बच्चा चोरी की अफ़वाहें, फ़ेक वीडियो, 'मारो-मारो' का शोर और होती मौतें...

  • 5 सितंबर 2019
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Image caption सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो

झारखंड की राजधानी से सटे रामगढ़ ज़िले में बच्चा चोर समझकर पीटे गये एक शख़्स की बुधवार शाम मौत हो गई.

ज़िले के एसपी प्रभात कुमार ने बीबीसी से इसकी पुष्टि की और कहा कि इस मामले में पाँच अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया है.

बुधवार को ही बिहार के छपरा, नालंदा, समस्तीपुर, उत्तर प्रदेश के अमेठी और झारखंड के कोडरमा से भी बच्चा चोरी की अफ़वाह पर लोगों को पीटने की ख़बरें आईं.

बीते एक महीने में इन अफ़वाहों के आधार पर हिंसा की 85 से ज़्यादा घटनाएं हुई हैं जिनमें 9 लोगों की मौत हुई है.

इन सभी जगहों पर स्थानीय पुलिस ने अफ़वाह फ़ैलाने वालों और हिंसा में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने का दावा किया है.

भीड़ द्वारा की गई हिंसा की इन घटनाओं को देखकर लगता है कि साल 2018 की तरह इस साल फिर ये अफ़वाहें कई राज्यों में पुलिस और प्रशासन के लिए समस्या बन गई हैं.

पिछले साल दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में बच्चा चोरी की अफ़वाहों के कारण सिलसिलेवार हिंसक घटनाएं हुई थीं जिनमें 29 लोगों की मौत हुई थी.

इस साल उत्तर भारत में इसका असर देखने को मिल रहा है और फ़िलहाल उत्तर प्रदेश सबसे ज़्यादा प्रभावित है.

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Image caption साल 2018 की घटनाओं के वीडियो भी सोशल मीडिया पर शेयर किये गए

उत्तर प्रदेश पुलिस के अनुसार 1 सितंबर 2019 तक सूबे में 45 से ज़्यादा घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें भीड़ ने अफ़वाह के चलते किसी को बच्चा चोर समझकर हमला बोल दिया. इन हमलों में अब तक तीन लोगों की मौत हुई है, कई लोग घायल हुए हैं और सौ से ज़्यादा लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस ने केस दर्ज किया है.

वहीं बिहार में भी एक महीने के भीतर पाँच निर्दोष लोगों की हत्या दर्ज की गई है जिन्हें भीड़ ने इसलिए पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि स्थानीय लोगों को बच्चा चोरी की अफ़वाह सच लगी.

इन दोनों राज्यों में पुलिस को ऐसी घटनाओं पर एडवायज़री जारी करनी पड़ी है. साथ ही अफ़वाह फ़ैलाने वालों को कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है.

पर बच्चा चोरी की अफ़वाहों से जुड़ी हिंसा की ये घटनाएं सिर्फ़ यूपी-बिहार तक सीमित नहीं हैं.

जुलाई 2019 से लेकर अब तक दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड समेत 50 से ज़्यादा घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें लोगों को बच्चा चोर समझकर मारा-पीटा गया है.

बीबीसी ने पाया कि ये घटनाएं कहीं ना कहीं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं क्योंकि हिंसा की इन घटनाओं को मौक़े पर मौजूद कुछ लोगों ने अपने मोबाइल कैमरे से शूट किया और फिर ये वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर भी किये गए हैं.

लेकिन तथ्यों को लेकर लापरवाही और भ्रामक संदेशों के कारण ऐसे वीडियो भड़काऊ और जानलेवा साबित हो रहे हैं.

ऐसे कई वीडियो बीबीसी के पाठकों ने वॉट्सऐप के ज़रिये हमें भेजे हैं और उनकी सच्चाई जाननी चाही है.

वायरल वीडियो और दावों की पड़ताल

  • सोशल मीडिया पर एक आदमी की पिटाई का वीडियो इस दावे के साथ शेयर किया गया कि 'दो हज़ार रोहिंग्याओं की एक टीम भारत में बच्चा चोरी के काम में लगी है जो उन्हें बेचती है'. वीडियो में एक महिला दिखाई देती हैं जिन्होंने बच्चा चोरी के कथित आरोप में इस आदमी के बाल पकड़ रखे हैं और वो चुपचाप ज़मीन पर बैठा है. सोशल मीडिया पर इस वीडियो को ही पंजाब के अलग-अलग कस्बों का बताकर शेयर किया गया है.
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लेकिन ये वीडियो पंजाब के जालंधर शहर का है और जिसे पीटा गया वो नेपाल से रोज़गार की तलाश में आया एक वेटर था.

