क्या बिहार में जेडीयू से अलग हो रही है बीजेपी

  • 11 अक्तूबर 2019
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बिहार में किसकी सरकार है?

इसका आदर्श जवाब होगा, 'एनडीए की'. यानी बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार.

लेकिन, यह जवाब अब उतना ही आदर्श बचा रह गया है, जितना कि आदर्श रूप से बचे रह गए हैं इस गठबंधन की सहयोगी पार्टियों के राजनीतिक मूल्य और सिद्धान्त.

यदि व्यावहारिक रूप में कहा जाए तो बिहार में इस वक्त केवल नीतीश कुमार की सरकार है और ऐसा हम नहीं बल्कि बीते कुछ दिनों के दौरान के राजनीतिक घटनाक्रम कह रहे हैं.

कुछ दिनों पहले जब जेडीयू की ओर से 'क्यों करें विचार, ठीके तो हैं नीतीश कुमार' वाला स्लोगन जारी किया गया तब से ही आगामी विधानसभा चुनाव में एनडीए के मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर विवाद चल रहा है.

एक तरफ जेडीयू का कहना है कि पिछली बार की तरह ही इस बार 2020 के विधानसभा चुनाव में भी उनका चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे. जबकि दूसरी तरफ बीजेपी के नेताओं की तरफ से ऐसे बयान आए हैं कि अबकी बार चेहरा बदलना चाहिए और मुख्यमंत्री बनाने का मौका बीजेपी को देना चाहिए.

वैसे तो एनडीए गठबंधन की तीनों पार्टियों ने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत समझौता करके गठबंधन की सरकार बनाई थी. मगर राम मंदिर, तीन तलाक़, अनुच्छेद 370 और एनआरसी जैसे बीजेपी के मुख्य मुद्दों पर जेडीयू की असहमति देश की संसद तक में दर्ज हो चुकी है.

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बारिश के बाद बदले हालात

इन तमाम असहमतियों और विवादों के बीच एक दिन (11 सितंबर 2019 को) जब उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यह ट्वीट किया कि "एनडीए के कप्तान नीतीश कुमार हैं और आगामी विधानसभा चुनाव में वही कप्तान रहेंगे", तब ऐसा लगा था कि दोनों पार्टियों के बीच तल्खियां कम हो गई हैं और वे नीतीश कुमार को एनडीए का चेहरा बनाने पर तैयार हो गए हैं.

लेकिन इसके बाद पटना में भारी बारिश हुई. भीषण जलजमाव हो गया. ऐसा कि उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार को उनके राजेंद्र नगर स्थित आवास से एनडीआरएफ की टीम को रेस्क्यू करना पड़ा.

हालात इतने बदतर हो गए हैं कि शहर के कई इलाकों में बारिश रुकने के 10 दिनों बाद तक भी पानी जमा है और इस ठहरे काले पानी को लेकर दोनों पार्टियों के नेताओं के बीच हो रही बयानबाज़ी अब गठबंधन को डूबोने की तैयारी करती दिख रही है.

एक तरफ जहां बीजेपी के नेता जलजमाव के लिए स्थानीय प्रशासन को दोषी बता रहे हैं, साल 2005 से सूबे की सत्ता पर काबिज जेडीयू को इसका ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ जेडीयू की तरफ से ऐसे बयान आ रहे हैं कि भले ही वे बिहार की सत्ता पर इतने दिनों से राज कर रहे हों, मगर पटना में हुए जलजमाव के लिए बीजेपी ज़िम्मेदार है क्योंकि इतने दिनों से पटना के सासंद और विधायक बीजेपी के ही हैं, पटना नगर निगम पर भी बीजेपी समर्थित मेयर ही शासन कर रही हैं. सोशल मीडिया पर यह लड़ाई देखी जा सकती है.

