चुनावी नतीजों के रुझान में ट्विस्ट और कांग्रेस में बदलता मूड

  • 24 अक्तूबर 2019

अगर आप दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय में मौजूद हों तो आपको चुनावी नतीजों का रुझान जानने के लिए टीवी या मोबाइल फ़ोन पर नज़र रखने की ज़रुरत नहीं पड़ती. सुबह कुछ घंटों तक सन्नाटा छाया रहे तो समझ लीजिये नतीजों के रुझान नकारात्मक होंगे.

अगर रुझान में ट्विस्ट हो या कोई नया मोड़ आया हो तो थोड़ी हल-चल पैदा होगी, बॉडी लैंग्वेज बदलता नज़र आएगा. उत्साह बढ़ता दिखाई देगा. अगर नतीजे अपनी अपेक्षा से बेहतर हों तो पार्टी के बड़े नेता भी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में दफ़्तर का रुख़ करने लगते हैं. ग़ायब नेता अचानक से नमूदार होने लगते हैं.

गुरूवार को भी कुछ ऐसा ही हुआ. सुबह 8 बजे से वोटों की गिनती शुरू होने के बाद से शुरुआती रुझान आने तक 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस मुख्यालय के अंदर माहौल ठंडा था. लेकिन दिन चढ़ते जब नतीजों के रुझान में एक ट्विस्ट आया तो यहाँ उत्साह बढ़ने लगा. कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ने लगी और कुछ वरिष्ठ नेता भी आने लगे. सुबह में वो अपनी यक़ीनी हार को मान कर चल रहे थे. पार्टी के हरियाणा के उत्तेजित नेता जगदीश शर्मा ने कहा कि पार्टी की हार होगी लेकिन उनके अनुसार उसकी वजह भारतीय जनता पार्टी द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का ग़लत इस्तेमाल है. 

दोपहर के बाद रुझान थोड़ा और साफ़ होने लगा तो कांग्रेस के दफ्तर में माहौल और भी गर्म हुआ. अब थोड़ा जोश भी दिखा. हरियाणा से पार्टी नेता जयवीर शेरगिल ने हमें बताया कि जनता ने उनके राज्य में बीजेपी को ख़ारिज कर दिया है. उन्होंने आज़ाद उम्मीदवारों और जेजेपी के 36 वर्षीय नेता दुष्यंत चौटाला के सहयोग से सरकार बनाने की संभावना पर ज़ोर देना शुरू कर दिया.

शेरगिल ने महाराष्ट्र में भी पार्टी का अब तक के रुझान के अनुसार प्रदर्शन बेहतर बताया. 

पार्टी मुख्यालय में जगदीश शर्मा और दूसरे कार्यकर्ताओं ने कहा कि उनकी पार्टी के उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन का मुख्य कारण था चुनावी मुहीम में महंगाई और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों को उठाना. वो कहते हैं, "मोदी ने कश्मीर और अनुच्छेद 370 के मुद्दों को उठाया.जनता ने इसे रद्द कर दिया"   

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कांग्रेस के दफ़्तर में पार्टी के नेता जितना ऑन रिकॉर्ड बातें करते हैं उससे अधिक ऑफ दा रिकॉर्ड. अपनी पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा करते हुए एक प्रवक्ता ने कहा कि राहुल गाँधी अगर पार्टी की अध्यक्षता से इस्तीफ़ा न देते और कार्यकर्ताओं की मांग पर इस्तीफ़ा वापस ले लेते तो महाराष्ट्र में बीजेपी को चुनौती दी जा सकती थी. 

अब हरियाणा और महाराष्ट्र में सरकारें जिसकी भी बनें रुझान से एक बात साफ़ है कि कांग्रेस पार्टी ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया है. शेरगिल ने कहा, "मीडिया और एग्जिट पोल ने हमें टांग दिया था, कहा हम मिट जाएंगे. अब जो नतीजे आये हैं उससे वो क्या कहेंगे?"

मीडिया और एग्जिट पोल तो दूर, सच तो ये है कि कांग्रेस मुख्यालय में मौजूद भारतीय मीडिया के पत्रकार रुझान में ट्विस्ट के बाद भी कांग्रेस को चुनावी डस्ट बिन में फेंकने पर तुले थे. रुझान के रुख़ के बदलने के बाद एक पत्रकार ने लाइव इंटरएक्शन में कहा, "डूबती कांग्रेस को तिनके का सहारा मिल गया है."  

