भूपिंदर सिंह हुड्डा बीजेपी के विजय रथ को चुनौती दे पाएंगे?

  • 8 अक्तूबर 2019
भूपिंदर सिंह हुड्डा इमेज कॉपीरइट Sat Singh

हरियाणा के आगामी विधानसभा में मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली बीजेपी के विजय रथ को कोई चुनौती दे सकता है, तो वो हैं देसवाली के नेता, 72 बरस के भूपिंदर सिंह हुड्डा.

भूपिंदर सिंह हुड्डा 2005 से 2014 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे थे. इस दौरान हुड्डा ने एक तरफ़ तो ख़ुद को राज्य के क़द्दावर जाट नेता के तौर पर स्थापित किया. साथ ही साथ उन्होंने रोहतक और आस-पास के तीन जाट बहुल ज़िलों को अपने गढ़ के तौर पर भी विकसित किया.

रोहतक, झज्जर और सोनीपत के जाटों को हुड्डा के दस साल के शासन काल में ऐसा वीआईपी दर्जा हासिल था कि उन्हें सरकारी नौकरियों में मनमर्ज़ी की पोस्टिंग मिलती थी. हर विकास कार्य में उन्हें तरजीह मिलती थी. इससे राज्य के बाक़ी 19 ज़िलों के लोग पुराने रोहतक के जाटों से जलते भी थे.

इलाक़े के बुज़ुर्ग यानी ताऊ, भूपिंदर सिंह हुड्डा को इस बात का श्रेय देते हैं कि उन्होंने पुराने और अविकसित रोहतक को चंडीगढ़ की तर्ज़ पर एक आधुनिक शहर बनाने की दिशा में बहुत काम किया. हुड्डा की कोशिशों से रोहतक की सड़कें, रोडलाइट और बुनियादी ढांचे में बहुत सुधार आया.

भूपिंदर सिंह हुड्डा के दस साल के शासन काल के दौरान, पुराने रोहतक के मतदाताओं को सरकारी नौकरियों में ख़ूब मौक़े मिले. उन्हें उनकी मन की पोस्टिंग भी मिल जाती थी. और राज्य सरकार के मुख्यालय तक उनकी पहुंच रोहतक के लोगों के लिए ख़ुद भी एक नया तजुर्बा था. और उन्होंने इसका भरपूर उपयोग भी किया.

हालांकि 2005 से पहले हुड्डा की इकलौती शोहरत ये थी कि उन्होंने पूर्व उप-प्रधानमंत्री और बेहद लोकप्रिय क़द्दावर जाट नेता देवीलाल को तीन बार रोहतक लोकसभा सीट से हराया था.

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

इससे पहले का दौर ऐसा था कि राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी बागरी के नेताओं की जागीर मालूम होती थी. पहले देवीलाल मुख्यमंत्री बने. फिर उनके बेटे ओम प्रकाश चौटाला ने पद संभाला. इनके अलावा भजन लाल और बंसी लाल मुख्यमंत्री बने तो वो भी बागरी के ही थे. लेकिन, पुराने रोहतक या देसवाली पट्टी के लोगों को कभी भी ये मौक़ा नहीं मिला कि उनके बीच का कोई नेता मुख्यमंत्री बने.

नतीजा ये रहा कि कृषि बहुल हरियाणा के रोहतक पट्टी के लोगों को राज्य के संसाधनों पर भी वाजिब हक़ नहीं मिला.

हालांकि, हरियाणा के अलग राज्य के तौर पर गठन के बाद से ही रोहतक राज्य की राजनीतिक गतिविधियों का गढ़ रहा था. देवीलाल जैसे बड़े नेताओं ने रोहतक को अपनी कर्मभूमि बनाया और सियासी कामयाबी का फल चखा. लेकिन, इसका फ़ायदा रोहतक के वोटरों को नहीं मिला.

सत्ता के गलियारों में पहुंच की रोहतक की जनता की ललक भूपिंदर सिंह हुड्डा ने ही शांत की.

'हरियाणा की पॉवर पॉलिटिक्स' नाम की किताब के लेखक भीम एस दहिया कहते हैं कि हरियाणा की जाट राजनीति में सबसे ज़्यादा ज़ोर इसी बात पर रहा कि राजनीति के अखाड़े में जाटों का प्रभुत्व बना रहे. जाटों के लिए किसी पार्टी की कोई अहमियत नहीं है. बस वो राज्य की सियासत पर हावी रहना चाहते हैं.

