जन्माष्टमी की दही हांडी की रौनक क्यों खो रही है?

  • 24 अगस्त 2019
दही हांडी

वक़्त के साथ त्योहारों का रूप बदला है. उन्हें मनाने का तरीक़ा बदला है लेकिन कुछ त्योहार ऐसे भी हैं जो अपनी रौनक खो रहे हैं. उन्हीं में से एक है दही-हांडी.

दही हांडी त्योहार की अनदेखी?

कुछ लोगों के लिए यह दही हांडी का त्योहार है तो कुछ लोगों के लिए यह कृष्ण-जन्माष्टमी का और इस त्योहार के आते ही मुंबई और थाणे में लोगों का जोश देखते ही बनता है.

पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने वाला यह त्योहार महाराष्ट्र में बहुत बड़े स्तर पर मनाया जाता है.

इस त्योहार में सबसे ख़ास होती है गोविंदाओं की टोली. जो एक के ऊपर एक चढ़कर पिरामिड बनाते हैं, हांडी तोड़ते हैं. लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं होता...गीत-संगीत होता है. जिसमें सिर्फ़ आम लोग नहीं बल्कि सेलीब्रिटीज़ भी हिस्सा लेते हैं.

गोविंदाओं को प्रोत्साहित करने के लिए लाखों-लाख रुपये के ईनाम रखे जाते हैं और जो टीम मटकी तोड़ने में सफल रहती है उसे वो ईनाम दिया जाता है. लेकिन इस साल इस त्योहार की रौनक उस तरह नहीं है जिस तरह पहले हुआ करती थी.

दही-हांडी का आयोजन करने वाले बहुत से आयोजकों ने इस साल दही-हांडी का आयोजन नहीं करने का फैसला किया है. उनका कहना है कि राज्य में बाढ़ की स्थिति को देखते हुए वे दही हांडी का आयोजन नहीं करेंगे. लेकिन क्या यह दही-हांडी त्योहार की अनदेखी की शुरुआत तो नहीं?

हमने इसके पीछे के कारणों का पता लगाने की कोशिश की....

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बढ़ती ख़्याति, कोर्ट की पाबंदियां और लोगों की घटती हिस्सेदारी

साल 2000 से 2014 तक के बीच में, दही-हांडी की ख्याति साल दर साल बढ़ती रही. गोविंदाओं की टोली इस दिन मटकियां फोड़ने के लिए निकलती थीं. कुछ छह-सात स्तरों पर पिरामिड बनाकर मटकी तोड़ते थे तो कुछ आठ से नौ लोगों के स्तरों में. मटकी तोड़ने के लिए इन्हें लाखों रुपये का ईनाम भी दिया जाता था.

लेकिन मुक़ाबला सिर्फ़ गोविदाओं की टोली के बीच में नहीं होता था, आयोजकों के बीच भी कड़ा मुक़ाबला होता था.

पूर्व राज्य मंत्री सचिन अहीर, राकांपा विधायक जितेंद्र अवध, शिवसेना विधायक प्रताप सरनाईक, शिवसेना मंत्री एकनाथ शिंदे, भाजपा विधायक राम कदम, शिवसेना विधायक राजेंद्र विचारे इन प्रतियोगिताओं के प्रमुख आयोजक रहे हैं. इन सभी की गिनती उन लोगों में होती है जिन्होंने इन प्रतियोगिताओं को काफी प्रोत्साहित किया और साल दर साल इन प्रतियोगिताओं की ईनामी राशि भी बढ़ती गई.

इन प्रतियोगिताओं में ईनामी राशि पांच लाख रुपये से लेकर 21 लाख रुपये तक हुआ करती है.

आयोजक अपने कार्यक्रमों में सेलीब्रिटीज़ को बुलाते थे ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जुटाया जा सके. बड़ी ईनामी राशि और सितारों की मौजूदगी इस कार्यक्रम को बेहद भव्य बना दिया करते थे. लेकिन कई बार इन त्योहारों में दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं.

कई बार एक के ऊपर एक चढ़कर पिरामिड बनाने वाले इन गोविंदाओं की टोली ऊंचाई से गिर पड़ती, कुछ घायल हो जाते लेकिन कुछ मामले ऐसे भी रहे हैं जिसमें कुछ गोविंदाओं की मौत तक हो गई.

ये एक बड़ा कारण रहा जिसकी वजह से हाल के दिनों में इस त्योहार की काफी आलोचना भी हुई. इसके बाद अदालत की तरफ से भी इस त्योहार पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिये गए.

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12 साल से कम उम्र का गोविंदा नहीं

कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने बाल अधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई कि इस तरह मानव श्रृंखला बनाना बच्चों को ख़तरे में डालना है. जुलाई 2014 में बाल अधिकार आयोग ने पहली बार एक फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि 12 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा दही-हांडी की प्रतियोगिता में शामिल नहीं होगा.

सुरक्षा कारणों की वजह से, बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी दही-हांडी को टांगे जाने की ऊंचाई, गोविंदाओं की संख्या और इस प्रतियोगिता में शामिल होने वालों की उम्र को लेकर कई तरह के नियम तय किया. कोर्ट ने आदेश दिया कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए न्यूनतम उम्र बारह साल होगी.

दही-हांडी के विशाल आयोजनों का असर यातायात व्यवस्था पर भी पड़ता है, जिससे आम लोगों को निश्चित तौर पर परेशानी का सामना करना पड़ता है. तो इन सारी बातों को देखते हुए नगर निगम ने भी अपनी ओर से इस त्योहार को लेकर कुछ सख़्त नियम तय कर दिये. इन नियम-कानून का एक असर तो ये हुआ कि बहुत से आयोजकों ने प्रतियोगिता से अपना नाम वापस ले लिया.

