रूसी करंजिया को नेहरू की डांट और मोरारजी देसाई से चिढ़

  • 18 सितंबर 2019
भारत में निडर और बेबाक पत्रकारिता की शुरुआत रूसी करंजिया ने की थी इमेज कॉपीरइट KARANJIA FAMILY

भारत में खोजी पत्रकारिता का जो रूप हम आज देखते हैं उसकी नींव रूसी करंजिया ने आज से कई दशक पहले रखी थी. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में काम करते हुए एक बार उन्होंने एक ज़बरदस्त स्कूप किया था.

वो महाराजाओं जैसे कपड़े पहन कर मुंबई के ताज होटल में होने वाली 'इंडियन चेम्बर ऑफ़ प्रिंसेज़' की गुप्त बैठक में शामिल हो गए और उसका पूरा ब्यौरा अपने अख़बार में छापा.

इस ख़बर के लिए उन्हें 100 रुपए मिले थे जो उस ज़माने में एक बड़ी रक़म हुआ करती थी. बाद में उन्होंने अपने इस अनुभव पर एक किताब भी लिखी थी 'थिएटर ऑफ़ द एबसर्ड.'

करंजिया ने फ़़रवरी 1941 में एक 'टैबलॉएड' की शुरुआत की थी और ब्रिटेन पर जर्मनी के हवाई हमले 'ब्लिट्ज़क्रीग' के नाम पर उसका नाम ब्लिट्ज़ रखा था. ब्लिट्ज़ का आदर्श वाक्य था 'फ़्री', 'फ़्रैंक' और 'फ़ियरलेस' और करंजिया के नेतृत्व में इन मूल्यों को जीवित रखना ही ब्लिट्ज़ अख़बार की पहचान बन गई थी.

मशहूर पत्रकार और राष्ट्रमंडल पत्रकार संघ के अध्यक्ष महेंद्र वेद को वो दिन अभी तक याद है जब रूसी करंजिया ने उन्हें अपने अख़बार ब्लिट्ज़ में लिखने का मौक़ा दिया था.

महेंद्र वेद बताते हैं, "हमारी उनसे पहली मुलाक़ात तब हुई जब हम छात्र हुआ करते थे. मैं साठ के दशक के बीच की बात कर रहा हूँ. वो एक तरह से हमारे हीरो थे. वो बहुत बड़ा अख़बार चलाते थे जो बहुत लोकप्रिय था. हमने एक अख़बार निकाला था और हम उनकी पहली प्रति उन्हें भेंट करने गए थे. उसके बाद हमने एक छोटी सी स्टोरी लिखी थी. जब हमने उसे उन्हें दिया तो उन्होंने कहा कि अगले हफ़्ते आ जाओ. अगले हफ़्ते उन्होंने वो स्टोरी एक 'बॉक्स आइटम' के तौर पर पेज तीन पर छाप दी और पैसे भी दिए. वो पैसे एक तरह से पत्रकार के रूप में मेरी पहली कमाई थी. हाँलाकि उन दिनों 30 रुपए बड़ी रक़म मानी जाती थी लेकिन हमें ख़ुशी थी कि हमारी स्टोरी ब्लिट्ज़ में छपी और उन्होंने अपने हाथ से मुझे पैसे दिए."

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बेबाकी और निडरता में कोई सानी नहीं था रूसी करंजिया का

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में नौकरी लगी

15 फ़रवरी, 1912 को क्वेटा में जन्मे रूसी करंजिया के पिता आँखों के सर्जन थे, जिन्होंने एडिनबरा में ट्रेनिंग ली थी. उनकी माँ क्वेटा के एक अमीर परिवार से आती थीं. उनका मुंबई के चौपाटी बीच के सामने एक घर हुआ करता था जिसका नाम था 'क्वेटा टैरेस.'