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दशहरे के कार्यक्रम में बीजेपी से कोई नहीं

मगर अब बात सोशल मीडिया से आगे निकल चुकी है. दशहरे के मौके पर गांधी मैदान में रावण वध के सरकारी कार्यक्रम के दौरान मंच पर सरकार की तरफ़ से तो खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मौजूद थे, मगर सरकार की सहयोगी पार्टी बीजेपी का एक भी प्रतिनिधि कार्यक्रम में शामिल नहीं हुआ. इसके उलट विपक्षी पार्टी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा रावण का वध कर रहे नीतीश कुमार के बगल में खड़े मुस्कुराते दिखे.

कार्यक्रम के आयोजकों के मुताबिक पिछले सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि गांधी मैदान के रावण वध कार्यक्रम में बीजेपी से कोई शामिल न हुआ हो. इस बार भी बीजेपी के नेताओं को आमंत्रित किया गया था. मंच पर उनके नाम की कुर्सियां भी लगाई गई थीं. लेकिन उनकी तरफ से कोई नहीं आया.

क्या रावणवध कार्यक्रम से बीजेपी का बायकॉट सरकार के बिखरने का संकेत है?

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "लग तो रहा है कि इस बार गठबंधन टूट जाएगा, सरकार बिखर जाएगी. मगर जब तक टूटे नहीं तब तक कुछ नहीं कहा जा सकता. क्योंकि जब इनका गठबंधन बना भी था तब भी कोई नहीं जानता था कि एक समय में एक-दूसरे से छुआछूत जैसी भावना लेकर चल रही दोनों पार्टियां रातों-रात एक हो जाएंगी. और जब से गठबंधन हुआ है तब से एक भी दिन ऐसा नहीं बीता कि दोनों के बीच मतभेद की बात न आयी हो. दोनों पार्टियों के बीच विभिन्न मुद्दों पर इतनी सारी असहमतियां ही हैं. हमेशा कलह होता रहता है. हम कह सकते हैं कि यह बीजेपी और जेडीयू की आपसी लड़ाई का नया संस्करण है."

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लेकिन इस बार अंतर्कलह गहरा गई है. विरोध के स्वर पहले से ज़्यादा मुखर और काफी संख्या में हैं. सबसे ज़्यादा सवाल तो उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की भूमिका पर उठे हैं. क्योंकि पहले हर बात पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले मीडिया फ्रेंडली सुशील मोदी जब से जलजमाव में रेस्क्यू किए गए हैं, तब से मीडिया से दूरी बना ली है.

मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "सुशील मोदी ने पहले तो तीन दिनों तक फंसे रहने का ड्रामा किया. फिर जब लोगों ने उनकी असलियत समझकर ट्रोल करना शुरू किया, सवाल पूछने शुरू किए, तब वे गायब हो गए. दरअसल वे सवालों से बच रहे हैं क्योंकि सबसे अधिक सवाल उन्हीं से पूछे जाएंगे. उनकी पार्टी के नगर विकास मंत्री, उनके समर्थन से बनीं मेयर, उन्हीं की पार्टी के सांसद और विधायक."

"सबसे बड़ा सवाल तो ये कि राज्य के उपमुख्यमंत्री ने तीन दिनों तक फंसे रहने का नाटक क्यों किया. अगर वे वाकई फंसे थे तो पहले ही दिन उन्हें केवल डीएम-एसपी को बोलना भर था. पूरा सरकारी अमला उनको निकालने में लग जाता. लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. दिखाने के लिए कि हम भी फंस गए हैं एक ड्रामा खेला. वो जानते हैं कि ये सारे सवाल उन्हीं से पूछे जाएंगे."

हमने सुशील मोदी से बात करने की बहुत कोशिश की. देशरत्न मार्ग स्थित उनके सरकारी बंगले पर भी गए. सैकड़ों बार फ़ोन मिलाया. लेकिन सुशील मोदी से बात नहीं हो सकी. उनके पीए राकेश प्रवीर से बात हुई.

उन्होंने कहा, "सर अभी किसी मीडिया वाले से बात नहीं कर रहे हैं. मैं आपका मैसेज तो उन तक पहुंचा देता हूं, मगर वे हर बार मना कर देते हैं."

