भारतीय नेताओं को क्यों रुलाता रहता है प्याज़?

  • 6 अक्तूबर 2019
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भारत में प्याज़ के दाम एक बार आसमान छू रहे हैं. उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में तो इसकी क़ीमत 80 रुपये किलोग्राम तक पहुंच गई है. अभी कुछ महीनों पहले ही इसका दाम महज़ 25 रुपये किलो था.

भारत में बहुत से लोगों के लिए प्याज़ के मौजूदा दाम बहुत ज़्यादा हैं. इसलिए विरोध की आशंका को भांपते हुए सरकार ने यह सोचकर प्याज़ के निर्यात पर रोक लगा दी है कि इससे घरेलू बाज़ार में सप्लाई बढ़ेगी और दाम में कमी आएगी.

सरकार का यह कदम किसानों और निर्यातकों को रास नहीं आया. उन्होंने महाराष्ट्र के नाशिक में थोक बाज़ार में प्रदर्शन किया.

भारत में सबसे ज़्यादा प्याज़ की पैदावार नाशिक में ही होती है.

महाराष्ट्र में अगले कुछ हफ़्तों में चुनाव होने वाले हैं और ऐसे में प्याज़ के दामों पर होने वाली बहस के तेज़ होने की आशंका है.

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब प्याज़ की क़ीमतों पर भारत में बहस हो रही है. तीख़े स्वाद वाली यह सब्ज़ी कई बार भारतीय राजनीति में होने का केंद्र बन जाती है.

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राजनीतिक सब्ज़ी?

अतीत में भी प्याज़ के दाम चुनावों को प्रभावित करने के लिए जाने जाते हैं.

वर्ष 1980 में भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दोबारा सत्ता दिलाने में प्याज़ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उस वक़्त इंदिरा गांधी ने प्याज़ की बढ़ी हुई क़ीमतों को तत्कालीन सरकार की नाकामी के तौर पर पेश किया था.

1980 में जनता दल गठबंधन टूटने के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी को जीत मिली थी.

1998 में केंद्र में सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी नुक़सान हुआ था और इसकी वजह प्याज़ की बढ़ी हुई क़ीमतों को बताया गया. तब कांग्रेस की शीला दीक्षित ने बीजेपी की सुषमा स्वराज को मात दी थी.

इसके बाद के वर्षों में भी प्याज़ राजनीतिक सुर्खियों में छाया रहा. फिर चाहे इसके दाम नाटकीय रूप से घटे हों या बढ़ें हों.

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जब शरद पवार पर फेंका गया प्याज़

साल 2006 में तत्कालीन कृषि मंत्री और महाराष्ट्र के मशहूर नेता शरद पवार को उस वक़्त किसानों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ा जब वो नाशिक में भाषण दे रहे थे. किसानों ने उन पर प्याज़ भी फेंके थे.

साल 2010 में भी प्याज़ के क़ीमतों में तेज़ी से उछाल आई थी. इसके विरोध में बीजेपी ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया था.

उस वक़्त हालात को काबू में करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने प्याज़ के निर्यात पर रोक लगा दी थी और आयात शुल्क में कटौती की थी.

इसके उलट साल 2017-18 में नाशिक में प्याज़ का थोक मूल्य दो रुपये प्रति किलोग्राम तक गिर गया. नाशिक भारत में प्याज़ के सबसे बड़े थोक बाज़ारों में से एक है.

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Image caption प्याज़ भारतीय खाने का अभिन्न अंग है.

आम जनता और ग़रीबों की है प्याज़

भारत में प्याज़ ग़रीबों और आम लोगों के लिए रोज़मर्रा के खाने का हिस्सा है. कई भारतीय व्यंजनों में प्याज़ डालना ज़रूरी होता है, ख़ासकर उत्तर भारत के राज्यों में.

प्याज़ मसालों को नर्म बनाता है और सब्ज़ियों में एक ख़ास तरह का ज़ायका लाती है. कच्चे और उबले प्याज़ को खाने के साथ सलाद के तौर पर भी खाया है.

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि पूरा भारत प्याज़ पर ही जीता है. दक्षिण और पूर्वी भारत के हिस्सों में इसका इस्तेमाल उतना ज़्यादा प्रचलित नहीं है. कई भारतीय समुदाय प्याज़ बिल्कुल नहीं खाते तो कुछ लोग किसी ख़ास अवधि में प्याज़ नहीं खाते.

