सौरव गांगुली: शुरू होगी 'दादागिरी' की दूसरी पारी?

  • 15 अक्तूबर 2019
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रविवार की रात बीसीसीआई की मुंबई में अहम बैठक थी. मीटिंग का महत्व इसलिए भी काफी था क्यूंकि इस बैठक में उन लोगो का नाम तय होना था जिन्हें अब दुनिया की सबसे अमीर बोर्ड को चलाने की ज़िम्मेवारी दी जानी थी.

बीसीसीआई के पुराने योद्धा जो अब लोढ़ा कमेटी के नए कानून के मुताबिक अयोग्य घोषित हो चुके है, उन्होंने नया दाव खेलते हुए अपने अपने करीबी प्रतिनिधियों को मैदान में उतारा.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति (CoA) के तीन साल कार्यकाल के बाद 23 अक्टूबर को बोर्ड फिर से एक बार लोकतांत्रिक तरीके से एक नए टीम के साथ शुरुआत करेगी.

भारतीय क्रिकेट के सबसे प्रतिष्ठित कप्तान - सौरव गांगुली का अगला अध्यक्ष बनना लगभग तय है. इस खबर के बाद से सोशल मीडिया पर #SouravGanguly और #DADAGIRI ट्रेंड कर रहा है.

खेल की राजनीति या राजनीति का खेल!

क्रिकेट की दो पावरफुल लॉबी ने अपने-अपने उम्मीदवार को अध्यक्ष बनाने कि लिए पूरा दम ख़म लगा दिया. इसमें जहाँ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन का उम्मीदवार बृजेश पटेल, वही पूर्व कप्तान सौरव गांगुली और गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह भी मैदान में थे.

घूम फिर कर लगाम गृहमंत्री के हाथ में ही था. श्रीनिवासन ने शनिवार को गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर बृजेश पटेल का नाम सामने रखा था वही गांगुली ने भी अमित शाह को बीसीसीआई चीफ़ बनने की इच्छा जाहिर कर दी थी.

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मुंबई में क्रिकेट संघों की कई राउंड मीटिंग के बाद सौरव गांगुली के नाम पर सहमती बनी क्यूंकि उन्होंने साफ़ तौर पर बता दिया था की अध्यक्ष पद के अलावा उनका किसी और पद में कोई रूचि नहीं है. माना जा रहा है कि गांगुली को भारत सरकार के मंत्री अनुराग ठाकुर का भी समर्थन प्राप्त था.

अध्यक्ष पद खोने के बाद बृजेश पटेल ने आईपीएल का चैयरमैन बनने पर सहमति दे दी. गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह सचिव को सचिव के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा गया जबकि अरुण सिंह ठाकुर, जो अनुराग ठाकुर के छोटे भाई है, को कोषाध्यक्ष बनाए जा सकते हैं. बीसीसीआई का अपेक्स काउंसिल 9 सदस्यों का होगा. 14 अक्टूबर को संभवतः गांगुली अपना नामांकन दाख़िल करेंगे.

चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद पूर्व भारतीय कप्तान का कार्यकाल 10 महीने का होगा. फिलहाल गांगुली के लिए ये एक छोटा कार्यकाल होगा क्योंकि नए नियमों के तहत जुलाई 2020 से उनकी कूलिंग ऑफ़ अवधि शुरू हो जाएगी.

वह पिछले पांच वर्षों करीब दो महीने से क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल में पद संभाल रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित लोढ़ा कमेटि के नियमों के मुताबिक एक प्रशासक केवल छह साल के अंतराल पर सेवा दे सकता है.

इस पर सौरव का कहना है कि, "यह नियम है. इसलिए हमें इससे निपटना होगा. मेरी पहली प्राथमिकता प्रथम श्रेणी क्रिकेटर होंगे. मैंने सीओए से अनुरोध भी किया था कि रणजी ट्रॉफ़ी क्रिकेट पर विशेष ध्यान दिया जाए पर उन्होंने नहीं सुनी. उनके लिए क्रिकेटरों के वित्तीय हित सर्वोपरि है."

