'पाकिस्तान नहीं चाहता कि भारत में राष्ट्रवाद मज़बूत हो'

  • 28 अगस्त 2019
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"हिंदुस्तान सिर्फ़ हिंदुओं का है. मौजूदा सरकार की इस मान्यता के पीछे आरएसएस है..."

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का ऐसा कहना ये जताता है कि उन्हें इतिहास की सही जानकारी नहीं है. इसके साथ ही वो वर्तमान से भी परिचित नहीं हैं.

अगर ऐसा नहीं होता तो वे एक प्रधानमंत्री होने के नाते कम से कम इस तरह की ग़लतबयानी नहीं करते. तथ्य कभी बदलता नहीं है.

विभाजन के बाद 1951 में भारत में जब पहली बार जनगणना हुई थी, उस वक़्त देश में मुसलमानों की आबादी नौ फ़ीसदी थी.

साल 2011 में ये आबादी बढ़कर 14 फ़ीसदी हो गई, जबकि इसी दौरान हिंदू आबादी 84 फ़ीसदी से घटकर 79 फ़ीसदी से कुछ अधिक रह गई.

ये दिखाता है कि भारत में धर्म के आधार पर किसी भी क्षेत्र में कोई भेदभाव कभी नहीं हुआ.

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विभाजन के बाद भारत पर सांप्रदायिकता का एक बोझ था लेकिन उस दौरान भी इस देश में किसी भी प्रकार से मुसलमानों के साथ भेदभाव नहीं हुआ.

इसके विपरीत बंटवारे के समय पाकिस्तान में लगभग 23 फ़ीसदी हिंदू आबादी थी. बांग्लादेश बनने के बाद ये आबादी मात्र 13 फ़ीसदी रह गई थी.

पाकिस्तान की हिंदू आबादी के आंकड़ों को लेकर विवाद ज़रूर रहा है पर इतना तो तय है कि ये कभी दहाई अंकों में हुआ करती थी और आज ये घट कर एक फ़ीसदी से भी कम रह गई है.

पाकिस्तान में सिर्फ़ हिंदुओं की आबादी ही कम नहीं हुई है बल्कि वहां ईसाई और अहमदिया लोगों पर भी घोर अत्याचार हुए हैं.

इसलिए इमरान ख़ान ऐसा कहकर इतिहास और वर्तमान दोनों के साथ नाइंसाफ़ी कर रहे हैं. किसी प्रधानमंत्री से ऐसी उम्मीद नहीं की जाती है कि वो तथ्यों के विपरीत जाकर बयानबाज़ी करें.

इमरान ख़ान का ये कहना कि आरएसएस हिटलर और मुसोलिनी को रोल मॉडल मानता है और संघ उनकी विचारधारा को आगे ले जाना चाहता है. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति पाकिस्तान की बौखलाहट दर्शाता है और ये अकारण भी नहीं है.

इसके पीछे जो तर्क है कि संघ लगातार जम्मू और कश्मीर को हिंदुस्तान का अभिन्न हिस्सा मानता रहा है और इसके लिए किसी एक दिन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है.

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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

लंबे समय से जम्मू और कश्मीर की स्थिति के बारे में देश की जनता को अवगत कराना, उसके लिए त्याग करना, संघ का नियमित अभियान रहा है. डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसके लिए बलिदान भी दिया.

जम्मू और कश्मीर भारत का एक अभिन्न हिस्सा है, ये सिर्फ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही नहीं मानता है बल्कि हिंदुस्तान के सभी राजनीतिक दल, यहां तक की देश के विभाजन के बाद मुस्लिम लीग की एक इकाई, जो हिंदुस्तान में बच गई थी, वो सब भी ये मानते रहे हैं.

इस मामले में अगर इमरान ख़ान और पाकिस्तान हस्तक्षेप करते रहे हैं और एक अघोषित युद्ध चलाते रहे हैं, तो ये उसकी अपनी कमज़ोरी रही है. ये पाकिस्तान की बौद्धिक बदहाली का परिणाम है कि वहां की सेना का प्रभाव इतना ज़्यादा रहा है कि वो अपने भूगोल को भी ठीक से नहीं जानते हैं.