इसके बावजूद प्याज़ का भारतीय खाने में अपनी एक जगह है. व्यंजनों के इतिहास की समझने वाली डॉक्टर मोहसीना मुकदम का कहना है कि प्याज़ महज एक सब्ज़ी नहीं बल्कि संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है.

"वो कहती हैं, "प्याज़ प्राचीन काल से ही भारतीय उपमहाद्वीप में इस्तेमाल होता रहा है. ज़्यादातर आम लोग और ग़रीब लोगों के लिए ये उनके ख़ाने का ज़रूरी हिस्सा है. महाराष्ट्र में अगर किसी के घर में सब्ज़ी नहीं है या सब्ज़ी ख़रीदने के पैसे नहीं हैं तो वो 'कांदा-भाकरी' (प्याज़-रोटी) खा लेते हैं. यहां आपको प्याज़ से जुड़े कई मुहावरे भी सुनने को मिलेंगे. इतनी ही नहीं, ज़्यादातर अरेंज्ड शादियों में जब लड़के और लड़की के परिवार पहली बार मिलते हैं तो उम्मीद की जाती है कि लड़की 'कांदे-पोहे' (प्याज़ वाला पोहे) परोसे."

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प्याज़ राजनीति पर कैसे असर डालता है?

आम तौर पर माना जाता है कि प्याज़ महंगा नहीं होगा. इसीलिए जब भी प्याज़ के दाम बढ़ते हैं, इसे महंगाई बढ़ने के संकेत के तौर पर देखा जाता है. ख़ासकर उत्तर भारत में इस पर ख़ूब बहस होती है.

जनसांख्यिकी की वजह से उत्तर भारत के राज्य राजनीति के केंद्र भी हैं और इसी उत्तर भारत में प्याज़ की मांग हमेशा बनी रहती है. इसलिए जब भी प्याज़ के दाम बढ़ते हैं इसका असर तुरंत ही बाज़ारों और दिल्ली (केंद्र) में दिखने लगता है.

पॉलिसी रिसर्चर और एक्टिविस्च मिलिंद मुरुगकर कहते हैं, "उत्तर भारत के लोगों में सत्ता और सरकार को प्रभावित करने की ख़ासी क्षमता है. भारत के बाकी हिस्सों में महंगाई को लेकर उतना शोर-शराबा नहीं होता. मगर जैसे ही उत्तर भारत में महंगाई मुद्दा बनने लगती है, सरकार दबाव में आ जाती है."

वहीं दूसरी ओर, अगर प्याज़ के दाम ज़्यादा ही गिरने लगते हैं तो इसका सीधा असर प्याज़ पैदा करने वाले राज्यों (महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात) के किसानों और उनकी आमदनी पर पड़ता है.

नाशिक की स्थानीय पत्रकार दीप्तिर राउत ने प्याज़ के कारोबार को लेकर काफ़ी वक़्त तक काम किया है.

दीप्ति कहती हैं, "किसानों को लगता है कि प्याज़ पैदा करने ठीक-ठाक पैसे कमाए जा सकते हैं क्योंकि ये सूखे और कम पानी वाले इलाकों में जल्दी उग जाते हैं. किसानों के लिए प्याज़ एटीएम मशीन की तरह है. कई बार किसानों के घर का बजट भी उनके उगाए प्याज़ पर निर्भर करता है."

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लेकिन प्याज़ के दाम बार-बार क्यों बढ़ते हैं?

प्याज़ के सबसे बड़े उत्पादक राज्य महाराष्ट्र ने इस साल भीषण बाढ़ का सामना किया है. बारिश ने पड़ोसी राज्य कर्नाटक और गुजरात में भी प्याज़ को ख़राब कर दिया.

नेशनल एग्रिकल्चरल को-ऑरपरेटिव मार्केटिंग फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (NAFED) के निदेशक इसकी वजह समझाते हैं.

