कश्मीर अब विकास के हाईवे पर या मुश्किलों की पगडंडी पर चलेगा? दो नज़रिए

  • 18 सितंबर 2019
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भारत सरकार ने पिछले ही महीने अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म करने का फ़ैसला किया था.

सरकार के इस क़दम के बाद बीबीसी ने दो विरोधी पार्टियों के राजनेताओं, बीजेपी के बैजयंत जय पांडा और कांग्रेस के शशि थरूर से कहा कि भारत सरकार के इस फ़ैसले का मतलब क्या है और इसका क्या असर होगा, इस बारे में वो दोनों अपना अलग-अलग नज़रिया रखें.

उन दोनों के विचार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं और इन्हें एक-दूसरे को जवाब के तौर पर भी नहीं देखा जाना चाहिए.

'अब कश्मीर के पास बेहतरी की अपार संभावनाएं हैं'

(बैजयंत जय पांडा, चार बार सांसद रह चुके हैं. वो अभी भारत की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं.)

यहां ध्यान देने वाली बात है कि भारत सरकार के कश्मीर पर उठाए गए क़दम से केवल बीजेपी के कट्टर समर्थक ही नहीं, बड़ी संख्या में आम भारतीय भी उत्साहित हैं. यहां तक कि कई विपक्षी नेताओं ने भी सरकार के इस क़दम का समर्थन किया है.

हालांकि कश्मीरी अलगाववादियों ने इसका कड़ा विरोध भी किया है. जबकि, भारत के कई विपक्षी दलों ने भी सरकार के क़दम पर विरोध जताया है. उनका दावा है कि सरकार का ये क़दम असंवैधानिक है और इसका अंत दुख:द होगा.

लेकिन, आज इस बात का अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल है कि सिर्फ़ नाम का बचा संविधान का अनुच्छेद 370, पहले के कुछ दशकों के मुक़ाबले कश्मीर के लोगों के लिए और बुरा साबित होगा.

पिछले दशकों में कश्मीर में 40 हज़ार से ज़्यादा लोगों की जानें गईं. भारत और पाकिस्तान के बीच इसकी वजह से दो जंगें भी हुईं और एक सीमित युद्ध भी हुआ.

इसकी वजह से कश्मीर के हज़ारों अल्पसंख्यक हिंदुओं यानी कश्मीरी पंडितों को ज़ुल्म सहने पड़े. इन्हें 1990 के दशक में इस्लामिक चरमपंथ के विस्तार की वजह से कश्मीर घाटी छोड़नी पड़ी थी.

अब कश्मीर के पास अपनी बेहतरी की अपार संभावनाएं हैं.

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संविधान के अनुच्छेद 370 की वजह से भारत की अदालतों के कई तरक़्क़ीपसंद फ़ैसले और क़ानून कश्मीर पर लागू नहीं हो पाते थे. इनमें बाल विवाह उन्मूलन, दलितों (पहले के अछूत) को अधिकार देने, महिलाओं के प्रति भेदभाव ख़त्म करने और एलजीबीटी समुदाय को अधिकार देने के अलावा भ्रष्टाचार निरोध जैसे क़ानून थे, जो कश्मीर पर लागू नहीं हो सके थे.

पंडित नेहरू की सरकार ने 1949 में संविधान में कश्मीर के लिए अनुच्छेद 370 का प्रावधान किया था. इसके तहत कश्मीर को अपना संविधान, अपना झंडा और विशेष दर्ज़ा मिला था. जबकि ऐसा लंबे वक़्त तक नहीं चल सकता था. ख़ुद पंडित नेहरू ने भी ऐसा ही कहा था कि अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान है.

किसी भी सूरत में ये तो सच है कि कश्मीर ने अक्टूबर 1947 में भारत में विलय का फ़ैसला किया था. और वो भी उसी नियम के तहत जिसके ज़रिए बाक़ी की रियासतों का भारत में विलय हुआ था.

