एनआरसी: नागरिकता की चक्की में पिसते असम के बच्चे - बीबीसी विशेष

  • 9 सितंबर 2019
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Image caption नोबिज़ुर इस्लाम

असम के धुभरी ज़िले में रहने वाली शाहिदा बीबी अपने एक कमरे के घर में अपने बेटे की तस्वीर ढूँढ रही हैं. काफ़ी देर ढूँढने पर भी जब कुछ नहीं मिलता तो वह थक कर बैठ जाती हैं. आज उनके पास ज़िंदगी के सिर्फ़ 45 दिन देख पाने वाले अपने सबसे छोटे बेटे नज़रुल इस्लाम की एक भी तस्वीर नहीं है.

बीती जुलाई के अंत में असम सरकार ने विधानसभा में एक लिस्ट जारी करके राज्य के डिटेन्शन कैम्पों में जिन 25 लोगों की मौत का रिकार्ड प्रस्तुत किया है, उनमें सबसे छोटे नज़रुल का नाम सबसे नीचे आता है. यूं तो विधान सभा में दिए गए एक आधिकारिक बयान में संसदीय राज्य मंत्री चंद्र मोहन पटवारी ने इन सभी 25 मौतों के लिए बीमारियों को दोषी ठहराया है, लेकिन शाहिदा का मानना है कि डिटेंशन कैम्प के सख़्त माहौल को बच्चा सह नहीं पाया.

डिटेन्शन के दौरान गुज़रे सबसे छोटे बच्चे की कहानी:

धुभरी ज़िले के रोवा गांव में मौजूद शाहिदा के घर के सामने से ब्रम्हपुत्र नदी बहती है. घर के आंगन में कपड़े सुखाने वाली रस्सी पर सूखती मछलियों की गंध पूरे माहौल में घुली हुई है.

वहीं बैठकर बातचीत करते हुए शाहिदा अपने डिटेन्शन का वक़्त बयान करते हुए बताती हैं, "मई 2011 में जब मुझे डी-वोटर के केस में कोकराझार डिटेंशन सेंटर ले जाया गया था, तब मेरे जुंडवा बच्चे नज़रुल और नोबिज़ुर सिर्फ़ 14 दिन के थे. उस रोज़ रास्ते में ही नज़रुल की तबीयत ख़राब होने लगी. जेल में दवाई और इलाज की उतनी सुविधा नहीं थी. फिर भी नज़रुल की तबीयत जब ज़्यादा बिड़गने लगी तो जेल अधिकारियों ने एक बार मुझे उसके साथ गुवाहाटी भेजा था- डॉक्टर को दिखाने के लिए".

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Image caption शाहिदा बीबी

शाहिदा आगे जोड़ती हैं, "डॉक्टर बेटे को अस्पताल में भर्ती करना चाहते थे लेकिन क्योंकि मैं वहाँ नहीं रुक सकती थी इसलिए हमें वापस आना पड़ा. उसकी खाँसी ठीक नहीं हो रही थी. तबीयत यूं ही बिगड़ती रही और फिर कुछ हफ़्तों बाद जब वो हमेशा के लिए चला गया तो मुझे तीन दिनों तक होश नहीं आया" .

नज़रुल के जाने के सात महीने बाद, मार्च 2012 में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने डी-वोटर के नागरिकता से जुड़े मुक़दमे में शाहिदा को भारतीय नागरिक घोषित करते हुए उन्हें रिहा कर दिया था. लेकिन हाल ही में 31 अगस्त को प्रकाशित हुई एनआरसी की फ़ाइनल लिस्ट में उनका नाम नहीं आया है.

नज़रुल की मौत के बाद शाहिदा के भाई को बच्चे का शव सौंप दिया गया था. नज़रुल के जुड़वां भाई नोबिज़ुर ने अपनी माँ के साथ ज़िंदगी का पहला साल जेल में ही गुज़ारा.