इसलिए वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बौखलाए हुए हैं कि संघ इस देश में एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करता है.

इस बौखलाहट का एक ऐतिहासिक कारण भी है. जब विभाजन हो रहा था तब बंगाल और पंजाब में सबसे अधिक हिंसा हो रही थी. पंजाब में आरएसएस और अकाली दल ने उस हिंसा को रोकने के लिए काम किया.

एएन बाली की किताब 'नाउ इट कैन बी टोल्ड' में इस बात का ज़िक्र किया गया है कि बंटवारे के समय हिंसक भीड़ से हिंदुओं को बचाने के लिए आरएसएस ने कितना काम किया था.

हम बंटवारा नहीं रोक पाए क्योंकि हमारे पास वो ताक़त नहीं थी लेकिन हमने हिंसा को रोकने का काम किया.

इसलिए पाकिस्तान नहीं चाहता है कि भारत में राष्ट्रवाद प्रबल और मज़बूत हो. वो भारत को एक विखंडित देश के रूप में देखना चाहता है.

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पाकिस्तान अपनी चिंता करे

जिस तरह से पाकिस्तान में फासीवादी और अलोकतांत्रिक शासन रहा है, पाकिस्तान उसी आईने में भारत को देखना चाहता है.

जबकि भारत जिसमें आरएसएस, बीजेपी और सरकार सभी शामिल हैं, वो पाकिस्तान को एक सभ्य देश के रूप में देखना चाहते हैं. लेकिन पाकिस्तान ऐसा नहीं बन पा रहा है.

इसलिए वे संघ के ख़िलाफ़ बौखलाए हुए हैं. संघ एक देशभक्त संगठन है, जिसकी इकाई सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही नहीं, दुनिया के 37 देशों में है. इन देशों में संघ अलग-अलग नामों से काम कर रहा है.

इमरान ख़ान ने अपने बयान में बाबरी मस्जिद और गुजरात दंगों का ज़िक्र किया, जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं थी. वे बलूचिस्तान और सिंध की चिंता करते तो ज़्यादा अच्छा होता. गुजरात में हुई सांप्रदायिक हिंसा की बात पर वे भूल जाते हैं कि जब राज्य पुलिस ने गोली चलाई तो किसी एक समुदाय के लोग नहीं मरे थे.

गुजरात दंगों के मामलों में अदालतों ने जो सज़ाएं सुनाई, उसमें किसी का धर्म देखकर सज़ा नहीं सुनाई गई.

इमरान ख़ान ये पता लगा सकते हैं कि गुजरात दंगों में किन लोगों को सज़ा हुई. क़ानून और व्यवस्था के सवाल को विचारधारा का प्रश्न नहीं मानना चाहिए. लेकिन इसकी विपरीत पाकिस्तानी पंजाब में अहमदिया समुदाय के लोगों के साथ जो अत्याचार हुए, जिसके कारण मुनीर कमीशन का गठन किया गया था.

मुनीर कमीशन की रिपोर्ट के बावजूद भी अहमदिया जिस तरह से सताए जाते हैं और बलूचिस्तान की आज़ादी का सवाल आज जिस तरह से पूरी दुनिया के सामने है, पाकिस्तान को उसके बारे में सोचना चाहिए.

मुझे लगता है कि बांग्लादेश की जितनी बुरी स्थिति थी, उससे कहीं ज़्यादा ख़राब स्थिति आज बलूचिस्तान की है. बांग्लादेश अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से पाकिस्तान का सामना कर पा रहा था लेकिन बलूचिस्तान की भौगोलिक स्थिति ऐसी नहीं है और इसीलिए वो पाकिस्तान की सेना और कट्टरपंथियों से मुक़ाबला नहीं कर पा रहा है.

