कौन हैं ट्रांसजेंडर रेवती जिनका नाम कोलंबिया यूनिवर्सिटी में लिखा गया

  • 13 अक्तूबर 2019
ए रेवती
Image caption ए रेवती

हमेशा से ये कहा जाता रहा है कि तमिल साहित्य की दुनिया में मर्दों और औरतों के बीच समानता नहीं है. तमिल साहित्य में जो पद-सम्मान और प्रतिष्ठा पुरुष लेखकों को हासिल है या मिली है, महिला लेखकों को कभी भी नहीं मिली.

लेकिन ट्रांसवूमन और लेखक ए रेवती ने इस क्षेत्र में अपना अलग मुक़ाम बनाया है. उन्होंने वो प्रतिष्ठा हासिल की है जो इसके पहले तमिल साहित्य में किसी को प्राप्त नहीं हुई.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में उनका नाम माया एंगलो, टोनी मॉरिसन, मारमॉन सिल्को और शांजे जैसे मशहूर लेखकों के नाम के साथ लिखा गया है.

कोलंबिया की बटलर लाइब्रेरी के प्रवेश द्वार पर आठ पुरुष लेखकों के नाम जिसमें अरस्तू, प्लेटो, होमर, डेमोस्थेनेस और सिसेरो जैसे महान लेखक शामिल हैं, लिखा हुआ है. इस बात को लेकर काफी विरोध हुआ कि आख़िर इसमें महिला लेखकों के नाम क्यों नहीं शामिल हैं.

फिर साल 1989 में कुछ छात्रों ने ख़ुद ही महिला लेखकों के नाम लिख दिए और इतना ही नहीं इन महिला लेखकों के नाम पुरुष लेखकों के नाम के ऊपर थे. लेकिन इन नामों को कुछ ही दिनों में मिटा दिया गया.

अब लगभग पूरे 30 साल बाद, महिलाओं के विरोध को देखते हुए एक बैनर, जिस पर अंतरराष्ट्रीय ख़्याति प्राप्त महिला लेखकों के नाम लिखे हुए हैं उसे यहां प्रदर्शित किया गया है. और ख़ास बात यह है कि इन महिलाओ में ए रेवती का नाम भी शामिल है.

हमने इस संदर्भ में रेवती से मुलाक़ात की, पढ़िए उनके साथ हुई बातचीत के मुख्य अंश -

कौन हैं रेवती?

जिस तरह से आपने ये सवाल मुझसे पूछा ठीक उसी तरह एक वक़्त पर यही सवाल मैंने ख़ुद से भी पूछा था. लेकिन अपने भीतर की रेवती को खोजने और पाने के लिए मुझे एक लंबा संघर्ष करना पड़ा.

तमिलनाडु के नमक्कल ज़िले के दुरईसामी में जन्मी रेवती जब पांचवी कक्षा में थीं तब उन्हें ख़ुद में कुछ लैंगिक बदलाव महसूस हुए.

पांचवी में पढ़ने वाली रेवती को लोगों के ताने सुनने पड़े. क्या स्कूल क्या पड़ोस...हर जगह अपमान झेलना पड़ा. लेकिन यह सबकुछ सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं था. माता-पिता और भाई की ओर से भी उन्हें काफी परेशानियां उठानी पड़ीं. एक वक़्त के बाद उन्होंने घर-परिवार छोड़ दिया और कभी दिल्ली तो कभी मुंबई रहीं.

हमारे समाज में एक ट्रांसजेंडर को जो कुछ परेशानी और तक़लीफ़ें उठानी पड़ती हैं रेवती ने भी उठाईं. रेवती भी हर उस तक़लीफ़ से गुज़रीं जिसका ज़िक्र हम आमतौर पर ट्रांसजेंडर लोगों के संदर्भ में सुनते हैं या पढ़ते हैं.

इसके बाद साल 1999 में वे बेंगलुरु में संगम ऑर्गेनाइज़ेशन से जुड़ गईं.

रेवती कहती हैं "जिस रेवती को आज आप देख रहे हैं उसे संगम लाइब्रेरी ने तराशा है. मैं साहित्यकार नहीं हूं. और सच कहूं तो मैंने बहुत ज़्यादा कुछ पढ़ा भी नहीं है. मुझे तो भाषा को लेकर डर भी था. एक समाज जो सबकुछ पवित्र-अपवित्र की नज़र से देखता है वहां भाषा भी पवित्रता से जुड़ी चीज़ है. मेरा डर इसी पवित्रता का सामना करने को लेकर था."

Image caption लाइब्रेरी के प्रवेश द्वार पर रेवती का नाम

रेवती पुराने दिनों को याद करते हुए कहती हैं " संगम में एक लाइब्रेरी थी, जिसने मुझे पढ़ने-लिखने से जुड़ा एक ऐसा अनुभव दिया जो बेहतरीन था. मैंने वहां बहुत सारी किताबें पढ़ीं. इससे फ़ायदा यह हुआ कि मेरे सामने कुछ सवाल खड़े हो गए. अंग्रेज़ी भाषा में ढेरों ऐसी किताबें थीं जिनमें ट्रांसजेंडर लोगों के दर्द को बेहद क़रीब से उकेरा गया था लेकिन वहां ऐसी कोई किताब नहीं थी जो भारतीय परिदृश्य से उस दर्द को बयां करती हो. इसी एक सवाल ने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया लेकिन मेरे भीतर हिचकिचाहट थी. लेखिका बामा ने मुझे लिखने के लिए वो भरोसा दिया और मुझे इस बात के लिए आगे बढ़ाया."

