हरियाणा: जाट आरक्षण आंदोलन के बाद देशद्रोह के मुक़दमे लड़ रहे जाट परिवारों का हाल

  • 16 अक्तूबर 2019
बीबीसी

रोहतक शहर के पूर्व में स्थित जाट भवन से लगभग हर पंद्रहवें दिन एक मिनी बस भरकर पंचकूला की सीबीआई अदालत के लिए निकलती है.

इस बस में वही गिने-चुने 22-23 लोग होते हैं जो बीते ढाई वर्षों से लगातार इसके यात्री हैं. जिस दिन कोर्ट की तारीख़ होती है, सुबह पाँच बजे सारे लोग जाट भवन पहुँच जाते हैं.

इसके बाद कुछ घंटों का सफ़र करके ये लोग सीबीआई कोर्ट पहुँचते हैं. वहाँ इन सबकी हाज़िरी लगती है. वकील और अधिकारी आपस में कुछ गुफ़्तगू करते हैं और फिर इन सभी से वापस जाने को कह दिया जाता है.

ये सभी लोग वर्ष 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा के रोहतक शहर में हुई तोड़फोड़ और आगज़नी के एक मुक़दमे में अभियुक्त हैं और हरियाणा सरकार के अनुसार, देशद्रोह के दोषी भी.

इन अभियुक्तों ने बीबीसी को बताया कि बीते ढाई साल में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोर्ट से सवा महीने बाद की तारीख़ (31 अक्तूबर 2019) मिली है क्योंकि राज्य में इस दौरान चुनाव होने हैं, वरना हर महीने कोर्ट के दो चक्कर तो लगते ही हैं.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

सीबीआई कोर्ट में लंबित मामले

इन अभियुक्तों के वकील कहते हैं, "रोहतक के इस सीबीआई केस में 70 से ज़्यादा लोग नामज़द हैं जिनमें से 16 लोग क़रीब तीन साल से जेल में क़ैद हैं. जेल में बंद किसी भी अभियुक्त पर आज तक कोई आरोप साबित नहीं हो सका है, फिर भी उन्हें ज़मानत नहीं मिल पाई. बाक़ी लोग ज़मानत पर तो हैं, लेकिन हर महीने उन्हें कोर्ट में पेश होना पड़ता है."

हरियाणा सरकार के अनुसार 2016 में हुए दंगों के बाद कुछ चुनिंदा मामले जाँच के लिए सीबीआई को सौंपे गए थे और ये सभी मामले सीबीआई कोर्ट में लंबित हैं.

इनके अलावा राज्य की ज़िला अदालतों में सौ से ज़्यादा मुक़दमे ऐसे हैं जिनमें नामज़द सैकड़ों लोग बीते तीन वर्षों से अदालतों के दरवाज़े पर हाज़िरी लगा रहे हैं.

इन सभी का भविष्य अधर में लटका हुआ है और ये नहीं जानते कि कभी दोषमुक्त हो भी पाएंगे या नहीं.

पर इनके परिवारों के लिए अदालतों के फ़ैसले का इंतज़ार किसी बड़ी सज़ा से कम नहीं है.

बीबीसी ने हरियाणा के कुछ ऐसे ही परिवारों से मुलाक़ात की और उनसे उनका हाल जानने की कोशिश की.

Image caption साहब कौर का घर

'जेल में बेटे को छूने भी नहीं देते'

सबसे पहले हमारी मुलाक़ात सांपला थाना क्षेत्र के नौनन्द गाँव में रहने वालीं 65 वर्षीय साहब कौर सिंधु से हुई.

वो हमारे सामने ही बैंक से होकर लौटी थीं. उन्होंने बताया कि वो बैंक में ये पता करने गई थीं कि किसानों को मिलने वाली दो हज़ार रुपये की क़िस्त अब तक क्यों नहीं आई?

इसके बाद साहब कौर ने अपने दो कमरे के मकान में चलने का आग्रह किया. पहले कमरे में दीवार पर टंगी एक रंगीन तस्वीर की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "ये मेरा बेटा हरिओम है."

28 वर्षीय हरिओम फ़रवरी 2016 से जेल में क़ैद हैं. उनपर देशद्रोह, तोड़फोड़, आगज़नी समेत कुछ अन्य धाराओं के तहत मुक़दमा दर्ज है.

