कौन लोग हैं जिन्हें 'बच्चे की दुआ' से दिक़्क़त है?: नज़रिया

  • 25 अक्तूबर 2019
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कुछ उर्दू/ हिन्दुस्तानी अलफ़ाज़ हों, कहीं ख़ुदा, रब या अल्लाह जैसे शब्द आ जायें और लिखने वाले को इक़बाल कहते हों तो कुछ लोगों के कान खड़े होने के लिए इतना काफ़ी है.

उनके लिए शब्दों के भेद जानना अहम नहीं है. उनके ज़हन में शब्दों से निकलने वाली आवाज़ों की छवियाँ हैं. उन छवियों में कोई धर्म है. उस धर्म की ख़ास छवि है.

वही छवि उनके लिए असल मायने है.

फिर चाहे, हम कितनी भी मानेख़ेज़ बात कहें, लिखें या बोलें, वे उन्हें उन छवियों से ही तौल देते हैं. सिरे से ख़ारिज करने की भरपूर कोशिश करते हैं. इस कोशिश में वे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि 'भारत' शब्द से बनने वाली तस्वीर को ही तोड़ने लगते हैं.

अगर हम वाक़ई में देखना चाहते हैं तो हाल के दिनों में ऐसा बहुत कुछ दिख सकता है. ताजा मामला एक नज़्म के सिलसिले में हैं. नज़्म लिखने वाले ने इसे 'बच्चे की दुआ' नाम दिया था. यही दुआ अरसे से भारत के कई हिस्सों में उर्दू और हिन्दी में पढ़ाई जाती है.

कई स्कूलों की प्रार्थनाओं में शामिल है.

अब आपत्ति दर्ज़ करने वालों की सोच है कि यह दुआ तो ख़ास धर्म की पैरवी है. यह मदरसे की दुआ है. स्टूडेंटों से इसे गवाना देशभक्ति नहीं है. दिलचस्प तो यह है कि यह नज़्म स्कूल की किताबों का हिस्सा हो सकता है लेकिन सभी स्टूडेंट मिलजुलकर उसे बुलंद आवाज़ में नहीं गा सकते हैं. इसे गाने वालों को ख़ास धर्म का होना चाहिए, ऐसा ही कुछ लोग मान रहे हैं.

क्या यह ख़तरनाक विचारों को फैलाने वाली कोई नज़्म है? सबसे पहले नज़्म पर ही नज़र डाली जाए-

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

ज़िंदगी शम्मा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!

दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए!

हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!

हो मिरे दम से यों ही मेरे वतन की ज़ीनत

जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब!

इल्म की शम्मा से हो मुझ को मोहब्बत या-रब!

हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना

दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना

मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को

नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझ को

(बांगे दरा, कुलियात ए इक़बाल, पेज- 34)

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Image caption उत्तर प्रदेश के पीलीभीत के एक स्कूल में प्रार्थना करतीं छात्राएं

इस नज़्म के मायने

यानी इस नज़्म को लय में गाने वाले बच्चे-बच्चियाँ हमसे किसी तरह की कोई लम्बी- चौड़ी माँग नहीं करती हैं. इनकी दुआ तो बिल्कुल अलग किस्म की है.

इनकी ख़्वाहिश है, हमारी ज़िंदगी दिये की तरह रोशनी फैलाने वाली हो. दुनिया में छाया अँधेरा दूर करें. हम अँधेरा नहीं, उजाला फैलाने वाली/ वाले बनें.

ये दुआ कर रही/रहे हैं कि उन्हें ऐसा बनने का मौक़ा और हौसला मिले ताकि उनसे देश की इज़्ज़त बढ़े. वतन का नाम बदनाम न हो. वे अपने को फुलवाड़ी में खिले फूल की मानिंद बता रहे हैं. इल्म से उनकी मोहब्बत हो, इसकी दुआ कर रहे हैं.

और तो और, वे यह सब हासिल कर कैसा इंसान बनना चाहती/ चाहते हैं?… तो ये दुआ कर रहे/रही हैं कि हमें हमदर्द बनाना, मददगार बनाना.

मगर किसके लिए? ग़रीबों, दुखियारों, बुज़ुर्गों के लिए...ये सचेत हैं कि कहीं ऐसा न हो भटकाव आ जाए. स्वार्थ हावी हो जाए. तो इनकी प्रार्थना है, हमें बुराई से बचाए रखना.

