संत रविदास मंदिर विवाद: दलितों ने उठाया आस्था का सवाल

  • 22 अगस्त 2019
चंद्रशेखर

दिल्ली के तुग़लकाबाद इलाक़े में शनिवार को गुरु रविदास मंदिर तोड़े जाने के विरोध में बुधवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में देश के विभिन्न हिस्सों से आए दलितों ने एक विशाल प्रदर्शन किया.

इसमें जुटी भीड़ हालांकि तब (अयोध्या आंदोलन) जितनी बड़ी या उतनी उग्र तो नज़र नहीं आई थी- कम से कम शुरुआत में, लेकिन 'मन्दिर वहीं बनाएंगे' के नारे और 'सवाल हमारी आस्था का' जैसे तर्कों को सुनकर एक बार तो लगा कि नब्बे के दशक में चरम पर पहुंचा 'राम मन्दिर आंदोलन' शायद एक बार फिर उबाल पर आ गया है.

पर तभी एक ओर से 'मोदी सरकार मुर्दाबाद' का शोर उठता है, और लोगों को जो पर्चियां बांटी जाती हैं उससे साफ़ हो जाता है कि कनॉट प्लेस से होते हुए राम लीला मैदान को जाने वाली ये रैली दिल्ली के तुग़लक़ाबाद में गुरु रविदास के मंदिर को ढहाये जाने के विरोध में निकाली जा रही है.

मंदिर को हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पिछले हफ़्ते ढहाया गया लेकिन दलित समुदाय इसके लिए नरेंद्र मोदी सरकार को ज़िम्मेदार मान रहा है.

सवाल आस्था का

... और बात उसी तर्क पर पहुंच गई है जो राम मन्दिर को लेकर आरएसएसस, बीजेपी और दूसरे हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा दी जाती रही है - सवाल आस्था का.

भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने बीबीसी से कहा भी, "आस्था से बड़ी कोई चीज़ नहीं. ये संघ और बीजेपी ने हमें सिखाया है, आज तो हम अपने मंदिर के लिए संघर्ष करने जा रहे हैं."

संघर्ष के इरादे से प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने दक्षिण दिल्ली के तुग़लक़ाबाद स्थित मंदिर स्थल की तरफ़ जाने की कोशिश भी की पर रास्ते में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें शुरु हो गईं जिसके बाद पुलिस ने ख़बरों के मुताबिक़ आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया.

चंद्रशेखर आज़ाद समेत कई लोगों को हिरासत में भी ले लिया गया है.

रविदास 15वीं और 16वीं सदी के भक्ति आंदोलन के अहम संतों में गिने जाते हैं और पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और भारत के कई इलाक़ों में उनके अनुयायी बड़ी संख्या में मौजूद हैं.

प्रदर्शन के दौरान जो पर्चियां बंट रही थीं उसमें रविदासिया धर्म का ज़िक्र था.

ग़ुस्सा मोदी सरकार से

दिल्ली से सटे दो राज्यों - पंजाब और हरियाणा में पिछले दिनों रविदास मंदिर को लेकर हुए आंदोलन के बाद बुधवार को राजधानी में जमा हुए दलित प्रदर्शनकारियों में ग़ुस्से का पुट सुबह से नज़र आ रहा था जो रामलीला मैदान पहुंचने और वहां से निकलने तक धीरे-धीरे तेज़ होता दिखा, जब प्रदर्शनकारियों में मौजूद कुछ युवकों के हाथ में कहीं से लाठियां और पेड़ों की मोटी टहनियां दिखाईं देने लगीं.

प्रदर्शकारी सवाल उठा रहे थे कि भारत में एक नहीं हज़ारों धार्मिक स्थल हैं जो सरकारी ज़मीन पर बने हैं तो सिर्फ़ दलितों के मंदिर को ही तोड़ने के लिए क्यों टारगेट किया गया.

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से आए प्रदर्शनकारी वकील ओम माथुर का तो कहना था कि नौकरशाही से लेकर अदालतों तक मनुवादी लोग बैठे हैं, दलित विरोधी लोग बैठे हैं, संत गुरुदास का मंदिर 600 साल पुराना था, क्या डीडीए जो अब ज़मीन का मालिक बना बैठ है, तब था?

पंजाब के पठानकोट से महिलाओं के एक जत्थे के साथ आईं दृष्टा देवी ने कहा, 'साड्डे नाल खिलवाड़ कित्था मोदी सरकार ने.'

'हमने इसे राजा बनाया, वोट भी दिया, मैं इसकी सपोर्टर भी बनी, आज मोदी सरकार कुछ नहीं कर रही. क्या उसे शर्म नहीं है?', दृष्टा देवी ये कहते-कहते उत्तेजित हो जाती हैं.