स्थानीय पुलिस के अनुसार वेटर की बस इतनी ग़लती थी कि उसने नशे की हालत में एक बच्चे से हाथ मिलाने की कोशिश की जिसे 'बच्चा चोरी' की कोशिश समझकर मोहल्ले वालों ने हमला कर दिया.

  • मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में भीड़ ने एक किन्नर और उनके दो साथियों को किसी पुरानी वीडियो के आधार पर बच्चा चोर समझा और उनकी पिटाई की. किन्नर ने पुलिस को बताया कि दो लोग बाइक पर आये और उन्होंने कहा कि यही है बच्चा चोर जो वीडियो में दिखता है और मारपीट शुरु कर दी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उन्हें पत्थर, लाठी, जूतों और डंडों से मारा गया.
  • पुलिस के मुताबिक़ ऐसा कोई गिरोह ग्वालियर में सक्रिय नहीं है जो बच्चे चोरी करता हो. पुलिस के अनुसार जो वीडियो सोशल मीडिया पर चल रहे हैं वो काफ़ी पुराने हैं और ग्वालियर से संबंधित नहीं हैं.
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लेकिन ये मामला यहीं नहीं रुका. सोशल मीडिया पर इस किन्नर और उनके दो साथियों की यह तस्वीर इस दावे के साथ शेयर की गई कि 'राजस्थान पुलिस ने राज्य में सक्रिय बच्चा चोर गैंग की फ़ोटो जारी की हैं'. लेकिन पुलिस ने इसे फ़र्ज़ी पोस्ट करार दिया.

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हमने पाया कि ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले में भी 23 अगस्त 2019 को एक घटना हुई जिसमें तीन किन्नरों को लोगों ने बच्चा चोर समझकर पीटा. मंडी ज़िले के एसपी गुरुदेव चंद ने इस ख़बर की पुष्टि की और कहा कि स्थानीय लोगों ने ग़लतफ़हमी के कारण ये हमला किया.

  • इसी तरह उत्तर प्रदेश में खंभे से बंधे एक लड़के का वीडियो इस दावे के साथ शेयर किया गया कि 'मानव अंगों की तस्करी करने वाला एक गिरोह सूबे में सक्रिय है जो बच्चे चोरी करता है'. इस वीडियो को ओलंपिक मेडल जीत चुके भारतीय पहलवान योगेश्वर दत्त ने भी 19 अगस्त 2019 को ट्वीट किया जिसे 35 हज़ार से ज़्यादा बार देखा जा चुका है.
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लेकिन पुलिस की पड़ताल में यह दावा बिल्कुल ग़लत साबित हुआ. ये यूपी के जालौन का मामला था. स्थानीय पुलिस के अनुसार 10 और 11 अगस्त 2019 की दरमियानी रात में कुछ लोगों ने इस लड़के को पकड़कर खंभे से बांधा, फिर उसे पीटा और ज़बरन उससे स्वयं को बच्चा चोर कहलवाया. इस संबंध में पुलिस 14 अगस्त 2019 को मुख्य अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर चुकी है. साथ ही यह सूचना सार्वजनिक की गई है कि ये मामला फ़र्ज़ी था.

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लेकिन इसी तरह के वीडियो को सही मानते हुए 23 अगस्त 2019 को यूपी के उन्नाव में बच्चा चोरी के शक़ पर पाँच लोगों को पीटा गया. उन्नाव पुलिस के अनुसार ये परिवार एक महीने से लापता बेटे की तलाश में उन्नाव ज़िले के धर्मपुर गाँव पहुँचा था. जिन्हें पीटा गया वो भी उन्नाव ज़िले के ही रहने वाले हैं.

सोशल मीडिया और 'मारो-मारो' का शोर

इन घटनाओं के अलावा बीबीसी ने उत्तर प्रदेश के तीन (झांसी, इटावा और बरेली ज़िले), राजस्थान के दो (दौसा और जोधपुर ज़िले) और हिमाचल प्रदेश के एक केस के बारे में स्थानीय पुलिस से बात की.

पुलिस के मुताबिक़ बच्चा चोरी की अफ़वाह के आधार पर किन्नरों, रंग-रंगीले बहरूपियों, शराब के नशे में खोए लोगों और मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों को भीड़ के हमले का सर्वाधिक शिकार होना पड़ा है और जाँच में इनके ख़िलाफ़ बच्चा चोरी की शिक़ायतें निराधार साबित हुई हैं.

इन मामलों की जाँच कर रहे पुलिस अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि जहाँ भी मॉब लिंचिंग की ये घटनाएं हुई हैं, वहाँ के स्थानीय लोगों के अनुसार उन्हें कई दिन से वॉट्सऐप पर भ्रामक सूचनाएं मिल रही थीं.

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यूपी के संभल ज़िले में भी कुछ ऐसा ही चल रहा था. 27 अगस्त 2019 को राम अवतार की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी.

