नज़रबंद नेताओं के बीच कश्मीर में कैसे होंगे ये घरेलू चुनाव?

  • 12 अक्तूबर 2019
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एक तरफ़ जहां कश्मीर घाटी में राजनीतिक पार्टियों से जुड़े बड़े, मंझले, छोटे नेता नज़रबंद हैं, ज़म्मू-कश्मीर में ब्लॉक डेवलेपमेंट काउंसिल (बीडीसी) के चुनाव की तैयारी हो रही है.

जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद वहां ये पहले चुनाव होंगे.

ब्लॉक डेवलेपमेंट काउंसिल के चुनाव 24 अक्टूबर को होने हैं.

ब्लॉक डेवलेपमेंट काउंसिल पंचायती राज व्यवस्था प्रणाली का दूसरा स्तर है. इसमें पंच और सरपंच वोट करते हैं.

जम्मू-कश्मीर में 316 ब्लॉक हैं. 310 ब्लॉक्स में चुनाव होने हैं.

एक तरफ़ जहां घाटी में राजनीतिक नेता नज़रबंद हैं और इंटरनेट और मोबाइल सेवा बंद, विपक्षी नेता इन चुनाव को "लोकतंत्र का मज़ाक़" बता रहे हैं.

आलोचकों के मुताबिक केंद्र सरकार के कदमों के कारण घाटी में "राजनीतिक शून्यता" आएगी जिससे लोगों की व्यवस्था में आस्था कम होगी.

जम्मू में कांग्रेस के रविंदर शर्मा शिकायत करते हैं, "हम कैसे उम्मीदवार खड़े करें? हम उम्मीदवारों को कैसे चुनें जब हम उनसे संपर्क नहीं सकते? घाटी में हमारे सारे नेता नज़रबंद हैं."

अगस्त में रविंदर शर्मा प्रेसवार्ता करने से रोक गया था और हिरासत में ले लिया गया था.

कांग्रेस ने इन चुनाव का बहिष्कार किया है. पार्टी का कहना है कि वो अपने नेताओं से संपर्क नहीं कर पा रही है.

जम्मू और कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी के हर्ष देव सिंह कहते हैं, "हम अपने उम्मीदवारों को अथॉरिटी लेटर्स नहीं दे पाए हैं, ताकि वो हमारे चुनाव चिन्हों पर लड़ पाएं. ये किस तरह के चुनाव हैं."

हर्ष देव सिंह को हाल ही में जम्मू में "58 दिन की नज़रबंदी" के बाद रिहा किया गया था.

"लोकतंत्र का मतलब है कि राजनीतिक दलों और नेताओं को समान अवसर मिलें. ये लोकतंत्र का मज़ाक़ है.... ये चुनाव औपचारिकता मात्र हैं. ये दिखानें की कोशिश है कि घाटी में चुनाव हो रहे हैं."

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हर्ष देव सिंह के मुताबिक उनकी पार्टी भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए इन चुनाव में हिस्सा ले रही है.

नेशनल कॉन्फ़्रेंस और पीडीपी नेताओं का भी कहना है कि वो ज़मीन पर अपने कार्यकर्ताओं और उम्मीदवारों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं.

नेशनल कॉन्फ़्रेंस के देवेंदर सिंह राणा का कहना है, "जब सब कुछ लॉकडाउन में है तो ऐसे वक्त राजनीति के बारे में बात करना उचित नहीं होगा."

"ऐसी स्थिति में राजनीतिक गतिविधि कैसे होगी? राजनीतिक गतिविधियों के लिए एक तरह का माहौल चाहिए.... जब तक राजनीतिक कार्यकर्ता लोगों से मिलेंगे नहीं, लोगों की भावनाओं, आकांक्षाओं को समझकर नेताओं तक जानकारी नहीं पहुंचाएंगे, तब तक सिस्टम कैसे चलेगा."

इस बीच जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संगठन से जुड़ीं शेहला रशीद ने सोशल मीडिया पर चुनावी राजनीति छोड़ने की घोषणा की.

उन्होंने लिखा, "जो चल रहा है वो लोकतंत्र नहीं है, बल्कि ये लोकतंत्र की हत्या है. ये कठपुतली नेताओं को बिठाने की योजना है."

कुछ महीने पहले शेहला रशीद, पूर्व आईएएस अफ़सर शाह फ़ैसल की जम्मू कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट में शामिल हुईं थीं.

राजनीतिक गतिविधियों पर असर

उधर जम्मू-कश्मीर भाजपा के रविंदर रैना नहीं मानते कि नेताओं की गिरफ़्तारी से घाटी की राजनीतिक गतिविधियों पर असर पड़ा है.

