भारत में गवाह बनना क्यों ख़तरनाक है?

  • 27 अगस्त 2019
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पिछले दिनों उन्नाव रेप कांड की पीड़िता और उनके वकील रायबरेली के पास एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गए थे, जिनके बाद से ही उनकी हालत नाज़ुक बनी हुई है.

इस हादसे में पीड़िता के दो महिला रिश्तेदारों की मौत हो गई थी, उनमें से एक रिश्तेदार 2017 की घटना की चश्मदीद थीं.

लखनऊ से बीबीसी संवाददाता समीरात्मज मिश्र के मुताबिक़ पीड़िता और गवाह को सुरक्षा मिली हुई थी लेकिन दुर्घटना वाले दिन गनर उनके साथ नहीं था. सीबीआई मामले की जांच कर रही है.

मामले में अभियुक्त बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर सभी आरोपों से इनकार करते रहे हैं.

लेकिन इस घटना ने एक बार फिर भारत में चश्मदीदों की सुरक्षा की ओर सभी का ध्यान खींचा है.

चश्मदीद को न्याय व्यवस्था की आंख और कान बताया गया है लेकिन अगर अभियुक्त प्रभावशाली हो तो भारत में चश्मदीद होना आसान नहीं. ऐसा कई मामलों में देखने को मिला है.

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आसाराम बापू और नारायण साई मामला

आसाराम बापू-नारायण साई के मामला इसका प्रमुख उदाहरण है.

दुनिया भर में 200 से ज़्यादा आश्रम चलाने वाले आसाराम बापू के बेटे नारायण साई पर चल रहे यौन उत्पीड़न मामले में महेंद्र चावला एक महत्वपूर्ण गवाह हैं.

आसाराम बापू और उनके बेटे नारायण साई बलात्कार मामलों में जेल में हैं.

लेकिन सुरक्षा को लेकर महेंद्र चावला की चिंता ख़त्म नहीं हुई हैं - "आसाराम जेल में हैं तो क्या हुआ, उनके सैकड़ों समर्थक तो मुझे निशाना बना सकते हैं."

महेंद्र चावला के मुताबिक़ आसाराम बापू से जुड़े कुल 10 लोगों पर हमले हुए, उनमें से तीन की मौत हुई और एक व्यक्ति राहुल सचान आज तक ग़ायब हैं.

"जिन लोगों पर हमला हुआ या फिर जिनकी मौत हुई, ये सब प्राइम विटनेस की श्रेणी में आते थे लेकिन आज तक आसाराम को अभियुक्त नहीं बनाया गया."

महेंद्र चावला को पुलिस सुरक्षा मिली हुई है लेकिन फिर भी उनसे संपर्क करना आसान नहीं है.

वो अनजान फ़ोन नंबर नहीं उठाते. अगर आपने किसी के रेफ़रेंस से उन्हें मेसेज किया भी हो तब भी उनके पास सवालों की भरमार होती है.

कारण - उन्हें सालों तक मिलीं धमकियां और उन पर हुआ जानलेवा हमला.

महेंद्र चावला दावा करते हैं 13 मई 2015 में सुबह नौ-साढ़े नौ के आसपास जब वो हरियाणा के पानीपत ज़िले के सनौली खुर्द गांव में अपने पहले फ़्लोर वाले घर में आराम कर रहे थे तो उन्हें बाहर कुछ आवाज़ सुनाई दी.

बाहर उन्हें दो लोग दिखे जिनके हाथ में बंदूक़ थी. उनमें से एक सीढ़ी चढ़ रहा था जबकि दूसरा नीचे पहरेदारी के लिए खड़ा था.

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दोनो में गुत्थमगुत्थी हुई और इस दौरान हमलावर ने महेंद्र चावला पर दो फ़ायर किए. पहली गोली दीवार पर लगी जबकि दूसरी महेंद्र चावला के कंधे पर.

हमलावार उन्हें मरा समझ छोड़कर भाग गए. वो क़रीब आठ से दस दिन अस्पताल में रहे.

महेंद्र चावला के मुताबिक़ हमलावर ने धमकी देते हुए कहा था, "नारायण साई के ख़िलाफ़ गवाही देता है?"

उधर आसाराम बापू के वकील चंद्रशेखर गुप्ता सभी आरोपों से इनकार करते हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "साल 2013 में आसाराम बापू की गिरफ़्तारी के बाद जिन मामलों को हमला बताया जा रहा है, उनमें से किसी मामले में आसाराम बापू अभियुक्त नहीं हैं. साल 2009 में राजू चांदक नाम के एक आश्रम साधक पर हमला हुआ था, उस मामले में आसाराम बापू को अभियुक्त बताया गया है."

