छात्राओं की मांग के आगे क्यों झुक गया बीएचयू प्रशासन

  • 16 सितंबर 2019
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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में छेड़छाड़ के आरोपों का सामना कर रहे प्रोफ़ेसर की बर्ख़ास्तगी की मांग को लेकर दो दिन तक धरने पर बैठी छात्राओं का धरना इस आश्वासन के बाद ख़त्म हो गया कि प्रोफ़ेसर के ख़िलाफ़ आरोपों की जाँच की समीक्षा की जाएगी, लेकिन सवाल उठता है कि क्या वजह रही जो विश्वविद्यालय प्रशासन छात्राओं की मांग के आगे इतनी जल्दी झुक गया?

कुलपति के साथ छात्रों की वार्ता के बाद जंतुविज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर एसके चौबे के ख़िलाफ़ शिकायतों की जाँच की समीक्षा का छात्रों को आश्वासन दिया गया लेकिन छात्रों की मुख्य मांग यानी प्रोफ़ेसर की बर्ख़ास्तगी की मांग को नकार दिया गया है. हालांकि इस दौरान प्रोफ़ेसर एसके चौबे लंबी छुट्टी पर रहेंगे और विश्वविद्यालय में नहीं आएंगे.

विश्वविद्यालय प्रशासन छात्राओं की मांग के आगे क्यों झुक गया, इस सवाल के जवाब में बीएचयू के जनसंपर्क अधिकारी डॉक्टर राजेश सिंह कहते हैं, "झुकने का कोई मतलब नहीं है. दरअसल, अभी तक छात्राओं ने ऐसी कोई शिकायत ही नहीं की थी. कार्यकारिणी परिषद के फ़ैसले के बाद प्रोफ़ेसर चौबे के ख़िलाफ़ वैसे भी कड़ी कार्रवाई की गई थी लेकिन उस फ़ैसले से किसी ने आपत्ति नहीं जताई थी. अब, जबकि छात्राएं धरने पर बैठ गईं, वीसी को ये बात पता चली तो उन्होंने ख़ुद ही छात्राओं को बुलाकर वार्ता की."

हालांकि दो दिन तक धरने पर बैठी छात्राएं लगातार कुलपति या किसी ज़िम्मेदार अधिकारी को बुलाने की मांग कर रही थीं लेकिन पीआरओ राजेश सिंह कहते हैं कि धरने की जानकारी कुलपति को नहीं थी. वहीं धरने पर बैठी छात्राओं का कहना है कि उन लोगों ने धरना फ़िलहाल समाप्त भले ही कर दिया है लेकिन यदि एक महीने के भीतर उनकी मांग पर विश्वविद्यालय प्रशासन ग़ौर नहीं करता है तो और बड़ा आंदोलन होगा.

क्या थी लड़कियों की मुख्य मांग

धरने में शामिल आकांक्षा राजनीति शास्त्र में एमए कर रही हैं. वो कहती हैं, "हमारी मुख्य मांग तो यही थी कि इतने गंभीर आरोप जिस प्रोफ़ेसर पर लगे हों, उन्हें बर्ख़ास्त किया जाए. हमारी कुछ और भी मांगें थीं जो नहीं मानी गई हैं. लेकिन प्रोफ़ेसर चौबे को निलंबित करना और उनके ख़िलाफ़ फिर से जाँच कराए जाने का आश्वासन दिए जाने से हम लोगों ने धरना ख़त्म कर दिया. अब देखना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन अपने वादे पर कितना खरा उतरता है. हालांकि इसकी उम्मीद कम ही दिख रही है क्योंकि अब तक का उसका रिकॉर्ड ऐसा ही रहा है."

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पिछले साल अक्तूबर में बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग के छात्रों का एक शैक्षणिक टूर भुवनेश्वर गया था. वहां से लौटने के बाद कुछ छात्राओं ने प्रोफ़ेसर चौबे पर अश्लील टिप्पणी करने का आरोप लगाते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से इसकी शिकायत की. उस वक़्त भी विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें निलंबित कर दिया था, आंतरिक शिकायत समिति यानी आईसीसी से जाँच के आदेश दे दिए और जाँच चलने तक बाहर जाने पर रोक लगा दी गई.

जाँच समिति ने प्रोफ़ेसर चौबे पर लगे आरोपों को सही पाया और जून 2019 को हुई कार्यपरिषद की बैठक में कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर प्रोफ़ेसर चौबे को सेंसर कर दिया गया. पीआरओ राजेश सिंह बताते हैं, "सेंसर करने का मतलब वो पढ़ाने के सिवाए विश्वविद्यालय की किसी गतिविधि में न तो शामिल हो सकते थे और न ही किसी ज़िम्मेदारी वाले पद पर नियुक्त हो सकते थे. यही नहीं, वो कहीं बाहर भी किसी पद के लिए आवेदन नहीं कर सकते थे."