मशहूर लेखक ज्ञान प्रकाश ने अपनी किताब 'मुंबई फ़ेबिल्स' में करंजिया का बेहतरीन चित्रण खींचा है, "बंबई के सेंट ज़ेवियर स्कूल और विल्सन कॉलेज में पढ़ने के बाद करंजिया पढ़ने के लिए केंब्रिज विश्वविद्यालय जाना चाह रहे थे ताकि वो बाद में आईसीएस की परीक्षा के लिए बैठ सकें. लेकिन तभी एक मासूम शरारत ने उनकी ज़िदगी की दिशा बदल दी. उन्होंने अपना नाम बदल कर टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 'लैटर्स टू एडिटर' कॉलम के लिए कई पत्र लिखे. जब अख़बार से उप संपादक आइवर जेहू को उनकी असली पहचान का पता चला तो उन्होंने करंजिया को टाइम्स ऑफ़ इंडिया में नौकरी देने का प्रस्ताव कर दिया जिसे करंजिया ने स्वीकार कर लिया. उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने उन्हें ईवनिंग स्टैन्डर्ड अख़बार के साथ ट्रेनिंग के लिए लंदन भेज दिया. लेकिन उस गंभीर अख़बार की ट्रेनिंग उन्हें रास नहीं आई और उन्होंने मसालेदार टेबलाएड डेली मिरर के साथ काम करना शुरू कर दिया."

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Image caption महात्मा गांधी के साथ रूसी करंजिया

गांधी की आलोचना

कुछ दिनों बाद करंजिया भारत वापस आ गए. उन्होंने महात्मा गाँधी के वर्धा आश्रम में जा कर उनके बारे में एक आलोचनात्मक रिपोर्ट छापी थी.

एक इंटरव्यू में करंजिया ने बताया था, "मैंने गाँधी के बारे में एक बहुत गंदा लेख लिखा. मेरी बैप्स तलयार ख़ाँ के साथ दोस्ती थी. उन्होंने एक बार मुझे खाने पर बुलाया. वहाँ पहली बार मेरा सामना जवाहरलाल नेहरू से हुआ. उन्होंने नेहरू से कहा कि कल मैंने गांधी पर जो लेख आपको दिखाया था, ये साहब उसके लेखक हैं. नेहरू ने मुझे ऐसा लेक्चर दिया कि मैंने अगले ही दिन गाँधी को पत्र लिख कर उनसे माफ़ी माँगी. इतना ही नहीं इस लेख से मुझे जो 250 रुपए मिले थे, वो भी मैंने महात्मा गांधी के हरिजन फ़ंड में दान कर दिए."

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ब्लिट्ज़ की सफलता का राज़

यहीं से करंजिया पहली बार नेहरू के संपर्क में आए और आजीवन उनके मुरीद रहे. लेकिन उसके बावजूद टाइम्स ऑफ़ इंडिया के प्रबंधन ने उनके स्थान पर फ़्रैंक मोरेस को संपादक पद के लिए 'ग्रूम' करना शुरू कर दिया.

उन्होंने टाइम्स की नौकरी छोड़ कुछ दिनों के लिए पहले संडे स्टैंडर्ड और फिर मॉर्निंग स्टैंडर्ड का संपादन किया. फिर 1941 में उन्होंने अपना अख़बार शुरू किया ब्लिट्ज़.

इसकी शुरुआत हुई थी मुंबई के सज वर्तमान प्रेस से सिर्फ़ 3000 रुपय़ों के साथ. वरिष्ठ पत्रकार और करंजिया के साथ काम कर चुके आनंद के सहाय बताते हैं, "एक तो उस समय इतने अख़बार नहीं थे. साप्ताहिक ब्लिट्ज़ तीन भाषाओं में निकलता था, अंग्रेज़ी में, हिंदी में और उर्दू में. जो सबसे जलते हुए सवाल थे उसके बारे में वो बिना किसी डर और झिझक के साफ़ शब्दों में बात करते थे, इस तरह से कि वो जनता के दिल को छू जाए. ब्लिट्ज़ का आख़िरी पेज भी बहुत मशहूर था. ब्रिटिश टेबलॉएड की तरह उस पर एक औरत की तस्वीर होती थी लेकिन साथ-साथ उसी पेज पर ख़्वाजा अहमद अब्बास का कॉलम छपा करता था."

