उत्तर प्रदेश उपचुनाव: 7 सीटें जीतने के बावजूद नुकसान में बीजेपी

  • 25 अक्तूबर 2019
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हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के साथ गुरुवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा में 11 सीटों पर उपचुनाव के नतीजे भी आए हैं.

इन चुनावों में बीजेपी अपनी ज़्यादातर सीटें बचाने में भले ही लगभग क़ामयाब रही लेकिन बिखरे विपक्ष और विपक्षी नेताओं की कथित निष्क्रियता के चलते उसे जिस परिणाम की उम्मीद थी, वो हासिल नहीं हुआ.

11 में से सात सीटों पर बीजेपी और एक सीट पर उसकी सहयोगी अपना दल (एस) को जीत हासिल हुई है जबकि तीन सीटों पर समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की है. कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी को एक भी सीट हासिल नहीं हुई.

बीजेपी अपनी सात सीटें बचाने में क़ामयाब रही लेकिन बाराबंकी ज़िले की जैदपुर सीट समाजवादी पार्टी ने उसके हाथ से छीन ली. पार्टी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं कि 'हमें उम्मीद थी कि हम इससे ज़्यादा सीटें लाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हो सका.'

बकौल राकेश त्रिपाठी, "हमें उम्मीद थी कि हम रामपुर की सीट भी इस बार जीतेंगे भले ही सामाजिक समीकरण हमारे अनुकूल नहीं थे लेकिन ऐसा नहीं हो सका. यह उम्मीद हमें केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों की बदौलत थी. हमें जैदपुर सीट हारने का भी कष्ट है लेकिन जिस तरीक़े से बेहद कम मतदान हुआ था, उसे देखते हुए परिणाम संतोषजनक हैं."

सबसे दिलचस्प मुक़ाबला रहा जलालपुर सीट पर जहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच कांटे की टक्कर रही और आख़िरकार समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सुभाष राय ने बहुजन समाज पार्टी की छाया वर्मा को महज़ 790 मतों से हरा दिया.

बिखरा विपक्ष

यह सीट बहुजन समाज पार्टी के नेता रितेश पांडेय के लोकसभा में पहुंचने के चलते खाली हुई थी. इस सीट के परिणाम का असर यह हुआ कि उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी शून्य हो गई यानी अपनी एकमात्र सीट भी नहीं बचा पाई.

जहां तक बात नफ़े नुक़सान की है तो इसमें कोई शक़ नहीं कि सीटों के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा फ़ायदा समाजवादी पार्टी को हुआ. सपा न सिर्फ़ रामपुर में अपनी सीट को बचाने में क़ामयाब रही बल्कि जैदपुर की सीट बीजेपी से और जलालपुर सीट बीएसपी से उसने छीन भी ली.

वहीं कांग्रेस पार्टी के लिए ये चुनाव कोई ख़ास बदलाव नहीं ला सके. इस उपचुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिली. इनमें से कोई सीट पहले भी कांग्रेस के पास नहीं थी.

लेकिन सहारनपुर के गंगोह में जिस तरह कांग्रेस उम्मीदवार शुरू से ही आगे चल रहा था, कांग्रेस पार्टी के भीतर भी ये उम्मीद जग गई कि यह सीट उसके खाते में जा सकती है. लेकिन आख़िरकार बीजेपी उम्मीदवार कीरत सिंह ने 5,419 मतों से कांग्रेस उम्मीदवार नोमान मसूद को मात दे दी.

नोमान मसूद के समर्थकों ने प्रशासन के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की तो नोमान मसूद ने आरोप लगाया कि वो चुनाव हारे नहीं हैं बल्कि हराए गए हैं. गंगोह के परिणामों को लेकर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी नाराज़गी जताई.

रायबरेली में कार्यकर्ता सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंची प्रियंका ने कहा कि इस परिणाम की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए. हालांकि सहारनपुर के ज़िलाधिकारी आलोक पांडेय ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया.

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कांग्रेस के मत प्रतिशत में इजाफ़ा

कांग्रेस पार्टी की उम्मीदवार करिश्मा ठाकुर कानपुर की गोविंद नगर सीट पर दूसरे नंबर पर रहीं जहां बीजेपी उम्मीदवार सुरेंद्र मैथानी ने उन्हें क़रीब 21 हज़ार मतों से हराया.