जैसे ही उन्हें प्रभुत्व को चुनौती मिलती है या कोई पार्टी उन्हें सियासी हैसियत में पहली पायदान से नीचे रखती है, तो वो उस पार्टी का साथ छोड़ देते हैं. या फिर वो उस पार्टी को ही तोड़ देते हैं. लेकिन, वो कभी भी दोयम दर्जे की हैसियत लंबे समय के लिए मंज़ूर नहीं करते.

भूपिंदर सिंह हुड्डा अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी नेता हैं. उन्होंने जाटों के वोट बैंक को एकजुट किया. हुड्डा ने इसके लिए ग़ैर जाट वोटों को एकजुट करने के पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के सब को ख़ुश करने के फॉर्मूले का इस्तेमाल किया.

वक़ील से सियासी हीरो बनने तक का सफ़र

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुभाष बत्रा रोहतक से कांग्रेस के पूर्व विधायक रह चुके हैं. वो 1991 की भजन लाल सरकार में गृह मंत्री भी रहे थे. बत्रा, पुराने दिनों को याद कर के कहते हैं कि 1991 से पहले भूपिंदर सिंह हुड्डा रोहतक की ज़िला अदालत में वकालत किया करते थे.

बत्रा बताते हैं कि उस दौर में हुड्डा अपने बचपन के सभी दोस्तों (जिन में उनके रिश्तेदार चंदर सेन दहिया के अलावा सभी ग़ैर जाट थे) के साथ रोहतक के मॉडल टाउन इलाक़े में ताश खेला करते थे. ये जगह हुड्डा के पुश्तैनी घर के क़रीब ही थी. इस दौरान चाय पर सियासी चर्चाएं भी हुआ करती थीं.

हुड्डा का ये तजुर्बा तब बहुत काम आया, जब उन्होंने चौधरी देवीलाल को चुनाव मैदान में पटखनी दी. शहरी वोटरों की पहली पसंद भूपिंदर सिंह हुड्डा ही थे. जबकि ग्रामीण मतदाता देवीलाल को तरजीह देते थे.

सुभाष बत्रा बताते हैं कि 1991 से पहले भूपिंदर सिंह हुड्डा, किलोई विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे. यहां तक कि उनके बड़े भाई कैप्टन प्रताप सिंह और पिता रनबीर सिंह भी अपने गृह क्षेत्र से चुनाव नहीं जीत सके थे.

किलोई सीट से कांग्रेस के टिकट पर लगातार हारने के बाद सियासी गलियारों में ये चर्चा होती थी कि चूंकि रनबीर सिंह की कांग्रेस मुख्यालय में तगड़ी पैठ है. इसी वजह से बार-बार हारने के बाद भी उनके परिवार को ही टिकट मिल जाता है.

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

1980 के दशक में रोहतक के लोगों के लिए हुड्डा, उनके 'भूपी' थे, क्योंकि उनका बर्ताव बहुत विनम्रता भरा होता था. वो अपने पिता रनबीर सिंह की गाड़ी चलाया करते थे. रनबीर सिंह संयुक्त पंजाब की सरकार में मंत्री रहे थे. इसके अलावा उनकी पहुंच दिल्ली में सत्ता के गलियारों तक भी थी.

उन दिनों को याद करते हुए सुभाष बत्रा बताते हैं कि, 'रनबीर सिंह ने ही मुझे अपने बेटे भूपी वकील से मिलवाया था. रनबीर सिंह मुझे अपनी फिएट कार में बिठा कर ले गए थे. तब भूपिंदर सिंह हुड्डा ही कार चला रहे थे और उनके पिता पीछे की सीट पर बैठे थे. तब रनबीर सिंह ने मुझे हुड्डा से मिलवाया था.'

बत्रा बताते हैं कि रनबीर सिंह कहा करते थे कि यूं तो उनका बेटा भूपी बहुत सीधा है. लेकिन अगर वो एक बार कुछ ठान लेता है, तो फिर उसे रोकना बहुत मुश्किल होता है.