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रंगीन और ख़ुशमिजाज़ शख़्स

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्लिट्ज़ का दफ़्तर भूमिगत हो गए कांग्रेस के वामपंथियों की पनाहगाह बन गया था.

तब अख़बार ने अपने लंदन संवाददाता रफ़ीक ज़कारिया के ज़रिए नेहरू की रिहाई के लिए मुहिम चलाई. जब जेल में रह रहे नेहरू के ब्लिट्ज़ के अंक नहीं पढ़ने दिए गए तो करंजिया ने ये मामला लॉर्ड सोरेंसन के ज़रिए हाउज़ ऑफ़ कॉमंस में उठवाया.

25 सालों के अंदर ब्लिट्ज़ के पाठकों की संख्या बढ़ कर दस लाख के क़रीब हो गई. आर के करंजिया का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक था. उनका बातचीत करने का सलीका तो बेहतरीन था ही, उनकी राजनीति की समझ भी बहुत पैनी थी.

महेंद्र वेद बताते हैं, "वो बहुत रंगीन और अच्छे 'मैनर्स' वाले इंसान थे. वो पारसी समुदाय के पुरानी पीढ़ी के लोगों की तरह थे जिनका अंग्रेज़ी अंदाज़ हुआ करता था. वो अच्छे-अच्छे कपड़े पहनते थे. लोगों से बहुत मिलते जुलते थे और उन्हें साथ ले कर चलते थे. उनका एक समाजवादी अंदाज़ भी था. जब आप उनके दफ़्तर में जाएं तो वहाँ लिखा रहता था, 'यू हैव टू बी क्रेज़ी टू वर्क हियर बट इट पेज़.' उनके दफ़्तर में जो माहौल रहता था वो अख़बार के दूसरे दफ़्तरों से अलग रहता था."

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नानावटी केस की रिपोर्टिंग

ब्लिट्ज़ अख़बार ने जिस तरह नानावटी मर्डर केस की रिपोर्टिंग की, उसने उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचा दिया. आजकल आमतौर से अपराधी का मीडिया ट्रायल किया जाता है, लेकिन तब ब्लिट्ज़ ने पीड़ित का मीडिया ट्रायल कर एक नई मिसाल कायम की थी.

जामिया मिलिया इस्लामिया के एक क़िदवई मीडिया रिसर्च सेंटर में प्रोफ़ेसर सबीना गडियोक बताती हैं, "टेलिविजन से पहले के युग में नानावटी केस एक बहुत बड़ा मीडिया इवेंट था. ब्लिट्ज़ ने इस घटना को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया. एक घटना से दूसरी घटना जुड़ती चली गई. कई जगह ब्लिट्ज़ ने घटनाएं पैदा कीं जिनका पत्रिकाओं, दूसरे अख़बारों और फ़िल्मों में भी ज़िक्र हुआ. इसका असर ये हुआ कि नानावटी रिवॉल्वर बिकने लगे, अहूजा तौलिए बेचे जा रहे थे. जब नानावटी अदालत में जाते थे तो लड़कियाँ उनके ऊपर गुलाब के फूल फेंकती थीं, क्योंकि वो बहुत 'डैशिंग' और 'हैंडसम' शख़्स थे. इस तरह पहली बार एक स्कैंडल को राष्ट्रीय महत्व मिल गया था. इस समय राजनीतिक घटनाएं भी हो रही थीं. पाकिस्तान के साथ लड़ाई की बातें शुरू हो गई थीं. चीन के साथ भारत के संबंध ख़राब हो चले थे. राज्यों का पुनर्गठन हो चुका था और केरल में पहली कम्यूनिस्ट सरकार बर्ख़ास्त कर दी गई थी. लेकिन इसके बावजूद नानावटी केस पर पूरे भारत का ध्यान लगा हुआ था जिसका वाहिद कारण था ब्लिट्ज़ की रिपोर्टिंग."

