोर्ट के बाहर एक दुकान से घंटों इंतज़ार के बाद सूचनाएं भेजते रहे लेकिन ईद के दिन उनका भी इंटरनेट और फ़ोन कनेक्शन बंद कर दिया गया.

उस दुकानदार ने मुझसे कहा कि उनके पास पुलिस आई थी और कहा गया कि मीडिया के लोग यहां से वीडियो बाहर भेजते हैं.

प्रशासन से कर्फ्यू पास लेने की हर कोशिश भी नाकाम हो गई. श्रीनगर के डीसी ऑफिस के कई चक्कर काटने के बाद भी हम खाली हाथ लौट गए.

कश्मीर में कई बरस हो गए रिपोर्टिंग करते हुए- बतौर रिपोर्टर पिछले कुछ दिनों का अनुभव याद दिला गया कि सच और साहस के साथ पत्रकार का काम करना कश्मीर में अब उतना आसान नहीं रहा.

ये एहसास आपको डराता तो है लेकिन मुझे अंदाज़ा नहीं था कि इस चुप्पी से डर के साथ धीमी साँस में बेख़ौफ़ मिज़ाज भी मुस्कुराता है. रिपोर्टिंग जारी है.

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