बलूचिस्तान की तरफ़ से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का मुद्दा, जो अब केंद्र में आ गया है और जिसे प्राप्त करना भारत की प्राथमिकता बन गई है, उसी की बौखलाहट के कारण इमरान ख़ान बार-बार उन मुद्दों को उठा रहे हैं जिससे पाकिस्तान का कोई लेना-देना नहीं है.

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पाकिस्तान की सोच

इमरान ख़ान यदि अपने देश का ही इतिहास खंगालते तो संघ के बारे में ऐसी बातें नहीं करते. 1946-47 में हिंसा और साम्प्रदायिकता से जब देश झुलस रहा था तब भी मुस्लिम लीग हिन्दुओं पर दोषारोपण के लिए हिन्दू संगठनों को निशाना बना रही थी. ये इसी बात से ज़ाहिर है कि अखंड भारत के सेंट्रल लेजिस्लेटिव काउंसिल में 11 फ़रवरी 1947 को ईए जाफ़र ने आरएसएस पर प्रतिबंध की मांग करते हुए इस पर साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने का आरोप लगाया.

तब गृह मंत्री सरदार पटेल ने सभी राज्यों से संघ के बारे में जानकारी मांगी. स्थिति उल्टी थी किसी भी राज्य ने इसका अनुमोदन नहीं किया. सिंध, ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह, बलूचिस्तान, रावलपिंडी, लाहौर जैसी जगहों पर संघ की अच्छी उपस्थिति थी लेकिन सभी राज्यों ने माना कि संघ का किसी दंगे में न हाथ है और न ही ये ख़तरा है. इसके प्रमाण अभिलेखागारों में मौजूद हैं. ये सभी स्थान आज के पाकिस्तान में हैं.

ये पाकिस्तान की पुरानी मानसिकता है. जो काम आज इमरान कर रहे हैं, वही काम एक समय में लियाक़त अली ख़ान करते थे. जब पाकिस्तान आंदोलन ध्रुवीकरण कराने में अक्षम सिद्ध हो रहा था तब लियाक़त और लीग ने संघ को मुसलमानों पर ख़तरा सिद्ध करना शुरू कर किया.

लीग के अख़बार 'डॉन' ने 13 अप्रैल, 1946 को पहला एडिटोरियल संघ पर लिखा और आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर इस पर आरोप लगाते हुए गांधी और नेहरू से इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की. इसे तो इसके संस्थापक का भी नाम ठीक से पता नहीं था. कोई घटना उद्धृत करने के लिए नहीं थी.

31 जनवरी को संघ पर अपने अगले संपादकीय में 'डॉन' ने गांधी और नेहरू की इस बात के लिए आलोचना की कि वो संघ के ख़िलाफ़ ना बोल रहे हैं ना ही प्रतिबंध की मांग का समर्थन कर रहे हैं. ये लीग की पुरानी तकनीक थी. लियाक़त से इमरान तक, एक ही कोशिश रही है कि साम्प्रदायिकता की पीठ की सवारी कर अपनी सत्ता बचाना.

इमरान उसी परंपरा के खलनायक हैं. संघ तो अखंड भारत का सपना देखता है और इस अवधारणा को सांस्कृतिक सभ्यता की बुनियाद पर आगे बढ़ा रहा है.

लोकतंत्र पर अटूट आस्था के कारण ही हम बलूचिस्तान में हस्तक्षेप के समर्थक हैं. पाकिस्तान में हिन्दुओं की जैसी दुर्दशा हुई है, उसके लिए हमारे अपने भारत के भी कुछ नेता और सरकारें ज़िम्मेदार हैं. उसकी क़ीमत पाकिस्तान को आज नहीं तो कल चुकानी पड़ेगी.

इमरान 1946 का फॉर्मूला लागू कर रहे हैं जो अब बेकार हो चुका है या वो संघ को निशाना बनाकर भारत में दोस्त तलाश कर रहे हैं?

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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