झारखंड लिंचिंग: पिटाई के बाद भी क्या बच सकती थी तबरेज़ की जान

  • 13 सितंबर 2019
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झारखंड के चर्चित तबरेज़ अंसारी लिंचिंग मामले की प्रशासनिक जांच में ये बात पता चली है कि उनका इलाज करने वाले डाक्टरों ने शुरुआती तौर पर लापरवाही बरती थी.

बुरी तरह ज़ख़्मी अवस्था में अस्पताल लाए गए तबरेज़ की मेडिकल जाँच में उन मानदंडों का पालन नहीं किया गया, जो ट्रॉमा केसेज के मरीज़ों की जाँच के लिए ज़रुरी होता है. हालांकि, जेल ले जाए जाने के बाद वहां प्रतिनियुक्त डॉक्टर ने वह सारी प्रक्रिया पूरी करायी. लेकिन तब तक कई घंटे बीत चुके थे.

सरायकेला के एसडीओ डा. बशारत क़य्यूम ने बीबीसी से बतचीत में इसकी पुष्टि की.

वे उस तीन सदस्यीय जाँच टीम के मुखिया थे, जिसे सरायकेला खऱसांवा के उपायुक्त (डीसी) ने इस मामले की जाँच का ज़िम्मा सौंपा था. इस टीम ने अपनी जाँच में डॉक्टरों और पुलिस की लापरवाही पायी थी. इसके बाद अपनी रिपोर्ट डीसी को सौंप दी.

ब्लड प्रेशर तक नहीं देखी गई

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एसडीओ डॉ. बशारत क़य्यूम ने कहा, "हमने तबरेज़ के मेडिकल काग़ज़ात की जांच की. तब पता चला कि 18 जून की सुबह सदर अस्पताल में लाए जाने के बाद उन्हें सबसे पहले देखने वाले डॉक्टर ने लापरवाही बरती है. उन्होंने वह कार्ड नहीं बनवाया, जो ट्रॉमा केसेज के मरीज़ों की जांच का अनिवार्य हिस्सा है."

तबरेज़ की सुबह जाँच करने वाले डॉक्टर ने उसकी परची पर सिर्फ़ मल्टीपल इंज्यूरी लिख दिया. यह विवरण नहीं था कि उसे कहां-कहां और कितना ज़ख़्म है. इसके लिए आवश्यक जाँच भी नहीं करायी गई थी. उनका ब्लड प्रेशर तक नहीं देखा गया था. उन्होंने सिर्फ़ घुटने का एक्स-रे कराने की सलाह दी, लेकिन पुलिस ने तब वह जाँच भी नहीं करायी और वापस थाना लेकर चली गयी.

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Image caption सदर अस्पताल के डिप्टी सुपरिडेंडेंट डॉ. बरियल मार्डी

उन्होंने यह भी कहा, "शाम में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने से पहले तबरेज़ को दोबारा सदर अस्पताल लाया गया. तब ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने उनका एक्स-रे कराया. उसके बाद 'फ़िट टू ट्रैवल' सर्टिफ़िकेट दे दिया. तब भी उसकी पूरी जाँच नहीं करायी गई. जेल ले जाए जाने के बाद वहां के डॉक्टर ने यह सब प्रक्रिया पूरी की थी."

अगर इलाज होता तो...

एसडीओ ने कहा, "यह कहना बहुत सबजेक्टिव होगा, लेकिन इलाज में लापरवाही तो बरती ही गई थी."

हालांकि, तबरेज़ अंसारी के परिवार वाले मानते हैं कि उनकी जान बचायी जा सकती थी.

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Image caption तबरेज़ अंसारी की पत्नी शाइस्ता परवीन

उनके चाचा मशरुर आलम ने बीबीसी से कहा, "तबरेज़ की मौत के लिए सिर्फ़ घातकीडीह गांव की भीड़ ही दोषी नहीं है. डॉक्टर, जेल प्रशासन और पुलिस भी बराबर की दोषी है. क़ायदे से इन सबके ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा चलना चाहिए. हमलोगों ने इसकी सीबीआइ जांच की मांग की है. अगर इसपर सुनवाई नहीं हुई, तो हमें इंसाफ़ के लिए हाइकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट जाना होगा. लेकिन, हम यह लड़ाई लड़ेंगे."