महेंद्र चावला के आरोपों पर चंद्रशेखर गुप्ता कहते हैं, "आप पर कोई हमला होता है और आप बोल दो कि देश के प्रधानमंत्री ने हमला करवाया तो पुलिस जांच करेगी, और पुलिस पाएगी कि आरोप ग़लत हैं."

कई बार गवाहों पर पैसे, धमकी आदि का दबाव रहता है. ऐसे मामलों में अभियुक्त सबूतों के अभाव में छूट जाते हैं.

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अमित जेठवा की हत्या का मामला

गुजरात में आरटीआई ऐक्टिविस्ट और पर्यावरणविद् अमित जेठवा मामले में वकील आनंद याग्निक गवाह भी हैं.

याग्निक के मुताबिक़ 20 जुलाई 2010 को गुजरात हाईकोर्ट के बाहर अमित जेठवा की हत्या से एक दिन पहले अमित ने उनसे उनके चैंबर में अपनी जान को लेकर चिंता जताई थी.

याग्निक के मुताबिक़ अमित जेठवा मर्डर ट्रायल के दौरान 195 में से 105 गवाह अपने बयान से मुकर गए.

इसी साल जुलाई में पूर्व सांसद दीनू सोलंकी को अमित जेठवा की हत्या में दोषी पाया गया जिसके बाद याग्निक को सुरक्षा दी गई.

पुलिस का ग़ैर-मददगार रवैया और भ्रष्टाचार भी गवाहों की परेशानी बढ़ाता है.

गवाहों के साथ न्याय व्यवस्था में कैसे व्यवहार होता है, इस पर 2018 के अपने एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एके सिकरी ने महेंद्र चावला बनाम भारत सरकार मामले में लिखा है कि गवाहों के पास न कोई न्यायिक सुरक्षा होती है न उनके साथ उचित व्यवहार होता है. आज की न्याय व्यवस्था गवाहों पर बहुत ध्यान नहीं देती, उनकी आर्थिक और निजी हालत देखे बिना उन्हें अदालत बुलाया जाता है, साथ ही उन्हें आने-जाने का ख़र्च भी नहीं दिया जाता.

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अदालतों में मामलों के सालों घिसटने के कारण भी गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं, या फिर गवाही देने से ही मना कर देते हैं.

सालों कोर्ट के चक्कर काटने, पुलिस के सामने बार-बार घटना को दोहराने और समाज में बात फैलने से गवाहों के निजी जीवन पर गहरा असर पड़ता है.

अमरीका जैसे विकसित देश की तरह भारत में चश्मदीदों के लिए कोई आधिकारिक कार्यक्रम, क़ानून नहीं है, हालांकि सालों से विभिन्न लॉ कमीशन या क़ानून आयोग में इसे लेकर बात होती रही है.

साल 1971 में शुरु सुरक्षा कार्यक्रम के मुताबिक अमरीका में अभी तक 8,600 चश्मदीदों और उनके 9,900 परिवारजनों को इस कार्यक्रम के ज़रिए सुरक्षा, नई पहचान, नए दस्तावेज़, मेडिकल सुविधा दिए गए हैं.

वहीं, ब्रिटेन में नेशनल क्राइम एजेंसी ऐसा ही कार्यक्रम चलाती है जिसमें लोगों के ब्रिटेन के भीतर और गवाह पर मंडरा रहे ख़तरे को देखते हुए कभी-कभी ब्रिटेन के बाहर भी भेज दिया जाता है.

वहां कुछ गवाहों की ज़िंदगी को ख़तरा इतना ज़्यादा होता है कि उन्हें अपने परिवार, दोस्तों से हमेशा के लिए दूर रहना पड़ता है क्योंकि ये रिलोकेशन या स्थानांतरण स्थायी होता है.

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गवाहों की सुरक्षा

जबकि ऑस्ट्रेलिया में भी गवाहों की सुरक्षा के लिए अप्रैल 1995 से नेशनल विटनेस प्रोटेक्शन प्रोग्राम शुरू किया जा चुका है.

इन विकसित देशों के कार्यक्रम की तर्ज पर ही दिसंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भारत में एक विटनेस प्रोटेक्शन स्कीम को हरी झंडी दी और कहा कि जब तक संसद इस पर क़ानून नहीं बनाती, ये स्कीम ज़मीन पर काम करेगी.

इस स्कीम के अंतर्गत गवाह को हर ज़िले में बनने वाली 'कंपीटेंट अथॉरिटी' को ऐप्लिकेशन लिखनी होगी. इस अथॉरिटी में उस ज़िले के डिस्ट्रिक्ट और सेशंस जज, पुलिस प्रमुख और अभियोग प्रमुख सदस्य होंगे. गवाह पर ख़तरा कितना गंभीर है, पुलिस उसकी जांच करेगी और फिर उस आधार पर फ़ैसला होगा.