संभल ज़िले में रहने वाले कुछ लोगों ने बीबीसी को बताया कि "मॉब-लिचिंग की घटना से पहले, कई दिन तक लगातार वॉट्सऐप पर ख़बरें आती रहीं कि संभल के फलाँ मोहल्ले में या फलाँ गाँव से बच्चा चोरी कर लिया गया है जिसे लेकर स्थानीय लोगों में बड़ी खलबली थी. लेकिन एक आदमी का ख़ून होने के बाद सब शांत है."

संभल में हुई मॉब-लिंचिंग के वायरल वीडियो में दिखता है कि राम अवतार भीड़ के आगे हाथ जोड़ते रहे, कहते रहे कि वो बच्चा चोर नहीं हैं, पर मारने वाले उनका नाम, गाँव का नाम और जाति जानने के बाद भी नहीं रुके. भीड़ 'बच्चा चोर-बच्चा चोर' और 'मारो-मारो' का शोर मचाती रही और हर तरफ से पड़ते लात घूंसे, लाठी डंडों के बीच लोग मोबाइल से वीडियो बनाते रहे.

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Image caption राम अवतार

मौक़े पर पहुंची पुलिस ने जब तक राम अवतार को अस्पताल पहुंचाया तब तक वो दम तोड़ चुके थे.

संभल के पुलिस अधीक्षक यमुना प्रसाद ने बीबीसी को बताया कि "राम अवतार अपने भतीजे को इलाज के लिए ले जा रहे थे. रास्ते में जराई गाँव पड़ता है जहाँ भीड़ ने उन्हें बच्चा चोर होने के शक़ में पकड़ लिया और पिटाई शुरू कर दी."

यमुना प्रसाद ने दावा किया कि उनके ज़िले में बच्चा चोरी की कोई घटना नहीं हुई है और ना ही कोई बच्चा चोर गैंग सक्रिय है. फिर भी लोग वॉट्सऐप पर फैली अफ़वाहों को सच मान लेते हैं.

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Image caption मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले में देह व्यापार के आरोप में जुलाई 2019 में गिरफ़्तार किये गए इस गिरोह की तस्वीर को कई राज्यों में 'बच्चा चोर गैंग' की गिरफ़्तारी का सबूत बताकर शेयर किया गया है

पुलिस इससे कैसे लड़ रही है?

हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी ओम प्रकाश सिंह ने एक वीडियो अपील जारी की जिसमें उन्होंने कहा कि लोग इन अफ़वाहों से लड़ने में पुलिस की मदद करें. इसी तरह की अपील राजस्थान और दिल्ली पुलिस ने भी की है.

यूपी के डीजीपी ऑफ़िस के अनुसार गाज़ियाबाद, कानपुर, मुज़फ़्फ़रनगर समेत राज्य के कई अन्य ज़िलों में अब तक 100 से ज़्यादा लोगों पर 'बच्चा चोरी की अफ़वाह फ़ैलाने' का केस दर्ज कर, उन्हें गिरफ़्तार किया गया है.

इन लोगों को पुलिस ने वॉट्सऐप पर ग़लत सूचना फ़ॉरवर्ड करने और स्थानीय लोगों के बीच ग़लत संदर्भ के साथ सामग्री शेयर करने के आरोप में पकड़ा है.

ओपी सिंह ने कहा है कि बच्चा चोरी की अफ़वाह फैलाने वालों के ख़िलाफ़ अब रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) के तहत कार्रवाई अमल में लाई जायेगी.

Image caption उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी ओम प्रकाश सिंह

यूपी पुलिस का दावा है कि बच्चा चोरी की अफ़वाहों को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर कैंपेन चलाया जा रहा है और गाँवों में कुछ युवकों को पुलिस वॉलेंटियर बनाया गया है जो वॉट्सऐप के ज़रिये राज्य के 1465 थानों में बने वॉट्सऐप ग्रुप्स से जुड़े हैं.

वॉट्सऐप इंडिया के एक प्रवक्ता ने भी बीबीसी से बात करते हुए यह दावा किया कि उनकी टीम भारत में वॉट्सऐप के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रिंट, रेडियो, ऑनलाइन और टीवी के ज़रिए जागरूकता फैला रही है.

पर यह काम आसान नहीं है, इसका अंदाज़ा 30 अगस्त 2019 को यूपी के पीलीभीत में हुई घटना से लगता है.

पीलीभीत के एसपी मनोज सोनकर ने बताया कि "जब पुलिस की एक टीम सोंधा गाँव में बच्चा चोरी की अफ़वाहों के ख़िलाफ़ जागरूकता फ़ैलाने पहुँची तो उनपर हमला किया गया. जैसे ही पुलिस वालों ने कहा कि अफ़वाह फ़ैलाने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जायेगी, तो गाँव वाले गुस्सा हो गए और पुलिस वालों को स्थिति कंट्रोल करने के लिए कई राउंड फ़ायर करने पड़े."