वो कहते हैं, "घाटी में मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के नेताओं पर कोई केस दर्ज नहीं किए गए हैं. सिर्फ़ फ़ारुख़ अब्दुल्लाह के ख़िलाफ़ केस (पब्लिक सेफ़्टी ऐक्ट) लगाया है और वो भी क्योंकि इंटेलिजेंस एजेंसियों को ये डर था कि वो बयानबाज़ी करके हालात खराब कर सकते हैं. इसके अलावा बाकी नेता हाउस अरेस्ट में हैं. प्रिवेंटिव कस्टडी में हैं. इनके ख़िलाफ़ सरकार ने एफ़आईआर डालकर इन्हें अंदर नहीं किया जैसे ये करते थे."

घाटी में पूर्व मुख्यमंत्रियों उमर अब्दुल्लाह, फ़ारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती के अलावा सज्जाद लोन, शाह फ़ैसल के अलावा कई नेता और पूर्व विधायक भी नज़रबंद हैं.

भाजपा के रविंदर रैना के मुताबिक नेताओं को नज़रबंद करने का कारण है कि कहीं वो हालात ख़राब न कर दें जिससे लोगों की जान न जाए.

प्रशासन ने हाल ही में जम्मू के नेताओं की नज़रबंदी ख़त्म कर दी थी.

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गवर्नर सत्यपाल मलिक के सलाहकार फ़ारुक ख़ान को ये कहते मीडिया में बताया गया कि हर व्यक्ति के आंकलन के बाद कश्मीरी नेताओं को भी नज़रबंदी से छोड़ दिया जाएगा.

जम्मू के नेताओं को श्रीनगर में पार्टी प्रमुखों से मुलाकात करने की इजाज़त भी दी गई.

नेशनल कॉन्फ़्रेंस के देवेंदर राणा उस प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा थे जिन्होंने उमर और फ़ारुख अब्दुल्लाह से मुलाकात की.

उन्होंने कहा, "वो स्थिति को लेकर दुखी हैं. उन्हें लोगों की चिंता है."

पीडीपी के प्रतिनिधिमंडल को भी पार्टी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती से मिलने की इजाज़त मिली लेकिन एक नेता के मुताबिक़ प्रशासन से इजाज़त मिलने और मिलने के वक्त के बीच समय इतना कम था कि प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों को उतने समय में इकट्ठा करके श्रीनगर जाने के लिए पर्याप्त वक्त नहीं था.

कई पार्टी कार्यकर्ता अंडरग्राउंड हैं या डरे हुए हैं या जम्मू सहित दूसरे इलाकों में भाग गए हैं.

नेशनल कॉन्फ़्रेंस और पीडीपी के दफ़्तर खाली पड़े हैं.

नज़रबंद किए गए एक सरपंच ने मुझे श्रीनगर हाई कोर्ट में बताया, "हमने संसदीय चुनाव में वोट दिया. उसका हमें ये सिला मिला."

उस सरपंच पर पब्लिक सेफ़्टी एक्ट लगाया गया था.

ये क़ानून किसी व्यक्ति को सुरक्षा के लिहाज़ से ख़तरा मानते हुए एहतियातन हिरासत में लेने का अधिकार देता है.

कई लोग फ़ारुख़ अब्दुल्लाह की नज़रबंदी और उनके ऊपर पीएसए लगाए जाने से सकते में हैं.

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एक व्यक्ति ने कहा, "घाटी में फ़ारुख़ अब्दुल्लाह सबसे ऊंचे क़द के भारतीय थे. अगर उनके ऊपर पीएसए लग सकता है तो कुछ भी हो सकता है."

कुछ लोगों ने कहा, राजनीतिक नेताओं के साथ जो हुआ सही हुआ क्योंकि उन्होंने "अपनी तिजोरियां भरी और लोगों की सेवा नहीं की."

ऐसे वक्त जब ज़मीन पर गतिविधियां थम सी गई हैं, विपक्षी नेता बीडीसी चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं.

जम्मू और कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी के हर्ष देव सिंह कहते हैं, "घाटी में 19,582 पंच और सरपंच की सीटें हैं जिनमें से 7,528 पोस्ट भरी हैं. इसका मतलब है 64 प्रतिशत सीटें खाली हैं. अगर आपके पास बीडीसी चुनाव के लिए वोटर नहीं हैं, तो वोट कौन डालेगा?... इस चुनाव की क्या विश्वसनीयता है?"

घाटी में नेशनल कॉन्फ़्रेंस और पीडीपी के भविष्य को लेकर कयास जारी हैं.