इसके बाद सही मायनों में तो अनुच्छेद 370 और इसमें किए गए संशोधन भारतीय संसद के तहत हुए. न तो पाकिस्तान का और न ही किसी और का इस मामले में क़ानूनी हस्तक्षेप था. ये ठीक वैसे ही था, जैसा भारत में विलय करने वाले किसी और राज्य के साथ होता.

अहम बात ये है कि कश्मीर के लोगों को इस बदलाव के बाद भी वही अधिकार हासिल हैं, जो भारत के किसी और इलाक़े में रहने वालों को मिले हैं. उन्हें अब भी चुनाव का हक़ मिलेगा. बराबरी का संवैधानिक अधिकार मिलेगा. जैसे कि देश के अन्य 1.36 अरब लोगों को मिला हुआ है. इनमें देश के 20 करोड़ मुसलमान भी शामिल हैं.

और, हालांकि अब कश्मीर एक संघ प्रशासित क्षेत्र बन गया है, तो अन्य राज्यों के मुक़ाबले इसे कम स्वायत्त अधिकार मिलेंगे. इससे केंद्र सरकार स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर यहां के संसाधनों का सुरक्षा के लिए बेहतर इस्तेमाल कर सकेगी.

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1948 के बाद से भारत ने जम्मू और कश्मीर को भारी पैमाने पर आर्थिक मदद दी. (ये अन्य राज्यों के प्रति व्यक्ति औसत के मुक़ाबले चार गुना ज़्यादा था.) लेकिन, इस आर्थिक मदद का उतना असर ज़मीनी स्तर पर नहीं दिखा.

हालांकि कई सामाजिक-आर्थिक पैमानों पर कश्मीर, भारत के अन्य क्षेत्रों के बराबर ही है. लेकिन, ये इसके अपने विकास की वजह से नहीं, बल्कि केंद्र सरकार से मिलने वाली मदद का नतीजा है.

कश्मीर का विशेष दर्जा होने की वजह से इसे केंद्र सरकार से मिलने वाले फंड में बड़े पैमाने पर हेरा-फेरी होती थी. इसके अलावा राज्य के सुरक्षा हालात ठीक न होने की वजह से यहां निवेश भी बहुत कम होता था, जिससे कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का टिकाऊ विकास हो सके.

अब विशेष दर्जा ख़त्म होने के बाद ये स्थिति नाटकीय रूप से बदल गई. अक्टूबर में कश्मीर में बड़ी कारोबारी बैठक होने वाली है. इसमें देश की कई बड़ी कंपनियों ने कश्मीर में बड़े पैमाने पर निवेश करने का एलान करने के संकेत दिए हैं. केवल बड़े खिलाड़ी ही नहीं, बहुत से और कारोबारी भी यहां निवेश के लिए उत्सुक हैं.

ज़मीन, पूरे भारतीय उप-महाद्वीप के लिए एक जज़्बाती मसला है. संविधान के अनुच्छेद 370 के चलते भारत के दूसरे हिस्सों के लोग कश्मीर में ज़मीन नहीं ले सकते थे. बल्कि ख़ुद कश्मीरी महिलाएं भी अगर किसी ग़ैर-कश्मीरी से शादी कर लेती थीं, तो कश्मीर में ज़मीन का उनका अधिकार छिन जाता था. आधुनिक और तरक़्क़ी पसंद जम्हूरियत में ऐसे भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है.

हालांकि कई और राज्यों में भी ऐसी पाबंदियां हैं. लेकिन, इनमें और कश्मीर में एक बड़ा फ़र्क़ है. जैसे कि उत्तर भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश में एक ख़ास समय सीमा तक रहने के बाद ही दूसरे राज्यों के नागरिक वहां ज़मीन ख़रीद सकते हैं. यानी उन्हें पहले हिमाचल प्रदेश के प्रति प्रतिबद्धता ज़ाहिर करनी होगी, तब वो वहां ज़मीन ख़रीद सकते हैं. ये अच्छी बात है. लेकिन, लिंग और क्षेत्र के नाम पर लगी पाबंदियां किसी इलाक़े को बाक़ी हिस्सों से काटने का ही काम करती हैं.