बत्रा कहते हैं, ''मैं आज भी हुड्डा के मामले में उनके पिता की बातों को सच होते देखता हूं. क्योंकि हुड्डा ने अपने कई ऐसे दोस्तों को बार-बार टिकट दिया, जो चुनाव नहीं जीत पाते थे. भूपी को दोस्तों को धोखा देने के बजाय हार मानना मंज़ूर था. क्योंकि वो यारों के यार हैं और संबंध निभाना जानते हैं.''

चुनाव हारने वाले नेता से सियासी गेम चेंजर बनने का दौर

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

ये उस वक़्त की बात है जब भूपी उर्फ़ भूपिंदर सिंह हुड्डा, किलोई सीट से विधानसभा पहुंचने की ज़ोर-आज़माइश कर रहे थे. उस समय हुड्डा की लोकसभा चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं थी. लेकिन, उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए उनके चचेरे भाई चौधरी वीरेंद्र सिंह ने राज़ी कर लिया.

चौधरी वीरेंद्र उस वक़्त हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे. उनके कहने पर भूपिंदर सिंह हुड्डा, चौधरी देवीलाल के ख़िलाफ़ रोहतक से लोकसभा का चुनाव लड़ने को राज़ी हो गए.

ताक़तवर बागरी नेता चौधरी देवीलाल के ख़िलाफ़ मैदान में उतरने के इस साहसिक फ़ैसले ने भूपिंदर हुड्डा की ज़िंदगी बदल दी. चुनाव प्रचार में हुड्डा ने रोहतक के मेहम में हुए हत्याकांड के मुद्दे को देवीलाल के ख़िलाफ़ ख़ूब भुनाया.

रोहतक के मतदाताओं की देवीलाल को वोट न देने की एक और वजह थी. और वो ये थी कि 1989 में देवीलाल ने रोहतक के अलावा राजस्थान की सीकर सीट से भी चुनाव लड़ा था. दोनों सीटें जीतने के बाद देवीलाल ने हरियाणा की रोहतक सीट के बजाय सीकर को चुना और रोहतक से इस्तीफ़ा दे दिया था.

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

उस वक़्त रोहतक के ग्रामीण इलाक़े के लोग देवीलाल की पूजा किया करते थे. लेकिन, देवीलाल के इस क़दम से वो छला हुआ महसूस कर रहे थे. उस वक़्त हुड्डा ने शहरी इलाक़ों में अच्छी पहचान बना ली थी. देवीलाल से लोगों की नाराज़गी का हुड्डा ने जमकर सियासी फ़ायदा उठाया.

1991 की ही तरह भूपिंदर हुड्डा ने 1996 और 1998 के लोकसभा चुनावों में भी देवीलाल को शिकस्त दे दी. हालांकि जीत-हार का अंतर बहुत कम था. लेकिन, देवीलाल जैसे क़द्दावर और बेहद लोकप्रिय नेता को लगातार तीन बार हराने की वजह से भूपिंदर सिंह हुड्डा की छवि एक ऐसे नेता की बन गई थी, जो रोहतक के पुराने सपने को पूरा कर सकते थे. और वो सपना था हरियाणा पर हुकूमत करने का.

1999 के लोकसभा चुनाव में हुड्डा को इंडियन नेशनल लोकदल के कैप्टन इंदर सिंह ने हरा दिया था. इंदर सिंह ने इसे मुख्यमंत्री ओपी चौटाला के पिता चौधरी देवीलाल को हराने का बदला क़रार दिया था. कैप्टन इंदर सिंह ने कहा कि केवल 1991 में भूपिंदर हुड्डा की देवीलाल पर जीत असली थी. क्योंकि, हुड्डा ने देवीलाल को 1996 में केवल 2266 वोट और 1998 में केवल 383 वोटों से हराया था.

कैप्टन इंदर सिंह का आरोप था कि हुड्डा को ये जीत धांधली से मिली थी.

इंदर सिंह ने आरोप लगाया कि देवीलाल को हराने के लिए उस वक़्त के मुख्यमंत्रियों, पहले बंसीलाल और फिर भजनलाल ने अपनी ताक़त का इस्तेमाल हुड्डा के पक्ष में किया था.

