किसान परिवार जिसने चार पीढ़ियों में पांच आत्महत्याएं देखीं

  • 12 सितंबर 2019
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Image caption लवप्रीत के परिजन

इससे पहले कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झारखंड में गुरुवार को किसानों के लिए पेंशन योजना का उद्घाटन करते, लवप्रीत ने ज़िंदगी के उस प्यार को तोड़ने का फ़ैसला कर लिया जिसका ज़िक्र उसके नाम में दो अलग-अलग भाषाओं में दो बार आता था, लव और प्रीत.

कर्ज़े के बोझ में दबकर खुदखुशी कर रहे किसानों की ख़बरें पंजाब के अंदर चल रही त्रासदी का भयानक रूप पेश करती हैं. बरनाला ज़िले के गांव भोतना के लवप्रीत सिंह ने अपने बाप-दादा-परदादा के पदचिन्हों पर चलते हुए दस सितंबर को खुदखुशी कर ली. पंजाब में 'बाप-दादा के क़दमों पर चलना' की आशीष भोतना गांव में पहुंच कर महज़ एक चीख बनकर रह जाती है.

सवा साल पहले लवप्रीत के पिता की खुदखुशी के बाद उनके घर जाने का मौका मिला था. इस परिवार के दुख का अंदाज़ा कौन लगा सकता है. घर के हालात तब भी ऐसे थे कि अच्छा भला इंसान भी सुनकर बुत हो जाए.

हरपाल कौर ने बताया था कि उसके पति की खुदखुशी के बाद उसके बेटे (लवप्रीत) की पढ़ाई छूट गयी थी. लवप्रीत उस दिन घर पर नहीं था पर उसकी मां ने बताया था कि वो ग्यारहवीं की परीक्षा बतौर प्राइवेट विद्यार्थी दे रहा है.

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Image caption लवप्रीत

चार पीढ़ियों में पांच की आत्महत्या

मां को अपने बेटे की पढ़ाई बीच में छूट जाने और छोटी उम्र में उसके सर पर इतनी बड़ी ज़िम्मेदारियां पड़ जाने का अफ़सोस था. यह कहना मुश्किल है कि हरपाल कौर के दिल दिमाग़ पर अपने पति, ससुर और दादा ससुर की खुदखुशियों का साया नहीं मंडराता था.

इस परिवार की चार पीढ़ियों को क़र्ज़ के बोझ ने निगल लिया है. कर्ज़े की चपेट में पैंसठ साल के बुज़र्ग किसान से लेकर 22 साल का नौजवान तक आया है. इस परिवार के सिर पर कर्ज़ा ज्यों का त्यों खड़ा है.

इससे पहले लवप्रीत के पिता कुलवंत सिंह ने कर्ज़े के बोझ के कारण खुदखुशी कर ली थी. उससे पहले जब कुलवंत तकरीबन 20 साल के थे तो उनके पिता (नाहर सिंह) ने भी कर्ज़े के कारण खुदखुशी कर ली थी और उससे भी पहले उनके दादा ने भी आर्थिक संकट के कारण खुदख़ुशी का रास्ता चुन लिया था.

घर में गांव के मर्द-औरत और सगे-संबंधी परिवार का दुख बंटाने आएं हैं. इतनी त्रासदियों के बाद परिवार को हौसला देने वालों के लिए अपना हौसला कायम रखना भी मुश्किल है हो रहा है.

सच्चियार कौर नाम की एक बुज़ुर्ग औरत भी घर आने वाले लोगों में शामिल है. उन्होंने इस परिवार की चार पीढ़ियों के पांच कामाने वाले मर्दों को खुदखुशी करते देखा है. इस परिवार के हालात बयान करते-करते सच्चियार कौर का गला भर आता है. वो कहती है, 'पहले इनके पास सोलह-सत्तरह एकड़ ज़मीन थी जैसे-जैसे गरीबी बढ़ती गयी क़र्ज़ भी बढ़ता गया और अब कुल एकड़ ज़मीन बची है और क़र्ज़ आठ लाख रूपए से भी ज़्यादा हो गया है.'

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लवप्रीत ठेके पर ज़मीन लेकर खेती करता था और उसने ठेके वाले खेत में जाकर ही कीटनाशक दवाई पीकर खुदखुशी की है.

क़र्ज़ का बोझ

सच्चियार कौर बताती हैं, 'पहले लवप्रीत के पिता जी चौदह एकड़ ज़मीन ठेके पर लेकर खेती करते थे. ओलें गिरने से उनकी फ़सल खराब हो गयी और उसी मानसिक हालत में उन्होंने खुदखुशी कर ली थी.'