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Image caption अपनी बेटी रीता मेहता और ईरान के शाह के साथ रूसी करंजिया

सात सितारा होटल के मालिक जैसी छवि

आर के करंजिया आम संपादकों से हर मामले में भिन्न थे. आउटलुक के संपादक रहे विनोद मेहता ने करंजिया पर 'मोर दैन अ मैवरिक' के शीर्षक से लिखा था, "वो 70 के दशक के संपादकों की तरह बिल्कुल नहीं थे. खुशवंत सिंह, गिरिलाल जैन, शामलाल और मुलगाँवकर - इन सभी संपादकों की एक ख़ास छवि होती थी. बेतरतीब, अव्यवस्थित, थोड़े ज़्यादा ही वयस्त और थोड़े किताबी. इन सबके विपरीत रूसी करंजिया किसी सात सितारा होटल के मालिक दिखते थे. उनकी बड़ी मूछें होती थी और वो स्टाइलिश सफ़ारी और लाउंड सूट पहना करते थे. उनके जूते भी बहुत फ़ैशनेबिल होते थे. एक बार मैंने उनको लिफ़्ट के पास अपनी गर्लफ़्रेंड का चुंबन लेते हुए देख लिया. वो ज़रा भी शर्मिंदा नहीं थे. बल्कि उन्होंने मेरी आँखों में अपनी आँखें डालीं और आँख मार दी."

गप्पें मारने के शौकीन

विनोद मेहता आगे लिखते हैं, "करंजिया से मुलाक़ात का मतलब होता था, ताज़ा नारियल पानी पीना और विदेशी मामलों का पाठ पढ़ना. उनकी मेज़ पर सुकार्णों, नासिर, नेहरू और टीटो की तस्वीरें रखी रहती थीं और वो हर एक के बारे में मज़ेदार क़िस्से सुनाया करते थे. गप्पें मारने का उन्हें बेहद शौक था. सुकार्णों की आशिक़ी के बारे में तो वो पूरी किताब लिख सकते थे. उनके कमरे से बाहर आते समय मुझे अकसर मशहूर लेखक ख़्वाजा अहमद अब्बास मिल जाया करते थे. वो या तो अपने कॉलम 'लास्ट पेज' की कॉपी देने आए होते थे या अपनी तन्ख़्वाह लेने. करंजिया अपने 'फ़्रीलासरों' को प्रति कॉलम पैसे नहीं देते थे, बल्कि हर महीने के अंत में तन्ख़्वाह की तरह उनका भुगतान करते थे. अब्बास को वो हर महीने 5 रुपए के करारे नोटों की 500 रुपयों की गड्डी देते थे."

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Image caption मोरारजी देसाई

मोरारजी देसाई के पीछे पड़े

करंजिया की नज़र में कुछ राजनेता उनके 'फ़ेवरेट' होते थे तो कुछ को वो बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे. मोरारजी देसाई उन में से एक थे.

ज्ञान प्रकाश अपनी किताब 'मुंबई फ़ेबिल्स' में लिखते हैं, "मोरारजी देसाई उन बदक़िस्मत राजनीतिज्ञों में थे जिनके पीछे ब्लिट्ज़ हाथ धो कर पड़ गया था, देसाई 1952 में बंबई के मुख्यमंत्री थे, जो 1977 में भारत के प्रधानमंत्री भी बने. ब्लिट्ज़ ने उनकी ईमानदारी और नैतिक खरेपन का जम कर मज़ाक उड़ाया. शराबबंदी पर उनके आदेश का मखौल उड़ाते हुए करंजिया ने अवैध शराब को 'मोरारजीना' और 'मोरारजूस' कहना शुरू कर दिया. ब्लिट्ज़ की नज़र में मोरारजी देसाई का सबसे बड़ा दोष ये था कि वो ऊपरी तौर पर तो नेहरू के प्रति वफ़ादारी दिखा रहे थे, लेकिन साथ ही उनकी जगह पर प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी रखते थे."