उनके बड़े भाई श्री ओम एक बस चालक हैं. उन्होंने बताया कि हरिओम रोहतक शहर में किसी ठेकेदार के लिए काम करता था और जिस दिन रोहतक शहर में हिंसा हुई वो रोज़ की तरह अपने काम पर जाने के लिए घर से निकला था.

17 वर्ष पहले हरिओम के पिता गुज़र गये थे. उसके बाद साहब कौर ने ही दोनों बच्चों को पाला, पढ़ाया और खेती की भी ज़िम्मेदारी संभाली.

इस परिवार के पास महज़ पाँच बीघा ज़मीन है जिससे घर में खाने लायक़ अनाज पैदा हो जाता है. कुछ वक़्त पहले तक घर में एक भैंस थी जो क़र्ज़ के कारण बिक चुकी है.

साहब कौर बताती हैं कि "बड़े बेटे को ड्राइवरी से बारह हज़ार रुपये मिलते हैं. इनमें से आठ हज़ार रुपये मैं हरिओम को पहुँचा देती हूँ. जेल में चीज़ें बहुत महंगी हैं. दो वक़्त की रोटी के अलावा हर चीज़ के कई गुने पैसे लगते हैं."

"बचे हुए चार हज़ार रुपये में से एक हज़ार रुपये उससे मिलने जाने, खाने-पीने और सफ़र में ख़र्च हो जाते हैं. बाक़ी से घर चलता है."

घर के हालात बयां करते हुए साहब कौर की आँखें भर आती हैं. वो हरिओम की तस्वीर पर हाथ फेरते हुए कहती हैं, "मुझे मेरे बेटे को छूने भी नहीं देते. कहते हैं बस दो मिनट मिलेंगे. फिर उसे पीछे खींच लेते हैं."

गिरफ़्तारी से कुछ महीने पहले ही हरिओम एक पालतू कुत्ता लेकर आया था. अब वही साहब कौर के अकेलेपन का साथी है.

Image caption कुछ वक़्त पहले तक साहब कौर के घर में एक भैंस थी जो कर्ज़ के कारण बिक चुकी है

वो बताती हैं, "टाइगर मेरे बच्चे की तरह है. मुझे इससे इंसान जैसा सहारा रहता है. बड़ा बेटा नौकरी के चक्कर में रात को बाहर होता है तो टाइगर मेरी खाट के साथ ही सोता है. ये नहीं होता तो इन तीन साल में मैं मर जाती."

साहब कौर कहती हैं कि छोटे बेटे के जेल जाने के बाद घर का ख़र्च इतना बढ़ गया कि बड़े बेटे की शादी नहीं हो पाई.

उन्होंने कहा कि "बिरादरी में सबको पता है कि हरिओम की वजह से हमारे आर्थिक हालात बहुत ख़राब हो चुके हैं. ऐसी तंगहाली में कौन अपनी बेटी हमारे घर में देगा. और हमें ये भी नहीं पता कि ये स्थिति कब तक रहेगी."

नौनन्द गाँव से निकलते समय हरिओम के बड़े भाई ने हमसे कहा, "आंदोलन के बाद भड़काऊ बयान करने वाले किसी नेता को सज़ा नहीं हुई. वो आज भी हमसे वोट माँगने आते हैं. पर समाधान करने कोई नहीं आता."

'पता नहीं पीछा कैसे छूटेगा'

हरियाणा में 2016 के मुक़दमे झेल रहे क़रीब आधा दर्जन परिवारों से हमारी बात हुई और सभी ने इस बात को उठाया कि जब आंदोलन की अगुवाई कर रहे यशपाल मलिक को देशद्रोह के केस में बाहर ही बाहर ज़मानत मिल गई, तो साधारण परिवारों के बच्चों और छात्रों को जेलों में क्यों बंद किया गया?

ये सवाल रोहतक की एक कच्ची कालोनी में रहने वालीं कमला देवी ने भी उठाया.

कमला 45 वर्षीय जसवीर सिंह की माँ हैं जिनपर रोहतक शहर में तोड़फोड़ करने वाली दंगाई भीड़ में शामिल होने का आरोप है और सीबीआई इन आरोपों की जाँच कर रही है.

कमला ने बीबीसी को बताया, "जसवीर की ज़मानत करवाने के लिए हमें क़रीब डेढ़ एकड़ ज़मीन बेचनी पड़ी. वो बीते दस महीने से घर पर है तो थोड़ा सुकून है. वरना एक समय था जब बेटे का चेहरा देखने के लिए पूरे-पूरे दिन जेल के बाहर इंतज़ार में गुज़र जाया करते थे."