सख़्त नियम

एनसीपी के विधायक जितेंद्र अवहद ने साल 2015 में घोषणा की थी कि उनका संगठन संघर्ष प्रतिष्ठान अब दही-हांडी प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लेगा. उनका कहना था कि कोर्ट के आदेश के बाद उन्होंने यह फ़ैसला लिया. सचिन अहीर की संकल्प प्रतिष्ठान ने भी इस प्रतियोगिता से अपना नाम वापस ले लिया, उनकी वजह भी यही है.

साल 2016-2017 के दौरान अकेले मुंबई में क़रीब 20 से 22 आयोजक दही-हांडी प्रतियोगिता से पीछे हट गए. बीते दो सालों में घाटकोपर इलाके में बीजेपी के विधायक राम कदम दही-हांडी प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं और गोविंदाओं के लिए यह अब एकमात्र आकर्षण का केंद्र रह गया है. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि अभी भी यहां की ईनामी राशि लाखों में है.

लेकिन कोल्हापुर और सांगली इलाक़े में बाढ़ की वजह से हुई तबाही के चलते यह घोषणा की गई है कि इस साल यहां कोई भी प्रतियोगिता नहीं होगी. और ईनाम की राशि बाढ़ प्रभावित लोगों में बांट दी जाएगी. एकनाथ शिंदे और राजन विचारे ने भी इस बात की घोषणा की है कि इस बार दही-हांडी प्रतियोगिता सिर्फ़ दोपहर तक ही होगी.

प्रताप सरनायक का कहना है कि वे लोग इस बार बाढ़ पीड़ितों की मदद करना चाहते हैं लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि वो दही-हांडी का त्योहार नहीं मानाएंगे. सरनायक की संस्था संस्कृति प्रतिष्ठान थाणे में एक विशाल दही-हांडी प्रतियोगिता का आयोजन कर रही है.

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गोविंदाओं की टोली में निराशा

जय जवान गोविंदा ग्रुप से जुड़े महेश सावंत कहते हैं "हम सभी नौकरी करते हैं. हर रात को वक़्त निकालकर हम तीन से चार घंटे अभ्यास करते हैं. जैसे जैसे यह त्योहार पास आता जाता है हमारा उत्साह बढ़ता जाता है. लेकिन आयोजक जब अचानक से प्रतियोगिताओं को रद्द कर देते हैं तो भावनात्मक तौर पर बहुत चोट पहुंचती है."

वो कहते हैं "हमारे ग्रुप में में छह सौ से सात सौ लड़के हैं. दही हांडी प्रतियोगिता शुरू होने के दो महीने पहले से हम लोग अभ्यास शुरू करते हैं. इस साल भी हमने तीन महीने पहले से ही अभ्यास शुरू कर दिया था. लेकिन जैसा की आयोजक प्रतियोगिताओं को रद्द कर रहे हैं उससे हम बहुत अधिक दुखी हैं. इससे पहले कोर्ट की सख़्ती की वजह से प्रतियोगिताएं रद्द हो गई थीं. लेकिन इसके बाद हमने कानूनी लड़ाई लड़ी और जीते भी. इस साल हमने सोचा था कि कोई दिक़्क़त पेश नहीं आएगी. लेकिन बाढ़ आ गई. हर किसी को आगे बढ़कर बाढ़ पीड़ितों की मदद करनी चाहिए लेकिन आयोजक नाच-गाने में ख़र्च होने वाले पैसे में कटौती करके दही-हांडी के कार्यक्रम का आयोजन कर सकते थे. हमने भी बाढ़ पीड़ितों की मदद की है लेकिन यह भी तो सोचना चाहिए कि यह साल में सिर्फ़ एकबार मनाया जाने वाला त्योहार है. तो ऐसे में हमें यह त्योहार मनाना चाहिए."

दही-हांडी को-ऑर्डिनेशन कमिटी के कार्यकारी अध्यक्ष अरूण पाटिल ने बीबीसी मराठी से बात करते हुए कहा "दही हांडी हमारा अपना त्योहार है. गोविंदाओं की टोली पूरे साल इस त्योहार का इंतज़ार करती है. इस राज्य ने कई तरह की मुसीबतों का सामना किया है. ये बिल्कुल सही है कि हमें उन लोगों की मदद करनी चाहिए जिन लोगों को मदद की ज़रूरत है लेकिन हमें अपने त्योहारों को तो मनाना नहीं छोड़ना चाहिए."

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प्रतियोगिताओं का भविष्य

गोविंदाओं की कई टोलियों ने यह तय किया था कि अगर वो प्रतियोगिता जीतते हैं तो वो ईनाम में मिलने वाली राशि बाढ़ पीड़ितों को दान कर देंगे. लेकिन जैसा की अभी बहुत से आयोजकों ने प्रतियोगिता को ही रद्द कर दिया है तो उनके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा है और इससे वे बेहद हताश हैं.

दही-हांडी को-ऑर्डिनेशन कमिटी के कार्यकारी अध्यक्ष कहते हैं "हमने कुछ आयोजकों से अनुरोध किया है कि वे प्रतियोगिताओं को रद्द ना करें.क्योंकि हम चाहते हैं कि यह प्रतियोगिता बची रहे."

उनका कहना है कि उन लोगों ने स्थानीय नेताओं से भी इस संबंध में बात की है.

वो कहते हैं " जब किसी दूसरी जगह जाते हैं तो हमें पता चलता है कि कैसे धीरे-धीरे यह त्योहार विलुप्त होने की कगार पर है. यह मुंबई की संस्कृति का हिस्सा है. हम इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक लेकर गए हैं. इसलिए हमने आग्रह किया है कि इसे दोबारा शुरू किया जाए. "

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