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क्या कहा रविशंकर प्रसाद ने

आखिर जलजमाव के मुद्दे पर बीजेपी नीतीश कुमार और जेडीयू के साथ क्यों नहीं खड़ी है? दशहरे पर रावणवध कार्यक्रम के दौरान बीजेपी के नेता क्यों नहीं शामिल हुए?

बीजेपी के कद्दावर नेता, पटना साहिब से चुने गए सांसद और मौजूदा केंद्र सरकार में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से इन सारे सवालों पर हमारी बात हुई.

रविशंकर प्रसाद कहते हैं, "जहां तक बात रावणवध कार्यक्रम में शामिल नहीं होने की है तो हमने यह पहले ही ऐलान कर दिया था कि पटनावासियों के लिए आयी इस विपदा की घड़ी में हम खुशी-खुशी दशहरा नहीं मनाएंगे. अपने लोगों के दुख में शामिल होंगे."

जेडीयू के साथ टकराव के सवाल पर प्रसाद कहते हैं, "हमारा कोई टकराव नहीं है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष (संजय जायसवाल) ने पहले ही कहा था कि यह प्राकृतिक विपदा के साथ-साथ प्रशासनिक अक्षमता भी है. इस बात में कोई दो राय नहीं कि स्थानीय स्तर पर कई गड़बड़ियां हुई हैं. हमने जांच कर दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग भी की है."

लेकिन दोषी कौन लोग हैं? क्या बीजेपी के लोगों पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती?

रविशंकर प्रसाद कहते हैं, "जांच हो रही है. जो दोषी हैं वे ज़रूर पकड़े जाएंगे और यदि जांच में हमारी भी पार्टी से कोई नाम आता है तो हम उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को तैयार हैं. जहां तक बात ज़िम्मेदारी की है तो हम अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं इसलिए पिछले दो हफ़्तों से लगातार ग्राउंड पर हैं. राहत और बचाव कार्य में लगे हैं. हमने त्यौहार नहीं मनाने का फ़ैसला किया."

जेडीयू से अलग होने की बात पर रविशकंर ने कहा, "यह मैं कैसे कहूं? सरकार तो ठीक ही चल रही है. अभी तो कोई दरार नहीं है. जो होना है वो हो ही जाएगा."

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किसे सबसे ज़्यादा नुक़सान

बीते दिनों में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को लेकर जितनी भी बातें हुई हैं, उनमें से अधिकतर बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा ही उठायी गई हैं. जेडीयू की तरफ से कोई भी बड़ा नेता इन मसलों पर खुलकर सामने नहीं आया है. तो क्या बीजेपी की तरफ से अलग होने की औपचारिक घोषणा का इंतजार कर रही है जेडीयू?

जेडीयू के वरिष्ठ नेता और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह बीबीसी से कहते हैं, "पहली बात तो ये कि जेडीयू आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति नहीं करती. जहां तक बात सरकार की है तो वह अच्छे से चल रही है. अब बीजेपी के नेता रावणवध कार्यक्रम में क्यों नहीं आए और वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, ये तो वही बता सकते हैं. सरकार ने जितना संभव हुआ है, जलजमाव की स्थिति से निपटने का प्रयास किया. अभी तक राहत और बचाव कार्य चल रहे हैं. मैं इतना ही कहूंगा कि जिनको दोष देना है वो दोष देते रहें, मगर वे अपनी ज़िम्मेदारियों को भी समझें."

जलजमाव के मुद्दे पर जिस तरह बिहार की राजनीति घूमती दिख रही है, उससे सबसे ज़्यादा नुकसान किसे होगा?

मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "ये लोग राजनीति करके जनता का नुकसान पहले करा चुके हैं. पार्टी की बात करें तो पटना के लिहाज से बीजेपी को इसका अधिक नुकसान होगा. लेकिन बिहार के स्तर पर नीतीश कुमार और जेडीयू की सुशासन वाली छवि को कहीं अधिक नुकसान पहुंचा है."

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