रविदास मंदिर: चंद्रशेखर को हिंसा के लिए क्यों दोष दे रहे हैं दलित चिंतक

  • 23 अगस्त 2019
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Image caption बुधवार को संत रविदास गुरुघर को लेकर हुए प्रदर्शनों में शाम को समय हिंसा हुई.

दिल्ली में बुधवार को संत रविदास गुरुघर को लेकर विरोध प्रदर्शनों के बाद हुई हिंसा के लिए दलित समाज का एक वर्ग भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है.

लोग मान रहे हैं कि ये हिंसा चंद्रशेखर के तुग़लकाबाद कूच करने के फ़ैसले का नतीजा है.

दलित नेता से थोड़ी सहानभूति रखनेवाले कह रहे हैं कि चंद्रशेखर हिंदुत्ववादियों के बिछाए जाल में उलझते जा रहे हैं, घोर आलोचक इसे उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वकांक्षा का नतीजा बता रहे हैं.

कहा जा रहा है कि कांग्रेस और बीजेपी अपनी-अपनी राजनीतिक बिसात बिछा रही हैं.

'अकेले चंद्रशेखर का फ़ैसला नहीं...'

चंद्रशेखर आज़ाद और उनके समर्थकों की रामलीला मैदान से तुग़लकाबाद की यात्रा के बीच प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, कई प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मयों को चोटें आईं, पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोल छोड़े, फ़िलहाल चंद्रशेखर समेत 96 लोग 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में हैं.

दिल्ली डेवलपमेंट ऑथरिटी (डीडीए) ने सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के बाद राजधानी के तुग़लकाबाद इलाक़े में मौजूद दलितों के आराध्य संत रविदास से जुड़े एक स्थल को ढहा दिया था.

दलित समुदाय इसे 500-600 साल पुरानी ऐतिहासिक धरोहर बताते हैं और इस वजह से इस समाज में भारी रोष है.

पंजाब और हरियाणा के कई शहरों में स्थल को 10 अगस्त को ढहाये जाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद दलित संगठनों ने 21 अगस्त को दिल्ली में विरोध रैली का आयोजन किया था.

Image caption भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद रावण पूरे मामले को आस्था का सवाल बताते हैं

आंदोलन की तैयारियों में शामिल लोगों के मुताबिक़ विरोध प्रदर्शन रैली को रामलीला मैदान में ही समाप्त हो जाना था और तय कार्यक्रम के मुताबिक़ लोग दोपहर बाद तक वहां जमा भी हो गए.

लेकिन फिर चंद्रशेखर और उनके कुछ क़रीबियों ने तुग़लक़ाबाद स्थल जाने का फ़ैसला ले लिया जिसका अंत हिंसा में हुआ.

भीम आर्मी के दिल्ली प्रदेश प्रभारी बीए हिमांशु मंडावली इन आरोपों को ग़लत बताते हैं और कहते हैं कि 'तुग़लक़ाबाद जाने का फ़ैसला समाज की सहमति से लिया गया था, हो सकता है अब सब अपना दामन बचाने की कोशिश में हों.'

रामलीला मैदान में बीबीसी ने चंद्रशेखर से सवाल किया कि रविदास स्थल को फिर से उसी जगह पर बनाने की मांग कोर्ट के फ़ैसले को न मानने जैसा नहीं होगा?

इस सवाल पर चंद्रशेखर ने कहा कि सब कह रहे हैं मंदिर बनाना है, मैं अपने लोगों की बात टाल नहीं सकता और फिर उन्होंने कहा कि वो जहां मंदिर था वहीं मत्था टेकने जा रहे हैं.

चंद्रशेखर ने कहा बीजेपी-आरएसएस ने लोगों को सिखा दिया है कि 'आस्था सर्वोपरि है, और हम अपने मंदिर के लिए संघर्ष करने जा रहे हैं.'

आंबेडकर और रविदास की राह नहीं

दलित आंदोलन से जुड़े लोग कहते हैं कि मंदिर शब्द और पूजा-अर्चना जैसी बातें कहीं भी दलित आंदोलन के मूल में नहीं और ख़ुद आंबेडकर और रविदास इस तरह की बातों के ख़िलाफ़ रहे हैं.

उनलोगों के मुताबिक़ हिंदुत्ववादी चाहते हैं कि बहुजन समाज भी इसी तरह की शब्दावलियों और आदतों में फंसे जिससे उनके एजेंडे को विस्तार मिल सके.