जब भजनलाल को उनके ही सियासी खेल में दी मात

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

2004 में जब भूपिंदर सिंह हुड्डा एक बार फिर लोकसभा चुनाव जीते, तो उस वक़्त हरियाणा के मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला थे.

उस समय हरियाणा कांग्रेस का मज़बूत मुख्यमंत्री चेहरा भजन लाल थे और उन्हें ख़्वाब में भी गुमान नहीं था कि भूपिंदर सिंह हुड्डा उनके लिए कोई सियासी ख़तरा बनेंगे और उनको उनके ही सियासी खेल में मात दे देंगे.

चौधरी देवीलाल को तीन बार लोकसभा चुनाव में हराने के बाद भूपिंदर सिंह हुड्डा में इतना आत्मविश्वास आ गया था कि अब वो हरियाणा की राजनीति में पीएचडी करने का दावा करने वाले भजनलाल को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच चुके थे.

अब भूपिंदर हुड्डा ने देसवाली चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की वकालत ज़ोर-शोर से करनी शुरू कर दी थी. 'पॉलिटिक्स ऑफ़ चौधर' नाम की किताब लिखने वाले सतीश त्यागी कहते हैं कि भूपिंदर सिंह हुड्डा को 'ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स' में महारत हासिल थी. संसद सदस्य होने की वजह से वो दिल्ली के कांग्रेस कल्चर को भी अच्छी तरह से समझ चुके थे.

कांग्रेस के पुराने दिग्गजों की तरह ही भूपिंदर सिंह हुड्डा भी देर रात तक जागते थे और लोगों से मिलते रहते थे. इस तरह उन्होंने गांधी परिवार के क़रीबी नेताओं का दिल जीत लिया था. रोहतक के लोगों से हुड्डा ये कहा करते थे कि वो बरास्ते दिल्ली, चंडीगढ़ पहुंचेंगे, यानी मुख्यमंत्री बनेंगे.

उस वक़्त प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के मददगार बनकर भजनलाल, सोनिया गांधी की नाराज़गी मोल ले चुके थे. वहीं, भूपिंदर सिंह हुड्डा ने अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा जैसे नेताओ की मदद से सोनिया गांधी की कृपा हासिल कर ली थी.

जब 2005 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 67 सीटें जीतकर बहुमत से सत्ता में आई, तो ज़्यादातर विधायकों ने भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन किया. सोनिया गांधी ने पर्यवेक्षकों की एक टीम दिल्ली से चंडीगढ़ भेजी. इन पर्यवेक्षकों ने विधायकों से बात करके उनसे इस बात पर सहमति ले ली कि इस बार मुख्यमंत्री आलाकमान तय करेगा.

त्यागी बताते हैं कि तब सोनिया गांधी के विश्वासपात्र जनार्दन द्विवेदी को ये बात अच्छे से पता थी कि ज़्यादातर विधायक भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाने के हक़ में हैं. लेकिन, उन्होंने हर विधायक से मुख्यमंत्री पद के लिए उसकी पसंद को निजी तौर पर काग़ज़ पर लिखवा लिया. और आख़िर में कहा कि सीएम कौन बनेगा, विधायक ये फ़ैसला सोनिया गांधी पर छोड़ दें.

वो 4 मार्च की सर्द सुबह थी. भजनलाल अपने समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली में अपने आवास पर डटे हुए थे और इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि सोनिया गांधी, सीएम पद के लिए उनके नाम का ऐलान करें. लेकिन, शाम 4 बजते-बजते उनका सपना चकनाचूर हो चुका था. उस दिन शाम को हरियाणा के नए सीएम के तौर पर भूपिंदर सिंह हुड्डा के नाम का ऐलान हुआ.

अब हुड्डा को सीएम स्वीकार करने के अलावा विधायकों के पास कोई चारा नहीं था. जब उनके सामने ये साफ़ हो गया कि हुड्डा ही सोनिया गांधी की पसंद हैं, तो विधायक धीरे-धीरे भजनलाल के आवास से खिसकने लगे.