मोरारजी देसाई भी करते थे करंजिया को नापसंद

मोराजी देसाई भी ब्लिट्ज़ को उतनी ही हिकारत की नज़र से देखते थे जितनी करंजिया उनको.

महेंद्र वेद एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हैं, "मैं जब उनसे मिलने गया और उन्हें बताया गया कि मैं करंजिया के अख़बार 'द डेली' में काम करता हूँ तो तुरंत उनका चेहरा बदल गया. उन्होंने फ़ौरन पूछा वो करंजिया वाला 'डेली'? मैंने बहुत अदब से हाथ जोड़ कर कहा 'हाँ,' लेकिन उन्हें मेरी उपस्थिति ही पसंद नहीं आई. थोड़ी देर के बाद वो करंजिया साहब के ख़िलाफ़ बोलने लगे. उन्होंने कहा उसने हमेशा मेरे ख़िलाफ़ लिखा है. करंजिया जब मुझसे मिलते थे तो मुझे 'बापू' कहते थे. मैं उनसे कहता भी था कि मुझे बापू मत कहो क्योंकि तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई इज़्ज़त नहीं है. जब मैं उठने लगा तो उन्होंने मुझसे कहा तुम्हें कोई ईमानदार संपादक नहीं मिला काम करने के लिए? मैंने मोरारजी भाई से कहा कि आप उस संपादक की तरफ़ इशारा कर दीजिए, मैं उसके पास चला जाऊंगा."

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Image caption राजीव गांधी

राजीव गांधी के मुरीद

इंदिरा गाँधी से करंजिया की 'लव-हेट' रिलेशनशिप रही. लेकिन राजीव गांधी को वो बेहद पसंद करते थे और उनके लिए उनके मन में बेहद स्नेह था.

आनंद सहाय बताते हैं, "राजीव गांधी के साथ उनके बहुत अच्छे ताल्लुक़ात थे. मैं ज़रूर कभी-कभी अपने लेखों में राजीव गाँधी की आलोचना किया करता था. इस पर उन्होंने एक दो बार अपनी नाख़ुशी ज़ाहिर की. वो कहते थे तुम इतने अच्छे लीडर को अपने लेखों से परेशान करने की कोशिश कर रहे हो. इस पर मैं उनसे भिड़ जाता था. करंजिया में ये बहुत अच्छी बात थी. एक अदना सा रिपोर्टर अदब से ही सही लेकिन उन जैसे संपादक को खरी खोटी सुना सकता था."

बड़े नेताओं का इंटरव्यू करने का शौक

करंजिया ने दुनिया के हर बड़े नेता का चाहे वो फिदेल कास्त्रो हों, जमाल अब्दुल नासिर हों या फिर मार्शल टीटो हों, सब का इंटरव्यू लिया.

नासिर तो उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान 'रिपब्लिकन ऑर्डर ऑफ़ द मेरिट' उन्हें दे डाला.

मशहूर पत्रकार वीर सांघवी ने अपने एक लेख में आर के करंजिया का बहुत सटीक आकलन किया है. साँघवी लिखते हैं, "आज़ादी के समय भारतीय प्रेस पर ब्रिटिश कंपनियों और जूट मालिकों का क़ब्ज़ा था. जवाहरलाल नेहरू उन्हें 'झूठ प्रेस' कहा करते थे. तब ब्लिट्ज़ ने भारत की वैकल्पिक तस्वीर पेश की. रूसी करंजिया सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेज़ी बोलते थे. हाँलाकि मुझे शक है कि वो गुजराती के भी एक दो शब्द जानते थे. करंजिया ने ब्लिट्ज़ को नेहरू के विकास मॉडल से जोड़ा. आज के संदर्भ में आप उसे कांग्रेस समर्थक कह सकते हैं, लेकिन 50 और 60 के दशक में भारतीय राजनीति आज से कहीं ज़्यादा जटिल थी."