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ऐसे ही तर्क भारत के अन्य मुस्लिम बहुल राज्यों की आबादी की बनावट बनाए रखने के लिए दिए जाते हैं. ये पाकिस्तान के द्विराष्ट्र सिद्धांत के समर्थन जैसा है. लेकिन, पाकिस्तान का ये तर्क अब इसलिए नहीं माना जाता क्योंकि उसका पूर्वी हिस्सा भाषाई और क्षेत्रीय भेदभाव की वजह से अलग देश बांग्लादेश बन चुका है.

वहीं, दूसरी तरफ़ पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की घटती आबादी के बरक्स भारत में अल्पसंख्यक ख़ूब आगे बढ़ रहे हैं. मुसलमान, जो देश के बंटवारे के वक़्त आबादी का दस प्रतिशत ही थे वो आज बढ़ कर भारत की कुल आबादी का 14 प्रतिशत हो गए हैं.

भारत के मुसलमानों ने चौतरफ़ा तरक़्क़ी भी देखी है. उन्होंने राजनीतिक, न्यायिक और सैन्य व्यवस्था में ऊंचे पद हासिल किए हैं. देश में कई मुस्लिम अरबपति भी हैं.

जिस स्वायत्तता का सपना कश्मीरी देखते हैं, वो हमारी संवैधानिक व्यवस्था में पहले से ही है. मानवता के इतिहास में इसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती. भारत में पूर्ण विलय के बाद, भले ही ये केंद्र शासित प्रदेश हो या आगे चलकर फिर से पूर्ण राज्य बन जाए, कश्मीर अपने लोगों को बेहतर ज़िंदगी दे सकेगा.

जैसा कि संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत सैयद अकबरुद्दीन ने बेहद शानदार शब्दों में बयां किया है, संविधान के अनुच्छेद 370 में बदलाव का किसी और पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

कश्मीर में सुरक्षा के जो अस्थायी उपाय किए गए हैं, उससे हिंसा और लोगों की जान जाने की घटनाएं होने से रोका है. और जहां तक पाकिस्तान से बातचीत का सवाल है, भारत शिमला समझौते के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है. जिसके तहत दोनों देशों ने संघर्ष रोकने और आपसी संबंध सामान्य बनाने की परिकल्पना की है.


'कश्मीर पर सरकार का क़दम लोकतंत्र से धोखा है'

(वर्तमान में कांग्रेस के सांसद शशि थरूर पूर्व राजनयिक हैं.)

संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A कश्मीर को ये अधिकार देते थे कि वो अपने यहां रहने वालों को स्थायी नागरिकों और बाक़ी लोगों से अलग कर सके. इससे कश्मीर में अन्य लोगों के संपत्ति ख़रीदने पर भी रोक लगी थी. इन्हें हटाने का फ़ैसला एक साहसिक क़दम माना जाना चाहिए था.

सरकार का बचाव करने वालों का तर्क है कि स्वायत्तता की वजह से ही कश्मीर घाटी में अलगाववाद को बढ़ावा मिला. इसने कश्मीर में बड़े पैमाने पर हिंसा को रोकने में भी कोई मदद नहीं मिली.

उनका ये भी कहना है कि संविधान के इन अनुच्छेदों की वजह से कश्मीर घाटी का इस्लामीकरण होता गया. इसकी वजह से ही कश्मीरी पंडितों (ऊंची जाति के हिंदू) पर भयानक ज़ुल्म हुए और उन्हें अपने पुश्तैनी ठिकाने छोड़कर भागना पड़ा. कश्मीर के स्पेशल स्टेटस की वजह से ही भारत के तरक़्क़ीपसंद क़ानून जैसे कि दलितों और अनुसूचित जातियों को अधिकार देने वाले क़ानून यहां लागू नहीं हो सके.

ये सभी बातें सच हैं. लेकिन, ऐसा संविधान के अनुच्छेद 370 के रहते हुए हुआ, न कि इसकी वजह से हुआ.

