पटना में डेंगू का कहर: 'यहां जो बच गया, वो ऊपर वाले की कृपा से बचता है'

  • 9 अक्तूबर 2019
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"डॉक्टर तो डॉक्टर, यहां सिस्टर भी कलक्टर है. पूरे दिन में सिर्फ़ तीन बार आती है और रात में मरीज को देखने वाला कोई नहीं है. हमने अच्छे कर्म किए होंगें तो मेरा बच्चा बच जाएगा."

डबडबायी आंखों और रूंधे गले से सतीश कुमार सिंह बहुत मुश्किल से ये बात बोल पाए.

उनका 18 साल का बेटा कुणाल बीते एक अक्टूबर से ही पीएमसीएच के डेंगू वार्ड में भर्ती है, लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं है.

मूल रूप से बिहार के औरंगाबाद जिले के सिमरा लाइन का रहने वाला कुणाल पटना के बोरिंग रोड इलाके में रहकर पढ़ाई करता है.

परिवार वाले बताते है कि 30 सितंबर को उसका फ़ोन आया कि उसकी तबियत ख़राब है, जिसके बाद परिवार उसे औरंगाबाद ले गया.

लेकिन तबियत में कोई सुधार नहीं हुआ तो उसे सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डॉक्टरों ने उसे इलाज के लिए पटना मेडिकल कॉलेज में रेफ़र कर दिया.

लेकिन सूबे के इस सबसे बड़े अस्पताल की अव्यवस्था ने एक पिता को अंदर तक डरा दिया है.

वो कहते है, "जिन डॉक्टर की यूनिट में मेरा बच्चे का इलाज चल रहा है, मैने उन्हें आज तक नहीं देखा. बिहार के मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री आए और देखे पीएमसीएच में क्या चल रहा है."

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बिहार में डेंगू-चिकनगुनिया: सबसे ज़्यादा प्रभावित पटना

चीफ मलेरिया ऑफ़िस द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक़ बिहार में जनवरी 2019 से 7 अक्टूबर तक 982 मामले डेंगू के आए है जिसमें अकेले पटना में 642 मामले हैं.

इसमें राजेन्द्र मेमोरियल रिसर्च इंस्टीटयूट ऑफ़ मेडिकल सांइसेज (आरएमआरआई), पटना से 206 मामले, पीएमसीएच में 515 मामले और 68 मामले नालंदा मेडिकल कॉलेज से रिपोर्ट हुए है.

पटना में जनवरी से 27 सितंबर 2019 तक ही सिर्फ़ 409 डेंगू के मरीज थे जो शहर में जलजमाव के बाद बढ़कर 642 हो गए. यानी सिर्फ़ 10 दिन के भीतर पटना में डेंगू के 233 मरीज चिन्हित हो चुके है.

हालांकि पटना के सिविल सर्जन आर के चौधरी बताते है, "भारी बारिश के चलते पटना में जो जलजमाव हुआ है, उसका पानी गंदा है. जबकि डेंगू का मच्छर साफ़ और स्थिर पानी में पनपता है. इसलिए जरूरी है कि लोग अपने घर और आसपास पानी जमा नहीं होने दे."

पटना के बाद बिहार में डेंगू से सबसे ज़्यादा प्रभावित ज़िला भागलपुर है जहां डेंगू के 95 मरीज मिले हैं.

वहीं चिकनगुनिया की बात करें तो बिहार में 7 अक्टूबर तक कुल 88 मामले चिकनगुनिया के आए हैं. जिसमें पटना में 74 मामले सामने आए हैं. पटना के बाद वैशाली में 3 मामले चिकनगुनिया के रिपोर्ट हुए हैं.

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सरकारी कोशिश

स्थिति से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने 10,11 और 12 अक्टूबर को पटना मेडिकल कॉलेज और नालंदा मेडिकल कॉलेज, पटना में डेंगू और चिकनगुनिया की जांच के लिए निशुल्क कैम्प लगाया जा रहा है.

वहीं, पटना एम्स ने भी शहर में 11 जगह हेल्थ कैम्प लगाए हैं. पटना के दिनकर गोलंबर के पास लगे हेल्थ कैम्प के डॉक्टर्स के मुताबिक़ फिलहाल सबसे ज्यादा चर्म रोग से पीड़ित लोग दवाई लेने आ रहे है.

सिविल सर्जन आरके चौधरी बताते है, "अभी डेंगू चिकनगुनिया के साथ साथ मलेरिया, फाइलेरिया, चर्म रोग, डायरिया से निपटना हमारे लिए चुनौती है. इसके लिए हम लोग घर घर ब्लीचिंग पाउडर और चूना छिड़काव के लिए और पानी पीने योग्य बनाने के लिए हैलोजेन टैबलेट बंटवा रहे है. साथ ही पटना की 22 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र को भी नई चुनौती के लिहाज से तैयार किया गया है."

स्वास्थ्य विभाग ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करके नागरिकों से अपने आस-पास सफ़ाई रखने, पानी उबालकर पीने, मच्छरदानी का उपयोग करने, ब्लीचिंग पाउडर और चूना मिश्रण का छिड़काव करने की अपील की गई है.

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Image caption पटना का आयुर्वेदिक अस्पताल बीमारियों को दावत देता हुआ लग रहा है

सरकारी दावों के बीच ज़मीनी हालात

हालांकि सरकार की तरफ़ से जो दावे किए जा रहे है वो सूबे के सबसे बड़े अस्पताल में आकर ही खोखले साबित होते हैं. जबकि यहां सबसे अच्छी सरकारी सुविधाएं मिलनी चाहिए.

अस्पताल के इमरजेंसी वॉर्ड के पहले तल्ले पर बने डेंगू-चिकनगुनिया वार्ड में मरीज और उनके परिजनों के पास अस्पताल की व्यवस्था को लेकर शिकायतों के अंबार है.

डेंगू वार्ड में अपनी बेटी पिंकी देवी का इलाज करा रही पटना के दरियापुर गोला की धरनी देवी, पूर्वी लोहानीपुर के कारू शर्मा, गया से आए मरीज सुरेन्द्र प्रजापति, शास्त्रीनगर से आए कमलाकांत झा से बात करने पर उनका गुस्सा झलकता है.

इन सबके मुताबिक़ डॉक्टर खुद देखने नहीं आते, अस्पताल में दवाइयां नहीं मिलती, नर्सिंग स्टॉफ़ काम काज में लापरवाही बरतता है, वहीं ग्राउंड फ्लोर के इमेरजेंसी वार्ड की गंदगी से हमेशा संक्रमण का डर बना रहता है.

6 अक्टूबर से भर्ती सुरेन्द्र प्रजापति कहते है, "बताइए, ये 38 ज़िलों का अस्पताल है. इतना गंदा है यहां पर. सिर्फ नर्सिंग स्टाफ़ के भरोसे पीएमसीएच चलता है. यहां न दवाई मिलती है, न इलाज."

वहीं, अपने बेटे अमर शर्मा का इलाज करा रहे कारू कहते है, "यहां जो बच गया, वो ऊपर वाले की कृपा से बचता है."

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