दोनों पार्टियों की राजनीति जम्मू और कश्मीर की स्वायत्ता को सुरक्षित रखने के चारों ओर घूमती थी.

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 ख़त्म करने के बाद दोनों पार्टियों के पैरों तले से राजनीतिक ज़मीन सरक गई है.

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सरकार के फ़ैसले के पक्षधर कहते हैं इससे जम्मू और कश्मीर में अब्दुल्लाह और मुफ़्ती परिवारों के राजनीतिक दबदबे को ख़त्म करके नए राजनेता तैयार करने में मदद मिलेगी.

हर्ष देव सिंह इससे सहमत नहीं हैं.

वो कहते हैं, "किसी राजनीतिक दल को चलाने के लिए किसे रखा जाता है, संविधान ने ये अधिकार ने पार्टी या उसके नेताओं को दिए हैं. लोग फ़ैसला करें कि पार्टी को वोट देना है या नहीं देना है. अगर उन्होंने गलत किया है तो उन्हें कानून के ख़िलाफ़ कार्रवाई कीजिए. फिर आप उनसे कहते हैं कि हम उन्हें चुनाव ही नहीं लड़ने देंगे तो कौन सा निज़ाम चला रहे हैं आप जम्मू और कश्मीर के अंदर?"

डॉक्टर नूर मोहम्मद बाबा सेंटर यूनिवर्सिटी ऑफ़ कश्मीर के डिपार्टमेंट ऑफ़ पॉलिटिक्स एंड गवर्नेंस में पढ़ाते हैं और जम्मू -कश्मीर में "अराजकता" की चेतावनी देते हैं.

"ऐसा लगता है कि (यहां) लोगों को थोपने की योजना है. ये लीडरशिप नहीं होगी. ये एक दमनकारी तरीका होगा. इससे लोगों में घृणा, बगावत, गुस्सा और अविश्वास पैदा होगा."

स्थानीय भाजपा नेताओं का दावा है कि बीडीसी चुनाव से घाटी में नए नेता पैदा होंगे.

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भाजपा के रविंदर रैना कहते हैं, "कश्मीर में कोई राजनीतिक शून्यता नहीं है. यहां हज़ारों की तादाद में पंच और सरपंच हैं. फिर ब्लॉक डेवलेपमेंट प्रमुख का चुनाव होगा.... जो जीतेगा उसका कैबिनेट रैंक होगा. राजनीतिक पार्टियां की भी गतिविधियां जारी हैं."

लेकिन क्या ये आसान होगा?

डॉक्टर नूर मोहम्मद बाबा कहते हैं, "नेता एक व्यवस्था से उभरते हैं. नेता लोगों को इकट्ठा करता है, उनकी समस्याओं को सुनता है, उनसे जुड़ता है और फिर विश्वास का एक रिश्ता कायम होता है. ऐसा होने में सालों, दशकों लग जाते हैं."

वो कहते हैं, "ये ज़रूरी है कि एक राजनीतिक आंदोलन को उभरने के लिए आज़ाद निष्पक्ष माहौल हो ताकि लोगों को साथ लाया जा सके, लोगों के पास जाया जा सके, और लोगों का भरोसा हासिल हो. विश्वास से ही लंबे समय के रिश्ते पनपते हैं."

जम्मू-कश्मीर में भाजपा 290 ब्लॉक्स में चुनाव लड़ रही है. बाकी सीटों पर पार्टी निर्दलीय और दूसरे उम्मीदवारों का समर्थन कर रही है.

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हर्ष देव सिंह कहते हैं, "सिर्फ़ एक ही पार्टी हर जगह पहुंच पा रही है. और वो है भाजपा.... पार्टी ये इंप्रेशन देने की कोशिश कर रही है कि एकमात्र भाजपा ही चुनाव लड़ रही है."

भाजपा नेता इसे "बहाना" बताते हैं.

रविंदर रैना कहते हैं, "एनसी और पीडीपी ने पंचायत चुनाव का बहिष्कार किया था. इसलिए उनकी पार्टियों के पंच और सरपंच नहीं बने. अब उन्हें पता है कि वो बीडीसी चुनाव नहीं जीतेंगे. इसलिए ये पार्टियां बहाने बना रही हैं."

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"हमें अपने नेताओं से संपर्क करने में कोई समस्या नहीं है. लैंडलाइन हैं. हमारी राजनीतिक गतिविधियां जारी हैं. हम अपने लोगों के संपर्क में हैं. मैंने कश्मीर के सभी ज़िलों का दौरा किया है. हम वहां कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग कर रहे हैं."

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