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कश्मीर के विशेष दर्जे को छीनने का समर्थन करने वालों का कहना है कि इससे राज्य का आर्थिक विकास होगा. क्योंकि ग़ैर कश्मीरी लोग भी वहां ज़मीन ख़रीदने और निवेश करने के लिए आज़ाद होंगे.

ये सच है कि जब से अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A ख़त्म करने का एलान हुआ है, तब से राज्यपाल ने राज्य के बाहर के निवेशकों को एक कांफ्रेंस में शामिल होने का आमंत्रण दिया है. बड़ी कंपनियां, जिनमें भारत की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस भी शामिल है, उन्होंने ये इरादा ज़ाहिर किया है कि वो कश्मीर में नए प्रोजेक्ट शुरू करने के इच्छुक हैं. वहीं, बॉलीवुड के निर्माताओं में तो कश्मीर पर आधारित ब्लॉकबस्टर फ़िल्में बनाने और वहां शूटिंग करने की होड़ सी लगी है.

सबसे ख़राब बात तो ये है कि हरियाणा के एक वरिष्ठ राजनेता ने ये भी कह दिया कि उनके राज्य के पुरुष और स्त्रियों के अनुपात को अब आसानी से सुधारा जा सकेगा क्योंकि अब वो कश्मीर से लड़कियां ब्याह कर हरियाणा ला सकेंगे.

हालांकि बहुत से लोगों को ये चिंता है कि इस क़दम से होने वाले नुक़सान, आगे चल कर होने वाले संभावित फ़ायदों से ज़्यादा हैं.

सबसे बड़ी बात ये है कि भारतीय लोकतंत्र में हिंसा की संस्कृति को स्थायी जगह मिल जाना. सरकार ने जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ भारत गणराज्य के बुनियादी संवैधानिक संबंध को ही बदल डाला है. और ये फ़ैसला करने से पहले न तो उन्होंने कश्मीरी जनता से मशविरा किया और न ही राज्य के चुने हुए प्रतिनिधियों से बात की.

क़ानून के साथ हुए इस मज़ाक़ से अन्य राज्यों को भी संदेश दिया गया है कि अगर ऐसा जम्मू-कश्मीर के साथ होता है, तो वो उनके साथ भी भविष्य में हो सकता है.

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सरकार का ये दावा कि उसने इस संवैधानिक संशोधन के लिए कश्मीरी जनता की सहमति ले ली है, सरासर ग़लत है. क्योंकि इस वक़्त जम्मू-कश्मीर में सीधे केंद्र का शासन है. और ऐसे में ये मानना कि केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल, राज्य की नुमाइंदगी करते हैं, बिल्कुल ही असंवैधानिक है. बल्कि यूं कहें कि केंद्र सरकार ने इस फ़ैसले के लिए अपने ही नियुक्त राज्यपाल की सहमति ले ली है.

ये फ़ैसला संसद के सामने पेश किया गया. संसद में सरकार का बहुमत होने की वजह से ये आसानी से पास हो गया. इस पर न तो सलाह मशविरा हुआ और न ही स्थानीय राजनीतिक दलों से संवाद किया गया. राज्य की विधानसभा भंग है. और राज्य के चुने हुए प्रतिनिधि नज़रबंद हैं.

इस फ़ैसले से कश्मीर को अंधे कुएं में धकेल दिया गया. और इस तरह से ये संवैधानिक तख़्तापलट कर दिया गया. राज्य के शिक्षण संस्थान बंद थे. इम्तिहान टाल दिए गए. दुकानें और पेट्रोल पंप बंद थे. टीवी नेटवर्क का प्रसारण रोक दिया गया. संचार के माध्यम काट दिए गए. टेलीफ़ोन और मोबाइल सेवाओं पर रोक लगा दी गई थी. इंटरनेट का शटर भी डाउन कर दिया गया था.

कश्मीर की जनता को पूरी तरह से अलग-थलग रहने और बाक़ी दुनिया से बिना संपर्क के जीने को मजबूर कर के ये संवैधानिक बदलाव किया गया.