सच्चियार कौर कुनबे में लवप्रीत की दादी हैं. वे तवसील से बताती हैं 'लवप्रीत के परदादा (जोगिंदर सिंह) रिश्ते में चचा ससुर थे पहले लवप्रीत के परदादा ने खुदखुशी की फिर इसके दादा, नाहर सिंह और उनके भाई भगवान सिंह ने खुदखुशियां की. डेढ़ साल पहले इसके पिता ने गले में फंदा डालकर खुदखुशी की. उसके बाद लवप्रीत के चाचा की बिमारी के कारण मौत हो गयी और अब यह भी चला गया.' इसके बाद वे चलती हुई गहरी सांस लेकर कहती हैं, 'बस बेटा, सारा परिवार ही ख़त्म हो गया.'

साथ के गांव चुंघा से मंजीत कौर भी आयी हैं. उनके पास बताने के लिए दुखों का अपना किस्सा है. वे बताती हैं, 'लवप्रीत मेरे बेटे के साथ पढ़ता था इनकी आपस में बहुत दोस्ती थी. जबसे लवप्रीत की खुदखुशी का पता चला है मेरे बेटे को संभालना मुश्किल हो गया है.'

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Image caption मृतक की दादी सच्चियार कौर

75 साल की सच्चियार कौर बताती हैं कि एक समय परिवार के पास 16-17 एकड़ ज़मीन थी जो धीरे-धीरे घटती गई और परिवार की ज़रूरतों के कारण क़र्ज़ का बोझ भी बढ़ता चला गया.

दरअसल मंजीत कौर का अपने आप को भी संभालना मुश्किल हो रहा है वे थोड़ा रूककर आगे बताती हैं, 'लवप्रीत मेरे साथ हर दुख-सुख की बातें करता था. ज़रूरत पड़ने पर मुझसे पैसा भी मांग लेता था. वो अक्सर कहता था कि हमारे घर में तो कुछ नहीं बचा. पड़सों ही वह हमारे घर होकर आया था. अपनी बहन के रिश्ते के बारे में मेरे साथ बात कर रहा था. वह मेरा दूसरा बेटा था. अब मेरे दो बेटों की जोड़ी टूट गयी.'

उस सोगवार माहौल में उस लड़की को ढूंढने की हिम्मत नहीं हुई जिसकी शादी की चिंता करता हुआ लवप्रीत मोह के सारे बंधन तोड़ गया.

गुरनाम सिंह ने साढ़े छह दशक की ज़िन्दगी गुज़ारी है इस परिवार साथ बचपन से जुड़े रहे गुरनाम सिंह बताते हैं, 'यह परिवार शुरू से ही मेहनत कररने वाला था. इन्होंने अपनी खेती करने के साथ-साथ किराए भाड़े का भी काम किया. इस लड़के के परदादा ने भी बहुत काम किया लेकिन क़र्ज़ के आगे हार गए. यह चौथी पीढ़ी में पांचवी मौत है जो क़र्ज़ के कारण हुई है. लवप्रीत के पिता जी भी बहुत मेहनत करते थे अपनी खेती करने के साथ-साथ कंबाइन चलाते थे, किराए पर थ्रेशर चलाते थे और साथ ही बतौर ड्राइवर ट्रैक्टर भी चलाते थे. किराए के काम के सिलसिले में वह पंजाब से बाहर ही जाते थे पर उनका क़र्ज़ नहीं खत्म हुआ.'

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वे बताते हैं, 'परिवार की ज़िम्मेदारियां निपटाते-निपटाते क़र्ज़ बढ़ता गया. अगर सरकार ने कोई मुआवज़ा दिया होता या क़र्ज़ माफ़ी दी होती तो शायद वे बच जाते. किसी ने हाथ नहीं पकड़ा, सहारा नहीं दिया तो क़र्ज़ का उतरना नामुमकिन था. सरकार चाहती तो सब कुछ कर सकती थी.'

लवप्रीत की दादी गुरदेव कौर के पास सरकार से करने के लिए फ़रियाद ही बची है, 'मेरे ससुर के मरने के साथ ही बुरा वक्त शुरू हुआ जो अब तक ख़त्म नहीं हुआ. मेरा पोता भी चला गया. घर में अब मेरी बहु और पोती ही बची है. सरकार ने हमारी मदद नहीं की. मेरी एक ही गुज़ारिश है कि सरकार मेरी पोती को सरकारी नौकरी पर लगाए. कम से कम इसकी ज़िंदगी तो आसान हो जाए.'