एक दशक का राज और दीपेंदर का उदय

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

भूपिंदर हुड्डा के मुख्यमंत्री बनने का जश्न पूरे रोहतक में बड़े धूम-धाम से मनाया गया. सड़कों पर भव्य विजय जुलूस निकाले गए. ख़ास तौर से किलोई विधानसभा क्षेत्र के लोग तो मानो दीवाने ही हो गए थे.

बीजेपी नेता वीरेंदर सिंह चौहान उस वक़्त एक राष्ट्रीय हिंदी अख़बार के पत्रकार थे. चौहान बताते हैं कि जिस दिन हुड्डा ने शपथ ली, उस दिन वो हुड्डा के गढ़ से गुज़र रहे थे. तभी लापरवाही से बाइक चला रहे एक शख़्स ने उनका रास्ता रोक लिया. जब चौहान ने उससे रास्ते से हटने को कहा, तो उसने अपना उप-नाम बताते हुए उन्हें धमकी दी.

चौहान बताते हैं कि उस आदमी ने कहा कि, 'मैं सांघी का हुड्डा हूं. मुझसे मत उलझना वरना तुम्हारी औक़ात बता देंगे.' यानी वो खुल कर राज्य के नए मुख्यमंत्री के साथ अपने ताल्लुक़ की नुमाइश कर रहा था.

मुख्यमंत्री बनने के बाद भूपिंदर हुड्डा ने अपने बेटे दीपेंदर हुड्डा को विदेश से वापस बुलाया. उस समय दीपेंदर अमरीका में नौकरी कर रहे थे. दीपेंदर को रोहतक लोकसभा सीट से टिकट दिया गया. मुख्यमंत्री पिता की सियासी ताक़त की बदौलत दीपेंदर हुड्डा, रिकॉर्ड वोटों से रोहतक सीट से चुनाव जीत गए.

चूंकि भूपिंदर हुड्डा सत्ता के गलियारों में नए-नए दाख़िल हुए थे, तो दो लोकप्रिय जननेता रघुबीर कादियान और आनंद सिंह डांगी हुड्डा के दाहिने और बाएं हाथ बन गए.

मुख्यमंत्री बनने में हुड्डा का साथ देने वाले हरियाणा के चौधरी वीरेंद्र सिंह, कुमारी शैलजा, उद्योपति मरहूम ओपी जिंदल, जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता धीरे-धीरे या तो हाशिए पर चले गए या फिर हुड्डा के विरोध के चलते उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी.

हुड्डा ने पहला काम तो ये किया कि वो ज़मीनी कार्यकर्ताओं से सीधे मिलने-जुलने लगे. इससे पहले इन कार्यकर्ताओं को मुख्यमंत्री तक पहुंचने के लिए विधायकों की मदद लेनी पड़ती थी.

इसकी वजह से भूपिंदर हुड्डा एक लोकप्रिय जननेता के तौर पर स्थापित हो गए, जो पुराने रोहतक से ताल्लुक़ रखते थे. इससे पहले रोहतक के जाट नेता अपनी खड़ी बोली वाली उजड्डता के लिए बदनाम थे.

अब हर रैली में और हर सभा में हुड्डा के नाम के ही नारे लगने लगे थे. नतीजा ये हुआ कि विनोद शर्मा जैसे नेता जो कभी हुड्डा की किचेन कैबिनेट का हिस्सा हुआ करते थे, वो भी पीछे छूट गए.

इसी तरह कभी हुड्डा का साथ देने वाले अहीर नेता कांग्रेस के राव इंदरजीत सिंह और बांगर नेता बीरेंद्र सिंह 2014 के चुनाव से पहले कांग्रेस में अपने साथ भेदभाव का आरोप लगाकर बीजेपी में शामिल हो गए.

भले ही पुराने कांग्रेसी नेता पार्टी छोड़ रहे थे. लेकिन, इधर हुड्डा ने अपने वफ़ादार विधायकों की नई फ़ौज खड़ी कर ली थी और वो ये सुनिश्चित करते थे कि उनके विश्वासपात्र विधायकों को रोहतक इलाक़े से टिकट मिल जाए.

इस दौरान, हुड्डा को ग़ैर-जाट समुदायों से मिलने वाला समर्थन घटने लगा. इसकी दो वजहें थीं. इन ग़ैर-जाट नेताओं को महसूस हुआ कि उनके साथ भेदभाव होता है. फिर, जब हरियाणा के दूसरे हिस्सों के विकास की तुलना पुराने रोहतक से हुई, तो उसमें भी भेदभाव साफ़ नज़र आता था.