Image caption कमला देवी

जसवीर के पिता, 70 वर्षीय कुलदीप सिंह ने बताया कि उनका बेटा पहले महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था.

लेकिन ज़मानत पर छूटने के बाद जब वो अपनी नौकरी वापस माँगने गया तो यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उसे रखने से साफ़ मना कर दिया.

जसवीर अब रोहतक शहर में टेंपो चलाते हैं. वो कहते हैं, "कई साल पहले हिसार ज़िले से अपनी ज़मीन बेचकर हम रोहतक आये थे ताकि बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा सकें. मैं दिन में ऑटोरिक्शा चलाता था और रात में यूनिवर्सिटी में चौकीदारी करता था. हमारे लक्ष्य पूरे हो रहे थे. मैंने बच्चों के लिए कुछ पैसे भी जोड़ लिये थे. लेकिन 2016 के जाट आंदोलन के बाद सब बदल गया."

Image caption जसवीर दावा करते हैं कि यूनिवर्सिटी के पास हंगामा देखने वालों की भीड़ में सैकड़ों लोग थे, पर केस में मेरा नाम सिर्फ़ मेरी जाति देखकर डलवाया गया

कमला कहती हैं, "जसवीर की घरवाली भी परिवार को छोड़ने की बातें करने लगी थी. हमने छोटे बच्चों का वास्ता देकर उसे मनाया. उससे कहा कि हिम्मत रख, जसवीर आ जाएगा."

"वो आज भी काम से लौटने में देर कर दे तो मुझे लगने लगता है कहीं पुलिस ने तो नहीं पकड़ लिया. तारीख़ पर जाता है तो लगता है कहीं जज गिरफ़्तार करने को ना कह दे. हर वक़्त डर रहता है कि इस बार जसवीर गया तो उसे कैसे वापस लाएंगे. पता नहीं मेरे बेटे का इन सबसे पीछा छूट पाएगा या नहीं."

कुलदीप सिंह के अनुसार, ज़मानत पर रिहा होने के बाद भी महीने में दो बार जसवीर को पंचकूला की सीबीआई अदालत में पेशी के लिए जाना पड़ता है और उनकी मासिक आमदनी का कुछ हिस्सा इसी में ख़र्च हो जाता है.

जसवीर की माँ कहती हैं कि अगर उनके बेटे ने वाक़ई कुछ किया है तो उसे जल्द से जल्द सज़ा दे दी जाए. और अगर वो बेकसूर है, तो ये तिल-तिल मरना अब उनके परिवार से बर्दाश्त नहीं हो रहा.

'पुलिस रिमांड देखने लायक़ था'

देशद्रोह, आगजनी और तोड़फोड़ के मुक़दमे में तक़रीबन दो साल जेल में बंद रहे धर्मेंद्र ये दावा करते हैं कि जाट आरक्षण आंदोलन के बाद, 29 फ़रवरी 2016 को हरियाणा में सबसे पहली गिरफ़्तारी उन्हीं की हुई थी.

फ़िलहाल वो ज़मानत पर हैं और रोहतक के एक डिग्री कॉलेज में वकालत की पढ़ाई कर रहे हैं.

शहर से 14 किलोमीटर दूर स्थित खिडवाली गाँव से वास्ता रखने वाले 25 वर्षीय धर्मेंद्र को लगता है कि जाट आरक्षण आंदोलन व्यक्तिगत रूप से उन्हें बहुत महंगा पड़ा क्योंकि उनके हाथ से रेलवे की नौकरी चली गई.

धर्मेंद्र ने बताया कि "मास्टर्स ऑफ़ टूरिज़्म का कोर्स करने के बाद मुझे रेलवे (IRCTC) की नौकरी मिली थी. जुलाई 2015 में हमारी ट्रेनिंग शुरु हुई थी और जिस समय ये आरक्षण आंदोलन शुरु हुआ, मैं ट्रेनिंग के दौर में ही था."

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"मैं जिस ट्रेन में था वो पंजाब जा रही थी. हरियाणा के रेवाड़ी ज़िले में उसे आंदोलनकारियों ने रोका. हमसे कहा गया कि ट्रेन में सवार यात्रियों की लिस्ट बनाकर हम तहसीलदार को सौंप दें. इसके बाद मैं अपने गाँव चला आया था. तब रोहतक शहर में आंदोलन पूरे ज़ोरों पर था."

