असम में एनआरसी की गाज गिरी स्कूलों पर

  • 27 अगस्त 2019
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असम में एक तरफ जहां लोगों को इस महीने 31 अगस्त को प्रकाशित होने जा रही नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न यानी एनआरसी की फाइनल लिस्ट का इंतजार है तो दूसरी तरफ एनआरसी के काम में लगाए गए शिक्षकों के कारण सरकारी स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं.

असम के सरकारी स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी चल रही है. लिहाजा एनआरसी अपडेट प्रक्रिया के काम में सरकारी शिक्षकों को लगाने से स्कूलों में छात्र-शिक्षक का अनुपात बिगड़ गया है.

असम में सभी स्तरों के स्कूलों में शिक्षकों के लगभग 36 हज़ार 500 पद खाली पड़े हैं. यह जानकारी असम सरकार ने इस साल फरवरी में राज्य विधानसभा में दी थी.

दरअसल साल 2015 से शुरू हुए एनआरसी अपडेट के काम में 55 हजार से अधिक सरकारी कर्मचारियों को लगाया गया है जिनमें सैकड़ों स्कूल शिक्षक हैं.

सरकारी स्कूल के शिक्षकों को एनआरसी के काम में लगाने से न केवल पढ़ाई में बाधा उत्पन्न हुई है बल्कि कई ऐसे प्राइमेरी स्कूल हैं जहां 150 बच्चों को केवल एक ही शिक्षक पढ़ा रहा है. विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार प्राइमरी स्कूलों में 17 हज़ार से अधिक शिक्षकों के पद खाली पड़े हुए हैं.

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शिक्षकों की कमी हमारे लिए बड़ी चुनौती

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अनुसार कक्षा 1 से 5वीं तक 30 छात्रों पर कम से कम एक शिक्षक होना चाहिए. यदि स्कूल में बच्‍चों की संख्‍या 150 से अधिक है तो 5 शिक्षकों के अतिरिक्‍त एक प्रधान शिक्षक होना अनिवार्य है. लेकिन एनआरसी के काम में शिक्षकों की ड्यूटी लगाने से कई स्कूलों के क्लासरूम खाली पड़े हुए हैं.

पिछले करीब साढ़े तीन साल से एनआरसी अपडेट का काम कर रहे मरियानी हाई स्कूल के प्रधान शिक्षक विकास भट्टाचार्य ने बीबीसी से कहा, "मुझे मई 2015 से एनआरसी अपडेट के काम में लगाया गया है. लिहाज़ा मैं स्कूल में अपना पूरा समय नहीं दे पाता. हमारे स्कूल में नर्सरी से लेकर कक्षा 10 तक के छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं. पिछले कुछ सालों में सरकार ने बुनियादी ढांचे के तहत स्कूल को काफी अच्छा बना दिया है अब विद्यार्थियों को बेहतर पढ़ाई करवाने पर ज़ोर दे रहे हैं.''

''लेकिन शिक्षकों की कमी हमारे लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है. मेरे अलावा हमारे स्कूल के दो शिक्षक और एक स्कूल सहायक को भी एनआरसी के काम में लगाया गया है. ऐसे में सारी कक्षाओं को संभालने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. विद्यार्थियों को परीक्षा से पहले कोर्स भी पूरा करवाना है. हम रिटायर्ड शिक्षकों और पूर्व छात्राओं की मदद ले रहे हैं लेकिन चुनौतियां बहुत हैं. 31 अगस्त को एनआरसी की फाइनल लिस्ट आने वाली है लेकिन अबतक हमें रिलीज़ नहीं किया गया है."

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साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के अनुसार शिक्षकों को पढ़ाई वाले दिनों में शिक्षा के अलावा दूसरे किसी काम में नहीं लगाया जा सकता. इसके अलावा शिक्षा का अधिकार कानून में भी कई सारे नियम तय किए गए हैं.

लेकिन असम में जमींनी स्तर पर अभी काफी कमियां देखने को मिल रही हैं. नतीजतन इनका प्रभाव सरकारी स्कूलों के प्रदर्शन पर पड़ रहा है. सरकारी स्कूलों में हर साल नए छात्रों की भर्ती में गिरावट देखने को मिल रही है.

साल 2017 में असम में 476 सरकारी निचले प्राथमिक स्कूलों और 95 उच्च प्राथमिक स्कूलों में एक भी छात्र ने प्रवेश नहीं लिया था. असम सरकार और केंद्र के बीच मई 2017 में समग्र शिक्षा अभियान पर परियोजना अनुमोदन बोर्ड की एक बैठक के मिनट्स में यह बात सामने आई थी.

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शिक्षा विभाग के अधिकारी मानते हैं कि एनआरसी की वजह से क्लासरूम में असामान्य स्थिति पैदा हो गई है. वो आरोप भी लगाते हैं कि एनआरसी के नोडल अधिकारी ने इन शिक्षकों को काम पर लगाने से पहले शिक्षा विभाग से किसी तरह का कोई सलाह मशविरा नहीं किया.

असम माध्यमिक शिक्षा निदेशक फणींद्र जिडूंग कहते हैं,"ज़िला उपायुक्त के ज़रिए एनआरसी ऑफिस कॉर्डिनेटर के निर्देश आते रहते हैं. वे खुद ही शिक्षकों को एनआरसी के काम के लिए नियुक्त करते हैं. सच कहू तो वे हमसे किसी तरह का सलाह-मशविरा नहीं करते और न ही कोई अनुमति लेते हैं. वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हैं. एनआरसी का काम जल्द खत्म करना है. लिहाज़ा वे सीधे शिक्षकों को आदेश भेजकर एनआरसी के काम में लगा देते हैं."