आख़िरकार हालात ऐसे बने कि कांग्रेस, रोहतक विधानसभा सीट से भी 2014 में चुनाव हार गई.

हुड्डा के क़रीबी एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने बीबीसी को बताया कि भूपिंदर हुड्डा के समर्थन में जुटने वाली भीड़ का रुख़ एक सियासी रणनीति के तहत अब दीपेंदर हुड्डा की तरफ़ मोड़ा जा रहा था. वो बताते हैं कि, ''लोग जब भूपिंदर हुड्डा से विकास के काम कराने की अपील करते थे, तो वो उस पर बहुत ध्यान नहीं देते थे. वहीं, दीपेंदर हुड्डा लोगों की अर्ज़ियों को न सिर्फ़ सुनते थे, बल्कि उनके काम पूरे कराते थे. दीपेंदर बहुत विनम्र और सहज हैं.''

जल्द ही युवा और अनुभवहीन दीपेंदर को कांग्रेस के सीनियर नेता भाई साहब या एमपी साहब कह कर बुलाने लगे थे.

वरिष्ठ पत्रकार और 'हरियाणा के लालो के सबरंग क़िस्से' नाम की किताब के लेखक पवन बंसल कहते हैं कि भूपिंदर हुड्डा से पहले हरियाणा के मुख्यमंत्रियों के काम करने का तजुर्बा बहुत कड़वा रहा था. लेकिन अपनी विनम्रता और सहजता की वजह से दीपू उर्फ़ दीपेंदर, सब के लिए सर्वसुलभ थे.

बीजेपी ने हुड्डा को कैसे उनके गढ़ में ही हराया?

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

केंद्र में मोदी के उदय और हरियाणा में क्षेत्रीय भेदभाव का फ़ायदा उठाकर 2014 में बीजेपी ने कांग्रेस को शिकस्त दे दी. लेकिन, पार्टी ने इस जीत का जश्न मनाने के बजाय, ग़ैर-जाटों की नाराज़गी का जज़्बाती फ़ायदा उठाने की अपनी कोशिशें जारी रखीं.

इसकी पहली मिसाल उस वक़्त दिखी, जब बीजेपी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक और ग़ैर-जाट नेता मनोहर लाल खट्टर को हरियाणा की कमान दी.

इससे ख़ुद से भेदभाव महसूस कर रहे हरियाणा के ग़ैर-जाट लोगों में उम्मीद जगी. इसकी एक वजह ये थी कि मनोहर लाल का दामन बेदाग़ था और उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सीधी पहुंच भी थी.

मज़े की बात ये है कि बीजेपी और मनोहर लाल का सोशल इंजीनियरिंग का ये फॉर्मूला हरियाणा में कभी नाकाम नहीं हुआ. क्योंकि 2014 के बाद से बीजेपी हरियाणा में कोई भी चुनाव नहीं हारी.

पहले तो बीजेपी ने नगर निकाय चुनाव में क्लीन स्वीप किया. इसके बाद 2019 में पार्टी ने हरियाणा की सभी लोकसभा सीटें जीत लीं. भूपिंदर हुड्डा और उनके बेटे दीपेंदर हुड्डा भी अपने-अपने गढ़ यानी रोहतक और सोनीपत से चुनाव हार गए.

बीजेपी पर दबाव था कि वो पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार दे.

'पॉलिटिक्स ऑफ़ चौधर' किताब के लेखक सतीश त्यागी कहते हैं कि क़द्दावर जाट नेता होने के बावजूद अब कांग्रेस आलाकमान उन्हें तरजीह नहीं दे रही थी. हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अशोक तंवर की एंट्री ने हरियाणा कांग्रेस में फूट डाल दी. पार्टी में अंदरूनी लड़ाई तेज़ हो गई.

जब बीजेपी हरियाणा में अपना आधार और वोट बैंक मज़बूत कर रही थी, तब कांग्रेस कई गुटों में बंटी हुई थी. हुड्डा, तंवर, सुरजेवाला और किरन, सब के सब गांधी परिवार के क़रीबी थे.