वीर सांघवी आगे लिखते हैं, "रूसी करंजिया की नज़र में कांग्रेस पार्टी एक निष्क्रिय और भ्रष्ट पार्टी थी जिसमें प्रतिक्रियावादी तत्वों की भरमार थी. लेकिन उनकी नज़र में नेहरू इससे अछूते थे. उस ज़माने में जब भारतीय अख़बारों में सरकार की जारी प्रेस रिलीज़ छपा करती थी, रूसी करंजिया दुनिया के बड़े-बड़े नेताओं का इंटरव्यू करते थे और वो भी बराबरी के स्तर पर. उनका आत्मविश्वास इतना ग़ज़ब का होता था कि विश्व नेताओं के साथ उनकी तस्वीर देख कर कोई बता नहीं सकता था कि इंटरव्यू देने वाला कौन है और इंटरव्यू लेने वाला कौन."

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पाकिस्तान के एटॉर्नी जनरल से पंगा

विवादों को हवा देना, चुटीली हेडलाइंस लगाना और बेबाकी करंजिया की शख़्सियत की ख़ास बात थी. वो अपने साथ काम करने वाले पत्रकारों से भी इसी बेबाकी की उम्मीद रखते थे. और उनके मुश्किल में आने पर कभी उनका साथ नहीं छोड़ते थे.

महेंद्र वेद एक क़िस्सा सुनाते हैं, "उस ज़माने में जब पाकिस्तान के पूर्व एटॉर्नी जनरल ए के ब्रोही दिल्ली आए थे तो हमने उनका इंटरव्यू लिया था. मेरे साथ इंटरव्यू लेने एक दूसरे अख़बार के प्रतिनिधि भी गए थे. ब्रोही साहब ने कुछ ऐसी बातें कहीं जिससे उस समय के ज़िया उल हक़ प्रशासन को बहुत शर्मिंदगी हुई. उन्होंने अपनी सफ़ाई में पाकिस्तान के उच्चायोग से कहा कि उन्होंने ये इंटरव्यू दिया ही नहीं था. हमने वो इंटरव्यू छापा और ये भी कहा कि अमरोही ने ये बातें वास्तव में कही थीं. करंजिया साहब उन दिनों दिल्ली आए हुए थे. उनको जब ये पता चला तो उन्होंने कहा तुम कल मेरे होटल आ जाओ. वहीं हम लोग मॉर्निंग वॉक करेंगे और साथ नाश्ता करेंगे."

महेंद्र वेद कहते हैं, "वो अशोका होटल में ठहरे हुए थे. जब मैं उनसे मिला तो उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अख़बार में स्पष्टीकरण छापूँ. और लिखने से पहले उन्हें फ़ोन पर उसे पढ़ कर सुना दूँ. मैं दफ़्तर गया और जैसे करंजिया साहब ख़ुद लिखते हैं, मैंने लिखा, मिस्टर ब्रोही आप और मैं इस होटल में इस कमरा नंबर में इतने बजे मिले थे. मिले थे कि नहीं बताइए? उन्होंने ये सुन कर कहा कि अगर तुम बुरा न मानो तो क्या मैं इसे अपने संपादकीय में इस्तेमाल कर सकता हूँ? मैंने कहा ज़रूर करिए. मेरे जैसे रिपोर्टर के लिए ये बहुत फ़क्र की बात थी कि मेरी लिखी हुई चीज़ को मेरा संपादक अपने संपादकीय में जगह दे रहा है. वो चीज़ दूसरे दिन करंजिया 'फ़्रंट पेज' एडिटोरियल के तौर पर छापी. करंजिया साहब पुराने तरह के संपादक थे जो आपके समर्थन में खड़े हो जाते थे."

करंजिया का ग़ुस्सा

मैंने आनंद सहाय से पूछा कि अपने मातहत पत्रकारों के साथ करंजिया का व्यवहार कैसा होता था.

