#हिंदी दिवस: पचास साल बाद बना हिंदी का नया साहित्य ज्ञानकोश

  • 14 सितंबर 2019
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बीते पचास वर्षों में कोई हिंदी साहित्य ज्ञानकोश नहीं बना था. इससे हिंदी जगत में एक तरह का बौद्धिक पिछड़ापन नज़र आने लगा था.

इस पिछड़ेपन को दूर करने और समाज के हाशिए पर पहुंचे साहित्य को मुख्यधारा में लाने के लिए कोलकाता स्थित भारतीय भाषा परिषद और वाणी प्रकाशन के साझा प्रयास और सैकड़ों लेखकों की बरसों की मेहनत का नतीजा, सात खंडो में एक वृहद हिंदी साहित्य ज्ञानकोश के तौर पर सामने आया है.

वर्ष 2014 से 2017 के बीच तैयार हुए इस ज्ञानकोश में साहित्य और उसके इतर विभिन्न विषयों पर 275 लेखकों के छब्बीस सौ से ज्यादा लेख शामिल हैं.

हाल में इसकी पहली प्रति दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को सौंपी गई. इस ज्ञानकोश के प्रकाशन के मौके पर कोलकाता में आयोजित एक समारोह में देश भर से जुटे विद्वानों ने भी इस पहल को 'ऐतिहासिक और हिंदी के लिए गौरव का पल' बताया.

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साहित्य के विकास में होगी भूमिका

भारतीय भाषा परिषद के निदेशक और ज्ञानकोश के प्रधान संपादक डॉ. शंभुनाथ कहते हैं, "हिंदी साहित्य के विकास में इसकी अहम भूमिका होगी. साहित्य का संबंध विभिन्न विधाओं से है. लेकिन ऐसा कोई ग्रंथ नहीं था जो साहित्य के व्यापक परिप्रेक्ष्य को विविधता में पाठकों के सामने खोल कर रख सके."

आखिर इस बड़े पैमाने पर किसी ज्ञानकोश को तैयार करने का विचार कैसे आया? डॉ. शंभुनाथ बताते हैं कि हिंदी साहित्य का ज्ञानकोश बने लगभग 50 साल हो गए थे. एक नए ज्ञानकोश की जरूरत लंबे समय तक महसूस की जा रही थी. लग रहा था कि हिंदी संसार में अगर बौद्धिक पिछड़ापन बहुत ज्यादा है तो इसकी एक प्रमुख वजह सामयिक ज्ञानकोश का अभाव है. वह बताते हैं कि हिंदी शिक्षा जगत और हिंदी प्रेमियों को ध्यान में रखते हुए इस ज्ञानकोश की रचना का विचार पैदा हुआ था.

शंभुनाथ कहते हैं, "बीते 50 बरसों से एक अपडेटेड ज्ञानकोश की कमी से हिंदी जगत में एक खाई पैदा हो गई थी. यह ज्ञानकोश बीती आधी सदी की उस खाई को पाटने में अहम भूमिका निभाएगा. इसे हिंदी का पहला विश्वकोश भी कहा जा सकता है. यह हिंदी की दुनिया को समृद्ध करेगा."

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Image caption पचास साल बाद बना हिंदी का नया साहित्य ज्ञानकोश

ज्ञानकोश में 32 विषयों पर 2660 रचनाएं

हिंदी साहित्य ज्ञानकोश के प्रधान संपादक डॉ. शंभुनाथ हैं. इसके संपादक मंडल में राधावल्लभ त्रिपाठी, जवरीमल्ल पारख, अवधेश प्रधान, अवधेश कुमार सिंह और अवधेश प्रसाद सिंह शामिल हैं. ज्ञानकोश की भाषा का संपादन वरिष्ठ लेखक राजकिशोर ने किया है जबकि संयोजन की जिम्मेदारी भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने निभाई है.

शंभुनाथ बताते हैं कि यह ज्ञानकोश सिर्फ साहित्य तक ही सीमित नहीं है. इसमें पर्यावरण, धर्म, भारतीय संस्कृति, मानवाधिकार, मीडिया कला, इतिहास और समाज विज्ञान समेत 32 विषयों पर 2,660 रचनाएं शामिल की गई हैं.