अगर कहीं ग़लत रास्ते पर क़दम बढ़ें तो हमारे क़दम नेकी के रास्ते पर ले जाना. कुल मिलाकर इनकी दुआ क्या है? यही न कि ये ख़ुद नेक इंसान बनें. देशभक्त बनें. वंचितों के मददगार बनें. समाज के लिए काम आएँ. दुनिया में फैले हर तरह के अँधेरे मिटाएँ.

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हम अपने बच्चों को कैसा बनाना चाहते हैं?

क्या हम बतौर समाज, इन दुआओं को मासूमों की ज़िंदगी का सच बनाने के लिए कोशिश करनी तो दूर उन पर ग़ौर करने को भी तैयार नहीं हैं?तो हम अपने मासूमों को कैसा बनना चाहते हैं... नफ़रत करने वाला. बुरा. झूठा. गरीबों, बुज़ुर्गों को उनके हाल पर छोड़ देने वाला. सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने बारे में सोचने वाला?एक और बात. इस नज़्म का नाम है, 'बच्चे की दुआ'. इसे मुसलमान, हिन्दू, सिख, ईसाई या बौद्ध बच्चे-बच्चियों की दुआ नहीं कहा गया है... सभी बच्चे-बच्चियों की दुआ मानी गयी. है न‌?

तो क्या हम अपनी नयी पीढ़ी को सबके साथ दुआ माँगते नहीं देखना चाहते? या एक-दूसरे की दुआओं में शामिल होते हुए नहीं देखना चाहते?तो क्या हमें 'ख़ुदा' से दुआ पर परहेज़ है? वैसे, जिन्हें ईश्वर में यक़ीन है, उनके लिए ऊपरवाला, ख़ुदा, अल्लाह, गॉड, भगवान सब एक ही निराकार के अलग-अलग ज़बानों में पहचान के शब्द हैं. तब ही तो गाँधी जी का प्रिय भजन यही कहता है,

रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीता राम

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान...

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महात्मा गांधी का जिक्र आता है तो अक्सर दो तरह की तस्वीरें जेहन में आती हैं.

'मेरा वतन वही है'

अब इस नज़्म को लिखने वाले पर भी थोड़ी बात कर ली जाए. इसके रचियता इक़बाल हैं. वही, 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' लिखने वाले इक़बाल.

भारत क्या है, 'तराना ए हिन्दी' में इसका बखान करने वाले इक़बाल.इन्हीं इक़बाल साहेब ने एक और नज़्म लिखी थी- 'हिन्दुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत'. अगर हम इसे उर्दू मानकर हिन्दी में तर्जुमा करने को बज़िद हैं तो इसे 'भारतीय बच्चों का राष्ट्रीय गीत' भी कह सकते हैं.

इस गीत में एक लाइन बार बार आती है- मेरा वतन वही है, मेरी वतन वही है. 'वही'... मतलब... जिस ज़मीं पर ख़्वाज़ा मोइनुद्दीन चिश्ती ने सच्चाई का संदेश दिया, गुरु नानक ने जहाँ एकता का गीत गया... यूनान वाले जहाँ आकर हैरान रह गये और जिसने सारे जहाँ को इल्म और हुनर दिया... वही... मेरा वतन वही है.इक़बाल ने स्कूल के लिए भी किताबों की रचना की है. इन किताबों के ज़रिये भी वे बच्चे-बच्चियों में जो भाव पैदा करना चाहते हैं, वह है देश से मोहब्बत का पाक जज़्बा. देश की मिलीजुली संस्कृति पर फ़ख़्र. सोचने-समझने का बड़ा दायरा. ख़ुद पर भरोसा. ख़ुद्दारी. बेहतर इंसान बनने का जज़्बा.

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Image caption अल्लामा इक़बाल

क्या हमने अब तय कर लिया है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को इन जज़्बातों की हवा से भी बचा कर रखेंगे?

क्या हम उन्हें इसलिए बचाना चाहते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि इनकी हवा लगने से वे हमदर्द इंसान बन जाएँ?

नतीजा, अपने और अपने परिवारजनों से इतर समाज के दूसरे हिस्सों के बारे में भी सोचने लगें?

सचमुच हम सब उलट-पुलट करने में लगे हैं. हम सब कुछ धर्म के दायरे में देख रहे हैं या देखने के आदी बनाये जा रहे हैं.

जो नहीं देखते थे, वे भी अब गाहे-ब-गाहे धर्म का ऐनक चढ़ा ले रहे हैं. हम इतिहास से भी सबक लेने को राज़ी नहीं है.

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