महाराष्ट्र चुनाव में कितना ज़ोर है वंशवादी राजनीति का

  • 11 अक्तूबर 2019
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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के मैदान में इस बार कई नए युवा चेहरे दिख रहे हैं. यह सुनने में जहां दिलचस्प लग रहा है लेकिन वहीं तथ्य यह भी है कि इनमें से कई चेहरे किसी न किसी राजनीतिक परिवार से जुड़े हैं.

पहले के कई चुनावों की तरह राजनीति से जुड़े पुराने परिवार इस मौके को अपनी अगली पीढ़ी के लॉन्च पैड के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. लिहाजा इससे यह तथ्य और भी पुख्ता होता है कि महाराष्ट्र भी वंशवाद की राजनीति से अछूता नहीं है.

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पवार और ठाकरे की तीसरी पीढ़ी में कौन?

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव 2019 राज्य के दो सबसे ताक़तवर राजनीतिक परिवारों की तीसरी पीढ़ी के चुनावी मैदान में उतरने की गवाही दे रहा है. पवार और ठाकरे.

इन्हें महाराष्ट्र की राजनीति के शीर्ष परिवारों के रूप में देखा जाता है और यहां की राजनीति अक्सर इन्हीं दोनों परिवारों के ईर्द-गिर्द घूमती दिखती है.

आदित्य ठाकरे, जो शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के पोते हैं, ठाकरे परिवार से चुनावी मैदान में उतरने वाले पहले सदस्य हैं. तो वहीं पवार परिवार से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख और कद्दावर नेता शरद पवार के पोते रोहित पवार का भी यह पहला चुनाव है.

शिवसेना राज्य की सत्ताधारी पार्टियों में से एक रही है और इसके संस्थापक बाल ठाकरे राज्य की राजनीति में हमेशा ही एक कद्दावर शख्सियत रहे.

क्षेत्रीयता और विभाजनकारी हिंदुत्व की पहचान वाली शिवसेना ने एक बार साल 1995 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का पद हासिल किया. इसके साथ ही साल 2014 से वह केंद्र और राज्य में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार का हिस्सा भी रही है.

लेकिन खुद को रिमोट कंट्रोल बताने वाले इसके संस्थापक बाल ठाकरे ने चुनावी मैदान में कभी अपना हाथ नहीं आजमाया. न तो वे और न ही उनके बेटे उद्धव कभी चुनाव लड़े. 2012 के बाद से शिवसेना की कमान उद्धव के हाथों में ही है.

उद्धव के चचेरे भाई राज ठाकरे ने भी कभी चुनावी अखाड़े में आजमाइश नहीं की. बाला साहेब ठाकरे से प्रेरित राज ठाकरे ने शिवसेना से अलग महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) के नाम से पार्टी भी बनाई और 2014 में चुनाव लड़ने का मन भी बनाया और सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा तक की लेकिन बाद में वो इससे पीछे हट गए.

लेकिन इस चुनाव में ठाकरे परिवार ने ऐतिहासिक फ़ैसला लेते हुए तीसरी पीढ़ी के ठाकरे यानी आदित्य ठाकरे को मुंबई की वर्ली विधानसभा सीट से उतारा है. यानी चुनाव के मैदान में उतरने वाले वे अब पहले ठाकरे बन गए हैं.

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Image caption पिता उद्धव के साथ आदित्य ठाकरे

आखिर आदित्य ने यह परंपरा क्यों तोड़ी?

हाल ही में 'द कज़न ठाकरेः उद्धव, राज ऐंड शैडोज़ ऑफ़ देयर् सेनाज़' नाम से किताब लिखने वाले राजनीतिक पत्रकार और लेखक धवल कुलकर्णी कहते हैं, "आप भारत के सभी राजनीतिक परिवारों को समझ सकते हैं लेकिन इनमें ठाकरे परिवार बिल्कुल अलग है. क्योंकि चाहे करुणानिधि हों या मुफ़्ती या गांधी, ठाकरे परिवार ने पारंपरिक तौर पर खुद को चुनाव से अलग रखा है. हालांकि उन्होंने पार्टी और सरकार पर अपनी पकड़ पहले से मजबूत बनाई है."

