भारत-पाकिस्तान तनाव का असर करतारपुर साहिब पर क्यों नहीं?: नज़रिया

  • 6 सितंबर 2019
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भारत और पाकिस्तान सरकार ने बुधवार को अटारी बाघा बॉर्डर पर पाकिस्तान में स्थित सिखों के धार्मिक स्थल करतारपुर साहिब को खोले जाने को लेकर बैठक की है.

इस बैठक में पाकिस्तान ने करतारपुर साहिब जाने के लिए कुछ शर्तें रखीं हैं.

इनमें भारतीय और भारतीय मूल के श्रद्धालुओं से सेवा शुल्क के रूप में 15 डॉलर की रकम लिए जाने और धर्मस्थल पर रुकने की समयसीमा तय करने जैसी शर्तें रखी हैं.

हालांकि, भारतीय दल ने पाकिस्तान की इस शर्त पर आपत्ति जताई है. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इसे शर्मनाक बताते हुए ट्वीट किया इस तरह की ओछी मांगें गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं के ख़िलाफ़ हैं. पाकिस्तान की यह मांग केवल करतारपुर कॉरिडोर की प्रगति में बाधा बनेंगी.

इस बैठक में ये बात भी हुई है कि करतारपुर साहिब जाने वाले लोग सुबह से लेकर शाम तक वहां रह सकते हैं.

लेकिन भारत ने इस शर्त का भी विरोध करते हुए इन्हें समझौते की भावना के ख़िलाफ़ बताया है.

इसके बाद इस बैठक में इस मसले को लेकर कोई समाधान नहीं निकल सका है.

क्या इन आपत्तियों पर बात बिगड़ सकती है?

भारत सरकार की ओर से इन विषयों पर आपत्ति जताए जाने के बाद ये सवाल उठा है कि क्या इससे आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दोनों ओर से जारी बातचीत खटाई में पड़ सकती है.

इसका सीधा जवाब है कि दोनों मुल्कों के लिए ये मुद्दा काफ़ी अहम है.

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इस वजह से इन आपत्तियों की वजह से बातचीत रुकने जैसी आशंकाएं पैदा नहीं होती हैं.

अगर पाकिस्तान की ओर से देखें तो पाकिस्तान भी इस वजह से बातचीत से पीछे नहीं हटेगा.

और भारत भी कोई ऐसी स्थिति पैदा नहीं होने देगा जिससे ये लगे कि उसकी वजह से बातचीत में खटाई पड़ी.

क्योंकि दोनों ही मुल्कों के लिए सीमा के दोनों ओर बसी पंजाबी आबादी काफ़ी अहम है.

पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार के लिए भी सिख आबादी काफ़ी अहमियत रखती है.

ऐसे में भारत-पाकिस्तान रिश्तों के आपसी संबंध खराब होने के बाद भी ये मुद्दा नकारात्मकता का शिकार नहीं होगा.

क्योंकि दोनों मुल्क अपनी सिख आबादी को नाराज़ नहीं करना चाहेंगे.

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इमरान के लिए क्यों ख़ास है पंजाबी लोग?

इमरान ख़ान के लिए ये मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय संकट से गुजर रही है.

ऐसे में पाकिस्तान सरकार का सोचना ये है कि अगर करतारपुर साहिब का मसला हल हो जाता है तो अमरीका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे मुल्कों में रहने वाले सिख समुदाय के लोग करतारपुर साहिब आना शुरू करेंगे.

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इससे पाकिस्तान के पास करतारपुर साहिब को अंतरराष्ट्रीय सिख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने का मौका है.

इसके साथ ही करतारपुर साहिब का भारत की बहुसंख्यक आबादी के लिए भी काफ़ी महत्व है जो कि ये मसला हल होने पर वहां जाना चाहेगा.

ऐसे में करतारपुर साहिब के रूप में पाकिस्तान सरकार के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाने का अवसर पैदा होता है.

इसके साथ ही एक पहलू ये भी है कि पाकिस्तान ये चाहेगा कि भारत की सिख आबादी में पाकिस्तान के प्रति समर्थन का भाव पैदा हो ताकि उसकी खुफ़िया एजेंसी आईएसआई आने वाले समय में भी इसका फायदा उठा सके.

ऐसे में पाकिस्तान के लिए करतारपुर साहिब का मसला कई मायनों में अहम है.

पीएम मोदी के लिए क्यों ख़ास हैं पंजाबी?

भारत सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में भारी कड़वाहट देखी जा रही है.

ऐसे में एक स्वाभाविक सवाल ये उठता है कि इतने तनावपूर्ण माहौल में भारत सरकार करतारपुर साहिब के मुद्दे पर क्यों बात कर रही है.

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इसका जवाब जानने के लिए हमें भारतीय पंजाब के इतिहास में झांकना होगा.

भारतीय पंजाब ने चरमपंथ का एक दौर देखा है जिसमें भारी खून-खराबा और तनावपूर्ण स्थितियां रही थीं.

पाकिस्तानी सरकार ने भी पंजाब में चरमपंथ का समर्थन किया था.

भारत सरकार को इस मसले को सुलझाने में काफ़ी दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा था.

ऐसे में भारत सरकार पंजाबी आबादी को कोई ऐसा बहाना नहीं देना चाहती है जिससे पाकिस्तान दोबारा इस तरह की कोशिशों को अंजाम दे सके.

ख़ासकर जब कश्मीर की स्थिति बिगड़ती दिख रही है तो इसके साथ वाले सूबे पंजाब में भारत सरकार किसी भी विपरीत स्थिति को पैदा नहीं होने देना चाहेगी.

इसके साथ ही अल्पसंख्यक समुदाय के लिहाज़ से भी कश्मीर का मुद्दा काफ़ी अहम बना हुआ है.

आने वाले दिनों में भारत प्रशासित कश्मीर में हालात और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है.

इस सब की वजह से भारत सरकार अल्पसंख्यक आबादी के ख़िलाफ़ जाती दिख रही है.

ऐसे में भारत सरकार को लग रहा है कि इस समय सिर्फ सिख ही एक ऐसी अल्पसंख्यक आबादी है जो कि भारत सरकार के पक्ष में है.

ऐसे में भारत सरकार ऐसी कोई स्थिति पैदा नहीं करना चाहती जिससे पंजाब की सिख आबादी में भी करतारपुर साहिब के मुद्दे की वजह से किसी तरह का रोष पैदा हो.

क्योंकि अगर सभी अल्पसंख्यक समुदाय सरकार के ख़िलाफ़ खड़े नज़र आते हैं तो इससे सरकार की छवि को काफ़ी धक्का पहुंचेगा.

कब तक सुलझेगा ये मसला?

ये मसला जल्द ही सुलझने के आसार दिखाई देते हैं.

क्योंकि दोनों मुल्कों में से कोई भी सरकार बातचीत रुकने का इल्ज़ाम अपने सिर नहीं लेना चाहेगी.

दोनों ही मुल्कों के लिए ये मुद्दा काफ़ी अहम है.

ऐसे में इस मुद्दे के जल्द सुलझने की संभावनाएं ज़्यादा हैं.

(बीबीसी संवाददाता अनंत प्रकाश के साथ बातचीत पर आधारित)

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