वो कहते हैं, "बारिश ने न सिर्फ़ इस साल उगने वाला प्याज़ ख़राब किया बल्कि स्टॉक में रखा लगभग 35 फ़ीसदी प्याज़ भी नष्ट कर दिया. इसका मतलब कि इस बार सामान्य से 25 फ़ीसदी ज़्यादा नुक़सान हुआ. दक्षिणी हिस्सों से सितंबर तक प्याज़ आने की उम्मीद थी लेकिन बाढ़ की वजह से उसमें भी देरी हो गई."

हाल के दशक में ऐसा बार-बार होने लगा है.

मिलिंग मुरुरगकर कहते हैं, "उत्पादन की मात्रा में बदलाव की वजह से प्याज़ के दामों में भी उतार-चढ़ाव देखा गया है. हर साल बारिश की मात्रा अलग-अलग होती है और इसकी वजह से प्याज़ का उत्पादन भी कम-ज़्यादा होता रहता है. अगर पैदावार थोड़ी भी कम या ज़्यादा होती है तो प्याज़ के दामों में भारी अंतर आ जाता है.''

दीप्ति के मुताबिक़, बारिश के बाद वैसे भी हर साल प्याज़ की कमी हो जाती है क्योंकि ये त्योहारों का वक़्त होता है.

वो कहती हैं, "प्याज़ साल में तीन बार उगाया जाता है. अगर एक सीज़न में अच्छी कीमत मिल जाती है तो अगले सीज़न में किसान ज़्यादा प्याज़ उगा लेते हैं लेकिन इसका नतीजा ये होता है कि ज़्यादा पैदावार की वजह से क़ीमतें फिर गिर जाती हैं. ये क्रम इसी तरह चलता रहता है और इसका फ़ायदा उठाते हैं बिचौलिए."

दीप्ति का ये भी मानना है कि भारत में प्याज़ की पैदावार का अध्ययन करने का कोई व्यवस्थित तरीका नहीं है.

वो कहती हैं, "जब तक आंकड़े इकट्ठा किए जाते हैं तब तक अगले सीज़न का प्याज़ बाज़ार में आ जाता है. इस तरह ये ठीक-ठीक पता ही नहीं चल पाता कि असल में कितना प्याज़ पैदा हुआ, कितनी मांग है और कितना निर्यात किया जा रहा है."

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इन सबका हल क्या है?

दीप्ति को लगता है कि बुनियादी स्तर पर बेहतर प्लानिंग, स्टोरेज और फ़ूड-प्रोसेसिंग की सुविधाओं में सुधार से मुश्किल आसान हो जाएगी. इसके अलावा अगर बाज़ार में अलग-अलग तरीके की सब्ज़ियां उपलब्ध कराई जाएं तो प्याज़ का विकल्प मिल जाएगा.

नाशिक में खेती करने वाले किसान विकास दारेकर पूछते हैं, "जब प्याज़ के दाम बढ़ते हैं तो सरकार तुरंत हरकत में आ जाती है लेकिन ऐसी ही फ़ुर्ती तब क्यों नहीं दिखाई जाती जब प्याज़ के दाम 200 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर जाते हैं? सरकार को हमें वाजिब दाम देना चाहिए और हमसे प्याज़ कम से कम 1500 रुपये प्रति क्विंटल के दर से खरीदना चाहिए."

हालांकि इसके उलट मिलिंद मुरुगकर का मानना है कि सरकार को 'प्याज़ के मामलों' में कभी दख़ल नहीं देना चाहिए.

वो कहते हैं, "55 फ़ीसदी से ज़्यादा भारतीय आबादी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है. वहीं खेती एक ऐसा सेक्टर है जो बेहद धीमी गति (2.5 फ़ीसदी प्रति) से बढ़ रहा है. हमारी अर्थव्यवस्था में सुस्ती की प्रमुख वजह यही है कि असंगठित और ग्रामीण से मांग कम हो गई है. अगर आप चाहते हैं कि ज़्यादा सामान ख़रीदने में सक्षम हों तो हमें निर्यात नहीं रोकना चाहिए. क्या हम कभी सॉफ़्टवेयर एक्सपोर्ट पर रोक लगाते हैं? ये वाक़ई अजीब है."

मुरुगकर का मानना है कि मौजूदा सरकार के पास भारी बहुमत है और इसे कुछ लोगों के दबाव से सामने टिकने की क्षमता होनी चाहिए.

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