वे कहते हैं, "एक तरह से कह सकते हैं कि ठाकरे परिवार ने यहां परोक्ष रूप से शासन किया है. उन्होंने यहां की सत्ता को लेकर छद्म परंपराओं का अपना ही एक तरीका बनाया. जब 1995 में पहली बार शिवसेना सरकार बनी तब बाला ठाकरे अक्सर तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी से भिड़ते हुए देखे गए थे.''

''आख़िरकार जोशी की जगह नारायण राणे को मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन राणे को उनके विद्रोह के लिए ज़्यादा ख्याति मिली जब उन्होंने 2005 में शिवसेना को मुश्किलों में पहुंचा दिया था. तब रिमोट कंट्रोल से चलाई जा रही महाराष्ट्र की सरकार, जैसा कि बाला ठाकरे ने खुद कहा था, में मरोड़ पैदा हो गई.''

''इसकी सबसे बड़ी वजह यह निकल कर आई कि राज्य का मुख्यमंत्री पूरी तरह से पार्टी प्रमुख के नियंत्रण में नहीं रह सकता है. लिहाजा आदित्य की चुनाव मैदान में एंट्री शिवसेना की अब तक 'रिमोट कंट्रोल' से सरकार चलाने की राजनीति का अंत माना जा सकता है."

कुलकर्णी कहते हैं, "शिवसेना एक आक्रामक संगठन है इसलिए ऐसा माना जा सकता है कि आदित्य के सरकार में आने से सत्ता के साथ पार्टी का टकराव भी कम होगी."

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नई पीढ़ी को चुनाव में आजमा चुका है पवार परिवार

दूसरी ओर पवार परिवार की तीसरी पीढ़ी के रोहित पवार भी करजात-जमखेद से चुनावी मैदान में उतरे हैं. ठाकरे के उलट पवार ने कभी ऐसा नहीं माना कि चुनाव में उनकी दिलचस्पी नहीं है.

दशकों तक महाराष्ट्र की राजनीतिक क्षितिज पर शरद पवार के वर्चस्व के बाद उनकी बेटी सुप्रिया सुले लोकसभा चुनाव जीत कर संसद पहुंची. इसके अलावा उनके भतीजे और राज्य में विपक्ष के नेता अजीत पवार उप-मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं.

2019 के विधानसभा चुनाव में पवार परिवार अपनी नई पीढ़ी के साथ उतरा है. अजीत पवार के बेटे पार्थ इसी साल मई में हुए लोकसभा चुनाव में हाथ आजमा चुके हैं. हालांकि पहली बार में उन्हें नाकामी मिली. अब शरद पवार के दूसरे पोते रोहित लॉन्च के लिए तैयार हैं.

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Image caption पंकजा और प्रतिमा मुंडे

वंशवाद को लेकर बीजेपी की कहानी भी अलग नहीं

वंशवाद का हमेशा विरोध करने वाली बीजेपी इस बात का दावा करती है कि उसकी पार्टी में वंशवाद नहीं है. वंशवाद के ही मुद्दे पर वो कांग्रेस पर खुला प्रहार भी करती आई है लेकिन महाराष्ट्र में की कहानी कांग्रेस से उलट नहीं है.

यहां उन्होंने ऐसे 25 उम्मीदावर मैदान में उतारे हैं जिनका राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक है. बीजेपी की सूची में कई बड़े नाम हैं.

दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे पराली से मैदान में हैं. फडणवीस सरकार में मुंडे बाल एवं महिला कल्याण मंत्री रही हैं. उनकी बहन प्रीतम बीड से सांसद हैं.

राजनीतिक विवाद तब भड़का जब बीजेपी ने अपने कद्दावर नेता एकनाथ खड़से को टिकट नहीं दिया, उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में मंत्रिमंडल से हटाया गया था.

हालांकि बीजेपी ने उनकी बेटी रोहिणी को टिकट दिया है. खड़से की बहू रक्षा पहले ही सांसद हैं. आकाश फुंडकर दिवंगत बीजेपी नेता पांडुरंग फुंडकर के बेटे हैं और बुलढाणा के खामगांव से चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. बीजेपी के वरिष्ठ नेता एनएस फरांडे की बहू देवयानी फरांडे नासिक से चुनाव लड़ रही हैं.

महाराष्ट्र की अन्य पार्टियों से कई नेता बीजेपी में शामिल किए गए हैं. इनमें भी कई ऐसे हैं जो वंशवाद की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.