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अब अगर सरकार के वक़ील सुप्रीम कोर्ट (जहां इस फ़ैसले को चुनौती दी गई है) को ये समझा लेते हैं कि उसने क़ानून का पालन किया है, तो भी ये भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद को ही चुनौती देने वाला फ़ैसला है. इसे अगर हम सैन्य प्रशासन कह रहे हैं, तो ये बिल्कुल ग़लत नहीं है.

इस फ़ैसले का आर्थिक असर साफ़ दिख रहा है. कश्मीर की लाइफ़लाइन कहा जाने वाला पर्यटन उद्योग चौपट हो गया है. कई दशकों की भारत की सरकारों की कश्मीर के हालात दुनिया को सामान्य दिखाने की कोशिशें बेकार चली गई हैं. अब विदेशी सरकारें अपने नागरिकों को सलाह दे रही हैं कि वो कश्मीर न जाएं. जबकि पहले की सरकारें दुनिया के देशों को ये भरोसा देती थीं कि उनके नागरिक घूमने के लिए कश्मीर आ सकते हैं, क्योंकि वहां के हालात सामान्य हैं. अब ये सारी कोशिशें बेकार हो गई हैं.

सबसे विचित्र बात तो ये है कि 2017 में कश्मीर के दौरे पर गए प्रधानमंत्री ने कश्मीर के युवाओं (जहां बेरोज़गारी की दर 24.6 प्रतिशत है, जो भारत के अन्य राज्यों से दोगुनी है) से अपील की थी कि वो आतंकवाद और पर्यटन में से एक चुनाव करें.

पर्यटन ने बहुत से बेरोज़गार युवाओं को काम दिया होता. लेकिन, अब सैलानी कश्मीर आ नहीं रहे हैं. और जम्मू-कश्मीर में पाबंदियों की वजह से वहां मौजूद लोगों को बाहर निकाल दिया गया है.

आज कई देश अपने नागरिकों को फिर से कश्मीर न जाने की एडवाइज़री जारी कर रहे हैं. इस वजह से कश्मीर की हाउसबोट सूनी हैं और कारोबार ठप है. हस्तशिल्प उद्योग से जुड़े और क़ालीन बनाने वाले कश्मीर के महान कलाकार बर्बाद हो गए हैं.

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भारत की धर्मनिरपेक्षता की बड़ी मिसाल अमरनाथ यात्रा, जिसके तहत हर साल हज़ारों हिंदू यात्री उत्तरी कश्मीर में स्थित गुफ़ा की तीर्थयात्रा पर जाते हैं, उसे भी बीच में ही रोक दिया गया.

सबसे चिंता की बात तो ये है कि लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेताओं को नज़र बंद कर दिया गया. ऐसे में सरकार ने अलोकतांत्रिक ताक़तों के लिए जगह ख़ुद ही बना दी है.

जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष दर्जा कश्मीर के बहुत से नेताओं को मुख्यधारा की राजनीति करने का मौक़ा और बहाना देता था. वो भारत के साथ रहकर राज्य की स्वायत्तता की वक़ालत करते थे.

लेकिन, अब ये आवरण भी उनसे छीन लिया गया है. इसलिए अब राज्य के नेता अप्रासंगिक साबित हो गए हैं और अब उनके पास चरमपंथ को रोकने की ताक़त नहीं बची है.

भारत सरकार का दावा है कि सरकार आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग जीत रही है. लेकिन, अब इस क़दम से आतंकवाद को नई ज़िंदगी मिल सकती है. अब आतंकवादी इस नई नाइंसाफ़ी का हवाला दे कर लोगों को जोड़ सकते हैं.

इससे कुछ भटके हुए युवा चरमपंथी संगठनों में शामिल हो सकते हैं. इससे भारत के बहादुर और चुनौती झेल रहे सैनिकों को और नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

हालांकि अब तक तो भारत सरकार के इस क़दम की तारीफ़ हुई है. लेकिन अभी ये कहना जल्दबाज़ी होगी कि जब तमाम पाबंदियां उठा ली जाएंगी, तब क्या होगा. क्योंकि कभी न कभी तो एहतियाती क़दम पीछे खींचने ही होंगे.

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