अफ़ीम उगाने के लिए कैसे मजबूर किए गए भारतीय किसान

  • 12 सितंबर 2019
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Image caption अफ़ीम के कारखाने में काम करते मजदूर

अमिताव घोष के जानेमाने उपन्यास, 'सी ऑफ़ पॉपीज़' में भारत के अफ़ीम उत्पादक क्षेत्र में गांव की एक महीला को अफ़ीम का एक बीज मिलता है.

वो लिखते हैं, ''वो बीज की तरफ़ देखती है जैसे उसने इसे पहले कभी नहीं देखा हो. और अचानक उसे पता चला कि यह ग्रह से ऊपर की चीज़ नहीं थी जिसने उसके जीवन को नियंत्रित किया है; यह छोटा सा गोला था - हमेशा सुंदर - भक्षक, दयालु और विनाशकारी, निरंतर और तामसिक.''

जब ये उपन्यास लिखा गया था उस समय उत्तरी भारत के कुछ 13 लाख किसान परिवार अफ़ीम की खेती करते थे. 19वीं सदी के अंत तक अफ़ीम की खेती एक करोड़ लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित करती थी जो अब उत्तर प्रदेश और बिहार का हिस्सा हैं.

गंगा किनारे दो कारख़ानों में कुछ हज़ार मज़दूर काम करते थे जो अफ़ीम के बीज के दूधिया तरल पदार्थ को सूखाते और मिलाते, उससे केक बनाते और लकड़ी के बक्सों (चेस्ट) में अफ़ीम की गोलियां पैक करते थे.

ये कारोबार ईस्ट इंडिया कंपनी चलाती थी जिसका एशिया में इस कारोबार पर एकाधिकार था. चीन के साथ दो युद्धों के बाद इसका कारोबार और बढ़ा और चीन को ब्रिटिश भारतीय अफ़ीम के लिए अपने दरवाज़े खोलने पड़े.

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि अफ़ीम के कारोबार से भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली और किसान इससे खुश थे. लेकिन, यूनिवर्सिटी ऑफ विएना में अर्थशास्त्र और सामाजिक इतिहास के प्रोफेसर रोल्फ बार के एक शोध के मुताबिक ये सच नहीं था.

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Image caption उत्तर भारत में एक अफ़ीम कारखाने की तस्वीरें

अफ़ीम कारोबार और किसान

डॉ. बार ने अफ़ीम उगाने की कीमत और किसानों को मिलने वाले भुगतान की खोज के लिए कई दस्तावेजों को खंगाला.

उन्होंने कारोबार के इतिहास पर भी खोज की- रॉयल कमीशन ऑफ ओपियम की 1895 की रिपोर्ट जिसके 7 वॉल्यम और 2500 पन्ने हैं.

इसमें भारत में अफ़ीम के इस्तेमाल और खपत पर 28 हजार सवाल व सैकड़ों गवाहों की रिपोर्ट है. साथ ही ये अध्ययन भी किया गया है कि औपनिवेशिक सरकार ने अपने उत्पादन और उपभोग को कैसे नियंत्रित किया था.

इस शोध के नतीजे डॉ. बार के कारोबार पर किए गए नए अध्ययन में प्रकाशित हुए हैं, जिसका नाम है, द पीजेंट प्रोडक्शन ऑफ ओपियम इन नाइटींथ सेंचुरी इंडिया.

उनका निष्कर्ष है कि अफ़ीम का कारोबार बेहद शोषणकारी था और भारतीय किसानों को ख़त्म कर रहा था. बार ने मुझे बताया, ''काफी नुकसान के बाद भी अफ़ीम की खेती की गई. किसान इस खेती के बिना बहुत बेहतर स्थिति में होते.''

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किसानों का शोषण

ईस्ट इंडिया कंपनी इस तरह अपना कारोबार चलाती थी. कंपनी के ओपियम एजेंसी नाम के संस्थान के 100 कार्यालयों में 2500 क्लर्क थे जो पुलिस की तरह अफ़ीम किसानों पर नज़र रखते थे और अनुबंधों का पालन कराते थे. भारतीयों श्रमिकों को प्रति सेर (वजन का माप) अफ़ीम पर कमीशन दिया जाता था.

19वीं सदी की शुरुआत में अफ़ीम का निर्यात 1880 के 4,000 चेस्ट प्रति वर्ष से बढ़कर 60,000 से अधिक चेस्ट तक पहुंच गया था. ये भूमि कर के बाद उस वक़्त भारतीय उपनिवेश से राजस्व का दूसरा सबसे बड़ा ज़रिया था.

डॉ. बार कहते हैं, ''सरकार का अफ़ीम उद्योग उपमहाद्वीप के सबसे बड़े उद्योगों में से एक था, जो हर साल कुछ हजार टन दवा का उत्पादन करता था. ये आज अफ़ग़ानिस्तान के अफ़ीम उद्योग के बराबर था, जो वैश्विक बाजार में हेरोइन की आपूर्ति करता है.''

प्रोफेसर के मुताबिक इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस फसल का लाखों लोगों के जीवन पर स्थायी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था.

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Image caption चीन के साथ दो युद्धों के बाद अफ़ीम का कारोबार बढ़ा.

अनुबंध में फंसते किसान

ब्याज मुक्त अग्रिम भुगतान की अफ़ीम किसानों के लिए था जो ऋण नहीं ले सकते थे.

वैसे वैश्विक बाजार के लिए उत्पादन करने वालों के लिए ये कोई बुरी बात नहीं थी. लेकिन, डॉ. बार के मुताबिक ये बात बुरी थी कि किसान किराए, खाद, सिंचाई और मजदूरों के लिए जितना भुगतान करते थे वो कच्चे अफ़ीम से होने वाली कमाई से ज़्यादा था.

वो अफ़ीम के उत्पादन में जितना खर्च करते थे उन्हें वो भी वसूल नहीं हो पाता था. लेकिन, जब तक वो ये समझ पाते तब तक वो अनुबंध में बंध चुके होते थे.

ओपियम एजेंसी ने कड़े उत्पादन लक्ष्य भी तय कर रखे थे और एक छोटा किसान ये तय नहीं कर सकता था कि वो अफ़ीम का उत्पादन करे या नहीं. उन्हें "औपनिवेशिक सरकार की निर्यात रणनीति के लिए अपनी ज़मीन और श्रम का हिस्सा देने के लिए मजबूर किया गया".

स्थानीय जमींदारों ने अपने भूमिहीन किरायेदारों को अफ़ीम उगाने के लिए मजबूर किया. फ़सल उगाने से इनकार करने पर किसानों को अगवा किया गया, उन्हें गिरफ्तार करके फसलों को नष्ट करने, आपराधिक मुकदमा चलाने और जेल में बंद करने की धमकी दी गई.

1915 में चीन के साथ अफ़ीम का कारोबार ख़त्म हो गया. हालांकि, 1947 में भारत के आजाद होने तक ब्रिटिश भारत का इस कारोबार पर एकाधिकार रहा.

डॉ. बार को ये बात हैरान करती है, "कुछ हज़ार अफ़ीम क्लर्कों ने लाखों किसानों को कैसे नियंत्रित किया, जिससे उन्हें एक ऐसी फसल पैदा करने के लिए मजबूर होना पड़ा जो उन्हें नुकसान पहुंचाती थी."

ये एक सही सवाल है.

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