लेकिन छात्रों और छात्राओं को प्रोफ़ेसर चौबे का विश्वविद्यालय में आकर पढ़ाना भी क़त्तई मंज़ूर नहीं था. यही वजह है कि उनके परिसर में आते ही छात्राएं उद्वेलित हो गईं और उन्हें धरने पर बैठना पड़ा. धरने में शामिल एक छात्रा का कहना था, "पीआरओ ग़लत कह रहे हैं कि छात्राओं ने इसकी शिकायत नहीं की थी, बल्कि सच्चाई ये है कि शिकायत कहीं सुनी नहीं गई. यदि हमारी माँग मान ली गई होती तो हम धरने पर क्यों बैठते?"

धरने में शामिल एक छात्र विवेक कहते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस बात से डर गया कि कहीं साल 2017 वाली स्थिति न आ जाए. उनके मुताबिक़, "धरने के पहले दिन तो प्रशासन ने बहुत ध्यान नहीं दिया, रात भर धरना चलने के बावजूद. अगले दिन रविवार था और दिन में भीड़ थोड़ी कम हो गई, लेकिन शाम को जब एकाएक छात्र-छात्राओं की भीड़ बढ़ने लगी और लगा कि अब ये आंदोलन गति पकड़ रहा है तो विश्वविद्यालय प्रशासन को दो साल पहले वाली स्थिति की आशंका दिखने लगी. इसीलिए आनन-फ़ानन में छात्रों को बुलाकर उन्होंने समझौते की बात की."

दो साल पहले यानी सितंबर 2017 में बीएचयू परिसर में छात्राओं के साथ छेड़ख़ानी, अभद्रता जैसी तमाम शिकायतों को लेकर छात्राएं धरने पर बैठ गई थीं. उसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वाराणसी आए थे लेकिन उस रास्ते से गुज़रने के बावजूद उन्होंने छात्राओं से कोई बात नहीं की जिसके विरोध में आंदोलन काफ़ी तेज़ हो गया. बाद में विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्राओं की सुरक्षा के संबंध में कई फ़ैसले और सुधार करने पड़े.

मोदी के जन्मदिन से कनेक्शन

इस बार भी ऐसा कहा जा रहा था कि 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने जन्मदिन पर वाराणसी आने वाले हैं. हालांकि उनके इस कार्यक्रम का कोई प्रोटोकॉल नहीं था लेकिन इसकी संभावना जताई जा रही थी. पत्रकार अनुराग तिवारी कहते हैं, "नरेंद्र मोदी न भी आते तो भी उनके जन्म दिन पर वाराणसी में तमाम कार्यक्रम होने हैं. यदि धरना ज़ोर पकड़ लेता तो सारी मीडिया कवरेज उसे मिलती. ज़ाहिर है, ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने काफ़ी असहज स्थिति हो सकती थी."

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बीएचयू के पीआरओ राजेश सिंह कहते हैं कि जिस विभाग की छात्राओं का ये मामला है, उस विभाग से एक दो को छोड़कर और कोई प्रदर्शन में शामिल नहीं था. उनके मुताबिक़, "धरने में अन्य विभागों के छात्र-छात्राओं के अलावा कुछ बाहरी लोग भी शामिल थे जो जबरन इस मुद्दे का राजनीतिकरण करना चाह रहे थे."

बताया जा रहा है कि इसी वजह से धरने को जल्द से जल्द समाप्त करने की विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोशिश भी की क्योंकि अगले दिन सोमवार था और विश्वविद्यालय खुलने के बाद स्थिति और बिगड़ सकती थी. वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार गिरीश दुबे कहते हैं, "यहां इस बात की भी चर्चा काफ़ी ज़ोर पकड़ रही थी कि कन्हैया कुमार और एसएफ़आई, आइसा जैसे संगठनों के भी तमाम छात्र सोमवार को बीएचयू पहुंच रहे हैं. प्रशासन ये स्थिति उत्पन्न नहीं होने देना चाहता था इसलिए उसकी कोशिश थी कि कैसे भी हो धरना ख़त्म कराओ."

इस मामले में जंतुविज्ञान विभाग के जिन प्रोफ़ेसर एसके चौबे पर आरोप लगे हैं उनसे बात करने की काफ़ी कोशिश की गई लेकिन उन्होंने बात नहीं की. वहीं कुछ लोगों का ये भी कहना है कि आख़िर में निर्णय एक बार फिर वही होगा जो पहले हो चुका है क्योंकि प्रोफ़ेसर एसके चौबे को बर्ख़ास्त करना इतना आसान नहीं है. शैक्षणिक टूर में शामिल एक छात्र ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "हम लोगों की जानकारी में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जो आपत्तिजनक हो, सिर्फ़ इसके कि छात्र-छात्राओं के साथ प्रोफ़ेसर चौबे भी समुद्र में नहा रहे थे और ये तस्वीर सोशल मीडिया में पोस्ट कर दी गई थी."

लेकिन सवाल ये भी है कि यदि ऐसा कुछ नहीं हुआ था तो कुछ छात्राओं की शिकायत पर वहां गए सभी छात्र-छात्राओं ने अपनी सहमति कैसे दी. बहरहाल, अब ये मुद्दा एक बार फिर विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी परिषद में जाएगा और उसके बाद ही प्रोफ़ेसर चौबे का भविष्य और बीएचयू परिसर की 'शांति व्यवस्था' तय हो सकेगी.

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