कैसे हुई इलाज में लापरवाही

उलब्ध काग़ज़ात के मुताबिक़, 18 जून की सुबह सरायकेला सदर अस्पताल में डॉक्टर ओम प्रकाश केसरी ने तबरेज़ की जाँच की थी. उन्होंने उनके घुटने का एक्स-रे कराने को लिखा था. कोई और जांच नहीं करायी.

अस्पताल में भर्ती भी नहीं किया. जब 21 जून को जेल में तबरेज़ की तबीयत बिगड़ी, तब भी डॉ. केसरी ही उन्हें देखने जेल गए. उन्होंने तब भी तबरेज़ को अस्पताल में भर्ती करने की सिफ़ारिश नहीं की. इसके अगले दिन 22 जून की सुबह तबरेज़ की तबीयत फिर से बिगड़ गयी. वे अस्पताल लाए गए, लेकिन उन्हें नहीं बचाया जा सका. उनकी मौत हो गई.

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Image caption तबरेज़ अंसारी के चाचा मशरूर आलम

इस बाबत पूछे जाने पर डॉ. ओम प्रकाश केसरी ने कोई कमेंट नहीं किया. उन्होंने किसी बड़े अधिकारी से बात करने की सलाह दी. तब सदर अस्पताल के डिप्टी सुपरिडेंडेंट डॉ. बरियल मार्डी ने इस घटनाक्रम की पुष्टि की. उन्होंने बताया कि जेल के डॉक्टर 21 व 22 जून को छुट्टी पर थे. इसलिए डॉ. केसरी को वहां भेजा गया था.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "तबरेज़ अस्पताल में ख़ुद चलकर आए थे. इसके सीसीटीवी फ़ुटेज और तस्वीरें हैं. क्योंकि, उन्होंने घुटने में दर्द और चोट की शिकायत की थी, इसलिए डॉ. केसरी ने सिर्फ़ घुटने का एक्स-रे कराने की सिफ़ारिश की. जेल प्रशासन का कहना है कि वे वहां भी ख़ुद चलकर वॉशरुम गए. आकर पानी पीया. फिर उनकी तबीयत बिगड़ी. कोई डॉक्टर इलाज में लापरवाही क्यों बरतेगा."

फारेंसिक एक्सपर्ट नहीं

डा बरियल मार्डी ने ही तबरेज़ अंसारी के शव का पोस्टमार्टम भी किया था. वे तीन डॉक्टरों की टीम को लीड कर रहे थे. उन्होंने स्वीकार किया कि उस टीम में किसी डॉक्टर की फारेंसिक स्पेशियालिटी नहीं थी.

पुलिस का पक्ष

सरायकेला खरसांवा के एसपी कार्तिक एस पुलिस को दोषी नहीं मानते. उन्होंने कहा कि हमलोगों ने शानदार काम किया. तेरह लोगों की गिरफ़्तारी कर समय पर चार्जशीट सौंपा. लेकिन, डॉक्टरी रिपोर्ट के आधार पर दफ़ा-302 हटा देने के कारण मीडिया हमें कटघरे में खड़ा कर रहा है. जबकि दफ़ा-304 में भी उम्रक़ैद की सज़ा होती है. इसके अलावा धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप समेत कई और संज्ञेय धाराओं में भी चार्जशीट की गई है. अब कोर्ट जो कहेगी, हम करेंगे.

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Image caption सरायकेला खरसावां के एसपी कार्तिक एस

एसपी कार्तिक एस ने बीबीसी से कहा, तबरेज़ का इलाज डॉक्टरों को करना था. अगर डॉक्टरों ने उन्हें भर्ती कराने की सिफ़ारिश की होती, तो हम जेल कैसे ले जाते. तबरेज़ ने मजिस्ट्रेट के सामने भी कोई शिकायत नहीं की. अगर वे कहते कि उन्हें इलाज की ज़रुरत है, तो कोर्ट उन्हें न्यायिक रिमांड पर जेल क्यों भेजती.

दिल्ली में प्रदर्शन

बहरहाल, तबरेज़ मामले में इरादतन हत्या की दफ़ा हटाए जाने के ख़िलाफ़ 13 सितंबर की दोपहर दिल्ली स्थित झारखंड भवन के सामने एक पब्लिक प्रोटेस्ट का आयोजन किया गया है. इसमें शामिल होने की अपील करती तबरेज़ की पत्नी शाइस्ता परवीन का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.

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