जाने-माने वरिष्ठ दलित पत्रकार दिलीप मंडल जो इस मसले पर भी ख़ूब लिख रहे हैं, ढहा दिए गए स्थल को रविदास 'गुरुघर' कह रहे हैं, मंदिर नहीं.

सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा जा रहा है: जिस रविदास ने मंदिर और मूर्तिपूजन को नहीं माना, जो शरीर को ही मंदिर मानते रहे आज उन्हीं के चेले उनके मंदिर के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

Image caption रविदास गुरुघर को अगस्त 10 को डीडीए ने ढहा दिया था

पवन कुमार संत रविदास के एक गीत के माध्यम से अपनी बात कहते हैं -

जीवन चार दिवस का मेला रे

पत्थर मूरति कुछ न खाती, खाते बांभन चेला रे

जनता लूटती बांभन सारे, प्रभू जी देति न धेला रे

पंद्रहवी और सोलहवी सदी के संत रविदास भक्ति आंदोलन के प्रणेताओं में शामिल हैं और उनके अनुयायियों की बहुत बड़ी तादाद है जो ख़ुद को रविदासी बुलाते हैं.

कुछ तो गुरुघर मामले को अयोध्या राम मंदिर मामले में फ़ैसला हिंदू पक्ष के ख़िलाफ़ आने की सूरत में रणनीति के तौर पर देख रहे हैं - जब 'आस्था सर्वोपरि' वाली बात इस समाज में और तेज़ी पकड़ेगी तो हिंदुत्वादियों की आस्था वाले तर्क को और भी बल मिलेगा.

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कमज़ोर होती मायावती

बहुजन आंदोलनों और राजनीति पर पैनी नज़र रखनेवाले संजीव माथुर कहते हैं, 'हिंदुत्वादियों की रणनीति रही है - बहुजन समाज को तोड़ने की, जैसे उन्होंने पिछड़ों में से यादवों को अलग-थलग कर ओबीसी के दूसरे वर्गों को तोड़ लिया, यहां भी वो जाटवों और चमारों में से एक वर्ग को तोड़ना चाहते हैं और मेरे विचार में यहां उनका लक्ष्य रविदासिया हैं.'

संजीव माथुर का कहना है कि मोदी सरकार संत रविदास गुरुघर के पुनर्निमाण के लिए तैयार हो जाएगी.

तर्क है कि सरकार इस मामले में भी वैसा ही करेगी जिस तरह उसने एससी-एसटी उत्पीड़न क़ानून मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलटने के लिए क़ानून लाकर किया था.

बुधवार को रामलीला मैदान में जमा आंदोलनकारियों में शामिल बहुत सारे लोगों ने बीबीसी से कहा कि अगर नरेंद्र मोदी सरकार गुरुस्थल को फिर से उसी जगह बनवाने को तैयार हो जाती है तो वो बीजेपी को वोट देंगे.

लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर सुकुमार कहते हैं कि रविदास गुरुघर जैसे आंदोलन को जातिवादी विरोधी सामाजिक सुधार बनाम वर्चस्व रखने वाले ब्राहमणवादी व्यवस्था के बीच संघर्ष के तौर पर देखा जाना चाहिए और इसलिए भीम आर्मी की हिंदुत्ववादियों के साथ किसी तरह की तालमेल की बात से वो सहमत नहीं हैं.

आरक्षण के मुद्दे पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को बहस के लिए चैलेंज करनेवाले चंद्रशेखर अकेले दलित लीडर दिख रहे, बीजेपी शासन में ही वो लंबे वक़्त तक उन्हें जेल में रह चुके हैं, वो अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं.

सुकुमार कहते हैं, 'जारी आंदोलन सिर्फ़ भीम आर्मी के बलबूते नहीं तैयार नहीं हुआ है बल्कि इसमें ढेर सारे दलित सामाजिक संगठन शामिल हैं, हां ये हो सकता है कि चंद्रशेखर के लिए आंदोलन के अपने दूसरे मानी भी हों.'

प्रोफेसर सुकुमार का कहना है कि बहुजन समाज पार्टी की दलितों के भीतर की उप-जातियों को अपना हिस्सा न बना पाने की विफलता, संगठन में बुद्धिजीवियों की शून्यता और मायावती की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की वजह से दलित राजनीति में उनकी जगह कमज़ोर हुई है जिसकी वजह से चंद्रशेखर आज़ाद और जिग्नेश मेवानी जैसे नेताओं का उभार सामने आ रहा है.

