महात्मा गांधी की जयंती पर सोनिया गांधी की मोदी सरकार को दो टूक

  • 2 अक्तूबर 2019
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महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर हमलावर तेवर अपनाते हुए कहा कि गांधी का नाम लेना आसान है लेकिन उनके रास्ते पर चलना आसान नहीं है.

कांग्रेस की पदयात्रा के समापन पर सोनिया गांधी ने कहा कि कुछ लोग देश को आरएसएस का प्रतीक बनाना चाहते हैं, लेकिन ये संभव नहीं है क्योंकि हमारे देश की नींव में गांधी के विचार हैं.

सोनिया गांधी ने दिल्ली में राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस दफ़्तर से निकल कर राजघाट पहुंची कांग्रेस की पदयात्रा के समापन पर ये बातें कहीं.

पढ़ें सोनिया गांधी ने क्या-क्या कहा?

महात्मा गांधी जी ने पूरी दुनिया को अहिंसा और सत्य का रास्ता अपनाने की प्रेरणा दी. ऐसे महामानव की स्मृति को बार बार नमन करते हैं.

आज जब हमारा देश और पूरी दुनिया महात्मा गांधी जी की 150वीं जयंती मना रही है हम सब को इस बात का गर्व है कि आज भारत जहां पहुंचा है, गांधी जी के रास्ते पर चल कर पहुंचा है.

गांधी जी का नाम लेना आसान है लेकिन उनके रास्ते पर चलना आसान नहीं है.

गांधी जी का नाम लेकर भारत को उन्हीं के रास्ते से हटकर अपनी दिशा में ले जाने की कोशिश करने वाले पहले भी कम नहीं थे लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तो साम दाम दंड भेद का खुला कारोबार करके वे अपने आपको बहुत ताक़तवर समझते हैं.

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महात्मा गांधी का जिक्र आता है तो अक्सर दो तरह की तस्वीरें जेहन में आती हैं.

इस सब के बावजूद अगर भारत नहीं घटता तो इसिलिए कि हमारे मुल्क की बुनियाद में गांधी जी के वुसूलों की आधारशिला है.

भारत और गांधी जी एक दूसरे के पर्याय हैं. यह अलग बात है कि आज कल कुछ लोगों ने इसे उल्टा करने की ज़िद पकड़ ली है.

वे चाहते हैं कि गांधी जी नहीं बल्कि आरएसएस भारत का प्रतीक बन जाएं. मैं ऐसा कहने वाले को साफ़ शब्दों में बताना चाहती हूं कि हमारे देश की मिलीजुली संस्कृति, मिलीजुली सभ्यता और मिलेजुले समाज में गांधी जी की सर्वसमावेशी व्यवस्था के अलावा कभी कुछ और सोच नहीं सकती.

गांधी सत्य के पुजारी, अहिंसा के उपासक

जो असत्य पर आधारित राजनीति कर रहे हैं वो कैसे समझेंगे कि गांधी जी सत्य के पुजारी थे.

जिन्हें अपनी सत्ता के लिए सबकुछ करना मंजूर है वो कैसे समझेंगे कि गांधी जी अहिंसा के उपासक थे.

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महात्मा गांधी को ये चिंता हमेशा सताती थी

जिन्हें लोकतंत्र में भी सारी शक्ति खुद की मुट्ठी में रखने की प्यास है वो कैसे समझेंगे कि गांधी जी के स्वराज का क्या महत्व है.

और जिन्हें मौका मिलते ही अपने को सर्वेसर्वा बताने की इच्छा हो वो कैसे समझेंगे कि गांधी जी की निस्वार्थ सेवा का मूल्य क्या होता है.

महात्मा गांधी जी चाहते थे कि भारत और उसके गांव आत्मनिर्भर हों. आज़ादी के बाद इसी रास्ते पर चल कर कांग्रेस ने क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के कदम उठाए हैं.

चाहे नेहरू जी, शास्त्री जी, इंदिरा जी, राजीव जी, नरसिम्हा राव जी या फिर डॉक्टर मनमोहन सिंह जी हों... सभी ने नए भारत के निर्माण के लिए दिन रात संघर्ष किया और तरक्की की नई मिसाल कायम की.

गांधी की आत्मा दुखी!

यही वजह है कि हमने इतनी सारी मंज़िलें तय कीं. गांधी जी के मार्ग पर चल कर कांग्रेस ने जितने नए रोज़गार के अवसर पैदा किए, जितने लोगों को ग़रीबी से मुक्ति दिलाई, हमारे अन्नदाता किसानों को जितने नए नए साधन उपलब्ध कराए, हमारी बहनों के लिए जितनी सुविधाएं मुहैया की, युवा और युवतियों को जितनी शिक्षा की सुविधाएं दीं... वो बेमिसाल हैं.

लेकिन बीते चार पांच साल में भारत की जो हालत हो गई है, मुझे लगता है कि उसे देख कर गांधी जी की आत्मा भी दुखी होती होगी.

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'जिनपर जुल्म हुआ वे ही जेल में डाली जा रहीं'

बेहद अफसोस की बात है कि आज किसान बदहाली की स्थिति में हैं, हमारे युवा बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं, उद्योग धंधे बंद हो गए हैं.

बहनें... गांव तो छोड़िए बड़े शहरों में भी सुरक्षित नहीं हैं और उन पर अत्याचार करने वाले प्रभावशाली लोग तो आराम फरमा रहे हैं और जिनपर जुल्म हुआ वे ही जेल में डाली जा रही हैं.

इन दिनों खुद को भारत का भाग्यविधाता समझने वालों से मैं विनम्रता से कहना चाहती हूं कि गांधी जी नफरत के नहीं प्रेम के प्रतीक हैं. वे तनाव के नहीं सद्भाव के प्रतीक हैं. निरंकुशता के नहीं जनतंत्र के प्रतीक हैं.

बाकी, कोई कुछ भी दिखावा करे मगर गांधी जी के सिद्धांतों पर कांग्रेस ही चली है और कांग्रेस ही चलेगी.

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महात्मा गांधी ने लंदन में तीन साल गुज़ारे थे

इसिलिए कांग्रेस के सभी बहन-भाइयों से कहती हूं कि भारत के बुनियादी मूल्यों को बचाने के लिए, हमारी संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करने के लिए, हमारे सामाजिक ताने बाने को ज़िंदा रखने के लिए लोगों की अलग-अलग पहचान की आज़ादी बनाने के लिए हम सभी को एक एक दिन गांधी जी की तरह गली गली, गांव गांव जाना है, तब जाकर भारत बनेगा.

आज हमें भारत की बुनियादी अस्मिता को, प्राचीन गरिमा को, सांस्कृतिक परंपराओं को, विविधता के मूल्यों को और आपसी सौहार्द को बचाने के लिए हर कीमत चुकाने का संकल्प लेकर यहां से जाना है.

यह संघर्ष कितना ही लंबा हो, कितना ही कठिन हो, हम इस रास्ते पर तब तक चलेंगे जब तक कामयाब नहीं हो जाते. मैं विश्वास दिलाती हूं कि अगर संकल्प मजबूत हो तो मंज़िल कभी दूर नहीं होती है.

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