फरवरी 2016 के नेतृत्व विहीन जाट आरक्षण आंदोलन का केंद्र रोहतक में था. इस आंदोलन के दौरान 30 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए थे. इस वजह से भी हुड्डा के समर्थकों की तादाद कम हुई.

रोहतक के लोग, ख़ास तौर से शहरी इलाक़ों के निवासियों को लगा कि हुड्डा और उनके बेटे उनकी मुसीबत के वक़्त उनके साथ नहीं थे. वो भूपिंदर हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंदर को इस बात के लिए माफ़ करने को तैयार नहीं थे. पूरे जाट आंदोलन के दौरान हुड्डा दिल्ली में ही रुके हुए थे.

जाट आंदोलन के लिए लोगों को उकसाने की एक वीडियो क्लिप वायरल होन के बाद हुड्डा के राजनीतिक सलाहकार प्रोफ़ेसर वीरेंदर सिंह के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई. इसने भी बीजेपी को हुड्डा को घेरने का मौक़ा दे दिया.

भूपिंदर हुड्डा की पत्नी आशा हुड्डा ने हमें बताया कि रोहतक के हिंसक हालात की ख़बर लगते ही वो रोहतक के लिए रवाना हो गए थे. लेकिन, सरकार ने उन्हें हरियाणा और दिल्ली दिल्ली की सीमा पर ही रोक लिया और राज्य में घुसने ही नहीं दिया. आशा कहती हैं कि हुड्डा परिवार को इस बात का अफ़सोस है कि वो उस मुश्किल वक़्त में रोहतक में नहीं थे. लेकिन, उनका परिवार लाचार था.

हुड्डा से नाराज़ वोटरों ने अपना ग़ुस्सा स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस पर निकाला. इसके बाद दीपेंदर हुड्डा 2019 में रोहतक लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार अरविंद शर्मा से चुनाव हार गए.

ब्राह्मण नेता अरविंद शर्मा, हुड्डा के पुराने दोस्त हैं. उन्हें बीजेपी ने दीपेंदर को हराने की नीयत से ही पार्टी में शामिल किया था.

जाट आरक्षण आंदोलन का एक असर ये भी हुआ कि ग़ैर-जाट वोटर बीजेपी के पक्ष में और मज़बूती से लामबंद हो गए. इसका नतीजा ये हुआ कि बीजेपी की जीत का फ़ासला पहले से बहुत ज़्यादा बढ़ गया.

हुड्डा के क़ानूनी पचड़े

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान भूपिंदर सिंह हुड्डा भले ही पार्टी की अंदरूनी लड़ाई को शांत कर के चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी का एकजुटता वाला चेहरा दुनिया को दिखाने में कामयाब हो गए हों. लेकिन, उनकी परेशानियां ख़त्म नहीं हुई हैं. केंद्र और राज्य में बीजेपी सरकार बनने के बाद उनके ख़िलाफ़ चार नामज़द एफ़आईआर दर्ज हो चुकी हैं.

हुड्डा पर जो आरोप हैं, उससे उनके फिर से हरियाणा का मुख्यमंत्री बनने की राह बंद हो सकती है. मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने ये बात कई बार सार्वजनिक मंच से कही है कि भूपिंदर सिंह हुड्डा सलाखों के पीछे होंगे.

जनवरी 2018 में सीबीआई ने उनके ख़िलाफ़ प्राथमिक जांच शुरू की थी. इस जांच का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 1 नवंबर 2017 को दिया था. ये मामला गुरुग्राम में 1417 एकड़ ज़मीन के अधिग्रहण के हुड्डा सरकार के फ़ैसले का था. क्योंकि इसमें से केवल 87 एकड़ ज़मीन ही आख़िर में सरकार ने अपने क़ब्ज़े में ली थी.

अधिग्रहण की गई जिस ज़मीन को अवैध तरीक़े से छोड़ दिया गया था, वो गुरुग्राम के सेक्टर 58 से 63 और 67 तक फैली हुई है. शुरुआती जांच के मुताबिक़, हुड्डा और उनकी सरकार के अधिकारियों ने अधिग्रहण के बाद ये ज़मीन ग़ैर-का़नूनी तरीक़े से छोड़ दी थी.