हालांकि वो कहते हैं कि ये युवा नेता कितने सफ़ल हो पाएंगे ये तो समय ही बताएगा लेकिन दलित आंदोलन को आक्रामक नेताओं की ज़रूरत है जिसमें चंद्रशेखर आज़ाद पूरी तरह से सक्षम दिखते हैं.

बुधवार को रैली के दौरान चंद्रशेखर पूरे समय न केवल कार की छत पर खड़े नज़र आए बल्कि कभी उनके हाथों में तलवार दिखी, तो कभी क़लम या लाठी, साथ में नीला झंडा.

बाद में भीम आर्मी संस्थापक और प्रदर्शनकारियों का एक वर्ग तुग़लकाबाद रविदास गुरुघर की तरफ़ कूच भी कर गया.

कोशिश कांग्रेस और आप की

इधर प्रियंका गांधी ने ट्वीट करके गुरुघर को तोड़े जाने की बात को भाजपा द्वारा दलित भाई बहनों की सांस्कृतिक विरासत से खिलवाड़ जैसा बताया है और कहा है कि जब हज़ारों दलित दिल्ली पहुंचकर इसके ख़िलाफ आवाज़ उठाते हैं तो बीजेपी उनपर लाठी बरसाती है, आंसू गैस चलवाती है, गिरफ़्तार करती है.

प्रियंका गांधी लोकसभा चुनावों के पहले चंद्रशेखर आज़ाद को देखने सहारनपुर के अस्पताल गई थीं जिसको लेकर राजनीतिक हलकों में बड़ी चर्चा हुई थी.

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जगजीवन राम की बेटी और पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने इस बात की पुष्टि की है.

उन्होंने एक ट्वीट में लिखा है, "तुग़लकाबाद स्थित प्राचीन मंदिर स्थल पर गुरु रविदास 1509 में स्वयं आए थे और मेरे पिता बाबू जगजीवन राम ने इसका जीर्णोद्धार कर 1 मार्च 1959 को इसका उद्घाटन किया था."

चंद्रशेखर से क़ुरबत बढ़ाने की कोशिश को कांग्रेस द्वारा उत्तर प्रदेश में दलितों के बीच अपनी खोई ज़मीन हासिल करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने स्वतंत्र उम्मीदवार जिग्नेश मेवाणी को समर्थन दिया था.

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बुधवार को हुई हिंसा के बाद गुरुवार को जब पुलिस और अदालती कार्रवाई जारी थी उसी दिन दिल्ली विधानसभा ने प्रस्ताव पारित कर जिसमें केंद्र से अध्यादेश लाकर यह भूमि रविदास मंदिर के लिए आवंटित करे.

दिल्ली सरकार ने भूमि आवंटन के बाद वहां भव्य मंदिर बनाने का वायदा भी किया है.

कुछ लोग इसे अरविंद केजरीवाल की पार्टी और सरकार के ज़रिये केंद्र को घेरने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं क्योंकि दिल्ली पुलिस की तरह डीडीए भी केंद्र के पास है और आप लंबे समय से दिल्ली की इन संस्थाओं को राज्य सरकार के अधीन लाने की मांग करती रही है.

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Image caption दिल्ली के सामाजिक न्याय मंत्री राजेन्द्र गौतम संत रविदास विवाद पर बीजेपी मुख्यालय का घेराव करते हुए

दिल्ली के सामाजिक कल्याण मंत्री राजेन्द्र गौतम बुधवार के प्रदर्शन रैली में शामिल भी हुए थे और उसके पहले इस मामले पर बीजेपी मुख्यालय का घेराव तक किया और हाल में प्रधानमंत्री को चिट्ठी भी लिखी है.

हालांकि, मगर राजेन्द्र गौतम का कहना है कि प्रदर्शन में उनकी उपस्थिति व्यक्तिगत स्तर पर थी और 'जो आप की कोशिशों को राजनीति बता रहे हैं वो ख़ुद इस मामले में राजनीति कर रहे हैं.'

राजेन्द्र गौतम कहते हैं, "इस बात से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है उसमें हम चुप कैसे रह सकते हैं."

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