जहां तक मत प्रतिशत का सवाल है तो कांग्रेस पार्टी ने पिछले चुनाव की तुलना में अपने मत प्रतिशत में लगभग दोगुने की बढ़ोतरी की और पार्टी के नेता इसे ही अपनी उपलब्धि बता रहे हैं.

पार्टी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू कहते हैं, "विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़कर लगभग दोगुना हुआ है. उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी ने आंदोलनों और संघर्षों के दम पर लगभग 12 फ़ीसदी से अधिक वोट पाया. उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा नुक़सान भाजपा को हुआ है, लोकसभा चुनावों के बरक्स भाजपा का वोट 14 प्रतिशत के करीब घटा है."

उपचुनावों में बीजेपी को छोड़कर किसी अन्य पार्टी ने प्रचार कार्यों में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखाई थी. कांग्रेस और बीएसपी का कोई बड़ा नेता चुनाव प्रचार के लिए नहीं आया तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव सिर्फ़ रामपुर में प्रचार करने गए. हालांकि रामपुर में आज़म ख़ान की पत्नी तज़ीन फ़ातिमा चुनाव जीत गईं और ये बता गईं कि बीजेपी को यहां जीत के लिए अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा.

वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कालहंस कहते हैं कि चुनाव प्रचार में बीजेपी को ज़्यादा नुक़सान भले ही न हुआ हो लेकिन ये परिणाम उसके लिए चेतावनी ज़रूर दे गए हैं.

वो कहते हैं, "चुनाव प्रचार की कमान पूरी तरह से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथ में थी. विपक्ष बिखरा हुआ तो था ही उसमें चुनाव लड़ने को लेकर कोई उत्साह भी नहीं था. बड़े नेता प्रचार से दूर रहे. दूसरी ओर बीजेपी ने चुनाव प्रचार में कोई क़सर नहीं छोड़ी. ऐसी स्थिति में यदि इस तरह के परिणाम आए हैं तो निश्चित तौर पर अगले चुनावों में ये बीजेपी के लिए ख़तरे की घंटी है. वो भी तब, जबकि हरियाणा और महाराष्ट्र के परिणाम इस तरह के आए हैं."

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बसपा सबसे नुकसान में

इन चुनावों में यदि सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ है तो वो है बहुजन समाज पार्टी का. बहुजन समाज पार्टी ने पहली बार उपचुनाव में हिस्सा लिया था लेकिन उसका कोई लाभ उसे नहीं मिला जबकि कांग्रेस पार्टी के लिए ये उपचुनाव निश्चित तौर पर उत्साह बढ़ाने वाले निकले.

जलालपुर सीट समाजवादी पार्टी ने उससे छीन ही ली, यहां बीएसपी के कद्दावर नेता लालजी वर्मा की बेटी छाया वर्मा का चुनाव हारना भी उसके लिए सदमे से कम नहीं है. बीएसपी नेता मायावती ने इस हार के पीछे बीजेपी की चाल बताया है.

मायावती ने ट्वीट किया है, "यूपी विधानसभा आम चुनाव से पहले बीएसपी के लोगों का मनोबल गिराने के षडयंत्र के तहत बीजेपी द्वारा सपा को कुछ सीटें जिताने व बीएसपी को एक भी सीट नहीं जीतने देने को पार्टी के लोग अच्छी तरह से समझ रहे हैं. वे इनके इस षड्यंत्र को फ़ेल करने के लिए जी-जान से जुटेंगे."

यही नहीं बीएसपी कई सीटों पर तीसरे और चौथे नंबर पर भी रही है. वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "मायावती को इस बात की भनक पहले से ही थी कि वो उपचुनाव में कुछ हासिल करने नहीं जा रही हैं लेकिन कम से कम अपनी जीती सीट तो बचा ही सकती थीं. लेकिन उन्होंने उसके लिए भी कोशिश नहीं की और महाराष्ट्र- हरियाणा के विधान सभा चुनाव में प्रचार करती रहीं. वहां तो कुछ हासिल हुआ नहीं, यहां जो था, वो भी चला गया."

"दूसरी ओर, उनके अपने मतदाताओं की स्थिति भी काफ़ी दुविधापूर्ण है. बीजेपी के प्रति उनका लगाव ऐसा ही रहा तो कोई आश्चर्य नहीं कि 2022 के विधान सभा चुनाव में उनकी पार्टी की स्थिति 2017 से भी नीचे चली जाए."

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