ग़रीबी में परिवार

घर के बाहर ही परिवार के एक और जानकार से मुलाक़ात हुई, उनका कहना था, ' भइया ऐसी होनी तो कभी न देखी न सुनी इस घर में तो किसी बदरूह का साया लगता है. हमारे देखते-देखते घर खाली हो गया.'

इस घर में सवा साल पहले क़र्ज़ की त्रासदी के बारे में खबर करने के लिए ही आना हुआ था. इस घर की खुशियां तो बहुत पहले ही पंख लगाकर उड़ चुकी थीं अब इस बदरंग हुए घर और त्रासदी के मायने एक हो गए हैं. अभी भी वो बुज़ुर्ग औरत जो कुछ बचा है उसे संभालने के लिए मदद की गुहार लगा रही है. बदरंग घरों के भी पते होते हैं. कोई सुख का सुनेहा लेकर आए तो.

कर्ज़ माफ़ी

बीबीसी पंजाबी द्वारा एकत्र की गई जानकारी के मुताबिक़ पंजाब सरकार ने कर्ज़ा माफ़ी योजना के तहत हरपाल कौर के परिवार का 53,000 रुपए का क़र्ज़ माफ़ किया था जो इन्होंने सहकारी सभा से लिया था. लवप्रीत के दादा नाहर सिंह की खुदखुशी के बाद सरकार ने दो लाख रूपए का मुआवज़ा दिया था. लवप्रीत के पिता कुलवंत सिंह की खुदखुशी के बाद सरकारी मुआवज़ा नहीं मिला.'

इस समय लवप्रीत के परिवार के सिर पर बैंक का डेढ़ लाख रूपए का क़र्ज़ है. इसके बिना तीन लाख रूपए पर सात कनाल ज़मीन गिरवी रखी है. यही ज़मीन उनके पास बची है. इसके बाद साहूकारों से लिए क़र्ज़ को मिलाकर कुल आठ लाख रूपए का क़र्ज़ बनता है.

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Image caption लवप्रीत की बहन मनजीत कौर

सरकारी जनगणना

पंजाब सरकार ने पूरे राज्य में खुदखुशी करने वाले परिवारों की जनगणना करवायी है जिसके मुताबिक़ 2000-2015 के दौरान 16,606 खुदखुशियां दर्ज की गयी हैं.

पंजाब खेतीबाड़ी विश्वविद्यालय की जनगणना के मुताबिक़ मालवा के छह ज़िलों में 14,667 खुदखुशियां हुई हैं जिनमें से लुधियाना जिला में 1,238, मोगा ज़िले में 1,423, बरनाला ज़िले में 1,706, भटिंडा ज़िले में 3,094, संगरूर ज़िले में 3,818 और मानसा ज़िले में 3,338 मामले दर्ज़ किए गए हैं.

बीबीसी पंजाबी से बात करते हुए पंजाब खेतीबाड़ी विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर सुखपाल सिंह ने दिसंबर 2018 में बताया था, 'खुदखुशियां करने वाले 16,606 लोगों में से 9,243 किसान और 7,363 मज़दूर थे. राज्य में हर साल 1,038 और रोज़ना तीन खुदखुशियां हो रहीं हैं.

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क़र्ज़ का बोझ और मनोरोग की मार

खुदखुशियों के इस रूझान के मानसिक पहलू को समझने के लिए बीबीसी पंजाबी के सरबजीत सिंह धालीवाल ने चंडीगढ़ में सरकारी अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ कमलेश कुमार साहू से बात की.

डॉ साहू का कहना है, 'खुदखुशियों का मनो-सामाजिक पक्ष बहुत अहम् है. हमारे समाज में मनोदशा के बारे में विशेषज्ञों से सलाह लेने का रूझान नहीं है. समाज खुदखुशी पीड़ित परिवार की सदमें के मनोवेग से निकलने में मदद नहीं करता.'

डॉ साहू आगे बताते हैं, 'खुदखुशी पीड़ित परिवार को सदमे से निकलने के लिए विशेषज्ञों के मशविरे की दरक़ार होती है जो आमतौर पर नदारद होता है. इसके अलावा अपनी अज्ञानता के कारण भी समाज सदमें की पीड़ा को देता.'

जब लवप्रीत के मामले की तफ्शील बताकर डॉ साहू से पूछा गया तो उनका जवाब था. 'खुदखुशियों के अलग-अलग कारण होते हैं. इस मामले में उम्र भी मायने रखती है. नौजवान तबके में बेरोज़गारी खुदखुशी का अहम कारण होती है. सामाजिक रूतबे में आयी कमी भी खुदखुशी का कारण बनती है.'

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