बंगाल में त्योहारों पर गहराता सियासत का रंग

  • 23 अगस्त 2019
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पहले रामनवमी और हनुमान जयंती. और अब जन्माष्टमी. पश्चिम बंगाल में तेज़ी से बदलते राजनीतिक माहौल में ऐसे तमाम त्योहार सियासत का हथियार बनते जा रहे हैं. खासकर बीते मई में आए लोकसभा चुनावों के परिणामों के बाद इन त्योहारों पर सियासत का रंग और गहरा हुआ है.

यही वजह है कि चुनावों के बाद पड़ने वाले पहले त्योहार यानी जन्माष्टमी के बहाने विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने बड़े पैमाने पर इसका आयोजन करने और इस मौके पर पांच सौ रैलियां आयोजित करने का फ़ैसला किया है.

टीएमसी की अगुवाई वाली राज्य सरकार पहले से ही इन रैलियों की रोह में रोड़े अटकाने का प्रयास करती रही है. लेकिन बावजूद इसके बीजेपी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विहिप के कार्यकर्ता रैलियां निकलाते रहे हैं और गिरफ़्तारियां देते रहे हैं.

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद शुरू हुई इन रैलियों के जरिए बीजेपी को टीएमसी के ख़िलाफ़ धुव्रीकरण में सहायता मिली और उसका नतीजा अबकी लोकसभा की 18 सीटों के तौर पर सामने आया.

अब वर्ष 2021 में होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने इन रैलियों के जरिए अपने पैरो तले की ज़मीन और मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है. बंगाल के कई इलाकों में इन रैलियों के दौरान हिंसा का घटनाएं भी होती रही हैं. लेकिन उस हिंसा को बीजेपी अपने पक्ष में भुनाती रही है.

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पांच सौ रैलियां

विश्व हिंदू परिषद ने इस बार जन्माष्टमी के मौके पर 23 से 25 अप्रैल तक राज्य के विभिन्न हिस्सों में पांच सौ रैलियां निकालने और कम से कम 15 सौ जगहों पर तीन दिनों तक उत्सव आयोजित करने का फ़ैसला किया है.

परिषद के सांगठनिक सचिव (बंगाल) सचिंद्रनाथ सिन्हा कहते हैं, "इन आयोजनों का मकसद राज्य के हिंदुओं को एकजुट करना है. यहां मुस्लिम तुष्टिकरण ख़तरनाक स्तर तक पहुंच गया है."

दरअसल, रामनवमी और हनुमान जयंती उत्सवों के बहाने विहिप और संघ ने वर्ष 2014 से ही राज्य में पांव जमाने की कवायद शुरू की थी. हर बीतते साल के साथ आयोजनों का स्वरूप बढ़ने के साथ इन संगठनों के पैरों तले की ज़मीन भी मजबूत होती रही.

अब लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने अगर तमाम राजनीतिक पंडितों के अनुमानों को झुठलाते हुए 42 में से 18 सीटें जीत लीं तो इसमें इन आयोजनों की अहम भूमिका रही है.

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Image caption प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष

इस साल रामनवमी के मौके पर संघ की ओर से आयोजित सशस्त्र रैलियों के मुद्दे पर सरकार और बीजेपी के बीच टकराव हुआ था. इसके लिए सरकार ने प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष के ख़िलाफ़ कई मामले भी दायर किए हैं.

विहिप के प्रवक्ता सौरीश मुखर्जी बताते हैं, "राज्य में लगभग 15 सौ जगहों पर पूजा आयोजित की जाएगी. बीते साल हमने सात सौ जगहों पर इसका आयोजन किया था. इस साल यह तादाद दोगुनी से ज़्यादा हो गई है."

वह बताते हैं कि बीते साल जन्माष्टमी के मौके पर दो सौ रैलियां निकाली गई थीं. लेकिन अबकी उनकी तादाद भी बढ़ा कर पांच सौ कर दी गई है. क्या इन रैलियों का मकसद बीजेपी की राजनीतिक ज़मीन मजबूत करना है इस सवाल पर सौरीश कहते हैं कि हमारा मकसद आर्थिक और राजनीतिक मतभेदों से परे उठ कर हिंदू समाज के एकजुट करना है.