इस सवाल पर कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के लिए रविदासिया समुदाय के लोग और दूसरे दलित मोदी हुकूमत को क्यों क़सूरवार ठहरा रहे हैं, दृष्टा देवी उलटे पूछ बैठती हैं, देखो जी, जब रातों-रात 370 टूट सकता है तो वो हमारे गुरु के अपमान को क्यों नहीं रोक सकते?

नोटबंदी भी तो रातों-रात लागू कर दी गई, वो आगे कहती हैं.

उनके इतना कहते ही उनके साथ मौजूद महिलाओं का समूह और साथ खड़े पुरुष जय भीम, जय भीम के नारे लगाने लगते हैं.

मथुरा से आए एक लंबी जटा वाले साधू से दिखने वाले बुज़ुर्ग नारे लगाने लगे जिनके साथ और आवाज़े भी मिल गईं: "गोली सीने खाएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे"

और इसके साथ ही - गुरुजी की क़सम खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे.

"असी मर देंगे या मार देंगे पर मंदिर उत्थे ही बनावेंगे"

तक़रीबन कुछ वैसे ही नारे जो राम मंदिर आंदोलन के दौरान लगे थे और सुने गए थे.

भीम आर्मी के बैनर तले

फ़र्क़ ये है कि बुधवार को दिल्ली में और उससे पहले भारत के दूसरे कई शहरों में अपने एक संत के मंदिर को लेकर दलित ये नारे लगाते सुने जा रहे हैं.

संगरूर से आए रविदासी तरसेम सिंह कहते हैं, 'साड्डा गुरु रविदास दा मंदिर नहीं बना तेसी राम दा मंदिर भी ना बनने देवेंगे.'

सुबह पंचकुईंया रोड से शुरु हुए प्रदर्शन में हालांकि दूसरे दलित संगठनों के कुछ झंडे और बैनर भी दिखे लेकिन सबसे अधिक तादाद थी भीम आर्मी के समर्थकों की.

भीम आर्मी लिखी नीली टोपी और टी-शर्ट पहने और संगठन का झंडा उठाए युवकों की. बुजुर्गों की तादाद उस मुक़ाबले कम थी.

सबसे कम उपस्थिति दिखी, या ढ़ूंढने से नज़र आई, सुश्री मायावती के राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी के लोगों की.

मायावती और चंद्रशेखर के बीच तनाव की ख़बरें पिछले दिनों कई बार सुर्ख़ियों में रही हैं.

बुधवार की रैली में कार की छत पर खड़े, ख़ास अंदाज़ में चंद्रशेखर प्रदर्शन का संचालन करते दिखे. कभी हाथ में तलवार लेकर, जिसकी जगह फिर क़लम ने ली और आख़िरी में एक हाथ में लाठी और दूसरे में भीम आर्मी का झंडा नज़र आने लगा.

कुछ मील का फ़ासला तय करने के बीच ही अलग-अलग अंदाज़, एक बार तो लगा ठीक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अंदाज़, बिल्कुल ऐसा ही नहीं लेकिन मोदी भी कई बार एक दिन में ही कई लिबासों में दिख जाते हैं.

चंद्रशेखर को केंद्र में बीजेपी की सरकार के आने के बाद लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा था.

भीम आर्मी ने हाल में ही अपनी छात्र विंग की शुरुआत की है.

कुछ लोग बुधवार की रैली को संगठन की सीधी राजनीति में प्रवेश की तैयारी के तौर पर भी देख रहे हैं. जिसमें उत्तर प्रदेश के एक इलाक़े में सीमित एक नेता को पास के कई प्रदेशों में पेंग बढ़ाने का मौक़ा मिल रहा है.

हालांकि बुधवार की विरोध प्रदर्शन रैली काफ़ी हद तक सफल रही और शाम के वक़्त हुई पुलिस से झड़प के बाद मीडिया में कई जगह की सुर्खियों में भी आ गई लेकिन सुबह रैली के रूट को लेकर थोड़ी भ्रम की स्थित दिखी.

चंद्रशेखर आज़ाद ने सुबह सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा था कि पुलिस प्रशासन घबराकर प्रदर्शन को जन्तर मन्तर पर जाने की इजाज़त नहीं दे रहा.

ख़ैर मन्दिर की मांग को लेकर प्रदर्शनाकारी पहले रामलीला मैदान में जमा हुए और कुछ देर वहां रुकने के बाद दक्षिण दिल्ली का रुख़ किया.

हालांकि रैली का हिस्सा बने लोग मोदी सरकार से कितने कम या अधिक नाराज़ हैं इसका अंदाज़ा इस बात से लगता है कि उनमें से वो सब जिन्होंने कहा कि लोकसभा में उनका वोट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गया फिर उन्हें ही वोट देने को तैयार हैं अगर केंद्र संत रविदास का मंदिर तुग़लकाबाद के उसी स्थान पर बना दें, जहां वो पहले था.

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