पहली किताब

रेवती ने अपनी पहली किताब "उनरवम उरुवमम" साल 2004 में लिखी थी. यह किसी ट्रांसवूमन पर किसी ट्रांसवूमन द्वारा लिखी गई पहली किताब है. इस किताब ने ट्रांसवूमन की ज़िंदगी को लेकर एक चर्चा को जन्म देने का काम किया. किताब के आने के बाद एक ट्रांसवूमन के नज़रिए से एक ट्रांसवूमन की ज़िंदगी को देखा गया. इस पर ढेरों चर्चाएं हुईं, विचार-विमर्श हुए.

"हालांकि मैंने किताब तो लिख दी थी लेकिन मैं अपनी भाषा को लेकर अब भी बहुत संकोच में थी और इस बात को लेकर भी परेशान थी कि इसमें वो सारे साहित्यिक पक्ष है या नहीं. उसी वक़्त पेंग्विन पब्लिकेशन ने मुझसे इस किताब का अंग्रेज़ी अनुवाद छापने की अनुमति देने के लिए आग्रह किया. इसने मुझे एक भरोसा दिया. तो इसके बाद मैंने उनसे पूछा, मैं अपनी आत्मकथी लिखूंगी. क्या वो भी अनुवादित हो सकेगी? वे तैयार हो गए. तो यह किताब- 'द ट्रुथ अबाउट मी:अ हिजड़ा लाइफ़ स्टोरी' सामने आई."

वो इस बात की भी वजह देती हैं कि उनकी आत्मकथा पहले अंग्रेजी में क्यों आई.

"मैंने अपनी ज़िंदगी के बारे में कुछ भी नहीं छिपाया है और अपनी ज़िंदगी के बारे हर एक बात को यथावत लिखा है. अगर यह किताब सीधे तमिल भाषा में प्रकाशित होता तो बहुत हद तक संभव है कि बहुत से लोग असहज हो जाते. इसलिए मैंने इसे पहले अंग्रेजी में ही प्रकाशित किया. लेकिन विडंबना तो यह है कि मुझे ख़ुद अंग्रेज़ी नहीं आती."

अंग्रेज़ी में किताब के प्रकाशित हो जाने के बाद बहुत से लोगों ने उन्हें विश्वास दिलाया और प्रोत्साहित किया कि वे इस किताब को तमिल भाषा में भी जारी करें. इसके बाद उनकी आत्मकथा तमिल भाषा में वेल्लाई मोझी के नाम से आई.

वो कहती हैं पेरुमल मुरुगन ने उनके लेखन को परिष्कृत करने में मदद की. वो कहती हैं, "हमारे घर एक-दूसरे के आसपास हैं. मैं उनसे लगातार मिलती रही और हमने बहुत बात-चर्चा की. वो हमेशा बताते रहते कि कैसे मैं अपनी लेखनी को और परिष्कृत करूं."

कोलंबिया में मिली इस पहचान के बारे में

रेवती को ख़ुद इस ख़बर के बारे में दो दिन बाद मालूम पड़ा.

वो बताती हैं, "मेरी एक दोस्त कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं, उसी ने मुझे इसके बारे में बताया. पहले तो मुझे यही समझ नहीं आया कि इसमें इतना ख़ास क्या है. फिर बाद में मुझे पता चला कि क़रीब तीस साल पहले महिला लेखकों ने विरोध प्रदर्शन किया था. मैं वाकई गर्व का अनुभव कर रही हूं."

रेवती चाहती हैं कि वो ख़ुद वहां जाकर अपना नाम वहां देखें.

"मैं ख़ुद वहां जाकर यह देखना चाहती हूं लेकिन पैसा एक बड़ा मसला है."

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ज़िंदगी का नाट्य रुपांतरण

रेवती ने नाटककार श्रीजीत और मंगई के साथ मिलकर भी काम किया है. उन्होंने अपनी ज़िंदगी को एक नाट्य प्रस्तुति के रूप में तैयार किया है जिसका तीस से अधिक बार मंचन हो चुका है.

वो कहती हैं "लिखना या फिर नाट्य मंचन... ये वो दो तरीक़े हैं जिसके द्वारा हम सबसे बेहतर तरीक़े से अपने मुद्दों को दूसरों तक पहुंचा सकते हैं."

वो अंत में कहती हैं "ट्रांसजेंडर्स के प्रति लोगों के रवैया में थोड़ा-बहुत तो बदलाव हुआ है. लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. अनुच्छेद 377 पर सुप्रीम कोर्ट का जो फ़ैसला आया वो वाकई उम्मीद जगाता है लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है."

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