डर के साथ-साथ चरम राष्ट्रवाद का माहौलः एन राम

  • 22 अगस्त 2019
एन राम इमेज कॉपीरइट Getty Images

'द हिंदू' अख़बार के संपादक एन राम मंगलवार को दाभोलकर मेमोरियल लेक्चर के सिलसिले में पुणे में थे.

लेक्चर का टॉपिक था, 'आज के भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां: रैशनलिस्ट (तर्कवादी) लोगों पर हमला, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ख़तरा और लोगों को हाशिये पर धकेलने का यथार्थ.'

बीबीसी मराठी संवाददाता जान्हवी मुले ने इन्हीं मुद्दों पर उनसे बातचीत की जिसमें मीडिया की आज़ादी से लेकर कश्मीर तक जैसे सवाल शामिल थे.

कश्मीर को लेकर मीडिया में जिस तरह की रिपोर्टिंग हुई है, उसे लेकर आपकी क्या राय है?

मुझे लगता है कि बहुत कुछ पत्रकारों के अपने विवेक पर भी निर्भर करता है. बिना आपातकाल की घोषणा किए सूचनाओं की आवाजाही पर रोक लगा दी गई. इंटरनेट बंद कर दिया गया. सियासी नेता हिरासत में ले लिए गए. दूसरी बातों के अलावा ये तो संविधान के अनुच्छेद 19(1) में दिए गए अधिकारों का सरासर उल्लंघन है.

लोकतंत्र ख़तरे में है और कश्मीर में तो कोई लोकतंत्र ही नहीं है. आप रातों रात एक राज्य के विघटन का फ़ैसला करते हैं और उसे एक केंद्र शासित प्रदेश में बदल देते हैं. ये कहते हैं कि समय आने पर राज्य का दर्जा बहाल कर देंगे.

और इस पूरी कवायद के बीच आप संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचल देते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि विरोध प्रदर्शन हुए और आपने इसे लोकतांत्रिक रूप से होने दिया. लेकिन डर के साथ-साथ चरम राष्ट्रवाद का माहौल है.

जब आप रफ़ाल को लेकर पड़ताल कर रहे थे तो आपने किसी किस्म का दबाव महसूस किया?

नहीं, मुझ पर रफ़ाल को लेकर कोई दबाव नहीं था. मुझे किसी ने फ़ोन करके यह नहीं कहा कि इसे प्रकाशित नहीं करो.

लेकिन हां उसके बाद, मेरा मतबल है कि सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल ने ऑफ़िशियल सीक्रेट एक्ट को लेकर ज़रूर बयान दिया था लेकिन अदालत ने बेहतरीन फ़ैसला देते हुए प्रेस की स्वतंत्रता को बरकरार रखा.

हम उस आदेश से बेहद खुश हैं. दो फ़ैसले सुनाए गए थे और दोनों ही बहुत अच्छे थे.

बल्कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने इस दस्तावेज़ों के प्रकाशन को प्रेस की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा था. और इससे हम बहुत खुश हुए थे.

छह साल के बाद, हमें नहीं पता कि दाभोलकर को किसने मारा?

मैंने पहले भी कहा था कि इस मामले में कुछ प्रगति हुई है लेकिन उन्हें अभी तक हथियार बरामद नहीं हो सका है.

और यह निश्चित तौर पर सही है कि उन्हें और बेहतर तरीक़े से प्रयास करने चाहिए थे और वो शायद मिल जाता.

हो सकता है उसे किसी नाले में फेंक दिया गया हो. या फिर कुछ भी... मैं वही कह रहा हूं जो मुझे कहा गया है और जो हमने पढ़ा भी है.

लेकिन इससे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है. भारत में आपराधिक नयाय प्रणाली कई मामलों में अक्षम दिखती है. एक पहलू यह भी है कि किसी मामले को लेकर हो सकता है ढील बरती गई हो, पूरी क्षमता के साथ काम नहीं किया गया हो...

यह बेहद बुरा है लेकिन इससे कहीं ज़्यादा बुरा यह है कि जानबूझकर चीज़ों को गढ़ा गया हो. हालांकि इस केस के बारे में हम अभी तक कुछ नहीं जानते हैं. लेकिन हां मैंने इस पर नज़र बनाकर रखी है. यह सीबीआई के पास है.

कोर्ट इस मामले को और गोविंद पानसरे की हत्या के मामले को देख रही है और मुझे पूरा भरोसा है कि कोर्ट जो भी फ़ैसला लेगी सही ही लेगी. मामले में कुछ तरक्की हुई है...और यही समस्या है.

क्या आपको लगता है कि राजनीतिक दल और राजनीतिक विचारधाराएं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करती हैं या फिर ये हमारे समाज में ही भीतर तक है?

मुझे लगता है कि यह दोनों ही बातें सही हैं. अगर आप आंकड़ों पर गौर करें वो सिर्फ़ पत्रकारिता के क्षेत्र में तो उदाहरण के तौर पर तो मेरे पास साल 2004 से लेकर एक दशक तक के आंकड़े हैं. यह बहुत ज़ाहिर तौर पर देखने को मिलता है.

सीपीजे के मुताबिक़ साल 2004 से लेकर एक दशक के भीतर भारत में क़रीब दस पत्रकारों की हत्या कर दी गई. अगले चार साल में बारह...और शायद इससे अधिक.

तो निश्चित तौर पर इस बात से इनक़ार नहीं किया जा सकता है कि इन सबके पीछे माहौल भी एक बड़ा कारण है. लेकिन ये बिल्कुल सही है कि डॉ. दाभोलकर की साल 2013 में हत्या कर दी गई और उस समय बीजेपी केंद्रीय सत्ता में नहीं थी.

तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि सत्ता में कौन है, किसकी सरकार है. समाज में ऐसे लोग मौजूद हैं जो अगर आपके काम को पसंद नहीं कर रहे हैं तो वो आपकी हत्या कर सकते हैं.

विरोध को दबाने का यह एक तरीक़ा है. तो इस लिहाज़ से आप बिल्कुल सही हैं कि आप इसे सिर्फ़ सरकार के सिर पर नहीं मढ़ सकते हैं. यह सिस्टम में भी अंदर तक धंसा हुआ है.

तो क्या पत्रकारों के लिए ऐसी परिस्थितियों में काम करना और मुश्किल होता जा रहा है?

बिल्कुल, लेकिन यह उस वक़्त के हालात पर भी निर्भर करता है. इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपने पहले से ही किन सावधानियों को बरता है. मुझे लगता है कि संस्थानों को अपने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए व्यापक तौर पर ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए.

मुझे तो लगता है कि यह ख़तरनाक है लेकिन हमें इस ख़तरे का हव्वा नहीं बनाना चाहिए. संघ परिवार के कारण आज इस देश में भय और भय का माहौल है और इस बारे में कोई संदेह नहीं है.

यहां तक कि अल्पसंख्यक समुदायों में भी इस तरह की भावनाएं हैं. जिहाद और इससे मिलती-जुलती भावनाएं. मुझे लगता है कि राजनीतिक सांप्रदायिकता ने पत्रकारों के लिए भी ख़तरे को बढ़ा दिया है. लेकिन हर किसी को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता है.

हालांकि मुझे यह कहते हुए खेद महसूस हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट प्रेस की स्वतंत्रता, समाचार माध्यमों की आज़ादी और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर और बेहतर कर सकता है.

आपको पता ही होगा कि फ़ेसबुक पर पोस्ट लिखने के लिए महिलाओं को कुछ दिनों के लिए जेल में डाल दिया गया और ये यहीं हुआ है...और ये अशोभनीय है.

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