गांगुली, जिन्होंने अपनी आक्रामक कप्तानी के साथ भारतीय क्रिकेट में एक नए युग की शुरुआत की, वो बोर्ड के शीर्ष पद संभालने वाले दूसरे भारतीय कप्तान होंगे. बीसीसीआई के अध्यक्ष बनने वाले एकमात्र अन्य भारतीय कप्तान विजयनग्राम या विज्जी के महाराजकुमार थे, जिन्होंने 1936 में इंग्लैंड दौरे के दौरान 3 टेस्ट मैचों में भारतीय टीम का नेतृत्व किया था. वे 1954 में बीसीसीआई के अध्यक्ष बने थे.

दादा की दादागिरी (दूसरी पारी)

गांगुली कभी भी नेतृत्व की भूमिका निभाने से कतराते नहीं हैं. विश्व क्रिकेट में सबसे सफल कप्तानों में से एक के रूप में अपना करियर खत्म करने के बाद, उन्होंने बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया के संरक्षण में सीएबी में प्रशासन में प्रवेश किया.

जब गांगुली ने 2000 में भारत के कप्तान के रूप में पदभार संभाला था, तो भारतीय क्रिकेट गर्त में था. मैच फिक्सिंग कांड के बाद बोर्ड की आईसीसी में दबदबा काफ़ी कम हो गया था. बतौर कप्तान उन्होंने भारतीय क्रिकेट को विश्वास दिलाया कि भारत विदेशों में भी जीत सकता है.

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लोढ़ा कमिटी के आने के बाद भी कई चीज़ें ठंडे बस्ते में पड़ी है और ऐसे में एक पूर्व क्रिकेटर का बतौर बोर्ड का कमान संभालना खिलाडियों और क्रिकेट के प्रशंसकों के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है. गांगुली कहते हैं कि, "मैं नियुक्ति से खुश हूं क्योंकि यह वह समय है जब बीसीसीआई की छवि थोड़ी ख़राब है और मेरे लिए यह बहुत कुछ करने का शानदार मौका है."

हर क्रिकेट प्रेमी को याद है कैसे कप्तान गांगुली के नेतृत्व में उनकी टीम ने ईडन गार्डन में ऑस्ट्रेलिया की 16-टेस्ट जीत की लकीर को तोड़ दिया था. इसी तरह अब उम्मीद जताया जा सकता है कि वो बीसीसीआई में सालों से चली आ रही कमियों को बदलने में सक्षम होंगे. हालांकि ये इतना आसान नहीं होगा और वो भी इतने काम समय में.

उनके मुताबिक, "चाहे आप निर्विरोध चुने जाते हैं या अन्यथा, यह एक बड़ी जिम्मेदारी होगी क्योंकि बीसीसीआई क्रिकेट की दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है. भारत आज के दौर में एक पावरहाउस है. उनके लिए यह एक चुनौती होगी."

वही उनके टीम के महत्वपूर्ण सदस्य रहे क्रिकेटर हरभजन सिंह का मानना है कि उनकी नियुक्ति क्रिकेटर्स के लिए बहुत अच्छी ख़बर होगी क्यूंकि वो एक क्रिकेटर हैं और क्रिकेटर्स की मनोदशा को पूरी तरह से समझते हैं. उन्होंने साल 2000 में कप्तान के तौर पर नए टीम की नींव रखी थी. उनका एक विज़न है और हम उम्मीद कर सकते हैं कि उनकी ये दूसरी पारी पहली पारी से भी ज़्यादा सफल हो. हम उम्मीद करते हैं कि वो क्रिकेट प्रशासकों के लिए एक मिसाल बने."

