प. बंगाल: रोज़गार के मुद्दे पर वाम संगठनों और पुलिस में भिड़ंत

  • 13 सितंबर 2019
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पश्चिम बंगाल में रोज़गार को लेकर परस्पर विरोधी दावों के बीच शुक्रवार को पुलिस और वामपंथी छात्र और युवा संगठनों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पों के दौरान कई लोग घायल हो गए.

स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफ़आई) और डेमोक्रेटिक यूथ फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (डीवाईएफ़आई) समेत 12 वामपंथी संगठनों के सदस्यों ने शिक्षा से लेकर रोज़गार तक की मांग के साथ हुगली ज़िले के सिंगुर से हावड़ा ज़िले में स्थित राज्य सचिवालय नवान्न तक एक रैली का आयोजन किया था.

सिंगुर वही जगह है जहां टाटा की लखटकिया कार परियोजना लगनी थी. लेकिन ममता बनर्जी के आंदोलन की वजह से वर्ष 2008 में टाटा समूह को रातोंरात यहां से बोरिया-बिस्तर समेट कर गुजरात जाना पड़ा था.

वाम संगठनों की यह रैली 12 सितंबर को सिंगुर से रवाना हुई थी और उसे आज राज्य सचिवालय पहुंचना था. कल रात यह रैली डानकुनी में रुकी थी.

वहां से सुबह रवाना होने के बाद पुलिस ने हावड़ा के मल्लिक फाटक इलाक़े में पहले बैरीकेड लगा कर रैली को रोकने का प्रयास किया. लेकिन रैली में शामिल लोग पुलिसवालों से भिड़ गए.

रैली में शामिल कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव भी शुरू कर दिया. भीड़ को तितर बितर करने के लिए पुलिस ने पहले आंसू गैस के गोले छोड़े और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया.

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सचिवालय से कुछ पहले इलाक़े में युद्ध जैसा नज़ारा पैदा हो गया था. पुलिसवालों के लाठीचार्ज में कई कार्यकर्ता घायल हो गए. दूसरी ओर, पुलिस का दावा है कि रैली में शामिल लोगों की ओर से पथराव के बाद भीड़ को खदेड़ने के लिए लाठीचार्ज किया गया. पुलिस के मुताबिक़, पथराव में एक वरिष्ठ अधिकारी को सिर में चोटें आई हैं.

पुलिस और वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच होने वाली झड़पों की वजह से इलाक़े में आंतक फैल गया. इन झड़पों की वजह से कई प्रमुख सड़कों पर ट्रैफ़िक ठप हो गया और घंटों लंबा जाम लगा रहा.

एक स्थानीय दुकानदार ने बताया, रैली में शामिल लोग सरकार के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे. पुलिस ने उनको आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया तो वह लोग पथराव करने लगे. उसके बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़ने के साथ भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया. इससे इलाक़े में भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो गई.

पुलिस ने किया लाठीचार्ज

इस बीच, वामपंथी संगठनों ने पुलिस पर सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस के इशारे पर शांतिपूर्ण रैली के ख़िलाफ़ हिंसा का सहारा लेने का आरोप लगाया है.

एसएफ़आई के प्रदेश सचिव श्रीजन भट्टाचार्य कहते हैं, "बंगाल के लिए शिक्षा के स्तर में गिरावट कोई मुद्दा नहीं है. राज्य से बड़े पैमाने पर उच्चशिक्षा के लिए छात्र दूसरे राज्यों में जाते रहे हैं."

वह कहते हैं कि नवान्न चलो अभियान का मक़सद शिक्षा के निजीकरण, फीस में बेतहाशा वृद्धि और इस क्षेत्र में बढ़ते भ्रष्टाचार के अलावा रोज़गार के क्षेत्र में लगातार गिरावट की ओर मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित करना था.

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भट्टाचार्य कहते हैं, "राज्य में प्रथामिक स्तर से ही शिक्षा का स्तर ख़राब है. सरकार मिड-डे मील के नाम पर रोज़ाना हर छात्र पर महज़ तीन रुपए ख़र्च करती है. इस बारे में पूछने पर वह केंद्र के माथे पर दोष मढ़ देती है."

वाम संगठनों की दलील है कि बंगाल के कॉलेजों को सरकार की ओर से ज़रूरत के मुक़ाबले कम धन आवंटित किया जाता है. इसी वजह से शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है. वाम संगठनों का दावा है कि राज्य में सरकार की तमाम घोषणाओं के बावजूद नए रोज़गार पैदा नहीं हो रहे हैं. इसके उलट पहले से चल रही कई कंपनियां बंद हो रही हैं. भट्टाचार्य दलील देते हैं, "अगर यहां नौकरियां होतीं तो राज्य के लाखों छात्र बेहतर भविष्य की तलाश में दक्षिणी राज्यों का रुख़ नहीं करते."

दूसरी ओर, सरकार ने इन संगठनों के दावों को ख़ारिज करते हुए उन पर अराजकता फैलाने का आरोप लगाया है. संसदीय कार्य मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं, "राज्य में बेरोज़गारी की दर तेज़ी से कम हुई है और अब यह दूसरे राज्यों के मुक़ाबले काफ़ी कम है. उनका कहना है कि बेरोज़गारी दर का राष्ट्रीय सूचकांक जहां 6.1 फ़ीसदी है वहीं बंगाल में बेरोज़गारी की दर महज़ 4.6 फ़ीसदी है. यह विकसित राज्यों में सबसे कम है."

राज्य सरकार के मंत्री का दावा

मंत्री आंकड़ों के हवाले से दावा करते हैं, "बंगाल के मुक़ाबले गुजरात में यह दर 4.8 फ़ीसदी, उत्तर प्रदेश में 6.4 फ़ीसदी, तमिलनाडु में 7.6 फ़ीसदी, तेलंगाना में 7.6 फ़ीसदी, राजस्थान में पांच फ़ीसदी और ओडिशा में 7.1 फ़ीसदी रही हैं."

वैसे, बेरोज़गार और उद्योगों के मुद्दे पर बीजेपी से लेकर तमाम विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस सरकार को पहले से ही कटघरे में खड़ा करते रहे हैं.

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Image caption तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और पश्चिम बंगाल पार्था चटर्जी

बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, "करोड़ों रुपए ख़र्च कर हर साल निवेशक सम्मेलन करने के बावजूद राज्य में एक भी नया उद्योग नहीं लगा है."

सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती समेत कई नेताओं ने सरकार से उद्योगों की स्थापना पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग उठा चुके हैं. चक्रवर्ती कहते हैं, "सरकार रोज़गार और उद्योगों के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रही है."

उनका सवाल है कि अगर सरकारी दावों के मुताबिक़ राज्य में हर साल रोज़गार के लाखों नए अवसर पैदा हो रहे हैं तो लाखों युवा हर साल बंगाल छोड़ कर दूसरे राज्यों में क्यों जा रहे हैं ?

कांग्रेस नेता अधीर चौधरी भी सरकार से रोज़गार के आंकड़ों में हेरा-फेरी करने का आरोप लगाते हैं. वह कहते हैं कि सरकारी दावा हक़ीक़त के ठीक उलट है.

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