धर्मेंद्र बताते हैं कि उनके गाँव के अन्य लड़कों के कहने पर वो भी जाट प्रोटेस्ट का समर्थन करने रोहतक गए थे.

उन्होंने कहा, "देश में रोज़ हज़ारों आंदोलन होते हैं और मुझे लगता है कि अपनी माँगों के लिए प्रदर्शन करने में कुछ ग़लत नहीं है. फिर वहाँ बहुत सारे लोग पहले से मौजूद थे तो हम भी चले गए. लेकिन जब 26 फ़रवरी को मैंने अपना नाम अख़बार में पढ़ा तो मुझे कुछ समझ नहीं आया."

"पहले तो लगा कि आंदोलन के मामले हैं. कुछ नहीं होगा. लेकिन जब पुलिस ने सात दिन लगातार रिमांड लिया तो वो देखने लायक था. कई रात नींद नहीं आई. तो मैं सोच रहा था कि ऐसी कौनसी एक्टिविटी कर दी जो इतने प्रोफ़ेशनल करियर से आकर सीधे पुलिस का इस तरह सामना करना पड़ रहा है."

Image caption धर्मेंद्र फ़िलहाल रोहतक के एक डिग्री कॉलेज में वक़ालत की पढ़ाई कर रहे हैं.

धर्मेंद्र के पिता, 58 वर्षीय राम रतन खिडवाली गाँव में ही रहते हैं. उनके पास दो एकड़ ज़मीन है जिससे उन्हें सीमित आमदनी होती है.

वो इस बात से परेशान है कि उनके बेटे को हर महीने पेशी पर जाना पड़ता है जिसमें उनकी आमद का अच्छा ख़ासा हिस्सा ख़र्च हो जाता है. इसके अलावा धर्मेंद्र की फ़ीस का बंदोबस्त अब उन्हें भारी लगने लगा है.

वो कहते हैं कि जिस उम्र में बेटे को नौकरी कर घर की मदद करनी थी, उस उम्र में उसे नए सिरे से पढ़ाई करनी पड़ रही है.

धर्मेंद्र के मुताबिक़ वो आज भी हर महीने कम से कम दो बार पंचकूला के सीबीआई कोर्ट में पेश होते हैं.

अब अदालत को ये तय करना है कि रोहतक शहर में हुई तोड़फोड़ और हिंसा समेत अन्य मामलों में धर्मेंद्र का कोई रोल था या नहीं.

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Image caption रोहतक शहर की फ़ाइल तस्वीर, 2016

रोहतक शहर, एक केंद्र बिंदु

हरिओम, जसवीर और धर्मेंद्र. तीन अलग जगहों से आने वाले इन पात्रों की कहानी में हरियाणा का रोहतक शहर एक 'कॉमन' कड़ी की तरह है.

सरकारी रिपोर्टों के अनुसार ये शहर 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई तोड़फोड़, आगजनी, लूटपाट और हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित हुआ था.

हरियाणा सरकार के गृह विभाग के आदेश पर रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर प्रकाश सिंह ने राज्य के दो बड़े अधिकारियों के साथ मिलकर इन दंगों पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी.

इस रिपोर्ट के अनुसार, 7 फ़रवरी 2016 को जाट आरक्षण आंदोलन शुरु हुआ था. क़रीब 15 दिन चले इस आंदोलन के अंतिम 5 दिनों में राज्य के आठ ज़िले आगजनी, लूटपाट, तोड़फोड़ और हिंसा का शिकार हुए थे. इस दौरान आधिकारिक रूप से 30 लोगों की मौत हुई थी जिनमें से दो-तिहाई जाट समुदाय से थे.

प्रकाश कमेटी की रिपोर्ट में लिखा है कि फ़रवरी 2016 में हुई घटनाओं के आधार पर पूरे राज्य में तीन हज़ार से अधिक केस दर्ज किए गए थे जिनमें एक हज़ार से अधिक मामले अकेले रोहतक ज़िले के थे.

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बीजेपी सरकार का दावा

बीबीसी से ख़ास बातचीत में बीजेपी नेता जवाहर यादव ने माना कि साल 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के बाद राज्य पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज किये थे जिनमें बहुत से केस बाद में निराधार साबित हुए. लेकिन यादव ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हरियाणा की बीजेपी सरकार ने ही बाद में ऐसे मुक़दमों को ख़ारिज भी किया था.