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उनका कहना है कि बंगाल की मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में यह आयोजन काफी प्रासंगिक हैं. इन आयोजनों के दौरान मुस्लिम तुष्टिकरण, सीमापार से होने वाली घुसपैठ और जिहादी हमलों के बढ़ते ख़तरे का मुद्दा भी उठाया जाएगा.

अब संघ और विहिप दक्षिण बंगाल के उन इलाकों पर ख़ास दे रही है जहां लोकसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा था.

उत्तर बंगाल में लोकसभा की सभी छह सीटें पार्टी की झोली में गई थीं. अब विधानसभा चुनावों से पहले वह दक्षिण बंगाल में ज़मीन मजबूत करना चाहती है.

पश्चिम बंगाल में अब तक दुर्गापूजा और कालीपूजा के त्योहारों का ही बड़े पैमाने पर आयोजन किया जाता रहा है. लेकिन अबकी पहली बार संघ और विहिप ने रामनवमी को भी इन त्योहारों के मुक़ाबले खड़ा करने का फ़ैसला किया है.

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संघ के प्रदेश महासचिव जिष्णु बसु कहते हैं, "हम इन कार्यक्रमों के जरिए हिंदू समाज को एकजुट करेंगे. राज्य के तमाम ज़िलों में बड़े पैमाने पर होने वाले आयोजनों का मकसद हिंदुओं को बंगाल में एकजुट होने की ज़रूरत के बारे में आगाह करना है."

दूसरी ओर, टीएमसी का आरोप है कि बीजेपी और संघ परिवार इन त्योहारों के जरिए सांप्रदायिक उन्माद भड़काने का प्रयास कर रहा है. टीएओमसी महासचिव और राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं, "सरकार को त्योहारों के आयोजन पर ऐतराज नहीं है. लेकिन इससे राज्य के सांप्रदायिक ढांचे के नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए."

मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी शुरू से ही संघ और उसके सहयोगी संगठनों पर सांप्रदायिक खाई बढ़ाने का आरोप लगाती रही हैं. उनका कहना है कि बीजेपी और उसके सहयोगी इन रैलियों के जरिए हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक मतभेद बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं.

वह कहती हैं, "बंगाल सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल रहा है. लेकिन इन संगठनों की सक्रियता तेज़ होने की वजह से कई जगह सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है."

मता का कहना है कि उनको ऐसी रैलियों से ऐतराज नहीं है. लेकिन बीजेपी का मकसद इस बहाने दंगे भड़का कर सियासी फायदा उठाना है. उन्होंने कहा है कि अगर इन रैलियों की वजह से कहीं कोई सांप्रदायिक तनाव या संघर्ष हुआ तो सरकार कड़ाई से निपटेगी.

टीएमसी महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "हमारी पार्टी भी जन्माष्टमी जैसे त्योहार मनाती है. लेकिन ऐसा आस्था के तहत किया जाता है. अपनी ताक़त दिखाने के लिए नहीं."

इसबीच, राज्य पुलिस ने कहा है कि अब तक ख़ास कर संवेदनशील इलाकों में रैलियां निकालने की अनुमति नहीं दी गई है.

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "इन रैलियों को अल्पसंख्यक बहुल इलाकों से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी. रामनवमी के मौके पर निकली रैलियों के दौरान ही आसनसोल और रानीगंज इलाकों में पहले सांप्रदायिक संघर्ष की घटनाएं हो चुकी है. ऐसे में पुलिस अबकी काफी सावधानी बरत रही है." लेकिन विहिप का कहना है कि अनुमति मिले या नहीं, रैलियों का आयोजन ज़रूर किया जाएगा.

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क्या है वजह?

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भड़काऊ टिप्पणियों और इन आयोजनों के विरोध की वजह से संघ और उसके सहयोगी संगठनों को अपना पांव जमाने में सहायता मिली है.

लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके वाकयुद्ध ने भी बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाया. इसके अलावा कई जगह जय श्रीराम का नारा लगाने वालों के ख़िलाफ़ ममता जिस तरह भड़कीं और ऐसा करने वालों की गिरफ़्तारियां हुईं, उससे भी उनकी छवि खराब हुई.