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क्या सिपाही या दारोगा इसे रोक सकते हैं?

समाजशास्त्री संजय श्रीवास्तव मानते हैं कि निचले स्तर पर क़दम उठाकर अब कुछ नहीं होगा. ये घटनाएं किसी सिपाही या दारोगा से नहीं रुकेंगी. इसके लिए सरकार को उच्चस्तर पर क़दम उठाने होंगे.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "भीड़ की इस हिंसा की एक वजह वो माहौल भी है जो राष्ट्रीय स्तर पर बनाया जा रहा है कि आप ऐसे हमले कर सकते हैं और आपको कोई कुछ कहेगा नहीं. अगर आपने ऐसा कोई काम किया भी तो आपके समर्थन में लोग आ जाएंगे और ऐसी घटनाओं को सही ठहराने के कारण बताएंगे."

संजय कहते हैं कि सरकार के शीर्ष लोगों को राष्ट्रीय मीडिया पर आकर देश को ये भरोसा देना होगा कि ऐसी घटनाएं रोकने के लिए सरकार गंभीर और सख़्त कार्रवाई करने का इरादा रखती है.

साल 2018 में बच्चा चोरी की अफ़वाहों के आधार पर हुई हिंसा की जो घटनाएं मीडिया में आईं, उन्हें दर्ज करके इंडिया-स्पेंड ने एक लिस्ट तैयार की है.

इस लिस्ट के अनुसार साल 2018 में अफ़वाहों के कारण 69 घटनाएं हुई और इनमें 29 लोगों की मौत हुई, 48 लोग गंभीर रूप से घायल हुए और 65 लोग चोटिल हुए.

हालांकि बीबीसी स्वतंत्र रूप से लिस्ट में दिये इस आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है. वहीं साल 2016 के बाद से भारत के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने आपराधिक मामलों पर अपनी रिपोर्ट जमा नहीं की है जिससे इन आंकड़ों का मिलान किया जा सके.

इस लिस्ट के मुताबिक़ साल 2018 में बच्चा चोरी की अफ़वाहों के कारण तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, ओडिशा और आंध्र प्रदेश समेत पूर्वोत्तर भारत के कई राज्य हिंसक घटनाओं से प्रभावित हुए थे.

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सरकार का रुख क्या है?

भारतीय व्यवस्था में पुलिस शासन राज्य स्तर का मामला है. लेकिन केंद्र सरकार इन घटनाओं के पीछे की मुख्य वजह यानी 'इंटरनेट के दुरुपयोग' पर कुछ फ़ैसले ले सकती है.

संसद के हालिया सत्र में भारत सरकार से यह पूछा गया था कि क्या वॉट्सऐप, फ़ेसबुक, ट्विटर वगैरह देश में भ्रामक सूचनाएं फ़ैलाने के लिए इस्तेमाल किये जा रहे हैं? अगर हाँ, तो सरकार ने इसे रोकने के लिए क्या किया?

भारत के केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 3 जुलाई 2019 को इसका जवाब दिया था.

रविशंकर प्रसाद का कहना था "साइबर स्पेस एक बेहद जटिल वातावरण वाली जगह है जहाँ सीमाएं नहीं हैं और लोग गुमनाम रहते हुए भी संवाद कर सकते हैं. ऐसे में ये संभावना बढ़ जाती है कि ग़लत क्लिप का इस्तेमाल करके लोगों में पैनिक या नफ़रत फैलाई जाये. ये एक ग्लोबल समस्या है. हम लोगों के बोलने की आज़ादी का सम्मान करते हैं जो उन्हें संविधान से मिली है. सरकार इंटरनेट पर मौजूद कंटेंट को मॉनिटर नहीं करती. फिर भी कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से हम कह सकते हैं कि इंटरनेट, ख़ासकर वॉट्सऐप का इस्तेमाल भ्रामक सूचनाएं फ़ैलाने में किया जा रहा है."

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रविशंकर प्रसाद ने ये भी दावा किया था कि सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय साल 2018 में वॉट्सऐप को दो नोटिस जारी कर चुका है.

प्रसाद ने कहा, "नोटिस के जवाब में वॉट्सऐप ने भारत सरकार से ये कहा था कि वो उनके प्लेटफ़ॉर्म के दुरुपयोग को रोकने के लिए कई ज़रूरी क़दम उठायेगा."

वॉट्सऐप इंडिया का दावा है कि उनकी टीम ने वॉट्सऐप के दुरुपयोग को रोकने के लिए चार बड़े फ़ैसले लिए हैं जिनमें मैसेज़ फ़ॉरवर्ड करने पर लिमिट लगाना एक मुख्य क़दम है.

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