एनसीपी के पूर्व नेता और मंत्री रह चुके गणेश नाइक अपने बेटे संदीप नाइक के साथ बीजेपी में शामिल हो गए. अब संदीप नवी मुंबई से बीजेपी के प्रत्याशी बनाए गए हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे बीजेपी के राज्यसभा सांसद हैं. लेकिन उनके बेटे जो अब तक कांग्रेस के विधायक थे बीजेपी ने उन्हें नामांकन भरने से ठीक एक दिन पहले पार्टी में शामिल करते हुए चुनाव में उतार दिया.

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Image caption राधाकृष्ण विखे पाटील

मधुकर पिचड़ और उनके बेटे वैभव दशकों तक शरद पवार के वफादार थे लेकिन अब वैभव बीजेपी की टिकट पर अकोला से मैदान में हैं. राणा जगजीत सिंह का तो शरद पवार के परिवार से संबंध है. वे एनसीपी के विधायक थे और उनके पिता पद्मसिंह एनसीपी के सांसद. लेकिन दोनों बीजेपी में शामिल हो गए और राणा जगजीत सिंह बीजेपी की टिकट पर चुनावी मैदान में हैं.

एक और कद्दावर राजनीतिक परिवार अहमदनगर से विखे परिवार है जिसने बीजेपी जॉइन की है. राधाकृष्ण विखे पाटील 2019 के लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले तक विधानसभा में कांग्रेस के विपक्ष के नेता थे लेकिन उसके बाद उनके बेटे डॉ. सुजय विखे पाटील बीजेपी की टिकट पर लोकसभा चुनाव जीत गए, अब पिता राधाकृष्ण भी बीजेपी की टिकट पर चुनावी मैदान में हैं.

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कांग्रेस और एनसीपी में वंशवाद का बोलबाला

इस बात की लगातार आलोचना की जाती है कि कभी कांग्रेस और एनसीपी में कुछ ही परिवारों का प्रभुत्व रहा है और ये ही परिवार इन पार्टियों को चला रहे हैं.

यहां तक कि जब दोनों ही पार्टियों के नेता लगातार सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल हो रहे हैं उसके बाद भी उनकी पार्टियों में जो टिकटें दी जा रही हैं उसमें भी वंशवाद का जोर ही दिख रहा है.

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिवंगत नेता विलासराव देशमुख के बेटे अमित देशमुख लातूर से विधायक हैं और दोबारा यहीं से चुनावी मैदान में हैं.

लेकिन इस चुनाव में वे अकेले अपने परिवार से नहीं उतरे हैं बल्कि उनके साथ उनके छोटे भाई धीरज भी लातूर ग्रामीण से चुनावी अखाड़े में हैं.

विश्वजीत कदम दिवंगत कांग्रेस नेता पतंगराव कदम के बेटे हैं. वे अपने पिता की सीट कड़ेगांव-पालुस से ही मैदान में उतरे हैं.

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Image caption प्रणति शिंदे

पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार शिंदे की बेटी प्रणति शिंदे सोलापुर से अपनी किस्मत आजमाइश कर रही हैं.

एनसीपी में धनंजय मुंडे जिन्हें कभी गोपीनाथ मुंडे के वारिस के रूप में देखा गया था लेकिन वरिष्ठ मुंडे ने भतीजे पर अपनी बेटी को तरजीत दी तो धनंजय ने एनसीपी का दामन थाम लिया.

वह महाराष्ट्र विधानसभा में पार्टी के नेता हैं और अपनी बहन पंकजा के ख़िलाफ़ एनसीपी की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. वरिष्ठ एनसीपी नेता और महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल येओला से एनसीपी की टिकट पर चुनावी मैदान में हैं तो उनके बेटे पंकज एनसीपी के लिए नंदगांव से अखाड़े में हैं.

द हिंदू के राजनीतिक संवाददाता आलोक देशपांडे कहते हैं, "इसका कोई जवाब नहीं है लेकिन इनकी जीत की वजह से ही वंशवाद की राजनीति चलती चली जा रही है, चाहे सत्ताधारी पार्टी कोई भी क्यों न हो."

वे कहते हैं, "चूंकि इन परिवारों के पास वर्षों से वफादार मतदाता हैं इसलिए उनके क्षेत्र में उनका विरोध नहीं होता है. यही वजह है कि हर पार्टी उन्हें अपने पाले में चाहती है. और यही वजह है कि वंशवाद की राजनीति बदस्तूर जारी है."

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