हरभजन कहते हैं कि दादा तो जन्म से ही लीडर हैं. वो जब कप्तान थे तो सबक साथ लेकर चलते थे. हर बंदा उनसे मिलकर सवाल पूछ सकता था और अपनी नाराज़गी दर्ज़ करा सकता था, यही उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत थी. इसके अलावा बड़े मुद्दों पर भी वो सबकी राय लेते थे.

वही मिडिल आर्डर बैट्समैन सुरेश रैना का मानना है कि गांगुली को क्रिकेट की सबसे ज़्यादा समझ है और वो क्रिकेट व्यवस्था में जबरदस्त सुधार लाएंगे. उन्हें उम्मीद है की आने वाले दिनों में बोर्ड में कई सुधार देखने को मिलेंग, सबसे बड़ी बात है की उनको इसका पूरा अनुभव भी है.

क्या हो सकता है रवि शास्त्री पर कोई फ़ैसला?

शास्त्री और गांगुली के बीच कभी बनी नहीं. क्रिकेट के प्रशंसकों को याद होगा की शास्त्री जब एक कोच के पद के लिए चुनाव लड़ रहे थे, तब दोनों के बीच मीडिया में काफ़ी गहमा गहमी हुई थी और अनिल कुंबले को इस पद के लिए चुना गया था.

शास्त्री ने तब गांगुली पर अपने साक्षात्कार के दौरान अनुपस्थित रहने का आरोप लगाया था और तब से दोनों ने एक दूसरे पर एक बार भी हमला करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा. अब, गांगुली के अध्यक्ष बनने के बाद ये भी माना जा रहा है कि इन दोनों के बीच रिश्तों की वजह से आगे के फैसलों पर भी असर दिखेगा क्यूंकि आख़िरकार रवि शास्त्री को सौरव गांगुली को ही रिपोर्ट करना पड़ेगा. इंटरनेट की दुनिया में इसको लेकर हलचल अभी से ही शुरू है. अध्यक्ष बनने की ख़बर आने के साथ ही नेटिज़ेंस ने रवि शास्त्री को ट्रोल करना शुरू कर दिया.

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हालांकि पूर्व क्रिकेटर हरभजन का कहना है कि सौरव के आने से बहुत सारे मसलों में स्पष्टता आ जाएगी चाहे वो कोच का मुद्दा हो या फिर कोई और. उनके मुताबिक सौरव आए हैं तो आगे के लिए रोडमैप जरूर तैयार करेंगे और वो जो भी करेंगे क्रिकेट के लिए अच्छा ही होगा.

एक और विषय है जिसपर स्पष्टता की ज़रूरत है, वो है पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी. धोनी के रिटायरमेंट को लेकर तरह तरह की बातें मीडिया के जरिए लोगों तक पहुँचती है. अब तक क्रिकेट बोर्ड में भी इसको लेकर उलझन बरक़रार है.

गांगुली पहले भी कह चुके हैं, "हर बड़े खिलाड़ी को रिटायर होना पड़ता है. तेंदुलकर, लारा, ब्रैडमैन .. सभी को पद छोड़ना पड़ा और यही तरीका है और एमएस को भी ऐसा ही कोई फ़ैसला लेना पड़ेगा." ऐसे में धोनी के लिए भी नया रोल तय किया जा सकता है.

उम्मीदें बहुत हैं सौरव से और जब वो निर्विरोध चुने जाएंगे तो उनपर दबाब भी होगा लेकिन ये वही दादा है जिन्होंने दबाब में हमेशा बेहतरीन प्रदर्शन किया है. अगले 10 महीने का कार्यकाल भारतीय क्रिकेट के लिए अति महत्वपूर्ण है.

जहाँ उनपर बीसीसीआई की साख़ को फिर से मजबूत करने का जिम्मा होगा वही बीसीसीआई के अंदर भी कई बदलाव कर खेल और खिलाडियों के लिए नए रोडमैप बनाना होगा.

उनका ट्रैक रिकॉर्ड ज़बरदस्त रहा है और ऐसे में उम्मीद की जा सकती है हमें आने वाले दिनों में कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

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