विटनेस प्रोटेक्शन कार्यक्रम में गवाह की सुरक्षा के लिए पूर्ण गोपनीयता बरतने की बात कही गई है. इसके लिए उठाए जाने वाले कुछ क़दम हैं -

1.गवाह के ईमेल और कॉल को मॉनीटर किया जाएगा.

2.उनके घर में सुरक्षा उपकरण लगाए जाएंगे.

3.अस्थायी तौर पर उनका घर बदल दिया जाएगा.

4.उनके घर के आसपास पेट्रोलिंग की व्यवस्था होगी.

5.उनकी गवाही विशेष रुप से तैयार अदालत में होगी जहां लाइव वीडियो लिंक्स, वन वे मिरर, गवाह के चेहरे और आवाज़ को बदलने आदि की सुविधा होती है.

इस स्कीम में आने वाले ख़र्च के लिए कार्यक्रम में एक फंड बनाने की भी बात कही गई है.

दुनिया के कुछ विटनेस प्रोटेक्शन कार्यक्रमों में जहां गवाह की पहचान को स्थायी तौर पर बदलने का प्रावधान है, क़ानून विशेषज्ञ नवीन गुप्ता के मुताबिक़ ऐसा करने से गवाहों पर कई बार उलटा असर पड़ता है क्योंकि वो अपनी पुरानी ज़िंदगी से हमेशा के लिए कट जाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में कंपिटेंट अथॉरिटी बनाने को लेकर कितना काम हुआ है, ये साफ़ नहीं लेकिन बीबीसी से बातचीत में जानकारों और राज्यों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने बताया कि इस स्कीम को लागू करने, कंपिटेंट अथॉरिटी के गठन आदि पर काम चल रहा है.

जेसिका लाल हत्याकांड, प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड और नीतीश कटारा हत्याकांड में गवाहों के बयान बदलने से जांच पर असर के चलते साल 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली में विटनेस प्रोटेक्शन स्कीम की शुरुआत की बात की थी.

इसे 2015 में लागू कर दिया गया.

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में जिस विटनेस प्रोटेक्शन स्कीम के लागू करने की बात की थी वो इसी दिल्ली विटनेस स्कीम पर आधारित थी.

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Image caption नवीन गुप्ता

नेशनल लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी में अधिकारी और इस कार्यक्रम में जुड़ रहे नवीन गुप्ता के मुताबिक़ साल 2013 से 2019 तक 236 लोगों की तरफ़ से आए आवेदनों में से 160 को सुरक्षा दी गई.

लेकिन गवाहों की सुरक्षा को लेकर सवाल ख़त्म नहीं हुए हैं.

व्यापम घोटाला

साल 2015 में उजागर हुए व्यापम घोटाले में प्रशांत पांडे व्हिसल ब्लोअर और गवाह हैं.

लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों के साथ काम करते हुए उन्हें इस कथित घोटाले के बारे में पता चला था.

मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरियों में भर्ती और मेडिकल स्कूल परीक्षा में एडमिशन में परीक्षार्थियों के किसी और से पर्चा लिखवाने, परीक्षा पेपर लीक होने आदि को व्यापाम घोटाले का नाम दिया गया था.

व्यायम उस दफ़्तर का नाम था जो ये परीक्षाएं करवाती थी.

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Image caption प्रशांत पांडे

प्रशांत पांडे और भोपाल में बीबीसी के लिए रिपोर्टिंग करने वाले शुरैह नियाज़ी के मुताबिक़ पिछले कुछ सालों में अब तक इस मामले से कहीं न कहीं जुड़े क़रीब 50 लोगों की मौत हो चुकी है, और "मारे गए कई लोग या तो गवाह थे या फिर किसी न किसी तरह मामले से जुड़े रहे, हालांकि उनका इस मामले से जुड़ा हुआ साबित करना एक चुनौती थी."

प्रशांत के मुताबिक़ उनके ऊपर ख़ुद तीन चार हमले हो चुके हैं, एक बार उनकी पत्नी जिस कार को चला रही थीं और जिसमें उनका बेटा, पिताजी और दादी बैठे थे, उसे एक ट्रक ने साइड से इतनी तेज़ी से टक्कर मारी कि वो लंबी दूरी तक घिसटती चली गईं हालांकि किसी को चोट नहीं आई.

वो कहते हैं, "मुझे फ़ोन पर कई बार धमकी मिल चुकी है जिसमें मुझसे कहा जाता है कि मैं ज़्यादा स्मार्ट न बनूं. 50 मारे गए हैं, तुम 51वें हो जाओगे.

इन मौंतों पर पुलिस ने क्या कार्रवाई की, ये साफ़ नहीं है.

गवाहों की सुरक्षा लंबे समय तक भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती रहेगी.

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