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मानक व्याकरण की भी जरूरत

इसके प्रकाशन के अवसर पर आयोजित गोष्ठी ज्ञानकोश समारोह में देश भर से जुटे विद्वानों ने भी इस पहल की सराहना की. उनका कहना था कि कोई भी ज्ञानकोश ऐसे ज्ञान का द्वार खोलता है जो पाठकों में जिज्ञासा, खुलापन और रचनात्मकता पैदा करे. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश इस परंपरा और साहित्य को और समृद्ध करेगा.

बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय (बीएचयू) के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. अवधेश प्रधान ने कहा, "इस कोष का निर्माण नए समय की चुनौतियों के संदर्भ में हुआ है. यह हिंदी शिक्षा जगत के एक बड़े अभाव को पूरा करेगा. इसकी भाषा भी सरल है."

वे इसे हिंदी की महान परंपरा की ही एक विकसित कड़ी बताते हैं. संपादक मंडल के सदस्य डॉ. अवधेश प्रसाद सिंह ने कहा कि इस ज्ञानकोश की तरह ही एक मानक हिंदी व्याकरण की भी ज़रूरत है. इग्नू से जुड़े प्रो. जवरीमल्ल पारख ने कहा, "आज साहित्य के अध्ययन के लिए ज्ञान के व्यापक क्षेत्रों का अध्ययन भी ज़रूरी है. यह ज्ञानकोश इसी कमी को पूरा करता है."

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Image caption डॉ. शंभुनाथ

'देश की संस्कृति बचाने की कोशिश'

प्रधान संपादक डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि यह महज कुछ व्यक्तियों का निर्माण नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और हिंदीभाषी समाज की रचनात्मक शक्ति की अभिव्यक्ति है. उन्होंने कहा, "हमने एक ऐसे ज्ञानकोश की नींव डाली है जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ इमारत ऊंची करती जाएंगी."

ज्ञानकोश समारोह की अध्यक्षता संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के पूर्व कुलपति डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने की.

उन्होंने कहा कि यह ज्ञानकोश हिंदी की एक ऐसी उपलब्धि है जो दशकों तक हिंदी पाठकों को आलोकित करेगी. उन्होंने कहा, "भारतीय बहुलता में अखंडता की एक दीर्घ परंपरा है जो इस ज्ञानकोश में भी प्रतिबिंबित होती है. यह देश की संस्कृति को बचाने की ही एक कोशिश है."

भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने कहा, "हम इस ज्ञानकोश का प्रकाशन करके गौरवान्वित महसूस करते हैं. यह हम सब की एक सामूहिक उपलब्धि है."

डॉ. शंभुनाथ कहते हैं, "यह ज्ञानकोश साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन की स्थापित चारदीवारियों को तोड़ता है और पाठक को जीवंत बनाए रखता है. अतीत और पश्चिम से आच्छादित हुए बिना आलोचनात्मक समावेशिकता ही हिंदी साहित्य ज्ञानकोश के निर्माण की बुनियादी दृष्टि रही है."

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कोलकाता में जुटे विद्वानों ने कहा कि हिंदी साहित्य ज्ञानकोश साहित्य के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, उन सभी पाठकों और जिज्ञासुओं के लिए भी एक धरोहर है जो अपने देश, समाज, संस्कृतियों और विश्व की सभ्यताओं को समझना चाहते हैं.

बीते 50 बरसों में नई दुनिया में ज्ञान के जो विस्फोट हुए हैं, उनकी रोशनी में भारतीय भाषाओं में हिंदी में बना यह पहला ज्ञानकोश है.

डॉ. शंभुनाथ बताते हैं, "ज्ञानकोश सामान्य शब्दकोश से इस अर्थ में अलग है कि इसमें शब्द के अर्थ और पर्याय भर नहीं होते. इसमें सीमित सूचनाओं की जगह शब्द, बीजशब्द या विविध विषयों की अवधारणात्मक विवेचना होती है. चित्र, नक्शे, आंकड़े, ग्रंथ सूची वगैरह उसे शब्दकोश से भिन्न बनाते हैं."

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