सच तो ये है कि कांग्रेस पार्टी के अंदर भी लोगों को ये उम्मीद नहीं थी कि दोनों राज्यों में उनका प्रदर्शन इतना अच्छा होगा. वो चुनाव से पहले ही हार मान चुके थे. चुनावी मुहीम के दौरान बीबीसी से बातें करते हुए महाराष्ट्र के कई नेताओं और कार्यकताओं ने कहा था कि वो लीडरशिप से मायूस हैं क्यूंकि उन्होंने पूरा दम नहीं लगाया. गुरुवार को शेरगिल ने ये स्वीकार किया कि अगर राज्य में पार्टी के नेताओं के बीच खींचा-तानी नहीं होती तो पार्टी का प्रदर्शन और भी बेहतर होता.

राहुल गाँधी ने महाराष्ट्र में केवल छह रैलियां कीं और हरियाणा में दो रैली में गए लेकिन इससे पहले उनके हेलीकॉप्टर में कोई तकनीकी ख़राबी आ गयी और रैली को रद्द करना पड़ा. पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने दोनों राज्यों में एक भी रैली नहीं की. ऐसा लगता था कि दोनों नेता मैच से पहले ही शिकस्त मान चुके थे. लेकिन हक़ीक़ृत ये है कि पिछले एक साल में महाराष्ट्र के तीन दौरे में मुझे लगा कि कांग्रेस कार्यकर्ता राहुल गाँधी के प्रति उतने ही वफ़ादार हैं जैसे कि बीजेपी के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी के प्रति. मैंने ये भी पाया कि कांग्रेस की पहुँच झोपड़ पट्टियों से लेकर गावों तक अब भी बाक़ी है.   

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दूसरी तरफ़ कांग्रेस की सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने दर्जनों रैलियां कीं. एक रैली के दौरान तेज़ बारिश होने लगी और 78 वर्षीय शरद पवार पूरी तरह से भीग गए, उनकी सफ़ेद शर्ट भी पानी से भीग गयी. क्या उनकी इस तस्वीर ने महाराष्ट्र के वोटरों पर गहरा असर छोड़ा? शायद. एनसीपी के कई नेता पार्टी छोड़ कर बीजेपी और शिव सेना में शामिल हो गए थे. चुनाव से पहले ऐसा लग रहा था कि पार्टी अपने वजूद के लिए लड़ रही है. 

लेकिन चुनावी मुहीम के दौरान मुझे पार्टी के नेता नवाब मालिक ने कहा था कि उनकी पार्टी से बग़ावत करके पार्टी छोड़ने वाले नेताओं से उनकी रातों की नींद हराम नहीं हो रही है.

उनका कहना था, "हमारे युवा नेताओं के लिए ये एक अच्छा अवसर होगा. इस बार नहीं तो अगली बार वो ज़रूर जीतेंगे."  

शरद पवार ने भी पार्टी के बाग़ियों की परवाह नहीं की लेकिन मीडिया ने पार्टी की मृत्युलेख लिखना शुरू कर दिया था. बाग़ी नेताओं का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा जिसके बाद पवार ने कहा कि जनता ने उन्हें ख़ारिज कर दिया है. 

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एनसीपी ने 2014 का विधान सभा चुनाव कांग्रेस से गठबंधन तोड़ कर अकेले लड़ा था. इससे पहले दोनों पार्टियां साथ-साथ तीन विधानसभा चुनाव लड़ीं थीं और इन्होंने लगातार तीन बार सरकर बनाया था. इस तरह 2014 की भूल को दोनों पार्टियों ने दोहराने की मूर्खता न करते हुए गठबंधन बनाया जिसका परिणाम अब तक के रुझान के अनुसार सकारात्मक रहा है. 

कांग्रेस और एनसीपी महाराष्ट्र में भले ही सरकार न बनाएं लेकिन निश्चित रूप से वो एक मज़बूत विपक्ष की भूमिका निभा सकते हैं. इसी तरह हरियाणा में कांग्रेस सरकार न भी बनाये तो पार्टी एक मज़बूत विपक्षी दल की तरह सरकार पर कड़ी नज़र बनाए रख सकती है.

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