जवाहर यादव एक समय मुख्यमंत्री मनोहर लाल के ओएसडी रह चुके हैं और मौजूदा समय में भारतीय जनता पार्टी के हरियाणा प्रदेश प्रचार एवं संपर्क प्रमुख हैं.

उन्होंने दावा किया कि "जो लोग निर्दोष थे और उनका नाम अगर किसी ऐसे केस में था जिससे किसी के जीवन पर कोई ख़तरा ना बना हो और किसी का आर्थिक नुकसान ना हुआ हो, उन मुक़दमों को हमारी सरकार वापस ले चुकी है. ऐसे मुक़दमों की संख्या सैकड़ों में थी जिन्हें एक लीगल प्रोसेस के ज़रिये सरकार ने वापस लिया है."

'ऑल इंडिया जाट आरक्षण बचाओ महाआंदोलन' के प्रमुख संयोजक धर्मवीर चौधरी बीजेपी नेता जवाहर यादव के इस दावे को चुनौती देते हैं.

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वो कहते हैं, "जाट समुदाय के आंदोलन का मक़सद सिर्फ़ आरक्षण के लिए सरकार पर दबाव बनाना था. लेकिन बीजेपी सरकार ने बाकी बिरादरियों को जाटों के ख़िलाफ़ भड़काया जिससे स्थिति ज़्यादा बिगड़ी. उपद्रवियों ने इस स्थिति का फ़ायदा उठाया और राज्य में अशांति फैली. ये सब सरकार की प्रशासनिक नाकामी की वजह से हुआ और ये बात प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट में भी सामने आ चुकी है."

धर्मवीर चौधरी दावा करते हैं, "ऐसा नहीं है कि उपद्रव के लिए हरियाणा में सिर्फ़ जाटों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज हुए थे. लेकिन मनोहर लाल सरकार ने इसमें भी पक्षपात किया और सिर्फ़ उनके मुक़दमे वापस लिए गए जो या तो ग़ैर-जाट थे या फिर जिन्होंने सत्ता के क़दमों में लेटने का विकल्प चुन लिया."

धर्मवीर चौधरी ने बीबीसी से बातचीत में ये भी स्पष्ट किया कि मौजूदा समय में हरियाणा में 'जाट आरक्षण आंदोलन' का कोई चेहरा नहीं है.

Image caption अभियुक्तों के वकील प्रदीप मलिक

'आंदोलन का जितना नुक़सान इन्हें, किसी और को नहीं'

फ़रवरी 2016 के जो मामले अदालतों में अब तक लंबित हैं, उनके बारे में समझने के लिए हमने रोहतक के वरिष्ठ वकील प्रदीप मलिक से भी बात की.

प्रदीप मलिक वकीलों के उस समूह में शामिल रहे हैं जिन्होंने इन मुक़दमों को क़रीब से देखा है और मौजूदा समय में कई अभियुक्तों के लिए वो सीबीआई कोर्ट में केस लड़ रहे हैं.

उन्होंने बताया, "रोहतक ज़िले में यूं तो हज़ार से ज़्यादा केस रजिस्टर हुए थे, लेकिन सरकार द्वारा केस वापस लिए जाने के बाद क़रीब 170 आपराधिक एफ़आईआर ऐसी रह गई थीं जिनमें गिरफ़्तारियाँ हुईं. रोहतक ज़िले के लगभग 300 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. इनमें से अधिकतर अब ज़मानत पर हैं, लेकिन कोर्ट से तारीख़ पर तारीख़ मिल रही हैं और ये सभी अधर में लटके हैं."

प्रदीप मलिक ने इस बात पर ज़ोर दिया कि साल 2016 में गिरफ़्तार हुए 300 लोगों में से सिर्फ़ एक अभियुक्त को ही कोर्ट ने अब तक दोषी पाया है और उसे आर्म्स एक्ट के तहत एक साल जेल की सज़ा सुनाई गई है.

