तेजस्वी यादव की अपनी ही पार्टी से बढ़ रही बेरुख़ी?- पाँच बड़ी ख़बरें

  • 19 अगस्त 2019
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बिहार के मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल अपने इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है. शनिवार को आरजेडी के विधायकों की बैठक थी लेकिन इसे रद्द करना पड़ा.

यह बैठक पूर्वनियोजित थी लेकिन पार्टी ने रद्द करने की कोई वजह नहीं बताई. कहा जा रहा है कि विधायकों की बैठक को विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव के कारण रद्द करना पड़ा क्योंकि वो इसमें शरीक होने को तैयार नहीं थे.

इससे पहले शुक्रवार को बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने कहा था कि विधायकों की बैठक में तेजस्वी यादव भी शामिल होंगे. लोकसभा चुनाव में पार्टी की बुरी तरह से हार के बाद से तेजस्वी यादव राजनीतिक परिदृश्य से ग़ायब हैं. तेजस्वी विधानसभा के सत्र में भी आख़िर की कुछ कार्यवाही में हिस्सा लिए. तेजस्वी विपक्ष के नेता हैं फिर भी किसी बहस में भाग नहीं लिए. यहां तक कि वो आरजेडी में चलाए गए सदस्यता अभियान से भी दूर रहे.

आरजेडी में इस बात को लेकर चिंता है कि तेजस्वी पार्टी की राजनीति में लोकसभा चुनाव के बाद से बिल्कुल दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. कहा जा रहा है कि तेजस्वी पार्टी की पूरी कमान अपने हाथों में चाहते हैं लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो पाया है.

वो अपने बड़े भाई तेजप्रताप यादव की गतिविधियों से भी नाराज़ बताए जाते हैं. इसके साथ ही पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं से भी नराज़ बताए जा रहे हैं जिन्होंने लोकसभा में हार के लिए तेजस्वी को ज़िम्मेदार ठहराया है. वो चाहते हैं कि पार्टी के भीतर पहले इन मुद्दों का समाधान किया जाए तब सक्रियता दिखाएंगे.

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हमने ऐतिहासिक भूल सुधार दी- अमित शाह

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि ट्रिपल तलाक एक ऐतिहासिक भूल थी जिसे बीजेपी सरकार ने सुधार दिया है.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन की ओर से आयोजित एक समारोह में अमित शाह ने कहा कि सभी राजनीतिक पार्टियों को इस बात से सहमत थीं कि इसको हटाना सही क़दम है.

उन्होंने कहा, "लेकिन कई लोगों ने इसका विरोध सिर्फ़ इस कारण किया क्योंकि वो अपना पारंपरिक वोट बैंक नहीं खोना चाहते थे. लेकिन इस कारण देश को काफ़ी कुछ सहना पड़ा."

शाह ने ये भी कहा कि इस बिल से देश के मुसलमानों को फ़ायदा होगा. हिंदू, ईसाई या जैन धर्म मानने वालों को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा क्योंकि वो इस कुरीति से कभी प्रभावित नहीं थे.

अपना रास्ता टक गई है कांग्रेस

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कंग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपिन्दर सिंह हुड्डा ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के मामले में भाजपा का समर्थन किया है और कहा है कि कांग्रेस अपना रास्ता भटक गई है.

रविवार को रोहतक में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "अगर सरकार कुछ अच्छा करती है तो मैं उसका समर्थन करता हूं. मेरी पार्टी से कई लोगों ने इसका विरोध किया है लेकिन मेरी पार्टी रास्ता भटक गई है. ये पार्टी आज वो नहीं है जो पहले थी. अगर बात देश प्रेम की है तो मैं किसी तरह का समझौता नहीं करूंगा."

इस बीच इस तरह के भी क़यास लगाए जा रहे हैं कि हुड्डा पार्टी छोड़ सकते हैं.

हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल इसी साल नवंबर में ख़त्म होने वाला है और माना जा रहा है कि चुनाव से पहले हुड्डा प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व को बदलना चाहते हैं.

इससे पहले उनके बेटे और कांग्रेस नेता दीपेंदर सिंह हुड्डा ने भी अनुच्छेद 370 तो ख़त्म किए जाने का समर्थन किया था.

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चीनी कंपनियां भारत के लिए ख़तरा

राष्ट्रीय जागरण मंच से जुड़ी संस्था स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि देश की सुरक्षा को चीनी कंपनियों से खतरा है.

मंच ने पहले ही मोबाइल तकनीक और 5जी नेटवर्क के क्षेत्र में काम करने वाली ख़्वावे कंपनी को भारत से निकालने के लिए अभियान छेड़ रखा है लेकिन अब इसका कहना है कि दूसरी चीनी टेलिकॉम कंपनियां भी भारत के लिए ख़तरा साबित हो सकती हैं.

एक बयान जारी कर मंच के प्रमुख अश्विनी महाजन ने कहा, "भारतीय टेलिकॉम नेटवर्क का एक बड़ा हिस्सा आज भी चीनी कंपनियों के क़ब्ज़े में है और चीनी सेना की मुख्य रणनीति में इन्फोर्मेशन डॉमिनेन्स भी शामिल है. इससे सुरक्षा को ख़तरा पैदा होने की आशंकाएं हैं और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता."

इससे पहले अमरीका भी ख़्वावे कंपनी के उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक लगा चुका है.

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सूडान में सेना औ विपक्ष के बीच अहम समझौता

सूडान के विपक्षी गठबंधन ने पांच लोगों के नाम सुझाए हैं जो चुनाव से पहले देश का शासन संभालने वाली स्वायत्त परिषद में शामिल होंगे.

सेना के साथ हुए अहम समझौते के बाद बनने वाली इस परिषद के सदस्य आज शपथ लेंगे. सूडान की सेना भी पांच लोगों को नामित कर रही है.

विपक्ष के गठबंधन में शामिल सूडानी कांग्रेस पार्टी के महासचिव ख़ालिद उमर ने विश्वास जताया कि यह समझौता सफल रहेगा.

उन्होंने कहा, "संवैधानिक दस्तावेज़ एकदम साफ़ है- कार्यकारी शक्तियां मंत्री परिषद के पास रहेगी जो कि नागरिकों से बनी होगी. अहम फैसले लेने का अधिकार विधान परिषद के पास होगा. इसका मतलब है कि सत्ता नागरिकों के पास रहेगी."

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