डिटेन्शन सेंटर और एक प्रेम कहानी:

दो साल पहले गुज़रे अपने पति को याद करके शाहिदा की आँखें भर आती हैं. आँसू पोछते हुए वह कहती हैं, "मेरी नागरिकता का मुक़दमा लड़ने के लिए मेरे पति ने हमारी सारी ज़मीन बेच दी. एक बार भी अपने बारे में या बच्चों के लिए ज़मीन बचाकर रखने के बारे में नहीं सोचा. उन्हें सिर्फ़ मेरा केस ठीक करना था. मुझे जेल का खाना अच्छा नहीं लगता था इसलिए 42 हफ़्तों तक वो लगतार मेरे लिए खाने-पीने का सामान घर से लेकर जेल आते रहे. 42 हफ़्तों तक लगातार धुभरी से कोकराझार आते रहे. उस वक़्त हमारे इतने पैसे ख़र्च हो गए कि हम क़र्ज़ से कभी उभर ही नहीं पाए".

आगे नागरिकता के लिए फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल में अर्ज़ी देने के बारे में पूछने पर शाहिदा कहती हैं, "पैसों की चिंता में घुलते घुलते मेरे पति भी गुज़र गए. बच्चा भी मेरा चला गया... अब इतना सब खोकर मुझे समझ नहीं आता कि नागरिकता के मेरे लिए क्या मायने हैं".

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Image caption शहिना

बाबा कब आएँगे?

बक्सा ज़िले के गोवरधना गांव में रहने वाली अनारा ख़ातून की छह साल की बेटी शाहीना अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाती. तीन साल से असम के ग्वालपारा डिटेंशन सेंटर में बंद अपने पति क़दम अली के मुक़दमें में उलझी अनारा, अपनी बेटी के इलाज के लिए मात्र दस हज़ार रुपए का इंतज़ाम नहीं कर पायी हैं.

शाहीना को उनकी व्हीलचेयर पर बिठाते हुए अनारा कहती हैं, "मेरे पति को डी वोटर के केस में डिटेन्शन सेंटर गए तीन साल हो गए. तब से इस घर, उनके नागरिकता के मुक़दमे, बूढ़े सास ससुर और इस बच्ची की सारी ज़िम्मेदारी मुझ पर आ पड़ी है. मैं मज़दूरी करके इनको खिलाऊँ, वकील की फ़ीस भरूँ या बेटी का ओपरेशन करवाऊँ?"

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Image caption अनारा खतून और उनकी 6 साल की बेटी शहिना

बेटी के इलाज के बारे में बताते हुए वह आगे जोड़ती हैं, "डॉक्टर ने ढाई साल पहले ही कहा था कि इसका ऑपरेशन किया जाना चाहिए. ऑपरेशन के बाद बच्ची के चलने फिरने की उम्मीद थी. लेकिन ख़र्चा दस हज़ार रुपए का आना था. इतने पैसे का इंतज़ाम मैं आज तक कर ही नहीं पायी. इसके बाबा से मिलने जब भी जेल जाती हूँ तो वहाँ उनकी हालत देखी नहीं जाती. उन्हें भी सामने बाज़ार से खाने पीने का कुछ समान ख़रीद कर दे देती हूँ. ऐसे में पैसे ही नहीं बचते".

इस बार 31 अगस्त को प्रकाशित हुई एनआरसी की लिस्ट में अनारा के परिवार में से किसी का भी नाम नहीं आया है. आगे फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल में नागरिकता का मुक़दमा लड़ने के बारे में पूछने पर वह कहती हैं, "जब बेटी मुझसे पूछती है कि बाबा कहाँ है, तब मुझे बहुत रोना आता है. इसलिए, अब मैं थक चुकी हूँ. अब और लड़ने की मुझ में हिम्मत नहीं. अगर सरकार कल आकर मेरे सारे परिवार को डिटेन्शन में बंद कर दे तो हम में से कोई कुछ नहीं कहेगा. आदमी एक बार ही मरता है, बार बार नहीं".