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प्रदीप मलिक के अनुसार, "रोहतक ज़िले को छोड़कर बाक़ी राज्य की बात की जाए तो इसी साल जनवरी में हिसार ज़िले के एक मामले में तीन हिस्ट्रीशीटर बदमाशों को आंदोलन के दौरान एक ग़ैर-जाट की हत्या करने के आरोप में उम्र क़ैद की सज़ा हुई है. इस एक केस के अलावा कुछेक मामले और हैं जिनमें कुछ लोगों को आर्म्स एक्ट के तहत ही सज़ा सुनाई गई है. लेकिन लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए ये कुछ भी नहीं है."

अपने मुवक्किलों के बारे में बात करते हुए प्रदीप मलिक ने कहा कि "इस आंदोलन का जितना नुक़सान इनको हुआ है, वो किसी और को नहीं हो सकता. इन तीन सालों में ये परिवार पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं और अभी ये नहीं पता कि आगे कितना समय और लगने वाला है."

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आंदोलन के साढ़े तीन साल बाद भी साबित नहीं हो पाए सैकड़ों अभियुक्तों पर दंगा करने के आरोप

'सबको मिला मुआवज़ा', लेकिन...

फ़रवरी 2016 में पीएचडी चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के अध्यक्ष महेश गुप्ता ने कहा था कि जाट आरक्षण आंदोलन के कारण आर्थिक गतिविधियाँ रुकने से उत्तर भारत को तीस हज़ार करोड़ से अधिक का आर्थिक नुकसान हो सकता है.

कहा ये भी गया था कि रोहतक शहर में किला रोड पर हुई आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट ने इस शहर को दस साल पीछे धकेल दिया है. लेकिन रोहतक शहर पर अब इसका कोई असर दिखाई नहीं देता और बीजेपी सरकार खुलेआम इसका श्रेय लेती है.

बीजेपी नेता जवाहर यादव ने बीबीसी से बातचीत के दौरान ये दावा किया कि साल 2016 में जिन लोगों को आर्थिक नुकसान हुआ था, जिनकी दुकानें, वाहन या घर जला दिए गए थे, उन सभी को दंगों के बाद 60 दिन के भीतर मनोहर लाल सरकार ने पूरा मुआवज़ा दे दिया था.

उन्होंने कहा, "एक लाख तक के मुआवज़े तो एक सप्ताह के भीतर दे दिए गए थे."

लेकिन जब हमने यादव से पूछा कि सत्तर से ज़्यादा लोगों पर आज भी देशद्रोह की धाराएं लगी हुई हैं जिसकी वजह से 15 से अधिक लोग साढ़े तीन साल से जेल में बंद हैं. इन पर कोई आरोप अब तक साबित नहीं हुआ. अदालत कह चुकी है कि मनोहर लाल सरकार देशद्रोह के मामलों को रिव्यू करे, तो सरकार ने कभी इन मामलों को वापस लेने का विचार क्यों नहीं किया?

इसके जवाब में यादव ने कहा, "वो केस सीबीआई के पास हैं. केंद्रीय एजेंसी जाँच कर रही है. हमारी सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है."

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आख़िरी उम्मीद किससे?

अंत में जब हमने अभियुक्तों के परिजनों ने पूछा कि क्या हरियाणा में सत्ता परिवर्तन से उन्हें कोई राहत मिलने की उम्मीद है? तो उनका जवाब हैरान करने वाला था.

ये परिवार मानते हैं कि हरियाणा में बीजेपी की जगह अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो वो भी चाहेगी कि 2016 के अभियुक्तों को कम या ज़्यादा, पर सज़ा ज़रूर हो और इसके पीछे राजनीतिक कारण छिपे हैं.

इनके अनुसार, "दोनों पार्टियाँ जाति की राजनीति करती हैं. जिस तरह बीजेपी ने बाकी बिरादरियों के वोट एक तरफ करने के लिए जाटों को कटघरे में खड़ा किया, उसी तरह कांग्रेस उस वोट बैंक से अपना हिस्सा वापस पाने के लिए हमें सूली पर चढ़ाना चाहेगी ताकि वो ये कह सके कि बीजेपी सरकार जिन दोषियों को सज़ा नहीं दिला पाई, उन्हें सज़ा दिलाकर कांग्रेस पार्टी ने हरियाणा का इंसाफ़ किया."

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इसलिए चाहे मुख्यमंत्री मनोहर लाल हों या विपक्ष के बड़े नेता भुपिंदर सिंह हुड्डा, दोनों के लिए इन परिवारों के मन में गुस्सा भरा पड़ा है.

इन्हें आज भी अगर उम्मीद है तो देश के क़ानून और अदालत से है.

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