सहाय का जवाब था "बहुत अच्छा. कभी-कभी उनको ग़ुस्सा आ जाता था. एक बार वो मुझे फ़ोन पर कुछ कहने लगे. मुझे उनकी भाषा पसंद नही आई. मैंने भी उनसे कहा कि अगर आप अपनी भाषा नहीं बदलेंगे तो मैं भी आपसे उसी लहजे में बात करूंगा सबके सामने. उस समय चुप हो गए. लेकिन जब यहाँ आए तो बोले तुम बिल्कुल बच्चों और नादानों की तरह बात कर रहे थे. मैं तुम्हें थोड़े फटकार लगा रहा था. मेरा इशारा दूसरों की तरफ़ था. एक बार मुझे इस बात बात पर तैश आ गया कि बंबई के एक लड़के ने कहा कि उसकी तनख़्वाह काट ली गई है. मैंने रूसी को लिखा कि मुझे ये सुन कर बहुत तकलीफ़ पहुंची है. अगर ऑफ़िस उस के साथ न्याय नहीं कर पा रहा है तो आप मेरी तन्ख़्वाह से पैसे काट कर उसे दे दीजिए."

उनके मुताबिक़, "वो बहुत नाराज़ हुए मुझसे. उन्होंने कहा तुमने अपने आप को समझ क्या रखा है? तुम्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि उसने किया क्या है. मैं चुप हो गया. रूसी में एक बड़ी बात थी कि एक सड़क का भिखारी भी उनके कमरे तक पहुंच सकता था और वो ख़ुद अपने मेहमान को छोड़ने दरवाज़े तक नीचे तक आते थे."

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Image caption ज़ियाउर रहमान

बांग्लादेश जाने के लिए दिए दस हज़ार रुपए

करंजिया का अख़बार इतना लोकप्रिय था कि उन्हें विज्ञापनों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. विज्ञापन न आने की वजह से वो अपने पत्रकारों को उतना वेतन नहीं दे पाते थे जितना उन्हें दूसरे अख़बारों से मिल सकता था.

महेंद्र वेद बताते हैं, "करंजिया का 'वन मैन शो' था. वो कहा करते थे कि उनके पास पैसे नहीं हैं. लेकिन उनकी बात करने का तरीक़ा बहुत अच्छा होता था, इसलिए पैसे कम होते हुए भी हम लोग ख़ुश रहते थे. उन दिनों में बांग्लादेश में वहाँ के राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान की हत्या हो गई थी. उसके बाद जब वहाँ चुनाव हुए तो मैंने वहाँ जाना चाहा क्योंकि मैं बांगलादेश में पहले रह चुका था. लेकिन लोगों ने कहा कि 'पितामह' इन सब चीज़ों पर पैसे नहीं ख़र्च करते. ब्लिट्ज़ के लोग उन्हें पीठ पीछे 'पितामह' कहा करते थे. लेकिन अगर तुम्हारा मन है तो तुम प्रस्ताव भेज दो. मैंने प्रस्ताव भेजा और तीन घंटे के दर मेरे पास करंजिया का संदेश आया कि आपको दस हज़ार रुपए स्वीकृत किए जाते हैं. आप वहाँ ज़रूर जाइए."

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Image caption मशहूर पत्रकार और राष्ट्रमंडल पत्रकार संघ के अध्यक्ष महेंद्र वेद

जीवन के आख़िरी पड़ाव में पकड़ा बीजेपी का हाथ

अस्सी के दशक के मध्य से वक़्त बदलना शुरू हुआ और ब्लिट्ज़ की लोकप्रियता में भी कमी आनी शुरू हो गई. करंजिया भी बूढ़े हो चले.

ताउम्र समाजवाद और नेहरू के आदर्शवाद को सलाम करने वाले रूसी करंजिया ने अपने जीवन की अंतिम बेला में भारतीय जनता पार्टी का हाथ थामा.

लेकिन तब तक उनका स्वास्थ्य बहुत ख़राब हो चुका था और उनकी याददाश्त क़रीब-क़रीब जा चुकी थी. एक फ़रवरी 2008 को भारतीय पत्रकारिता के इस दिग्गज ने इस दुनिया को अलविदा कहा. इत्तेफ़ाक से ये वही दिन था जब उन्होंने 67 साल पहले ब्लिट्ज़ का पहला अंक छापा था.

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