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Image caption मोहम्मद अस्मत

अव्वल विद्यार्थी से मज़दूर तक:

यूं तो दरांग ज़िले के ठेकराबारी गांव में रहने वाले 17 साल के मोहम्मद अस्मत की उम्र पढ़ने लिखने और दोस्तों के साथ घूमने फिरने की है. लेकिन एक होनहार विद्यार्थी होने के बावजूद अस्मत स्कूल छोड़कर रोज़ मज़दूरी करने के लिए मजबूर है.

दो साल पहले अस्मत के पिता मुनाफ़ अली को नागरिकता से जुड़े डी-वोटर केस में तेज़पुर डिटेन्शन सेंटर भेज दिया गया था. तब से अस्मत की ज़िंदगी का रूख़ हमेशा के लिए बदल गया.

"दो साल पहले डी वोटर के केस में पुलिस मेरे पिता मुनाफ़ अली को उठाकर ले गयी. उन्हें तेज़पुर के डिटेंशन कैम्प में बंद कर दिया गया और घर की सारी ज़िम्मेदारी मुझ पर आ पड़ी. हमारे पास न मुक़दमे के लिए पैसे हैं न ही पिता से मिलने जाने के लिए. बड़ी मुश्किल से रोज़ मज़दूरी करके मैं घरवालों के लिए सिर्फ़ खाने का ही इंतज़ाम कर पाता हूँ".

स्कूल छोड़ने के बाद एक दिन अस्मत के क्लास-टीचर भी उसका हाल चाल लेने घर आए. फावड़ा हाथों में लिए बैठे अस्मत आगे जोड़ते हैं, "मैंने टीचर को बताया कि अगर मैं एक भी दिन काम ना करूँ, तो उस दिन माँ को खाना नहीं मिलेगा. इसलिए मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ गयी. कभी कभी सोचता हूँ कि स्कूल जाता था तो कितना ख़ुश था मैं. पढ़ाई पूरी हो जाती तो कोई ठीक ठाक नौकरी करके परिवार की स्थिति भी सुधार सकता था. लेकिन बाबा के डिटेन्शन में बंद होने के बाद से सब कुछ बदल गया. अब मैंने मान लिया है कि मेरी क़िस्मत में यही लिखा है".

असम में लोगों की नागरिकता तय करने की इस दुरूह प्रक्रिया का शिकार होते इन मासूम बच्चों के भविष्य को लेकर क़ानून में अब तक कोई प्रावधान नहीं किया गया है.

गुवाहाटी स्तिथ अपने दफ़्तर में बातचीत करते हुए वरिष्ठ वकील मुस्तफ़ा अली बताते हैं, "डिटेंशन सेंटर के लिए अलग से कोई जेल मैन्यूअल नहीं है. जेल में ही अलग से डिटेंशन कैम्प क्रीएट किए गए हैं. जेल मैन्यूअल में परोल जैसे जो सुविधाएँ हैं वो डिटेन्शन कैम्प पर लागू होती हैं या नहीं इसमें कलैरिटी नहीं है. डिटेंशन सेंटर में जो बच्चे माँ-बाप के साथ जाते हैं उनकी देखभाल को लेकर क़ानून में अभी तक कोई विशेष प्रावधान नहीं है".

नागरिकता तय करने की इस दुरूह क़ानूनी प्रक्रिया में खोए असम के इन बच्चों का भविष्य फ़िलहाल अंधेरे में डूबा हुआ सा लगता है. कभी डिटेंशन में बंद माँ बाप के जेल की सख़्त माहौल में रहने को मजबूर तो कभी उनके साये के बिना बाहर की कठोर दुनिया को अकेले सहते इन बच्चों की सुध लेने वाला, फ़िलहाल कोई नहीं.

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