जांच एजेंसी का ये भी आरोप है कि, इन ज़मीनों के विकास के लाइसेंस बिल्डरों ने हुड्डा सरकार की मदद से अवैध तरीक़े से हासिल किए थे. ज़मीन के सौदों में ग़ैर-क़ानूनी काम के लिए हरियाणा पुलिस ने हुड्डा और रॉबर्ट वाड्रा के ख़िलाफ़ भी एफ़आईआर दर्ज की थी.

भूपिंदर सिंह हुड्डा से प्रवर्तन निदेशालय ने भी पूछताछ की थी. ये मामला एक और ज़मीन के सौदे से जुड़ा था, जिसे लेकर ईडी ने केस दर्ज किया था. इस केस में हुड्डा का बयान पीएमएलए यानी प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्डरिंग एक्ट के तहत दर्ज किया गया था. असल में ये मामला हुड्डा सरकार द्वारा नेशनल हेरल्ड अख़बार की मूल कंपनी एसोसिएट जर्नल लिमिटेड को पंचकुला के सेक्टर 6 में C-17 नाम का प्लॉट ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से आबंटित करने और मनी लॉन्डरिंग से जुड़ा हुआ है.

वित्तीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया है कि हुड्डा ने एजेएल को फ़ायदा पहुंचाया, जो ग़ैर-क़ानूनी था. ईडी का आरोप है कि हुड्डा सरकार ने एजेएल को निर्माण कार्य पूरा करने के लिए मई 2008 से मई 2012 तक बढ़ा कर समय दिया. और आख़िर में एसोसिएट जर्नल लिमिटेड को निर्माण कार्य पूरा करन के लिए 2014 तक का समय दे डाला.

आगे का रास्ता

इमेज कॉपीरइट Sat Singh

भूपिंदर सिंह हुड्डा के बारे में कहा जाता है कि वो क़िस्मत के धनी राजनेता हैं, जो बिना रेस में हुए भी अचानक मुख्यमंत्री बन गए थे. फिर उन्होंने बड़ी कामयाबी से हरियाणा पर दस साल राज किया और बाग़ियों को क़ाबू में रखा.

लेकिन, उत्साह से लबरेज़ बीजेपी इस बार-अबकी बार 75 पार के नारे के साथ हरियाणा विधानसभा का चुनाव लड़ रही है. और पार्टी का इरादा बचे-खुचे विपक्ष का सफ़ाया करने का है.

हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों से साफ़ है कि जाट मतदाताओं ने बीजेपी को स्वीकार कर लिया है. कई जाट नेताओं के बीजेपी में शामिल होने से हुड्डा की मुश्किलें बढ़ गई हैं.

वहीं, चौटाला ख़ानदान में फूट पड़ने के बाद से इंडियन नेशनल लोकदल की रही-सही सियासी ताक़त भी ख़त्म हो गई है. आज आईएनएलडी और उसका विरोधी गुट जेजेपी, सियासी तौर पर बहुत कमज़ोर माने जा रहे हैं.

हाल के कुछ बरसों में मतदाताओं ने पार्टियों को निर्णायक वोट दिया है. ऐसे में सरकार बनाने के लिए ज़रूरी आधी से ज़्यादा सीटें जीतना हुड्डा के लिए आसान नहीं होगा.

लोकसभा चुनाव में हुड्डा अपने सियासी गढ़ रोहतक और सोनीपत से हार गए थे. इससे उनके अजेय नेता होने की छवि भी ख़त्म हो गई. अब केवल समय ही बता सकता है कि हुड्डा, हरियाणा के वोटरों का दिल जीतने के लिए कौन सा जादुई नुस्ख़ा आज़माते हैं.

लेकिन, ये बात तो पक्के तौर पर कही जा सकती है कि क़रीब एक दशक तक सियासत के शिखर पर रहने के बाद हुड्डा 2019 में राजनीतिक रूप से ज़मीन पर पहुंच चुके हैं. अब देसवाली के पहले नेता इस चुनाव में दोबारा विजेता बनकर फ़र्श से अर्श का सफ़र तय करते हैं या फिर केसरिया तूफ़ान में उड़ जाएंगे, ये तो 24 अक्तूबर को ही तय होगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे

संबंधित समाचार