बीजेपी को लोकसभा चुनावों में इसका फायदा मिला. राजनीतिक विश्लेषक उदयन बनर्जी कहते हैं, "जय श्रीराम नारे पर ममता की आक्रामक प्रतिक्रिया ने बीजेपी की ज़मीन मजबूत की. उनको इस मामले की अनदेखी करनी चाहिए थी."

लेकिन क्या लोकसभा चुनावों में बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन की यही अकेली वजह रही?

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राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "कांग्रेस और सीपीएम के हाशिए पर सिमटने की वजह से उसके वोट बैंक पर बीजेपी ने कब्जा कर लिया. कांग्रेस और सीपीएम के बीच तालमेल नहीं होने की वजह से वोटरों का जबरदस्त धुव्रीकरण हुआ और इसका नुकसान तृणमूल कांग्रेस को उठाना पड़ा. इसके अलावा कुछ इलाकों में बीजेपी को टीएमसी के अल्पसंख्यक वोट बैंक में भी सेंध लगाने में कामयाबी मिली."

राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मईदुल इस्लाम कहते हैं, "बीजेपी इस बार उसी स्थिति में थी जिस स्थिति में वर्ष 2001 में तृणमूल कांग्रेस थी. तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों की रवैए की वजह से स्थानीय लोगों में बढ़ती नाराजगी का भी फायदा बीजेपी को मिला."

वहीं राजनीतिक विश्लेषक उदयन बनर्जी कहते हैं, "बंगाल में कांग्रेस तो पहले से ही हाशिए पर थी जबकि सीपीएम के नेतृत्व वाले वाममोर्चा के पैरों तले की जमीन भी लगातार खिसक रही थी. ऐसे में तृणमूल कांग्रेस-विरोधी वोटरों को बीजेपी में ही बेहतर विकल्प नजर आया और लोगों ने उसके पक्ष में खुल कर वोट डाले."

बीजेपी ने अबकी नागरिकता (संशोधन) विधेयक और एनआरसी के अलावा ममता बनर्जी सरकार के कथित भ्रष्टाचार और सिंडीकेट राज को यहां प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था. वोटरों पर इनका भी असर नज़र आया.

लोकसभा चुनावों में बीजेपी की ओर से लगे करारे झटके के बाद टीएमसी ने जाने-माने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सहायता ली है. उनकी सलाह पर ही अब ममता अपने स्वाभाव के विपरीत काफी संयत नजर आ रही हैं और पहले की तरह हर बात पर आक्रामक रवैया अपनाने से बच रही हैं.

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टीएमसी सूत्रों का कहना है कि विधानसभा चुनावों से पहले एक आक्रामक और जुझारू नेता की उनकी छवि को बदलने का प्रयास किया जा रहा है. इसी कवायद के तहत ममता ने पहले कटमनी यानी सरकारी योजनाओं में सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं की ओर से लिए जाने वाले कमीशन का मुद्दा उठाया था और उसके बाद आम लोगों से सीधा संपर्क बनाने के लिए दीदी के बोलो शीर्षक अभियान के तहत एक हेल्पलाइन सेवा और वेबसाइट शुरू की है. इसके जरिए लोग अपनी शिकायतें और समस्याएं सीधे ममता तक पहुंचा सकते हैं.

बीजेपी के लगातार बेहतर होते प्रदर्शन ने अगले विधानसभा चुनावों से पहले टीएमसी के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी है. इसी वजह से उसने प्रशांत किशोर की सेवाएं ली हैं और पार्टी के भ्रष्ट नेताओं को निशाने पर लेने लगी है.

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बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत तमाम नेता पहले ही कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव तो उनके लिए सेमीफ़ाइनल है. फ़ाइनल तो विधानसभा चुनाव ही होंगे.

विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "बीजेपी ने सेमीफ़ाइनल में बेहतर प्रदर्शन के जरिए दो साल बाद होने वाले फ़ाइनल से पहले सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए ख़तरे की घंटी तो बजा ही दी है."

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