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शिक्षा निदेशक जिडूंग आगे कहते हैं, "शिक्षकों की कमी इस समय हमारी सबसे बड़ी चुनौती है. कुछ कानूनी अड़चनों के कारण हम अभी तक खाली पड़े शिक्षकों के पद भर नहीं पा रहे हैं. राज्य में सभी स्तर के स्कूली शिक्षकों के करीब 16 हज़ार पद खाली पड़े हैं. इनमें से 4 हजार से अधिक खाली पदों पर नियुक्ति देने के लिए राज्यपाल से अनुमोदन भी मिल गया है लेकिन अनुबंध के तहत काम करने वाले कुछ शिक्षक कोर्ट चले गए हैं. लिहाज़ा कोर्ट के फैसले तक ये नियुक्तियां नहीं हो पाई. ऐसी स्थिति में हमें स्कूलों में शिक्षकों की कमी से जूझना पड़ रहा है."

एनआरसी की फाइनल लिस्ट 31 अगस्त को पब्लिश कर दी जाएगी. ऐसे में सरकार ने फैसला लिया है कि एनआरसी की फाइनल लिस्ट में जिन लोगों का नाम शामिल नहीं किया जाएगा, वे आगे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में 120 दिन के भीतर अपील दायर कर सकेंगे. इस तरह एनआरसी केंद्र का काम लगभग खत्म माना जा रहा है. लेकिन क्या इसके बाद इन तमाम शिक्षकों को वापस स्कूल ड्यूटी में भेज दिया जाएगा?

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इस सवाल का जवाब देते हुए जोरहाट जिला उपायुक्त रोशनी कोराती कहती हैं, "हमने स्कूल शिक्षकों को एनआरसी के काम के लिए पूरा दिन नही लगाया है. एनआरसी अपडेट के काम में अन्य कई सरकारी अधिकारी भी काम कर रहे हैं. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि इससे स्कूलों के प्रदर्शन पर कोई असर पड़ेगा."

अगर एनआरसी केंद्रों में पब्लिक सुनवाई खत्म हो गई है तो इन शिक्षकों को अबतक रिलीज़ करने का आदेश क्यों नहीं भेजा गया? जिला उपायुक्त कोराती कहती हैं, "31 अगस्त को फाइनल लिस्ट पब्लिश होने के बाद हम समूची स्थिति को देखेंगे. अगर ऊपर से कुछ निर्देश आते हैं तो निश्चित तौर पर हम इनको रिलिज कर देंगे."

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वैसे तो सूमचे असम में एनआरसी के काम में लगे शिक्षकों की स्कूलों में गैर मौजूदगी का खामियाज़ा छात्र-छात्राओं को उठाना पड़ रहा है. लेकिन बांग्लादेश बॉर्डर से सटे धुबड़ी ज़िले में स्थिति यह है कि 2422 नंबर नबो पाठसाला लोअर प्राइमरी स्कूल में 155 छात्रों के लिए महज एक शिक्षक है.

धुबरी में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार विजय शर्मा कहते हैं, "एनआरसी के काम में शिक्षकों को लगाने से स्कूलों में काफी नुकसान हो रहा है. ऐसी जानकारी है कि धुबरी के 2200 प्राथमिक स्कूल के करीब 1500 शिक्षकों को एनआरसी के काम में लगाया गया है. कई स्कूलों में हालात यह है कि एक ही शिक्षक सभी क्लास के बच्चों को पढ़ा रहे हैं और वहीं मिड डे मील से लेकर स्कूल के बाकि सारे काम कर रहे हैं. हालांकि शिक्षा विभाग के लोग स्थिति से निपटने के लिए गैर सरकारी संगठनों की मदद ले रहे हैं."

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नीति आयोग के साथ मिलकर शिक्षा व्यवस्था को सुधारने का काम कर रहे पीरामल फाउंडेशन के धुबड़ी ज़िला प्रबंधक उदय सिंह कहते हैं, "मैं पिछले एक साल से धुबरी में शिक्षा विभाग और ज़िला प्रशासन के साथ काम कर रहा हूं और यहां शिक्षकों की भारी कमी महसूस की है. पिछले साल के मुकाबले धुबड़ी जिले में शिक्षकों की संख्या काफी कम हुई है. इसका कारण केवल एनआरसी नहीं है. कुछ शिक्षक रिटार्यड हो गए हैं तथा सैकडों ऐसे शिक्षक हैं जिन्होंने धुबरी में ज्वाइन करने के बाद अपना तबादला करवा लिया है.''

''इस समय पूरे ज़िले में केवल 49 फीसदी ही शिक्षक हैं. लिहाज़ा हमने ज़िला प्रशासन के साथ मिलकर प्रयास नाम से एक अभियान चलाया था जहां आसपास इलाके से करीब 2400 पढ़े-लिखे युवक-युवतियों को उन स्कूलों में बतौर वालंटियर टीचर पढ़ाने के लिए भेजा गया जहां शिक्षकों की कमी है. हमारा एक ही मकसद था कि शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों को पढ़ाई में नुकसान नहीं होना चाहिए. यह व्यवस्था केवल एक महीने के लिए थी."

एनआरसी की फाइनल सूची प्रकाशित होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है. दावे और आपत्ति के तहत चल रही सुनवाई पूरी कर ली गई है. लिहाज़ा सरकारी कर्मचारी खासकर शिक्षकों का काम लगभग खत्म हो गया है. ऐसे में यह उम्मीद लगाई जा रही है कि सितंबर की पहली तारीख से ये तमाम शिक्षक फिर से अपनी क्लासरूम में लौट आएंगे.

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